भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 428

अ० ४ ] चतुर्थ स्कन्ध ४१९


व्यास उवाच
जितं वै बलिना राजन् दत्ता येन च मेदिनी ॥ २१<br><br>त्रिविक्रमोऽपि नाम्ना यः प्रथितो वामनोऽभवत् ।<br>छलनार्थमिदं राजन्वामनत्वं नराधिप ॥ २२<br><br>सम्प्राप्तं हरिणा भूयो द्वारपालत्वमेव च ।<br>सत्यादन्यतरन्नास्ति मूलं धर्मस्य पार्थिव ॥ २३व्यासजी बोले— हे राजन्! उस राजा बलिकी ही विजय हुई, जिसने समस्त भूमण्डलका दान कर दिया था। हे राजन्! जो त्रिविक्रम नामसे विख्यात थे, वे भगवान् विष्णु वामन बने। हे नरेन्द्र! उन्होंने छल करनेके लिये यह वामनरूप धारण किया था और इसी छलके परिणामस्वरूप उन श्रीहरिको राजा बलिका द्वारपाल बनना पड़ा। अतः हे राजन्! सत्यसे बढ़कर धर्मका मूल और कुछ नहीं है॥ २१—२३॥
दुःसाध्यं देहिनां राजन्सत्यं सर्वात्मना किल ।<br>माया बलवती भूप त्रिगुणा बहुरूपिणी ॥ २४<br><br>ययेदं निर्मितं विश्वं गुणैः शबलितं त्रिभिः ।<br>तस्माच्छलवता सत्यं कुतोऽविद्धं भवेन्नृप ॥ २५हे राजन्! सम्यक् प्रकारसे सत्यका पालन करना प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है। अनेक रूप धारण करनेवाली त्रिगुणात्मिका माया बड़ी बलवती है, जिसने तीनों गुणोंसे सम्मिश्रित इस विश्वकी रचना की है। अतः हे राजन्! छल-कपट करनेवालेसे बिना प्रभावित हुए यह सत्य कैसे रह सकता है?॥ २४-२५॥
मिश्रेण जनिता चैव स्थितिरेशा सनातनी ।<br>वैखानसाश्च मुनयो निःसङ्गा निष्प्रतिग्रहाः ॥ २६<br><br>सत्ययुक्ता भवन्त्यत्र वीतरागा गतस्पृहाः ।<br>दृष्टान्तदर्शनार्थाय निर्मितास्ते च तादृशाः ॥ २७सत्त्व, रज और तम—इन्हीं तीनों गुणोंके मेलसे संसारका प्रादुर्भाव हुआ, यही सृष्टिका सनातन नियम है। केवल अनासक्त, प्रतिग्रहशून्य, रागरहित और तृष्णाविहीन वानप्रस्थ तथा मुनिजन अवश्य सत्यपरायण होते हैं, किंतु वैसे लोग केवल दृष्टान्त दिखानेके लिये ही बनाये गये हैं॥ २६-२७॥
अन्यत्सर्वं शबलितं गुणैरेभिस्त्रिभिर्नृप ।<br>नैकं वाक्यं पुराणेषु वेदेषु नृपसत्तम ॥ २८<br><br>धर्मशास्त्रेषु चाङ्गेषु सगुणै रचितेष्विह ।<br>सगुणः सगुणं कुर्यान्निर्गुणो न करोति वै ॥ २९<br><br>गुणास्ते मिश्रिताः सर्वे न पृथग्भावसङ्गताः ।<br>निर्व्यलीके स्थिरे धर्मे मतिः कस्यापि न स्थिरा ॥ ३०हे राजन्! उनके अतिरिक्त सब कुछ सत्त्व, रज एवं तम—इन तीनों गुणोंसे ओत-प्रोत है। हे नृपश्रेष्ठ! पुराणों, वेदों, धर्मशास्त्रों, वेदांगों और सगुण प्राणियोंद्वारा रचित ग्रन्थोंमें भी कहीं एकवाक्यता नहीं मिलती; सगुण प्राणी ही सगुण कार्य करता है, निर्गुणसे सगुण कार्य नहीं हो सकता; क्योंकि वे सभी गुण मिश्रित हैं, वे पृथक्-पृथक् नहीं रहते। इसी कारण किसीकी भी बुद्धि सत्य तथा सनातनधर्ममें टिक नहीं पाती॥ २८—३०॥
भवोद्भवे महाराज मायया मोहितस्य वै ।<br>इन्द्रियाणि प्रमाथीनि तदासक्तं मनस्तथा ॥ ३१<br><br>करोति विविधान्भावान्गुणैस्तैः प्रेरितो भृशम् ।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनः स्थिरजङ्गमाः ॥ ३२<br><br>सर्वे मायावशा राजन् सानुक्रीडति तैरिह ।<br>सर्वान्वै मोहयत्येषा विकुर्वत्यनिशं जगत् ॥ ३३हे महाराज! संसारकी सृष्टिके समय मायासे मोहित मनुष्यकी इन्द्रियाँ अत्यन्त चंचल हो जाती हैं और उनमें आसक्त मन उन गुणोंसे प्रेरित होकर विविध प्रकारके भाव प्रकट करने लगता है। हे राजन्! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त स्थावर-जंगम सभी प्राणी मायाके वशीभूत रहते हैं और वह माया उनके साथ क्रीडा करती रहती है। यह माया सभीको मोहमें डाल देती है और जगत्में निरन्तर विकार उत्पन्न किया करती है॥ ३१—३३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—14 C