देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 430, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 430
| अ० ५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| करोति सुकृतं तद्वद्विपरीतं भवेत्किल ।<br>स्वार्थासक्तः पुमान्नित्यं न जानाति शुभाशुभम् ॥ ४७<br>दैवाधीनः सदा कुर्यात्पापमेव न सत्कृतम् ।<br>प्राजापत्याः सुराः सर्वे ह्यसुराश्च तदुद्भवाः ॥ ४८<br>सर्वे ते स्वार्थनिरताः परस्परविरोधिनः ।<br>सत्त्वोद्भवाः सुराः सर्वेऽप्युक्ता वेदेषु मानुषाः ॥ ४९<br>रजोद्भवास्तामसास्तु तिर्यञ्चः परिकीर्तिताः ।<br>सत्त्वोद्भवानां तैर्वैरं परस्परमनारतम् ॥ ५०<br>तिरश्चामत्र किं चित्रं जातिवैरसमुद्भवे ।<br>सदा द्रोहपरा देवास्तपोविघ्नकरास्तथा ॥ ५१<br>असन्तुष्टा द्वेषपराः परस्परविरोधिनः ।<br>अहङ्कारसमुद्भूतः संसारोऽयं यतो नृप ॥ ५२<br>रागद्वेषविहीनस्तु स कथं जायते नृप ॥ ५३ | विपरीत फल मिलता है। स्वार्थमें लिप्त मनुष्य शुभाशुभका ज्ञान नहीं रख पाता और दैवाधीन होकर सदा पाप ही किया करता है, पुण्य नहीं ॥ ४४—४७½ ॥<br>प्रजापति ब्रह्मासे ही देवता उत्पन्न हुए हैं और उन्हींसे असुरोंकी भी उत्पत्ति हुई है। वे सब-के-सब स्वार्थमें लिप्त होकर एक-दूसरेके विरुद्ध काम करते हैं। वेदोंमें कहा गया है कि सत्त्वगुणसे सभी देवता, रजोगुणसे मनुष्य तथा तमोगुणसे पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनिके जीव उत्पन्न होते हैं। अतएव जब सत्त्वगुणसे उत्पन्न देवताओंमें भी निरन्तर आपसमें वैरभाव रहता है तब पशु-पक्षियोंमें परस्पर जातिवैर उत्पन्न होनेमें क्या आश्चर्य ! देवता भी सदैव द्रोहमें तत्पर रहते हैं और तपस्यामें विघ्न डाला करते हैं। हे नृप ! वे सदा असन्तुष्ट रहते हुए द्वेषपरायण होकर आपसमें विरोधभाव रखते हैं। अतः हे राजन् ! जब यह संसार ही अहंकारसे उत्पन्न हुआ है, तब वह राग-द्वेषसे हीन हो ही कैसे सकता है ? ॥ ४८—५३ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
अधमजगतः स्थितिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
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अथ पञ्चमोऽध्यायः
नर-नारायणकी तपस्यासे चिन्तित होकर इन्द्रका उनके पास जाना और मोहिनी माया प्रकट करना तथा उससे भी अप्रभावित रहनेपर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंको भेजना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br>अथ किं बहुनोक्तेन संसारेऽस्मिन्नृपोत्तम ।<br>धर्मात्माद्रोहबुद्धिस्तु कश्चिद्भवति कर्हिचित् ॥ १<br>रागद्वेषावृतं विश्वं सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।<br>आद्ये युगेऽपि राजेन्द्र किमद्य कलिदूषिते ॥ २ | व्यासजी बोले—हे नृपोत्तम! अब अधिक कहनेसे क्या लाभ? इस संसारमें कहीं बिरला ही ऐसा कोई धर्मात्मा पुरुष होगा जो द्रोहभावसे रहित हो। यह चर-अचर सम्पूर्ण संसार राग-द्वेषसे ओत-प्रोत है। हे राजेन्द्र! सत्ययुगमें भी यह संसार ऐसा ही था, तब कलिसे दूषित इसके विषयमें क्या कहा जाय? ॥ १-२ ॥ |
| देवाः सेर्ष्याश्च सद्रोहाश्छलकर्मरताः सदा ।<br>मानुषाणां तिरश्चां च का वार्ता नृप गण्यते ॥ ३<br>द्रोहपरे द्रोहपरो भवेदिति समानता ।<br>अद्रोहिणि तथा शान्ते विद्वेषः खलता स्मृता ॥ ४ | हे राजन्! जब देवता भी सदा ईर्ष्यायुक्त, द्रोहसे भरे हुए और छल-परायण रहते हैं, तब मनुष्य तथा पशु-पक्षियोंकी बात ही क्या है? यदि कोई मनुष्य द्रोह करनेवालेके प्रति द्रोहभाव रखे तो यह समानताकी बात है, किंतु द्रोह न करनेवाले तथा शान्त स्वभाववालेके प्रति विद्वेष रखनेको नीचता कहा गया है ॥ ३-४ ॥ |