देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 429, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ ] |
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| असत्यो जायते राजन्कार्यावान्प्रथमं नरः।<br>इन्द्रियार्थांश्चिन्तयानो न प्राप्नोति यदा नरः॥ ३४<br><br>तदर्थं छलमादत्ते छलात्पापे प्रवर्तते।<br>कामः क्रोधश्च लोभश्च वैरिणो बलवत्तराः॥ ३५<br><br>कृताकृतं न जानन्ति प्राणिनस्तद्वशं गताः।<br>विभवे सत्यहङ्कारः प्रबलः प्रभवत्यपि॥ ३६<br><br>अहङ्काराद्भवन्मोहो मोहान्मरणमेव च।<br>सङ्कल्पा बहवस्तत्र विकल्पाः प्रभवन्ति च॥ ३७<br><br>ईर्ष्यासूया तथा द्वेषः प्रादुर्भवति चेतसि।<br>आशा तृष्णा तथा दैन्यं दम्भोऽधर्ममतिस्तथा॥ ३८<br><br>प्राणिनां प्रभवन्त्येते भावा मोहसमुद्भवाः।<br>यज्ञदानानि तीर्थानि व्रतानि नियमास्तथा॥ ३९<br><br>अहङ्काराभिभूतस्तु करोति पुरुषोऽन्वहम्।<br>अहंभावकृतं सर्वं प्रभवेद्वै न शौचवत्॥ ४०<br><br>रागलोभात्कृतं कर्म सर्वाङ्गं शुद्धिवर्जितम्।<br>प्रथमं द्रव्यशुद्धिश्च द्रष्टव्या विबुधैः किल॥ ४१ | हे राजन्! सर्वप्रथम अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य असत्यका सहारा लेता है। उस समय इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करते हुए जब मनुष्य अपना अभीष्ट नहीं पाता, तो वह उसके लिये छल करने लगता है। इस प्रकार छलके कारण वह पापमें प्रवृत्त हो जाता है। काम, क्रोध और लोभ मनुष्योंके सबसे बड़े शत्रु हैं। इनके वशमें होनेके कारण प्राणी कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं जान पाते। ऐश्वर्य बढ़ जानेपर अहंकार और भी बढ़ जाता है। अहंकारसे मोह उत्पन्न होता है और मोहसे विनाश हो जाता है। मोहके कारण मनुष्यके मनमें अनेक प्रकारके संकल्प-विकल्प होने लगते हैं। उस समय मनमें ईर्ष्या, असूया तथा द्वेष उत्पन्न हो जाते हैं। प्राणियोंके हृदयमें आशा, तृष्णा, दीनता, दम्भ और अधार्मिक बुद्धि—ये सब उत्पन्न हो जाते हैं। ये भावनाएँ प्राणियोंमें मोहसे ही उत्पन्न होती हैं। यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत और नियम जो कुछ भी सत्कर्म हैं, उन्हें भी मनुष्य अहंकारके ही वशीभूत होकर निरन्तर करता है, उनका अहंभावसे किया गया सारा कार्य वैसा नहीं होता, जैसा कि शुद्ध अन्तःकरणसे किया जाता है। आसक्ति एवं लोभसे किया हुआ कोई भी कर्म सर्वथा अशुद्ध होता है॥ ३४-४० १/२ ॥ | | अद्रोहेणार्जितं द्रव्यं प्रशस्तं धर्मकर्मणि।<br>द्रोहार्जितेन द्रव्येण यत्करोति शुभं नरः॥ ४२<br><br>विपरीतं भवेत्तत्तु फलकाले नृपोत्तम।<br>मनोऽतिनिर्मलं यस्य स सम्यक्फलभाग्भवेत्॥ ४३<br><br>तस्मिन्विकारयुक्ते तु न यथार्थफलं लभेत्।<br>कर्तारः कर्मणां सर्वे आचार्यऋत्विजादयः॥ ४४ | बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे सर्वप्रथम द्रव्य-शुद्धिपर विचार कर लें। द्रोहरहित कर्म करके अर्जित किया हुआ धन धर्मकार्यमें प्रशस्त माना गया है। हे नृपश्रेष्ठ! द्रोहपूर्वक उपार्जित किये हुए द्रव्यके द्वारा मनुष्य जो उत्तम कार्य करता है, समय आनेपर उसका विपरीत फल प्राप्त होता है। जिसका मन परम पवित्र है, वही पूर्ण फलका अधिकारी होता है और मनके विकारपूर्ण रहनेपर उसे यथार्थ फल नहीं मिलता॥ ४१-४३ १/२ ॥ | | स्युस्ते विशुद्धमनसस्तदा पूर्णं भवेत्फलम्।<br>देशकालक्रियाद्रव्यकर्तॄणां शुद्धता यदि॥ ४५<br><br>मन्त्राणां च तदा पूर्णं कर्मणां फलमश्नुते।<br>शत्रूणां नाशमुद्दिश्य स्ववृद्धिं परमां तथा॥ ४६ | जब कर्म करानेवाले ऋत्विक्, आचार्य आदि लोगोंका चित्त शुद्ध रहता है, तभी पूर्ण फल प्राप्त होता है। यदि देश, काल, क्रिया, द्रव्य, कर्ता और मन्त्र—इन सबकी शुद्धता रहती है, तभी कर्मोंका पूरा फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य शत्रुनाश तथा अपनी अभिवृद्धिके उद्देश्यसे पुण्यकर्म करता है तो उसे भी वैसा ही |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—14 D