भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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४१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आप्तवाक्यं प्रमाणं चेदाप्तः कः परदेहवान्।<br>पुरुषो विषयासक्तो रागी भवति सर्वथा॥ ९<br>रागो द्वेषो भवेन्नूनमर्थनाशादसंशयम्।<br>द्वेषादसत्यवचनं वक्तव्यं स्वार्थसिद्धये॥ १०यदि आप्त वचनको प्रमाण मानें, तो फिर कौन पुरुष आप्त है? विषयासक्त मनुष्यमें राग आ ही जाता है और अपना स्वार्थ भंग होनेपर उसमें निःसन्देह राग-द्वेषकी बहुलता हो जाती है। द्वेषके कारण अपनी स्वार्थसिद्धिके लिये असत्य भाषण करना पड़ता है॥ ९-१०॥
जरासन्धविघातार्थं हरिणा सत्त्वमूर्तिना।<br>छलेन रचितं रूपं ब्राह्मणस्य विजानता॥ ११<br>तदाप्तः कः प्रमाणं किं सत्त्वमूर्तिरपीदृशः।<br>अर्जुनोऽपि तथैवात्र कार्ये यज्ञविनिर्मिते॥ १२परम ज्ञानी और सत्त्वगुणके मूर्तस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने भी जरासन्धके वधके लिये छलसे ब्राह्मणका वेष धारण किया था। जब सत्त्वमूर्ति भी इस प्रकारके होते हैं, तब किस आप्त पुरुषको प्रमाण माना जाय ? उसी प्रकार [राजसूय] यज्ञके अवसरपर अर्जुनने भी वैसा ही कर्म किया था॥ ११-१२॥
कीदृशोऽयं कृतो यज्ञः किमर्थं शमवर्जितः।<br>परलोकपदार्थं वा यशसे वान्यथा किल॥ १३जिस यज्ञमें अशान्तिका वातावरण रहा, उस यज्ञको किस श्रेणीका यज्ञ कहा जाय ? वह यज्ञ परलोकमें परमपदकी प्राप्तिके लिये किया गया था अथवा सुयश पानेके लिये किया गया था या अन्य किसी कार्यकी सिद्धिके लिये किया गया था ?॥ १३॥
धर्मस्य प्रथमः पादः सत्यमेतच्छ्रुतेर्वचः।<br>द्वितीयस्तु तथा शौचं दया पादस्तृतीयकः॥ १४<br>दानं पादश्चतुर्थश्च पुराणज्ञा वदन्ति वै।<br>तैर्विहीनः कथं धर्मस्तिष्ठेदिह सुसम्मतः॥ १५श्रुतिका यह वचन है कि धर्मका प्रथम चरण सत्य, दूसरा चरण पवित्रता, तीसरा चरण दया तथा चतुर्थ चरण दान है। पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं। इन चारोंके बिना परम आदृत धर्म कैसे टिक सकता है ?॥ १४-१५॥
धर्महीनं कृतं कर्म कथं तत्फलदं भवेत्।<br>धर्मे स्थिरा मतिः क्वापि न कस्यापि प्रतीयते॥ १६तब मेरे पूर्वजोंके द्वारा किया गया वह धर्मविहीन यज्ञ-कर्म [उत्तम] फल देनेवाला कैसे हो सकता था ? इससे तो यही प्रतीत होता है कि उस समय किसीका भी कहीं भी धर्ममें अटल विश्वास नहीं था॥ १६॥
छलार्थञ्च यदा विष्णुर्वामनोऽभूज्जगत्प्रभुः।<br>येन वामनरूपेण वञ्चितोऽसौ बलिर्नृपः॥ १७जगत्प्रभु भगवान् विष्णुने भी छलनेहेतु वामनका रूप धारण किया था, जिन्होंने वामनरूपसे राजा बलिको ठग लिया था॥ १७॥
विहर्ता शतयज्ञस्य वेदाज्ञापरिपालकः।<br>धर्मिष्ठो दानशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ १८<br>स्थानात्प्रभ्रंशितोऽकस्माद्विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>जितं केन तयोः कृष्ण बलिना वामनेन वा॥ १९<br>छलकर्मविदा चायं सन्देहोऽत्र महान्मम।<br>वञ्चयित्वा वञ्चितेन सत्यं वद द्विजोत्तम॥ २०<br>पुराणकर्ता त्वमसि धर्मज्ञश्च महामतिः।महाराज बलि सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, वेदोंकी आज्ञाका पालन करनेवाले, धर्मात्मा, दानी, सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय थे। ऐसे महापुरुषको परम प्रभावशाली भगवान् विष्णुने अकस्मात् पदच्युत कर दिया। अतः हे कृष्णद्वैपायन ! उन दोनोंमें कौन जीता ? वंचना करके छलकर्ममें निपुण भगवान् वामनकी विजय हुई या छले गये राजा बलिकी; इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। हे द्विजश्रेष्ठ ! मुझे सत्य बात बताइये; क्योंकि आप पुराणोंके रचयिता, धर्मज्ञ तथा महान् बुद्धिसम्पन्न हैं॥ १८-२० १/२॥

1897 श्रीमद्देवी...महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 14 B