देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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४२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
| संस्कृत | हिन्दी |
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| यः कश्चित्तापसः शान्तो जपध्यानपरायणः।<br>भवेत्तस्य जपे विघ्नकर्ता वै मघवा परम्॥ ५ | यदि कोई तपस्वी शान्त होकर जप-ध्यानमें लीन हो जाता है तो इन्द्र उसके जपमें विघ्न डालनेहेतु तत्पर हो जाते हैं॥ ५॥ |
| सतां सत्ययुगं साक्षात्सर्वदैवासतां कलिः।<br>मध्यमो मध्यमानां तु क्रियायोगौ युगे स्मृतौ॥ ६ | सज्जन पुरुषोंके लिये हर समय सत्ययुग दिखलायी पड़ता है और दुष्ट लोगोंके लिये सर्वदा कलियुग ही रहता है। जिस युगमें क्रिया तथा योग व्यवस्थित रहते हैं, वे द्वापर तथा त्रेतारूप मध्यम युग मध्यम कोटिके लोगोंके लिये कहे गये हैं॥ ६॥ |
| कश्चित्कदाचिद्भवति सत्यधर्मानुवर्तकः।<br>अन्यथान्ययुगानां वै सर्वे धर्मपरायणाः॥ ७<br>वासना कारणं राजन् सर्वत्र धर्मसंस्थितौ।<br>तस्यां वै मलिनायां तु धर्मोऽपि मलिनो भवेत्॥ ८<br>मलिना वासना सत्यं विनाशायेति सर्वथा। | अतः किसी समय भी कोई सत्यधर्मा हो सकता है अथवा सभी युगोंमें जो चाहे धर्मपरायण हो सकता है। हे राजन्! सर्वत्र धर्मकी स्थितिमें वासना ही प्रधान कारण मानी गयी है। उसमें मलिनता आ जानेपर धर्म भी मलिन हो जाता है। मलिन वासना विनाशके लिये होती है; यह सर्वथा सत्य है॥ ७-८ १/२॥ |
| ब्रह्मणो हृदयाज्जातः पुत्रो धर्म इति स्मृतः॥ ९<br>ब्राह्मणः सत्यसम्पन्नो वेदधर्मरतः सदा।<br>दक्षस्य दुहितारो हि वृता दश महात्मना॥ १०<br>विवाहविधिना सम्यङ् मुनिना गृहधर्मिणा।<br>तास्वजीजनयत्पुत्रान्धर्मः सत्यवतां वरः॥ ११<br>हरिं कृष्णं नरं चैव तथा नारायणं नृप।<br>योगाभ्यासरतो नित्यं हरिः कृष्णो बभूव ह॥ १२<br>नरनारायणौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम्।<br>प्रालेयाद्रिं समागत्य तीर्थे बदरिकाश्रमे॥ १३ | ब्रह्माजीके हृदयसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो धर्म—इस नामसे कहा गया। वह ब्राह्मण सत्यसम्पन्न और वैदिक धर्ममें सदा संलग्न रहनेवाला था। उस गृहस्थधर्मी महात्मा मुनिने पाणिग्रहणकी विधिसे दक्षप्रजापतिकी दस कन्याओंका सम्यक् रूपसे वरण किया। सत्यव्रतियोंमें श्रेष्ठ उस धर्मने उनसे 'हरि', 'कृष्ण', 'नर' और 'नारायण' नामक चार पुत्र उत्पन्न किये। हे राजन्! उनमें 'हरि' और 'कृष्ण' ये दोनों योगाभ्यास करने लगे तथा नर और नारायण ये दोनों हिमालयपर्वतके शिखरपर जाकर 'बदरिकाश्रम' तीर्थमें कठिन तपस्या करने लगे॥ ९—१३॥ |
| तपस्विषु धुरीणौ तौ पुराणौ मुनिसत्तमौ।<br>गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे॥ १४<br>हरेरंशौ स्थितौ तत्र नरनारायणावृषी।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु चक्राते तप उत्तमम्॥ १५<br>तापितं च जगत्सर्वं तपसा सचराचरम्।<br>नरनारायणाभ्यां च शक्रः क्षोभं तदा ययौ॥ १६ | वे प्राचीन मुनिश्रेष्ठ नर और नारायण तपस्वियोंमें सबसे प्रधान थे। गंगाके विस्तृत तटपर रहकर ब्रह्मचिन्तन करते हुए भगवान् विष्णुके अंशावतार नर-नारायणने वहाँ पूरे एक हजार वर्षोंतक कठोर तप किया। उनके तपसे चराचरसहित सम्पूर्ण संसार सन्तप्त हो गया। इससे इन्द्रके मनमें नर-नारायणके प्रति क्षोभ उत्पन्न हो गया॥ १४—१६॥ |
| चिन्ताविष्टः सहस्राक्षो मनसा समकल्पयत्।<br>किं कर्तव्यं धर्मपुत्रौ तापसौ ध्यानसंयुतौ॥ १७<br>सिद्धार्थौ सुभृशं श्रेष्ठमासनं मे ग्रहीष्यतः।<br>विघ्नः कथं प्रकर्तव्यस्तपो येन भवेन्न हि॥ १८ | तब चिन्तित होकर इन्द्रने अपने मनमें सोचा—अब मुझे क्या करना चाहिये? ये धर्मपुत्र नर-नारायण तपस्वी तथा ध्यानपरायण हैं। ये पूर्णरूपसे सिद्ध होकर मेरा श्रेष्ठ आसन ग्रहण कर लेंगे, अतः किस प्रकार विघ्न उत्पन्न करूँ, जिससे तप न कर सकें॥ १७-१८॥ |