देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 434, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 434
अ० ६ ] चतुर्थ स्कन्ध ४२५
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| प्रलोभितौ मयात्यर्थं वरदानैस्तपस्विनौ।<br>स्थानान्न चलितौ शान्तौ वृथायं मे गतः श्रमः ॥ ४४<br><br>तथा वै मायया कृत्वा भीषितौ तापसौ भृशम्।<br>तथापि नोत्थितौ स्थानाद्देहरक्षापरौ न तौ ॥ ४५ | मैंने उन दोनों तपस्वियोंको वरदानोंके द्वारा बहुत प्रलोभन दिया, किंतु वे अपने स्थानसे विचलित नहीं हुए, बल्कि शान्त बैठे रहे। मेरा यह परिश्रम व्यर्थ चला गया। मैंने माया रचकर उन तपस्वियोंको बहुत डराया, फिर भी वे अपने आसनसे नहीं उठे। वे दोनों शरीररक्षाके लिये जरा भी चिन्तित नहीं हैं ॥ ४४-४५ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा शक्रं प्राह मनोभवः।<br>वासवाद्य करिष्यामि कार्यं ते मनसेप्सितम् ॥ ४६<br><br>यदि विष्णुं महेशं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम्।<br>ध्यायन्तौ तौ तदास्माकं भवितारौ वशौ मुनी ॥ ४७<br><br>देवीभक्तं वशीकर्तुं नाहं शक्तः कथञ्चन।<br>कामराजं महाबीजं चिन्तयन्तं मनस्यलम् ॥ ४८<br><br>तां देवीं चेन्महाशक्तिं संश्रितौ भक्तिभावतः।<br>न तदा मम बाणानां गोचरौ तापसौ किल ॥ ४९ | व्यासजी बोले—इन्द्रका यह वचन सुनकर कामदेवने उनसे कहा—हे इन्द्र! मैं अभी आपका मनोवांछित कार्य करूँगा। यदि वे दोनों मुनि विष्णु, शिव, ब्रह्मा अथवा सूर्य किसीका ध्यान करते होंगे, तो वे हमारे वशमें हो जायेंगे। मैं केवल कामराज महाबीज 'क्लीं' का अपने मनमें चिन्तन करनेवाले देवीभक्तको वशमें करनेमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हूँ। यदि वे भक्ति-भावसे महाशक्तिस्वरूपा देवीकी उपासनामें लगे होंगे, तो मेरे बाणोंका प्रभाव उन तपस्वियोंपर नहीं पड़ेगा ॥ ४६–४९ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>गच्छ त्वं च महाभाग सर्वैस्तत्र समुद्यतैः।<br>कार्यं ममातिदुःसाध्यं कर्ता हितमनुत्तमम् ॥ ५० | इन्द्र बोले—हे महाभाग! जानेके लिये उद्यत इन सभीके साथ तुम वहाँ जाओ। यद्यपि मेरा यह कार्य अत्यन्त दुःसाध्य है, फिर भी तुम इस हितकर तथा उत्तम कार्यको पूर्ण कर ही लोगे ॥ ५० ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तेन समादिष्टा ययुः सर्वे समुद्यताः।<br>यत्र तौ धर्मपुत्रौ द्वौ तेपाते दुष्करं तपः ॥ ५१ | व्यासजी बोले—इस प्रकार इन्द्रका आदेश पाकर वे लोग पूरी तैयारीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ वे धर्मपुत्र नर-नारायण कठोर तपस्या कर रहे थे ॥ ५१ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
नरनारायणकथावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
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अथ षष्ठोऽध्यायः
कामदेवद्वारा नर-नारायणके समीप वसन्त ऋतुकी सृष्टि, नारायणद्वारा उर्वशीकी उत्पत्ति, अप्सराओं Child / द्वारा नारायणसे स्वयंको अंगीकार करनेकी प्रार्थना
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| व्यास उवाच<br>प्रथमं तत्र सम्प्राप्तो वसन्तः पर्वतोत्तमे।<br>पुष्पिताः पादपाः सर्वे द्विरेफालिविराजिताः ॥ १<br><br>आम्राश्च बकुला रम्यास्तिलकाः किंशुकाः शुभाः।<br>सालास्तालास्तमालाश्च मधूकाः पुष्पिता बभुः ॥ २ | व्यासजी बोले—सर्वप्रथम उस पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर वसन्त पहुँचा। उस पर्वतपर स्थित सभी वृक्ष पुष्पित हो गये और उनपर भ्रमरोंके समूह मँडराने लगे ॥ १ ॥<br><br>आम, मौलसिरी, रम्य, तिलक, सुन्दर किंशुक, साल, ताल, तमाल तथा महुए—ये सब-के-सब फूलोंसे सुशोभित हो गये ॥ २ ॥ |