देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
४१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आप्तवाक्यं प्रमाणं चेदाप्तः कः परदेहवान्।<br>पुरुषो विषयासक्तो रागी भवति सर्वथा॥ ९<br>रागो द्वेषो भवेन्नूनमर्थनाशादसंशयम्।<br>द्वेषादसत्यवचनं वक्तव्यं स्वार्थसिद्धये॥ १० | यदि आप्त वचनको प्रमाण मानें, तो फिर कौन पुरुष आप्त है? विषयासक्त मनुष्यमें राग आ ही जाता है और अपना स्वार्थ भंग होनेपर उसमें निःसन्देह राग-द्वेषकी बहुलता हो जाती है। द्वेषके कारण अपनी स्वार्थसिद्धिके लिये असत्य भाषण करना पड़ता है॥ ९-१०॥ |
| जरासन्धविघातार्थं हरिणा सत्त्वमूर्तिना।<br>छलेन रचितं रूपं ब्राह्मणस्य विजानता॥ ११<br>तदाप्तः कः प्रमाणं किं सत्त्वमूर्तिरपीदृशः।<br>अर्जुनोऽपि तथैवात्र कार्ये यज्ञविनिर्मिते॥ १२ | परम ज्ञानी और सत्त्वगुणके मूर्तस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने भी जरासन्धके वधके लिये छलसे ब्राह्मणका वेष धारण किया था। जब सत्त्वमूर्ति भी इस प्रकारके होते हैं, तब किस आप्त पुरुषको प्रमाण माना जाय ? उसी प्रकार [राजसूय] यज्ञके अवसरपर अर्जुनने भी वैसा ही कर्म किया था॥ ११-१२॥ |
| कीदृशोऽयं कृतो यज्ञः किमर्थं शमवर्जितः।<br>परलोकपदार्थं वा यशसे वान्यथा किल॥ १३ | जिस यज्ञमें अशान्तिका वातावरण रहा, उस यज्ञको किस श्रेणीका यज्ञ कहा जाय ? वह यज्ञ परलोकमें परमपदकी प्राप्तिके लिये किया गया था अथवा सुयश पानेके लिये किया गया था या अन्य किसी कार्यकी सिद्धिके लिये किया गया था ?॥ १३॥ |
| धर्मस्य प्रथमः पादः सत्यमेतच्छ्रुतेर्वचः।<br>द्वितीयस्तु तथा शौचं दया पादस्तृतीयकः॥ १४<br>दानं पादश्चतुर्थश्च पुराणज्ञा वदन्ति वै।<br>तैर्विहीनः कथं धर्मस्तिष्ठेदिह सुसम्मतः॥ १५ | श्रुतिका यह वचन है कि धर्मका प्रथम चरण सत्य, दूसरा चरण पवित्रता, तीसरा चरण दया तथा चतुर्थ चरण दान है। पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं। इन चारोंके बिना परम आदृत धर्म कैसे टिक सकता है ?॥ १४-१५॥ |
| धर्महीनं कृतं कर्म कथं तत्फलदं भवेत्।<br>धर्मे स्थिरा मतिः क्वापि न कस्यापि प्रतीयते॥ १६ | तब मेरे पूर्वजोंके द्वारा किया गया वह धर्मविहीन यज्ञ-कर्म [उत्तम] फल देनेवाला कैसे हो सकता था ? इससे तो यही प्रतीत होता है कि उस समय किसीका भी कहीं भी धर्ममें अटल विश्वास नहीं था॥ १६॥ |
| छलार्थञ्च यदा विष्णुर्वामनोऽभूज्जगत्प्रभुः।<br>येन वामनरूपेण वञ्चितोऽसौ बलिर्नृपः॥ १७ | जगत्प्रभु भगवान् विष्णुने भी छलनेहेतु वामनका रूप धारण किया था, जिन्होंने वामनरूपसे राजा बलिको ठग लिया था॥ १७॥ |
| विहर्ता शतयज्ञस्य वेदाज्ञापरिपालकः।<br>धर्मिष्ठो दानशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ १८<br>स्थानात्प्रभ्रंशितोऽकस्माद्विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>जितं केन तयोः कृष्ण बलिना वामनेन वा॥ १९<br>छलकर्मविदा चायं सन्देहोऽत्र महान्मम।<br>वञ्चयित्वा वञ्चितेन सत्यं वद द्विजोत्तम॥ २०<br>पुराणकर्ता त्वमसि धर्मज्ञश्च महामतिः। | महाराज बलि सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले, वेदोंकी आज्ञाका पालन करनेवाले, धर्मात्मा, दानी, सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय थे। ऐसे महापुरुषको परम प्रभावशाली भगवान् विष्णुने अकस्मात् पदच्युत कर दिया। अतः हे कृष्णद्वैपायन ! उन दोनोंमें कौन जीता ? वंचना करके छलकर्ममें निपुण भगवान् वामनकी विजय हुई या छले गये राजा बलिकी; इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। हे द्विजश्रेष्ठ ! मुझे सत्य बात बताइये; क्योंकि आप पुराणोंके रचयिता, धर्मज्ञ तथा महान् बुद्धिसम्पन्न हैं॥ १८-२० १/२॥ |
1897 श्रीमद्देवी...महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 14 B
अ० ४ ] चतुर्थ स्कन्ध ४१९
अ० ४ ] चतुर्थ स्कन्ध ४१९
| व्यास उवाच | |
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| जितं वै बलिना राजन् दत्ता येन च मेदिनी ॥ २१<br><br>त्रिविक्रमोऽपि नाम्ना यः प्रथितो वामनोऽभवत् ।<br>छलनार्थमिदं राजन्वामनत्वं नराधिप ॥ २२<br><br>सम्प्राप्तं हरिणा भूयो द्वारपालत्वमेव च ।<br>सत्यादन्यतरन्नास्ति मूलं धर्मस्य पार्थिव ॥ २३ | व्यासजी बोले— हे राजन्! उस राजा बलिकी ही विजय हुई, जिसने समस्त भूमण्डलका दान कर दिया था। हे राजन्! जो त्रिविक्रम नामसे विख्यात थे, वे भगवान् विष्णु वामन बने। हे नरेन्द्र! उन्होंने छल करनेके लिये यह वामनरूप धारण किया था और इसी छलके परिणामस्वरूप उन श्रीहरिको राजा बलिका द्वारपाल बनना पड़ा। अतः हे राजन्! सत्यसे बढ़कर धर्मका मूल और कुछ नहीं है॥ २१—२३॥ |
