भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 436
अ० ६ ]चतुर्थ स्कन्ध४२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नीलेन्दीवरनेत्रा सा बिल्ववृक्षफलस्तनी।<br>प्रोत्फुल्लकुन्दरदना मञ्जरीकर्णशोभिता॥ १५<br>बन्धुजीवाधरा शुभ्रा सिन्धुवारनखोद्भवा।<br>पुंस्कोकिलस्वरा पुण्या कदम्बवसना शुभा॥ १६<br>बर्हिवृन्दकलापा च सारसस्वननूपुरा।<br>वासन्ती बद्धरशना मत्तहंसगतिस्तथा॥ १७<br>पुत्रजीवांशुकन्यस्तरोमराजिविराजिता ।<br>वसन्तलक्ष्मीः सम्प्राप्ता ब्रह्मन् बदरिकाश्रमे॥ १८नीले कमल जिसके नेत्र हैं, बिल्व-वृक्षके फल जिसके स्तन हैं, खिले हुए कुन्दके फूल जिसके दाँत हैं, आमके बौर जिसके कान हैं, बन्धुजीव (गुलदुपहरिया)-के पुष्प जिसके शुभ्र अधर हैं, सिन्धुवारके पुष्प जिसके नख हैं, कोयलके समान जिसका स्वर है, कदम्बके पुष्प जिस सुन्दरीके पावन वस्त्र हैं, मयूरपंखोंके समूह जिसके आभूषण हैं, सारसोंका स्वर जिसका नूपुर है, माधवी लता जिसकी करधनी है—ऐसी मत्त हंसके समान गतिवाली तथा इंगुदीके पत्तोंको रोमस्वरूप धारण की हुई वसन्तश्री इस बदरिकाश्रममें छायी हुई है॥ १४—१८॥
अकाले किमियं प्राप्ता विस्मयोऽयं ममाधुना।<br>तपोविघ्नकरा नूनं देवर्षे परिचिन्तय॥ १९मुझे तो यह महान् आश्चर्य हो रहा है कि असमयमें यह यहाँ क्यों आ गयी? हे देवर्षे! आप यह निश्चित समझिये कि इस समय यह हमलोगोंकी तपस्यामें विघ्न डालनेवाली है॥ १९॥
श्रूयते सुरनारीणां गानं ध्यानविनाशनम्।<br>आवयोस्तपिभङ्गाय कृतं मघवता किल॥ २०<br>ऋतुराडन्यथाकाले प्रीतिं सञ्जनयेत्कथम्।<br>विघ्नोऽयं विहितो भाति भीतेनासुरशत्रुणा॥ २१<br>वाताः सुगन्धाः शीताश्च समायान्ति मनोहराः।<br>नान्यत्कारणमस्तीह शतक्रतुकृतिं विना॥ २२ध्यान भंग कर देनेवाला यह देवांगनाओंका गीत सुनायी दे रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि हम दोनोंका तप नष्ट करनेके लिये इन्द्रने ही यह उपक्रम रचा है। अन्यथा ऋतुराज वसन्त अकालमें कैसे प्रीति प्रकट कर सकता है? जान पड़ता है कि भयभीत होकर असुरोंके शत्रु इन्द्रके द्वारा ही यह विघ्न उपस्थित किया गया है। सुरभित, शीतल एवं मनोहर हवाएँ चल रही हैं; इसमें इन्द्रकी चालके अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है॥ २०—२२॥
इति ब्रुवति विप्राग्र्ये देवे नारायणे विभौ।<br>सर्वे दृष्टिपथं प्राप्ता मन्मथप्रमुखास्तदा॥ २३<br>ददर्श भगवान्सर्वान्नरो नारायणस्तथा।<br>विस्मयाविष्टमनसौ बभूवतुरुभावपि॥ २४विप्रवर विभु भगवान् नारायण ऐसा कह ही रहे थे कि कामदेव आदि सभी दिखायी पड़ गये। भगवान् नर तथा नारायणने उन सबको प्रत्यक्ष देखा और इससे उन दोनोंके मनमें महान् आश्चर्य हुआ॥ २३-२४॥
मन्मथं मेनकां चैव रम्भां चैव तिलोत्तमाम्।<br>पुष्पगन्धां सुकेशीं च महाश्वेतां मनोरमाम्॥ २५<br>प्रमद्वरां घृताचीञ्च गीतज्ञां चारुहासिनीम्।<br>चन्द्रप्रभां च सोमां च कोकिलालापमण्डिताम्॥ २६<br>विद्युन्मालामम्बुजाक्ष्यौ च तथा काञ्चनमालिनीम्।<br>एताश्चान्या वरारोहा दृष्टास्ताभ्यां तदन्तिके॥ २७<br>तासां द्व्यष्टसहस्राणि पञ्चाशदधिकानि च।<br>वीक्ष्य तौ विस्मितौ जातौ कामसैन्यं सुविस्तरम्॥ २८कामदेव, मेनका, रम्भा, तिलोत्तमा, पुष्पगन्धा, सुकेशी, महाश्वेता, मनोरमा, प्रमद्वरा, गीतज्ञ और सुन्दर हास्य करनेवाली घृताची, चन्द्रप्रभा, कोकिलके समान आलाप करनेवाली सोमा, विद्युन्माला, अम्बुजाक्षी और कांचनमालिनी—इन्हें तथा अन्य भी बहुत-सी सुन्दर अप्सराओंको नर-नारायणने अपने पास उपस्थित देखा। उनकी संख्या सोलह हजार पचास थी, कामदेवकी उस विशाल सेनाको देखकर वे दोनों मुनि चकित हो गये॥ २५—२८॥