भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 435

| ४२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बभूवुः कोकिलालापा वृक्षाग्रेषु मनोहराः।<br>वल्ल्योऽपि पुष्पिताः सर्वा आलिङ्गिर्नगोत्तमान्॥ ३वृक्षोंकी डालियोंपर कोयलोंकी मनोहारिणी कूक आरम्भ हो गयी। पुष्पोंसे लदी हुई सभी लताएँ ऊँचे पर्वतोंपर चढ़ने लगीं॥ ३॥
प्राणिनः स्वासु भार्यासु प्रेमयुक्ताः स्मरातुराः।<br>बभूवुश्चातिमत्ताश्च क्रीडासक्ताः परस्परम्॥ ४सभी प्राणी अपनी-अपनी भार्याओंमें प्रेमासक्त हो गये तथा मत्त होकर परस्पर क्रीड़ा करने लगे॥ ४॥
ववुर्मन्दाः सुगन्धाश्च सुस्पर्शा दक्षिणानिलाः।<br>इन्द्रियाणि प्रमाथीनि मुनीनामपि चाभवन्॥ ५मन्द, सुगन्धयुक्त तथा सुखद स्पर्शवाली दक्षिणी हवाएँ चलने लगीं। उस समय मुनियोंकी भी वृत्तियाँ अतीव चंचल हो उठीं॥ ५॥
रतियुक्तस्ततः कामः पूरयन्पञ्चमार्गणाम्।<br>चकार त्वरितस्तत्र वासं बदरिकाश्रमे॥ ६तत्पश्चात् अपनी भार्या रतिके साथ कामदेव भी अपने पंचबाणोंको छोड़ता हुआ तत्काल बदरिकाश्रम पहुँचकर वहाँ रहने लगा॥ ६॥
रम्भा तिलोत्तमाद्याश्च गत्वा तत्र वराश्रमे।<br>गानं चक्रुः सुगीतज्ञाः स्वरतानसमन्वितम्॥ ७संगीतकलामें अत्यन्त प्रवीण रम्भा और तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ भी उस रमणीक बदरिकाश्रममें पहुँचकर स्वर तथा तानमें आबद्ध गीत गाने लगीं॥ ७॥
तच्छ्रुत्वा मधुरोद्गीतं कोकिलानाञ्च कूजितम्।<br>भ्रमरालिविरावञ्च प्रबुद्धौ तौ मुनीश्वरौ॥ ८उस मधुर गायन, कोयलोंकी कूक तथा भ्रमर-समूहोंका गुंजार सुनकर उन दोनों मुनिवरोंका ध्यान भंग हो गया॥ ८॥
ऋतुराजमकाले तु दृष्ट्वा तौ पुष्पितं वनम्।<br>जातौ चिन्तापरौ तत्र नरनारायणावृषी॥ ९<br><br>किमद्य शिशिरापायः संवृतः समयं विना।<br>प्राणिनो विह्वलाः सर्वे लक्ष्यन्तेऽतिस्मरातुराः॥ १०<br><br>कालधर्मविपर्यायः कथमद्य दुरासदः।<br>नरं नारायणः प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ ११असमयमें ही वसन्तका आगमन तथा सम्पूर्ण वनको पुष्पोंसे सुशोभित देखकर वे दोनों नर तथा नारायणऋषि चिन्तित हो उठे [वे सोचने लगे कि] क्या आज समय पूरा हुए बिना ही शिशिर ऋतु बीत गयी? इस समय तो समस्त प्राणी कामसे पीड़ित होनेके कारण अत्यन्त विह्वल दिखायी पड़ रहे हैं। कालके स्वभाव तथा नियममें यह अद्भुत परिवर्तन आज कैसे हो गया? विस्मयके कारण विस्फारित नेत्रोंवाले मुनि नारायण नरसे कहने लगे॥ ९-११॥
नारायण उवाच<br>पश्य भ्रातरिमे वृक्षाः पुष्पिताः प्रतिभान्ति वै।<br>कोकिलालापसङ्घुष्टा भ्रमरालिProcess: भ्रमरालिविराजिताः॥ १२नारायण बोले— हे भाई! देखो, ये सभी वृक्ष पुष्पोंसे लदे हुए सुशोभित हो रहे हैं। इन वृक्षोंपर कोयलोंकी मधुर ध्वनि हो रही है तथा भ्रमरोंकी पंक्तियाँ विराजमान हैं॥ १२॥
शिशिरं भीममातङ्गं दारयन्स्वखरैर्नखैः।<br>वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने॥ १३हे मुने! यह वसन्तरूपी सिंह अपने पलाशपुष्परूपी तीखे नाखूनोंसे शिशिररूपी भयानक हाथीको विदीर्ण करता हुआ यहाँ आ पहुँचा है॥ १३॥
रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका।<br>नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना॥ १४हे देवर्षे! लाल अशोक जिसके हाथ हैं, किंशुकके पुष्प जिसके पैर हैं, नील अशोक जिसके केश हैं, विकसित श्याम कमल जिसका मुख है,