| दुःसाध्यं देहिनां राजन्सत्यं सर्वात्मना किल ।<br>माया बलवती भूप त्रिगुणा बहुरूपिणी ॥ २४<br><br>ययेदं निर्मितं विश्वं गुणैः शबलितं त्रिभिः ।<br>तस्माच्छलवता सत्यं कुतोऽविद्धं भवेन्नृप ॥ २५ | हे राजन्! सम्यक् प्रकारसे सत्यका पालन करना प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है। अनेक रूप धारण करनेवाली त्रिगुणात्मिका माया बड़ी बलवती है, जिसने तीनों गुणोंसे सम्मिश्रित इस विश्वकी रचना की है। अतः हे राजन्! छल-कपट करनेवालेसे बिना प्रभावित हुए यह सत्य कैसे रह सकता है?॥ २४-२५॥ |
| मिश्रेण जनिता चैव स्थितिरेशा सनातनी ।<br>वैखानसाश्च मुनयो निःसङ्गा निष्प्रतिग्रहाः ॥ २६<br><br>सत्ययुक्ता भवन्त्यत्र वीतरागा गतस्पृहाः ।<br>दृष्टान्तदर्शनार्थाय निर्मितास्ते च तादृशाः ॥ २७ | सत्त्व, रज और तम—इन्हीं तीनों गुणोंके मेलसे संसारका प्रादुर्भाव हुआ, यही सृष्टिका सनातन नियम है। केवल अनासक्त, प्रतिग्रहशून्य, रागरहित और तृष्णाविहीन वानप्रस्थ तथा मुनिजन अवश्य सत्यपरायण होते हैं, किंतु वैसे लोग केवल दृष्टान्त दिखानेके लिये ही बनाये गये हैं॥ २६-२७॥ |
| अन्यत्सर्वं शबलितं गुणैरेभिस्त्रिभिर्नृप ।<br>नैकं वाक्यं पुराणेषु वेदेषु नृपसत्तम ॥ २८<br><br>धर्मशास्त्रेषु चाङ्गेषु सगुणै रचितेष्विह ।<br>सगुणः सगुणं कुर्यान्निर्गुणो न करोति वै ॥ २९<br><br>गुणास्ते मिश्रिताः सर्वे न पृथग्भावसङ्गताः ।<br>निर्व्यलीके स्थिरे धर्मे मतिः कस्यापि न स्थिरा ॥ ३० | हे राजन्! उनके अतिरिक्त सब कुछ सत्त्व, रज एवं तम—इन तीनों गुणोंसे ओत-प्रोत है। हे नृपश्रेष्ठ! पुराणों, वेदों, धर्मशास्त्रों, वेदांगों और सगुण प्राणियोंद्वारा रचित ग्रन्थोंमें भी कहीं एकवाक्यता नहीं मिलती; सगुण प्राणी ही सगुण कार्य करता है, निर्गुणसे सगुण कार्य नहीं हो सकता; क्योंकि वे सभी गुण मिश्रित हैं, वे पृथक्-पृथक् नहीं रहते। इसी कारण किसीकी भी बुद्धि सत्य तथा सनातनधर्ममें टिक नहीं पाती॥ २८—३०॥ |
| भवोद्भवे महाराज मायया मोहितस्य वै ।<br>इन्द्रियाणि प्रमाथीनि तदासक्तं मनस्तथा ॥ ३१<br><br>करोति विविधान्भावान्गुणैस्तैः प्रेरितो भृशम् ।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनः स्थिरजङ्गमाः ॥ ३२<br><br>सर्वे मायावशा राजन् सानुक्रीडति तैरिह ।<br>सर्वान्वै मोहयत्येषा विकुर्वत्यनिशं जगत् ॥ ३३ | हे महाराज! संसारकी सृष्टिके समय मायासे मोहित मनुष्यकी इन्द्रियाँ अत्यन्त चंचल हो जाती हैं और उनमें आसक्त मन उन गुणोंसे प्रेरित होकर विविध प्रकारके भाव प्रकट करने लगता है। हे राजन्! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त स्थावर-जंगम सभी प्राणी मायाके वशीभूत रहते हैं और वह माया उनके साथ क्रीडा करती रहती है। यह माया सभीको मोहमें डाल देती है और जगत्में निरन्तर विकार उत्पन्न किया करती है॥ ३१—३३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—14 C
| ४२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ ] |
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| असत्यो जायते राजन्कार्यावान्प्रथमं नरः।<br>इन्द्रियार्थांश्चिन्तयानो न प्राप्नोति यदा नरः॥ ३४<br><br>तदर्थं छलमादत्ते छलात्पापे प्रवर्तते।<br>कामः क्रोधश्च लोभश्च वैरिणो बलवत्तराः॥ ३५<br><br>कृताकृतं न जानन्ति प्राणिनस्तद्वशं गताः।<br>विभवे सत्यहङ्कारः प्रबलः प्रभवत्यपि॥ ३६<br><br>अहङ्काराद्भवन्मोहो मोहान्मरणमेव च।<br>सङ्कल्पा बहवस्तत्र विकल्पाः प्रभवन्ति च॥ ३७<br><br>ईर्ष्यासूया तथा द्वेषः प्रादुर्भवति चेतसि।<br>आशा तृष्णा तथा दैन्यं दम्भोऽधर्ममतिस्तथा॥ ३८<br><br>प्राणिनां प्रभवन्त्येते भावा मोहसमुद्भवाः।<br>यज्ञदानानि तीर्थानि व्रतानि नियमास्तथा॥ ३९<br><br>अहङ्काराभिभूतस्तु करोति पुरुषोऽन्वहम्।<br>अहंभावकृतं सर्वं प्रभवेद्वै न शौचवत्॥ ४०<br><br>रागलोभात्कृतं कर्म सर्वाङ्गं शुद्धिवर्जितम्।<br>प्रथमं द्रव्यशुद्धिश्च द्रष्टव्या विबुधैः किल॥ ४१ | हे राजन्! सर्वप्रथम अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य असत्यका सहारा लेता है। उस समय इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करते हुए जब मनुष्य अपना अभीष्ट नहीं पाता, तो वह उसके लिये छल करने लगता है। इस प्रकार छलके कारण वह पापमें प्रवृत्त हो जाता है। काम, क्रोध और लोभ मनुष्योंके सबसे बड़े शत्रु हैं। इनके वशमें होनेके कारण प्राणी कर्तव्य-अकर्तव्यको नहीं जान पाते। ऐश्वर्य बढ़ जानेपर अहंकार और भी बढ़ जाता है। अहंकारसे मोह उत्पन्न होता है और मोहसे विनाश हो जाता है। मोहके कारण मनुष्यके मनमें अनेक प्रकारके संकल्प-विकल्प होने लगते हैं। उस समय मनमें ईर्ष्या, असूया तथा द्वेष उत्पन्न हो जाते हैं। प्राणियोंके हृदयमें आशा, तृष्णा, दीनता, दम्भ और अधार्मिक बुद्धि—ये सब उत्पन्न हो जाते हैं। ये भावनाएँ प्राणियोंमें मोहसे ही उत्पन्न होती हैं। यज्ञ, दान, तीर्थ, व्रत और नियम जो कुछ भी सत्कर्म हैं, उन्हें भी मनुष्य अहंकारके ही वशीभूत होकर निरन्तर करता है, उनका अहंभावसे किया गया सारा कार्य वैसा नहीं होता, जैसा कि शुद्ध अन्तःकरणसे किया जाता है। आसक्ति एवं लोभसे किया हुआ कोई भी कर्म सर्वथा अशुद्ध होता है॥ ३४-४० १/२ ॥ | | अद्रोहेणार्जितं द्रव्यं प्रशस्तं धर्मकर्मणि।<br>द्रोहार्जितेन द्रव्येण यत्करोति शुभं नरः॥ ४२<br><br>विपरीतं भवेत्तत्तु फलकाले नृपोत्तम।<br>मनोऽतिनिर्मलं यस्य स सम्यक्फलभाग्भवेत्॥ ४३<br><br>तस्मिन्विकारयुक्ते तु न यथार्थफलं लभेत्।<br>कर्तारः कर्मणां सर्वे आचार्यऋत्विजादयः॥ ४४ | बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे सर्वप्रथम द्रव्य-शुद्धिपर विचार कर लें। द्रोहरहित कर्म करके अर्जित किया हुआ धन धर्मकार्यमें प्रशस्त माना गया है। हे नृपश्रेष्ठ! द्रोहपूर्वक उपार्जित किये हुए द्रव्यके द्वारा मनुष्य जो उत्तम कार्य करता है, समय आनेपर उसका विपरीत फल प्राप्त होता है। जिसका मन परम पवित्र है, वही पूर्ण फलका अधिकारी होता है और मनके विकारपूर्ण रहनेपर उसे यथार्थ फल नहीं मिलता॥ ४१-४३ १/२ ॥ | | स्युस्ते विशुद्धमनसस्तदा पूर्णं भवेत्फलम्।<br>देशकालक्रियाद्रव्यकर्तॄणां शुद्धता यदि॥ ४५<br><br>मन्त्राणां च तदा पूर्णं कर्मणां फलमश्नुते।<br>शत्रूणां नाशमुद्दिश्य स्ववृद्धिं परमां तथा॥ ४६ | जब कर्म करानेवाले ऋत्विक्, आचार्य आदि लोगोंका चित्त शुद्ध रहता है, तभी पूर्ण फल प्राप्त होता है। यदि देश, काल, क्रिया, द्रव्य, कर्ता और मन्त्र—इन सबकी शुद्धता रहती है, तभी कर्मोंका पूरा फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य शत्रुनाश तथा अपनी अभिवृद्धिके उद्देश्यसे पुण्यकर्म करता है तो उसे भी वैसा ही |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—14 D
| अ० ५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| करोति सुकृतं तद्वद्विपरीतं भवेत्किल ।<br>स्वार्थासक्तः पुमान्नित्यं न जानाति शुभाशुभम् ॥ ४७<br>दैवाधीनः सदा कुर्यात्पापमेव न सत्कृतम् ।<br>प्राजापत्याः सुराः सर्वे ह्यसुराश्च तदुद्भवाः ॥ ४८<br>सर्वे ते स्वार्थनिरताः परस्परविरोधिनः ।<br>सत्त्वोद्भवाः सुराः सर्वेऽप्युक्ता वेदेषु मानुषाः ॥ ४९<br>रजोद्भवास्तामसास्तु तिर्यञ्चः परिकीर्तिताः ।<br>सत्त्वोद्भवानां तैर्वैरं परस्परमनारतम् ॥ ५०<br>तिरश्चामत्र किं चित्रं जातिवैरसमुद्भवे ।<br>सदा द्रोहपरा देवास्तपोविघ्नकरास्तथा ॥ ५१<br>असन्तुष्टा द्वेषपराः परस्परविरोधिनः ।<br>अहङ्कारसमुद्भूतः संसारोऽयं यतो नृप ॥ ५२<br>रागद्वेषविहीनस्तु स कथं जायते नृप ॥ ५३ | विपरीत फल मिलता है। स्वार्थमें लिप्त मनुष्य शुभाशुभका ज्ञान नहीं रख पाता और दैवाधीन होकर सदा पाप ही किया करता है, पुण्य नहीं ॥ ४४—४७½ ॥<br>प्रजापति ब्रह्मासे ही देवता उत्पन्न हुए हैं और उन्हींसे असुरोंकी भी उत्पत्ति हुई है। वे सब-के-सब स्वार्थमें लिप्त होकर एक-दूसरेके विरुद्ध काम करते हैं। वेदोंमें कहा गया है कि सत्त्वगुणसे सभी देवता, रजोगुणसे मनुष्य तथा तमोगुणसे पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनिके जीव उत्पन्न होते हैं। अतएव जब सत्त्वगुणसे उत्पन्न देवताओंमें भी निरन्तर आपसमें वैरभाव रहता है तब पशु-पक्षियोंमें परस्पर जातिवैर उत्पन्न होनेमें क्या आश्चर्य ! देवता भी सदैव द्रोहमें तत्पर रहते हैं और तपस्यामें विघ्न डाला करते हैं। हे नृप ! वे सदा असन्तुष्ट रहते हुए द्वेषपरायण होकर आपसमें विरोधभाव रखते हैं। अतः हे राजन् ! जब यह संसार ही अहंकारसे उत्पन्न हुआ है, तब वह राग-द्वेषसे हीन हो ही कैसे सकता है ? ॥ ४८—५३ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
अधमजगतः स्थितिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
o
अथ पञ्चमोऽध्यायः
