देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 437, कुल 889 में से
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| ४२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रणम्याग्रे स्थिताः सर्वा देववाराङ्गनास्तदा ।<br>दिव्याभरणभूषाढ्या दिव्यमालोपशोभिताः ॥ २९ | उस समय दिव्य वस्त्र तथा आभूषणोंसे विभूषित और दिव्य मालाओंसे सुशोभित देवलोककी वे अप्सराएँ प्रणाम करके सामने खड़ी हो गयीं॥ २९॥ |
| जगुश्छलेन ताः सर्वाः पृथिव्यामतिदुर्लभम् ।<br>तत्तथावस्थितं दिव्यं मन्मथादिविवर्धनम् ॥ ३० | तत्पश्चात् वे अनेक प्रकारके हाव-भाव प्रदर्शित करती हुई छलपूर्वक पृथ्वीतलपर अत्यन्त दुर्लभ एवं कामवासनावर्धक गीत गाने लगीं। |
| शुश्राव भगवान्विष्णुर्नरो नारायणस्तदा ।<br>श्रुत्वा प्रोवाच तास्तत्र प्रीत्या नारायणो मुनिः ॥ ३१ | भगवान् नर-नारायणने उस गीतको सुना। तदनन्तर उसे सुनकर नारायणमुनिने प्रेमपूर्वक उनसे कहा—तुमलोग आनन्दसे बैठो, मैं तुम्हारा अद्भुत आतिथ्य-सत्कार करूँगा। |
| आस्यतां सुखमत्रैव करोम्यातिथ्यमद्भुतम् ।<br>भवत्योऽतिथिधर्मेण प्राप्ताः स्वर्गात्सुमध्यमाः ॥ ३२ | हे सुन्दरियो! तुमलोग स्वर्गसे यहाँ आयी हो, अतएव हमारी अतिथिरूपा हो॥ ३०—३२॥ |
| व्यास उवाच<br>साभिमानस्तु सञ्जातस्तदा नारायणो मुनिः ।<br>इन्द्रेण प्रेषिता नूनं तथा विघ्नचिकीर्षया ॥ ३३ | व्यासजी बोले— हे राजन्! उस समय मुनि नारायण अभिमानमें आकर सोचने लगे कि निश्चितरूपसे इन्द्रने हमारे तपमें बाधा डालनेकी इच्छासे इन्हें भेजा है। ये सब बेचारी क्या चीज हैं, मैं अभी अपना तपोबल दिखाता हूँ और इनसे भी अधिक दिव्य रूपवाली नवीन अप्सराएँ उत्पन्न करता हूँ॥ ३३-३४॥ |
| वराक्यः का इमाः सर्वाः सृजाम्यद्य नवाः किल ।<br>एताभ्यो दिव्यरूपाश्च दर्शयामि तपोबलम् ॥ ३४ | |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा करेणोरुं प्रताड्य वै ।<br>तरसोत्पादयामास नारीं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥ ३५ | मनमें ऐसा विचार करके उन्होंने हाथसे अपनी जंघापर आघातकर तत्काल एक सर्वाङ्गसुन्दरी स्त्री उत्पन्न कर दी॥ ३५॥ |
| नारायणोरुसम्भूता ह्युर्वशीति ततः शुभा ।<br>ददृशुस्ताः स्थितास्तत्र विस्मयं परमं ययुः ॥ ३६ | वह सुन्दरी भगवान् नारायणके ऊरुदेश (जंघा)-से उत्पन्न हुई थी, अतः उसका नाम उर्वशी पड़ा। वहाँ उपस्थित वे अप्सराएँ उर्वशीको देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं॥ ३६॥ |
| तासां च परिचर्यार्थं तावतीश्चातिसुन्दरीः ।<br>प्रादुश्चकार तरसा तदा मुनिरसम्भ्रमः ॥ ३७ | तदनन्तर उन अप्सराओंकी सेवाके लिये मुनिने तत्काल उतनी ही अन्य अत्यन्त सुन्दर अप्सराएँ उत्पन्न कर दीं। हाथमें विविध प्रकारके उपहार लिये हँसती हुई तथा मधुर गीत गाती हुई उन सब अप्सराओंने उन मुनियोंको प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़ी हो गयीं॥ ३७-३८॥ |
| गायन्त्यश्च हसन्त्यश्च नानोपायनपाणयः ।<br>प्रणेमुस्ता मुनी सर्वाः स्थिताः कृत्वाञ्जलिं पुरः ॥ ३८ | |
| तां वीक्ष्य विभ्रमकरीं तपसो विभूतिं<br>देवाङ्गना हि मुमुहुः प्रविमोहयन्त्यः ।<br>ऊचुश्च तौ प्रमुदिताननपद्मशोभा<br>रोमोद्गमोल्लसितचारुनिजाङ्गवल्ल्यः ॥ ३९ | लोगोंको मोहमें डाल देनेवाली वे [इन्द्रप्रेषित] अप्सराएँ तपस्याकी विभूति उस विस्मयकारिणी उर्वशीको देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठीं। उन अप्सराओंके मुखकमल आनन्दातिरेकसे खिल उठे तथा उनके मनोहर शरीररूपी वल्लरियोंपर रोमांचरूपी अंकुर निकल आये। वे अप्सराएँ उन दोनों मुनियोंसे कहने लगीं—॥ ३९॥ |