देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 433, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| चिन्तयन्तौ महाविद्यामादिशक्तिं सनातनीम्।<br>ईश्वरीं सर्वलोकानां परां प्रकृतिमद्भुताम्॥ ३१<br><br>ध्यायतां कः क्षमो लोके बहुमायाविद्वप्युत।<br>यन्मूलाः सकला माया देवासुरकृताः किल॥ ३२<br><br>ते कथं बाधितुं शक्ता ध्यायन्ति गतकल्मषाः।<br>वाग्बीजं कामबीजञ्च मायाबीजं तथैव च॥ ३३<br><br>चित्ते यस्य भवेत्तं तु बाधितुं कोऽपि न क्षमः।<br>मायया मोहितः शक्रो भूयस्तस्य प्रतिक्रियाम्॥ ३४ | आदिशक्ति, सनातनी, सब लोकोंकी स्वामिनी और अद्भुत परा-प्रकृतिका ध्यान कर रहे थे। देवताओं तथा असुरोंके द्वारा रची गयी सारी माया जिन भगवतीसे ही उत्पन्न होती है, उनका ध्यान करनेवालेको विचलित करनेमें कौन समर्थ है, चाहे वह कितना ही बड़ा मायाविज्ञ क्यों न हो? जो लोग कल्मषरहित होकर भगवतीका ध्यान करते हैं, वे भला कैसे विचलित किये जा सकते हैं? देवीका वाग्बीज, कामबीज और मायाबीज—यह जिसके हृदयमें विद्यमान है, उसे विचलित करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है॥ ३०—३३ १/२॥ | | कर्तुं कामवसन्तौ तु समाहूयाब्रवीद्वचः।<br>मनोभव वसन्तेन रत्या युक्तो व्रजाधुना॥ ३५<br><br>अप्सरोभिः समायुक्तस्तरसा गन्धमादनम्।<br>नरनारायणौ तत्र पुराणावृषिसत्तमौ॥ ३६<br><br>कुरुतस्तप एकान्ते स्थितौ बदरिकाश्रमे।<br>गत्वा तत्र समीपे तु तयोर्मन्मथ मार्गणैः॥ ३७<br><br>चित्तं कामातुरं कार्यं कुरु कार्यं ममाधुना।<br>मोहयित्वोच्चाटयित्वा विशिखैस्ताडयाशु च॥ ३८ | अब मायासे मोहित इन्द्रने पुनः उनका प्रतीकार करनेहेतु कामदेव तथा वसन्तको बुलाकर यह वचन कहा—हे कामदेव! तुम वसन्त और रतिको लेकर अनेक अप्सराओंके साथ उस गन्धमादनपर्वतपर अभी शीघ्रतापूर्वक जाओ। वहाँ 'नर-नारायण' नामक दो प्राचीन श्रेष्ठ ऋषि बदरिकाश्रमके एकान्त स्थानमें स्थित होकर तपस्या कर रहे हैं। हे मन्मथ! उनके पास जाकर तुम अपने बाणोंसे उनके चित्तको कामासक्त कर दो। उनका मोहन तथा उच्चाटन करके तुम अपने बाणोंसे उन्हें शीघ्र आहत कर डालो; मेरा यह कार्य अभी सिद्ध करो॥ ३४—३८॥ | | वशीकुरु महाभाग मुनी धर्मसुतावपि।<br>को ह्यस्मिन् सर्वसंसारे देवो दैत्योऽथ मानवः॥ ३९<br><br>यस्ते बाणवशं प्राप्तो न याति भृशताडितः।<br>ब्रह्माहं गिरिजानाथश्चन्द्रो वह्निर्विमोहितः॥ ४०<br><br>गणना कानयोः काम त्वद्बाणानां पराक्रमे। | इस प्रकार हे महाभाग! धर्मके पुत्र उन दोनों मुनियोंको वशीभूत कर लो। इस सम्पूर्ण संसारमें देवता, दैत्य या मनुष्य कौन ऐसा है, जो तुम्हारे बाणके वशीभूत होकर अत्यन्त कामासक्त न हो जाय? हे कामदेव! जब ब्रह्मा, मैं (इन्द्र), शिव, चन्द्रमा या अग्नि भी मोहित हो जाते हैं तब तुम्हारे बाणोंके पराक्रमके सामने उन दोनोंकी क्या गणना है?॥ ३९-४० १/२॥ | | वाराङ्गनागणोऽयं ते सहायार्थं मयेरितः॥ ४१<br><br>आगमिष्यति तत्रैव रम्भादीनां मनोरमः।<br>एका तिलोत्तमा रम्भा कार्यं साधयितुं क्षमा॥ ४२<br><br>त्वमेवैकः क्षमः कामं मिलितैः कस्तु संशयः।<br>कुरु कार्यं महाभाग ददामि तव वाञ्छितम्॥ ४३ | तुम्हारी सहायताके लिये मेरे द्वारा यह रम्भा आदि अप्सराओंका समूह भेजा जा रहा है, जो वहाँ पहुँच जायगा। अकेली तिलोत्तमा या रम्भा ही इस कार्यको करनेमें समर्थ है अथवा तुम अकेले भी इसे करनेमें समर्थ हो, तब सभी सम्मिलित रूपसे कार्य सिद्ध कर लेंगे; इसमें सन्देहकी बात ही क्या? हे महाभाग! तुम मेरे इस कार्यको सम्पन्न करो, मैं तुम्हें वांछित वस्तु प्रदान करूँगा॥ ४१—४३॥ |