नर-नारायणकी तपस्यासे चिन्तित होकर इन्द्रका उनके पास जाना और मोहिनी माया प्रकट करना तथा उससे भी अप्रभावित रहनेपर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंको भेजना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>अथ किं बहुनोक्तेन संसारेऽस्मिन्नृपोत्तम ।<br>धर्मात्माद्रोहबुद्धिस्तु कश्चिद्भवति कर्हिचित् ॥ १<br>रागद्वेषावृतं विश्वं सर्वं स्थावरजङ्गमम् ।<br>आद्ये युगेऽपि राजेन्द्र किमद्य कलिदूषिते ॥ २ | व्यासजी बोले—हे नृपोत्तम! अब अधिक कहनेसे क्या लाभ? इस संसारमें कहीं बिरला ही ऐसा कोई धर्मात्मा पुरुष होगा जो द्रोहभावसे रहित हो। यह चर-अचर सम्पूर्ण संसार राग-द्वेषसे ओत-प्रोत है। हे राजेन्द्र! सत्ययुगमें भी यह संसार ऐसा ही था, तब कलिसे दूषित इसके विषयमें क्या कहा जाय? ॥ १-२ ॥ |
| देवाः सेर्ष्याश्च सद्रोहाश्छलकर्मरताः सदा ।<br>मानुषाणां तिरश्चां च का वार्ता नृप गण्यते ॥ ३<br>द्रोहपरे द्रोहपरो भवेदिति समानता ।<br>अद्रोहिणि तथा शान्ते विद्वेषः खलता स्मृता ॥ ४ | हे राजन्! जब देवता भी सदा ईर्ष्यायुक्त, द्रोहसे भरे हुए और छल-परायण रहते हैं, तब मनुष्य तथा पशु-पक्षियोंकी बात ही क्या है? यदि कोई मनुष्य द्रोह करनेवालेके प्रति द्रोहभाव रखे तो यह समानताकी बात है, किंतु द्रोह न करनेवाले तथा शान्त स्वभाववालेके प्रति विद्वेष रखनेको नीचता कहा गया है ॥ ३-४ ॥ |
४२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ५
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| यः कश्चित्तापसः शान्तो जपध्यानपरायणः।<br>भवेत्तस्य जपे विघ्नकर्ता वै मघवा परम्॥ ५ | यदि कोई तपस्वी शान्त होकर जप-ध्यानमें लीन हो जाता है तो इन्द्र उसके जपमें विघ्न डालनेहेतु तत्पर हो जाते हैं॥ ५॥ |
| सतां सत्ययुगं साक्षात्सर्वदैवासतां कलिः।<br>मध्यमो मध्यमानां तु क्रियायोगौ युगे स्मृतौ॥ ६ | सज्जन पुरुषोंके लिये हर समय सत्ययुग दिखलायी पड़ता है और दुष्ट लोगोंके लिये सर्वदा कलियुग ही रहता है। जिस युगमें क्रिया तथा योग व्यवस्थित रहते हैं, वे द्वापर तथा त्रेतारूप मध्यम युग मध्यम कोटिके लोगोंके लिये कहे गये हैं॥ ६॥ |
| कश्चित्कदाचिद्भवति सत्यधर्मानुवर्तकः।<br>अन्यथान्ययुगानां वै सर्वे धर्मपरायणाः॥ ७<br>वासना कारणं राजन् सर्वत्र धर्मसंस्थितौ।<br>तस्यां वै मलिनायां तु धर्मोऽपि मलिनो भवेत्॥ ८<br>मलिना वासना सत्यं विनाशायेति सर्वथा। | अतः किसी समय भी कोई सत्यधर्मा हो सकता है अथवा सभी युगोंमें जो चाहे धर्मपरायण हो सकता है। हे राजन्! सर्वत्र धर्मकी स्थितिमें वासना ही प्रधान कारण मानी गयी है। उसमें मलिनता आ जानेपर धर्म भी मलिन हो जाता है। मलिन वासना विनाशके लिये होती है; यह सर्वथा सत्य है॥ ७-८ १/२॥ |
| ब्रह्मणो हृदयाज्जातः पुत्रो धर्म इति स्मृतः॥ ९<br>ब्राह्मणः सत्यसम्पन्नो वेदधर्मरतः सदा।<br>दक्षस्य दुहितारो हि वृता दश महात्मना॥ १०<br>विवाहविधिना सम्यङ् मुनिना गृहधर्मिणा।<br>तास्वजीजनयत्पुत्रान्धर्मः सत्यवतां वरः॥ ११<br>हरिं कृष्णं नरं चैव तथा नारायणं नृप।<br>योगाभ्यासरतो नित्यं हरिः कृष्णो बभूव ह॥ १२<br>नरनारायणौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम्।<br>प्रालेयाद्रिं समागत्य तीर्थे बदरिकाश्रमे॥ १३ | ब्रह्माजीके हृदयसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो धर्म—इस नामसे कहा गया। वह ब्राह्मण सत्यसम्पन्न और वैदिक धर्ममें सदा संलग्न रहनेवाला था। उस गृहस्थधर्मी महात्मा मुनिने पाणिग्रहणकी विधिसे दक्षप्रजापतिकी दस कन्याओंका सम्यक् रूपसे वरण किया। सत्यव्रतियोंमें श्रेष्ठ उस धर्मने उनसे 'हरि', 'कृष्ण', 'नर' और 'नारायण' नामक चार पुत्र उत्पन्न किये। हे राजन्! उनमें 'हरि' और 'कृष्ण' ये दोनों योगाभ्यास करने लगे तथा नर और नारायण ये दोनों हिमालयपर्वतके शिखरपर जाकर 'बदरिकाश्रम' तीर्थमें कठिन तपस्या करने लगे॥ ९—१३॥ |
| तपस्विषु धुरीणौ तौ पुराणौ मुनिसत्तमौ।<br>गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे॥ १४<br>हरेरंशौ स्थितौ तत्र नरनारायणावृषी।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु चक्राते तप उत्तमम्॥ १५<br>तापितं च जगत्सर्वं तपसा सचराचरम्।<br>नरनारायणाभ्यां च शक्रः क्षोभं तदा ययौ॥ १६ | वे प्राचीन मुनिश्रेष्ठ नर और नारायण तपस्वियोंमें सबसे प्रधान थे। गंगाके विस्तृत तटपर रहकर ब्रह्मचिन्तन करते हुए भगवान् विष्णुके अंशावतार नर-नारायणने वहाँ पूरे एक हजार वर्षोंतक कठोर तप किया। उनके तपसे चराचरसहित सम्पूर्ण संसार सन्तप्त हो गया। इससे इन्द्रके मनमें नर-नारायणके प्रति क्षोभ उत्पन्न हो गया॥ १४—१६॥ |
