भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 432

| अ० ५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२३ | | :--- | :--- |

| उत्पाद्य कामं क्रोधञ्च लोभं वाप्यतिदारुणम्।<br>इत्युद्दिश्य सहस्राक्षः समारुह्य गजोत्तमम्॥ १९<br><br>विघ्नकामस्तु तरसा जगाम गन्धमादनम्।<br>गत्वा तत्राश्रमे पुण्ये तावपश्यच्छतक्रतुः॥ २० | अब इनके मनमें काम, क्रोध अथवा अत्यन्त भीषण लोभ उत्पन्न करके तपमें विघ्न करना चाहिये। यह विचारकर इन्द्र अपने उत्तम ऐरावत हाथीपर सवार होकर उनके तपमें विघ्न डालनेकी इच्छासे गन्धमादनपर्वतपर शीघ्रतापूर्वक जा पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने उस पवित्र आश्रममें तप करते हुए नर-नारायणको देखा॥ १९-२०॥ | | तपसा दीप्तदेहौ तु भास्कराविव चोदितौ।<br>ब्रह्मविष्णू किमेतौ वै प्रकटौ वा विभावसू॥ २१<br><br>धर्मपुत्रावृषी एतौ तपसा किं करिष्यतः।<br>इति सञ्चिन्त्य तौ दृष्ट्वा तदोवाच शचीपतिः॥ २२<br><br>किं वा कार्यं महाभागौ ब्रूतं धर्मसुतौ किल।<br>ददामि वां वरं श्रेष्ठं दातुं यातोऽस्म्यहमृषी॥ २३<br><br>अदेयमपि दास्यामि तुष्टोऽस्मि तपसा किल। | उस समय तपके प्रभावसे दीप्त शरीरवाले वे दोनों ऋषि उगे हुए सूर्यकी भाँति प्रतीत हो रहे थे। [इन्द्रने सोचा—] क्या ये ब्रह्मा और विष्णु प्रकट हुए हैं अथवा दो सूर्य उदित हो गये हैं? धर्मके ये दोनों पुत्र अपने तपद्वारा न जाने क्या कर देंगे? ऐसा विचार करके शचीपति इन्द्रने नर-नारायणकी ओर देखकर उनसे कहा—हे महाभाग धर्मनन्दन! आपलोगोंका क्या कार्य है, बताइये। मैं श्रेष्ठ वर अभी प्रदान करता हूँ। हे ऋषियो! मैं वर देनेके लिये ही आया हूँ। वर अदेय हो तो भी मैं दूँगा; क्योंकि मैं आप लोगोंकी तपस्यासे परम प्रसन्न हूँ॥ २१—२३ १/२ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं पुनः पुनः शक्रस्तावुवाच पुरः स्थितः॥ २४<br><br>नोचतुस्तावृषी ध्यानसंस्थितौ दृढचेतसौ।<br>ततो वै मोहिनीं मायां चकार भयदां वृषः॥ २५<br><br>वृकान्सिंहांश्च व्याघ्रांश्च समुत्पाद्याबिभीषयत्।<br>वर्षं वातं तथा वह्निं समुत्पाद्य पुनः पुनः॥ २६<br><br>भीषयामास तौ शक्रो मायां कृत्वा विमोहिनीम्।<br>भयतोऽपि वशं नीतौ न तौ धर्मसुतौ मुनी॥ २७<br><br>नरनारायणौ दृष्ट्वा शक्रः स्वभवनं गतः।<br>वरदाने प्रलुब्धौ न न भीतौ वह्निवायुतः॥ २८<br><br>व्याघ्रसिंहादिभिः क्रान्तौ चलितौ नाश्रमात्स्वकात्।<br>न तयोर्ध्यानभङ्गं वै कर्तुं कोऽपि क्षमोऽभवत्॥ २९ | व्यासजी बोले— इस प्रकार उनके सामने खड़े होकर इन्द्रने बार-बार उनसे [वरदान माँगनेको] कहा, किंतु ध्यानमग्न तथा दृढ़चित्त वे दोनों ऋषि नहीं बोले। तब इन्द्रने अपनी भयदायिनी मोहिनी माया प्रकट की। उन्होंने भेड़िये, सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओंको उत्पन्न करके उन्हें भयभीत किया। इसी प्रकार वर्षा, वायु तथा अग्नि उत्पन्न करके इन्द्रने अपनी मोहिनी माया रचकर उन दोनोंको भयभीत करनेकी चेष्टा की किंतु धर्मपुत्र वे दोनों मुनि इस भयसे भी वशमें नहीं किये जा सके। ऐसे उन नर-नारायणको देखकर इन्द्र अपने भवन चले गये। वे नर-नारायण वरदानके लोभमें नहीं आये और अग्नि तथा वायुसे भयभीत नहीं हुए। व्याघ्र, सिंह आदिके आक्रमण करनेपर भी वे दोनों अपने आसनसे हिलेतक नहीं। उन दोनोंके ध्यानको भंग करनेमें उस समय कोई भी समर्थ नहीं हो सका॥ २४—२९॥ | | इन्द्रोऽपि सदनं गत्वा चिन्तयामास दुःखितः।<br>चलितौ भयलोभाभ्यां नेमौ मुनिवरोत्तमौ॥ ३० | इन्द्र भी अपने घर पहुँचकर दुःखित होकर विचार करने लगे कि मुनिवरोंमें उत्तम ये दोनों ऋषि भय तथा लोभसे विचलित नहीं हुए। वे तो महाविद्या, |

देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 432, कुल 889 में से · BharatKosha