| चिन्ताविष्टः सहस्राक्षो मनसा समकल्पयत्।<br>किं कर्तव्यं धर्मपुत्रौ तापसौ ध्यानसंयुतौ॥ १७<br>सिद्धार्थौ सुभृशं श्रेष्ठमासनं मे ग्रहीष्यतः।<br>विघ्नः कथं प्रकर्तव्यस्तपो येन भवेन्न हि॥ १८ | तब चिन्तित होकर इन्द्रने अपने मनमें सोचा—अब मुझे क्या करना चाहिये? ये धर्मपुत्र नर-नारायण तपस्वी तथा ध्यानपरायण हैं। ये पूर्णरूपसे सिद्ध होकर मेरा श्रेष्ठ आसन ग्रहण कर लेंगे, अतः किस प्रकार विघ्न उत्पन्न करूँ, जिससे तप न कर सकें॥ १७-१८॥ |
| अ० ५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२३ | | :--- | :--- |
| उत्पाद्य कामं क्रोधञ्च लोभं वाप्यतिदारुणम्।<br>इत्युद्दिश्य सहस्राक्षः समारुह्य गजोत्तमम्॥ १९<br><br>विघ्नकामस्तु तरसा जगाम गन्धमादनम्।<br>गत्वा तत्राश्रमे पुण्ये तावपश्यच्छतक्रतुः॥ २० | अब इनके मनमें काम, क्रोध अथवा अत्यन्त भीषण लोभ उत्पन्न करके तपमें विघ्न करना चाहिये। यह विचारकर इन्द्र अपने उत्तम ऐरावत हाथीपर सवार होकर उनके तपमें विघ्न डालनेकी इच्छासे गन्धमादनपर्वतपर शीघ्रतापूर्वक जा पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने उस पवित्र आश्रममें तप करते हुए नर-नारायणको देखा॥ १९-२०॥ | | तपसा दीप्तदेहौ तु भास्कराविव चोदितौ।<br>ब्रह्मविष्णू किमेतौ वै प्रकटौ वा विभावसू॥ २१<br><br>धर्मपुत्रावृषी एतौ तपसा किं करिष्यतः।<br>इति सञ्चिन्त्य तौ दृष्ट्वा तदोवाच शचीपतिः॥ २२<br><br>किं वा कार्यं महाभागौ ब्रूतं धर्मसुतौ किल।<br>ददामि वां वरं श्रेष्ठं दातुं यातोऽस्म्यहमृषी॥ २३<br><br>अदेयमपि दास्यामि तुष्टोऽस्मि तपसा किल। | उस समय तपके प्रभावसे दीप्त शरीरवाले वे दोनों ऋषि उगे हुए सूर्यकी भाँति प्रतीत हो रहे थे। [इन्द्रने सोचा—] क्या ये ब्रह्मा और विष्णु प्रकट हुए हैं अथवा दो सूर्य उदित हो गये हैं? धर्मके ये दोनों पुत्र अपने तपद्वारा न जाने क्या कर देंगे? ऐसा विचार करके शचीपति इन्द्रने नर-नारायणकी ओर देखकर उनसे कहा—हे महाभाग धर्मनन्दन! आपलोगोंका क्या कार्य है, बताइये। मैं श्रेष्ठ वर अभी प्रदान करता हूँ। हे ऋषियो! मैं वर देनेके लिये ही आया हूँ। वर अदेय हो तो भी मैं दूँगा; क्योंकि मैं आप लोगोंकी तपस्यासे परम प्रसन्न हूँ॥ २१—२३ १/२ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं पुनः पुनः शक्रस्तावुवाच पुरः स्थितः॥ २४<br><br>नोचतुस्तावृषी ध्यानसंस्थितौ दृढचेतसौ।<br>ततो वै मोहिनीं मायां चकार भयदां वृषः॥ २५<br><br>वृकान्सिंहांश्च व्याघ्रांश्च समुत्पाद्याबिभीषयत्।<br>वर्षं वातं तथा वह्निं समुत्पाद्य पुनः पुनः॥ २६<br><br>भीषयामास तौ शक्रो मायां कृत्वा विमोहिनीम्।<br>भयतोऽपि वशं नीतौ न तौ धर्मसुतौ मुनी॥ २७<br><br>नरनारायणौ दृष्ट्वा शक्रः स्वभवनं गतः।<br>वरदाने प्रलुब्धौ न न भीतौ वह्निवायुतः॥ २८<br><br>व्याघ्रसिंहादिभिः क्रान्तौ चलितौ नाश्रमात्स्वकात्।<br>न तयोर्ध्यानभङ्गं वै कर्तुं कोऽपि क्षमोऽभवत्॥ २९ | व्यासजी बोले— इस प्रकार उनके सामने खड़े होकर इन्द्रने बार-बार उनसे [वरदान माँगनेको] कहा, किंतु ध्यानमग्न तथा दृढ़चित्त वे दोनों ऋषि नहीं बोले। तब इन्द्रने अपनी भयदायिनी मोहिनी माया प्रकट की। उन्होंने भेड़िये, सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओंको उत्पन्न करके उन्हें भयभीत किया। इसी प्रकार वर्षा, वायु तथा अग्नि उत्पन्न करके इन्द्रने अपनी मोहिनी माया रचकर उन दोनोंको भयभीत करनेकी चेष्टा की किंतु धर्मपुत्र वे दोनों मुनि इस भयसे भी वशमें नहीं किये जा सके। ऐसे उन नर-नारायणको देखकर इन्द्र अपने भवन चले गये। वे नर-नारायण वरदानके लोभमें नहीं आये और अग्नि तथा वायुसे भयभीत नहीं हुए। व्याघ्र, सिंह आदिके आक्रमण करनेपर भी वे दोनों अपने आसनसे हिलेतक नहीं। उन दोनोंके ध्यानको भंग करनेमें उस समय कोई भी समर्थ नहीं हो सका॥ २४—२९॥ | | इन्द्रोऽपि सदनं गत्वा चिन्तयामास दुःखितः।<br>चलितौ भयलोभाभ्यां नेमौ मुनिवरोत्तमौ॥ ३० | इन्द्र भी अपने घर पहुँचकर दुःखित होकर विचार करने लगे कि मुनिवरोंमें उत्तम ये दोनों ऋषि भय तथा लोभसे विचलित नहीं हुए। वे तो महाविद्या, |
| ४२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
| चिन्तयन्तौ महाविद्यामादिशक्तिं सनातनीम्।<br>ईश्वरीं सर्वलोकानां परां प्रकृतिमद्भुताम्॥ ३१<br><br>ध्यायतां कः क्षमो लोके बहुमायाविद्वप्युत।<br>यन्मूलाः सकला माया देवासुरकृताः किल॥ ३२<br><br>ते कथं बाधितुं शक्ता ध्यायन्ति गतकल्मषाः।<br>वाग्बीजं कामबीजञ्च मायाबीजं तथैव च॥ ३३<br><br>चित्ते यस्य भवेत्तं तु बाधितुं कोऽपि न क्षमः।<br>मायया मोहितः शक्रो भूयस्तस्य प्रतिक्रियाम्॥ ३४ | आदिशक्ति, सनातनी, सब लोकोंकी स्वामिनी और अद्भुत परा-प्रकृतिका ध्यान कर रहे थे। देवताओं तथा असुरोंके द्वारा रची गयी सारी माया जिन भगवतीसे ही उत्पन्न होती है, उनका ध्यान करनेवालेको विचलित करनेमें कौन समर्थ है, चाहे वह कितना ही बड़ा मायाविज्ञ क्यों न हो? जो लोग कल्मषरहित होकर भगवतीका ध्यान करते हैं, वे भला कैसे विचलित किये जा सकते हैं? देवीका वाग्बीज, कामबीज और मायाबीज—यह जिसके हृदयमें विद्यमान है, उसे विचलित करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है॥ ३०—३३ १/२॥ | | कर्तुं कामवसन्तौ तु समाहूयाब्रवीद्वचः।<br>मनोभव वसन्तेन रत्या युक्तो व्रजाधुना॥ ३५<br><br>अप्सरोभिः समायुक्तस्तरसा गन्धमादनम्।<br>नरनारायणौ तत्र पुराणावृषिसत्तमौ॥ ३६<br><br>कुरुतस्तप एकान्ते स्थितौ बदरिकाश्रमे।<br>गत्वा तत्र समीपे तु तयोर्मन्मथ मार्गणैः॥ ३७<br><br>चित्तं कामातुरं कार्यं कुरु कार्यं ममाधुना।<br>मोहयित्वोच्चाटयित्वा विशिखैस्ताडयाशु च॥ ३८ | अब मायासे मोहित इन्द्रने पुनः उनका प्रतीकार करनेहेतु कामदेव तथा वसन्तको बुलाकर यह वचन कहा—हे कामदेव! तुम वसन्त और रतिको लेकर अनेक अप्सराओंके साथ उस गन्धमादनपर्वतपर अभी शीघ्रतापूर्वक जाओ। वहाँ 'नर-नारायण' नामक दो प्राचीन श्रेष्ठ ऋषि बदरिकाश्रमके एकान्त स्थानमें स्थित होकर तपस्या कर रहे हैं। हे मन्मथ! उनके पास जाकर तुम अपने बाणोंसे उनके चित्तको कामासक्त कर दो। उनका मोहन तथा उच्चाटन करके तुम अपने बाणोंसे उन्हें शीघ्र आहत कर डालो; मेरा यह कार्य अभी सिद्ध करो॥ ३४—३८॥ | | वशीकुरु महाभाग मुनी धर्मसुतावपि।<br>को ह्यस्मिन् सर्वसंसारे देवो दैत्योऽथ मानवः॥ ३९<br><br>यस्ते बाणवशं प्राप्तो न याति भृशताडितः।<br>ब्रह्माहं गिरिजानाथश्चन्द्रो वह्निर्विमोहितः॥ ४०<br><br>गणना कानयोः काम त्वद्बाणानां पराक्रमे। | इस प्रकार हे महाभाग! धर्मके पुत्र उन दोनों मुनियोंको वशीभूत कर लो। इस सम्पूर्ण संसारमें देवता, दैत्य या मनुष्य कौन ऐसा है, जो तुम्हारे बाणके वशीभूत होकर अत्यन्त कामासक्त न हो जाय? हे कामदेव! जब ब्रह्मा, मैं (इन्द्र), शिव, चन्द्रमा या अग्नि भी मोहित हो जाते हैं तब तुम्हारे बाणोंके पराक्रमके सामने उन दोनोंकी क्या गणना है?॥ ३९-४० १/२॥ | | वाराङ्गनागणोऽयं ते सहायार्थं मयेरितः॥ ४१<br><br>आगमिष्यति तत्रैव रम्भादीनां मनोरमः।<br>एका तिलोत्तमा रम्भा कार्यं साधयितुं क्षमा॥ ४२<br><br>त्वमेवैकः क्षमः कामं मिलितैः कस्तु संशयः।<br>कुरु कार्यं महाभाग ददामि तव वाञ्छितम्॥ ४३ | तुम्हारी सहायताके लिये मेरे द्वारा यह रम्भा आदि अप्सराओंका समूह भेजा जा रहा है, जो वहाँ पहुँच जायगा। अकेली तिलोत्तमा या रम्भा ही इस कार्यको करनेमें समर्थ है अथवा तुम अकेले भी इसे करनेमें समर्थ हो, तब सभी सम्मिलित रूपसे कार्य सिद्ध कर लेंगे; इसमें सन्देहकी बात ही क्या? हे महाभाग! तुम मेरे इस कार्यको सम्पन्न करो, मैं तुम्हें वांछित वस्तु प्रदान करूँगा॥ ४१—४३॥ |
अ० ६ ] चतुर्थ स्कन्ध ४२५
अ० ६ ] चतुर्थ स्कन्ध ४२५
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
|---|---|
| प्रलोभितौ मयात्यर्थं वरदानैस्तपस्विनौ।<br>स्थानान्न चलितौ शान्तौ वृथायं मे गतः श्रमः ॥ ४४<br><br>तथा वै मायया कृत्वा भीषितौ तापसौ भृशम्।<br>तथापि नोत्थितौ स्थानाद्देहरक्षापरौ न तौ ॥ ४५ | मैंने उन दोनों तपस्वियोंको वरदानोंके द्वारा बहुत प्रलोभन दिया, किंतु वे अपने स्थानसे विचलित नहीं हुए, बल्कि शान्त बैठे रहे। मेरा यह परिश्रम व्यर्थ चला गया। मैंने माया रचकर उन तपस्वियोंको बहुत डराया, फिर भी वे अपने आसनसे नहीं उठे। वे दोनों शरीररक्षाके लिये जरा भी चिन्तित नहीं हैं ॥ ४४-४५ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा शक्रं प्राह मनोभवः।<br>वासवाद्य करिष्यामि कार्यं ते मनसेप्सितम् ॥ ४६<br><br>यदि विष्णुं महेशं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम्।<br>ध्यायन्तौ तौ तदास्माकं भवितारौ वशौ मुनी ॥ ४७<br><br>देवीभक्तं वशीकर्तुं नाहं शक्तः कथञ्चन।<br>कामराजं महाबीजं चिन्तयन्तं मनस्यलम् ॥ ४८<br><br>तां देवीं चेन्महाशक्तिं संश्रितौ भक्तिभावतः।<br>न तदा मम बाणानां गोचरौ तापसौ किल ॥ ४९ | व्यासजी बोले—इन्द्रका यह वचन सुनकर कामदेवने उनसे कहा—हे इन्द्र! मैं अभी आपका मनोवांछित कार्य करूँगा। यदि वे दोनों मुनि विष्णु, शिव, ब्रह्मा अथवा सूर्य किसीका ध्यान करते होंगे, तो वे हमारे वशमें हो जायेंगे। मैं केवल कामराज महाबीज 'क्लीं' का अपने मनमें चिन्तन करनेवाले देवीभक्तको वशमें करनेमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हूँ। यदि वे भक्ति-भावसे महाशक्तिस्वरूपा देवीकी उपासनामें लगे होंगे, तो मेरे बाणोंका प्रभाव उन तपस्वियोंपर नहीं पड़ेगा ॥ ४६–४९ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>गच्छ त्वं च महाभाग सर्वैस्तत्र समुद्यतैः।<br>कार्यं ममातिदुःसाध्यं कर्ता हितमनुत्तमम् ॥ ५० | इन्द्र बोले—हे महाभाग! जानेके लिये उद्यत इन सभीके साथ तुम वहाँ जाओ। यद्यपि मेरा यह कार्य अत्यन्त दुःसाध्य है, फिर भी तुम इस हितकर तथा उत्तम कार्यको पूर्ण कर ही लोगे ॥ ५० ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तेन समादिष्टा ययुः सर्वे समुद्यताः।<br>यत्र तौ धर्मपुत्रौ द्वौ तेपाते दुष्करं तपः ॥ ५१ | व्यासजी बोले—इस प्रकार इन्द्रका आदेश पाकर वे लोग पूरी तैयारीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ वे धर्मपुत्र नर-नारायण कठोर तपस्या कर रहे थे ॥ ५१ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
नरनारायणकथावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
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अथ षष्ठोऽध्यायः
कामदेवद्वारा नर-नारायणके समीप वसन्त ऋतुकी सृष्टि, नारायणद्वारा उर्वशीकी उत्पत्ति, अप्सराओं Child / द्वारा नारायणसे स्वयंको अंगीकार करनेकी प्रार्थना
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>प्रथमं तत्र सम्प्राप्तो वसन्तः पर्वतोत्तमे।<br>पुष्पिताः पादपाः सर्वे द्विरेफालिविराजिताः ॥ १<br><br>आम्राश्च बकुला रम्यास्तिलकाः किंशुकाः शुभाः।<br>सालास्तालास्तमालाश्च मधूकाः पुष्पिता बभुः ॥ २ | व्यासजी बोले—सर्वप्रथम उस पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर वसन्त पहुँचा। उस पर्वतपर स्थित सभी वृक्ष पुष्पित हो गये और उनपर भ्रमरोंके समूह मँडराने लगे ॥ १ ॥<br><br>आम, मौलसिरी, रम्य, तिलक, सुन्दर किंशुक, साल, ताल, तमाल तथा महुए—ये सब-के-सब फूलोंसे सुशोभित हो गये ॥ २ ॥ |
| ४२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बभूवुः कोकिलालापा वृक्षाग्रेषु मनोहराः।<br>वल्ल्योऽपि पुष्पिताः सर्वा आलिङ्गिर्नगोत्तमान्॥ ३ | वृक्षोंकी डालियोंपर कोयलोंकी मनोहारिणी कूक आरम्भ हो गयी। पुष्पोंसे लदी हुई सभी लताएँ ऊँचे पर्वतोंपर चढ़ने लगीं॥ ३॥ |
| प्राणिनः स्वासु भार्यासु प्रेमयुक्ताः स्मरातुराः।<br>बभूवुश्चातिमत्ताश्च क्रीडासक्ताः परस्परम्॥ ४ | सभी प्राणी अपनी-अपनी भार्याओंमें प्रेमासक्त हो गये तथा मत्त होकर परस्पर क्रीड़ा करने लगे॥ ४॥ |
| ववुर्मन्दाः सुगन्धाश्च सुस्पर्शा दक्षिणानिलाः।<br>इन्द्रियाणि प्रमाथीनि मुनीनामपि चाभवन्॥ ५ | मन्द, सुगन्धयुक्त तथा सुखद स्पर्शवाली दक्षिणी हवाएँ चलने लगीं। उस समय मुनियोंकी भी वृत्तियाँ अतीव चंचल हो उठीं॥ ५॥ |
| रतियुक्तस्ततः कामः पूरयन्पञ्चमार्गणाम्।<br>चकार त्वरितस्तत्र वासं बदरिकाश्रमे॥ ६ | तत्पश्चात् अपनी भार्या रतिके साथ कामदेव भी अपने पंचबाणोंको छोड़ता हुआ तत्काल बदरिकाश्रम पहुँचकर वहाँ रहने लगा॥ ६॥ |
| रम्भा तिलोत्तमाद्याश्च गत्वा तत्र वराश्रमे।<br>गानं चक्रुः सुगीतज्ञाः स्वरतानसमन्वितम्॥ ७ | संगीतकलामें अत्यन्त प्रवीण रम्भा और तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ भी उस रमणीक बदरिकाश्रममें पहुँचकर स्वर तथा तानमें आबद्ध गीत गाने लगीं॥ ७॥ |
| तच्छ्रुत्वा मधुरोद्गीतं कोकिलानाञ्च कूजितम्।<br>भ्रमरालिविरावञ्च प्रबुद्धौ तौ मुनीश्वरौ॥ ८ | उस मधुर गायन, कोयलोंकी कूक तथा भ्रमर-समूहोंका गुंजार सुनकर उन दोनों मुनिवरोंका ध्यान भंग हो गया॥ ८॥ |
| ऋतुराजमकाले तु दृष्ट्वा तौ पुष्पितं वनम्।<br>जातौ चिन्तापरौ तत्र नरनारायणावृषी॥ ९<br><br>किमद्य शिशिरापायः संवृतः समयं विना।<br>प्राणिनो विह्वलाः सर्वे लक्ष्यन्तेऽतिस्मरातुराः॥ १०<br><br>कालधर्मविपर्यायः कथमद्य दुरासदः।<br>नरं नारायणः प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ ११ | असमयमें ही वसन्तका आगमन तथा सम्पूर्ण वनको पुष्पोंसे सुशोभित देखकर वे दोनों नर तथा नारायणऋषि चिन्तित हो उठे [वे सोचने लगे कि] क्या आज समय पूरा हुए बिना ही शिशिर ऋतु बीत गयी? इस समय तो समस्त प्राणी कामसे पीड़ित होनेके कारण अत्यन्त विह्वल दिखायी पड़ रहे हैं। कालके स्वभाव तथा नियममें यह अद्भुत परिवर्तन आज कैसे हो गया? विस्मयके कारण विस्फारित नेत्रोंवाले मुनि नारायण नरसे कहने लगे॥ ९-११॥ |
| नारायण उवाच<br>पश्य भ्रातरिमे वृक्षाः पुष्पिताः प्रतिभान्ति वै।<br>कोकिलालापसङ्घुष्टा भ्रमरालिProcess: भ्रमरालिविराजिताः॥ १२ | नारायण बोले— हे भाई! देखो, ये सभी वृक्ष पुष्पोंसे लदे हुए सुशोभित हो रहे हैं। इन वृक्षोंपर कोयलोंकी मधुर ध्वनि हो रही है तथा भ्रमरोंकी पंक्तियाँ विराजमान हैं॥ १२॥ |
| शिशिरं भीममातङ्गं दारयन्स्वखरैर्नखैः।<br>वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने॥ १३ | हे मुने! यह वसन्तरूपी सिंह अपने पलाशपुष्परूपी तीखे नाखूनोंसे शिशिररूपी भयानक हाथीको विदीर्ण करता हुआ यहाँ आ पहुँचा है॥ १३॥ |
| रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका।<br>नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना॥ १४ | हे देवर्षे! लाल अशोक जिसके हाथ हैं, किंशुकके पुष्प जिसके पैर हैं, नील अशोक जिसके केश हैं, विकसित श्याम कमल जिसका मुख है, |
| अ० ६ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नीलेन्दीवरनेत्रा सा बिल्ववृक्षफलस्तनी।<br>प्रोत्फुल्लकुन्दरदना मञ्जरीकर्णशोभिता॥ १५<br>बन्धुजीवाधरा शुभ्रा सिन्धुवारनखोद्भवा।<br>पुंस्कोकिलस्वरा पुण्या कदम्बवसना शुभा॥ १६<br>बर्हिवृन्दकलापा च सारसस्वननूपुरा।<br>वासन्ती बद्धरशना मत्तहंसगतिस्तथा॥ १७<br>पुत्रजीवांशुकन्यस्तरोमराजिविराजिता ।<br>वसन्तलक्ष्मीः सम्प्राप्ता ब्रह्मन् बदरिकाश्रमे॥ १८ | नीले कमल जिसके नेत्र हैं, बिल्व-वृक्षके फल जिसके स्तन हैं, खिले हुए कुन्दके फूल जिसके दाँत हैं, आमके बौर जिसके कान हैं, बन्धुजीव (गुलदुपहरिया)-के पुष्प जिसके शुभ्र अधर हैं, सिन्धुवारके पुष्प जिसके नख हैं, कोयलके समान जिसका स्वर है, कदम्बके पुष्प जिस सुन्दरीके पावन वस्त्र हैं, मयूरपंखोंके समूह जिसके आभूषण हैं, सारसोंका स्वर जिसका नूपुर है, माधवी लता जिसकी करधनी है—ऐसी मत्त हंसके समान गतिवाली तथा इंगुदीके पत्तोंको रोमस्वरूप धारण की हुई वसन्तश्री इस बदरिकाश्रममें छायी हुई है॥ १४—१८॥ |
| अकाले किमियं प्राप्ता विस्मयोऽयं ममाधुना।<br>तपोविघ्नकरा नूनं देवर्षे परिचिन्तय॥ १९ | मुझे तो यह महान् आश्चर्य हो रहा है कि असमयमें यह यहाँ क्यों आ गयी? हे देवर्षे! आप यह निश्चित समझिये कि इस समय यह हमलोगोंकी तपस्यामें विघ्न डालनेवाली है॥ १९॥ |
| श्रूयते सुरनारीणां गानं ध्यानविनाशनम्।<br>आवयोस्तपिभङ्गाय कृतं मघवता किल॥ २०<br>ऋतुराडन्यथाकाले प्रीतिं सञ्जनयेत्कथम्।<br>विघ्नोऽयं विहितो भाति भीतेनासुरशत्रुणा॥ २१<br>वाताः सुगन्धाः शीताश्च समायान्ति मनोहराः।<br>नान्यत्कारणमस्तीह शतक्रतुकृतिं विना॥ २२ | ध्यान भंग कर देनेवाला यह देवांगनाओंका गीत सुनायी दे रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि हम दोनोंका तप नष्ट करनेके लिये इन्द्रने ही यह उपक्रम रचा है। अन्यथा ऋतुराज वसन्त अकालमें कैसे प्रीति प्रकट कर सकता है? जान पड़ता है कि भयभीत होकर असुरोंके शत्रु इन्द्रके द्वारा ही यह विघ्न उपस्थित किया गया है। सुरभित, शीतल एवं मनोहर हवाएँ चल रही हैं; इसमें इन्द्रकी चालके अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है॥ २०—२२॥ |
| इति ब्रुवति विप्राग्र्ये देवे नारायणे विभौ।<br>सर्वे दृष्टिपथं प्राप्ता मन्मथप्रमुखास्तदा॥ २३<br>ददर्श भगवान्सर्वान्नरो नारायणस्तथा।<br>विस्मयाविष्टमनसौ बभूवतुरुभावपि॥ २४ | विप्रवर विभु भगवान् नारायण ऐसा कह ही रहे थे कि कामदेव आदि सभी दिखायी पड़ गये। भगवान् नर तथा नारायणने उन सबको प्रत्यक्ष देखा और इससे उन दोनोंके मनमें महान् आश्चर्य हुआ॥ २३-२४॥ |
| मन्मथं मेनकां चैव रम्भां चैव तिलोत्तमाम्।<br>पुष्पगन्धां सुकेशीं च महाश्वेतां मनोरमाम्॥ २५<br>प्रमद्वरां घृताचीञ्च गीतज्ञां चारुहासिनीम्।<br>चन्द्रप्रभां च सोमां च कोकिलालापमण्डिताम्॥ २६<br>विद्युन्मालामम्बुजाक्ष्यौ च तथा काञ्चनमालिनीम्।<br>एताश्चान्या वरारोहा दृष्टास्ताभ्यां तदन्तिके॥ २७<br>तासां द्व्यष्टसहस्राणि पञ्चाशदधिकानि च।<br>वीक्ष्य तौ विस्मितौ जातौ कामसैन्यं सुविस्तरम्॥ २८ | कामदेव, मेनका, रम्भा, तिलोत्तमा, पुष्पगन्धा, सुकेशी, महाश्वेता, मनोरमा, प्रमद्वरा, गीतज्ञ और सुन्दर हास्य करनेवाली घृताची, चन्द्रप्रभा, कोकिलके समान आलाप करनेवाली सोमा, विद्युन्माला, अम्बुजाक्षी और कांचनमालिनी—इन्हें तथा अन्य भी बहुत-सी सुन्दर अप्सराओंको नर-नारायणने अपने पास उपस्थित देखा। उनकी संख्या सोलह हजार पचास थी, कामदेवकी उस विशाल सेनाको देखकर वे दोनों मुनि चकित हो गये॥ २५—२८॥ |
| ४२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रणम्याग्रे स्थिताः सर्वा देववाराङ्गनास्तदा ।<br>दिव्याभरणभूषाढ्या दिव्यमालोपशोभिताः ॥ २९ | उस समय दिव्य वस्त्र तथा आभूषणोंसे विभूषित और दिव्य मालाओंसे सुशोभित देवलोककी वे अप्सराएँ प्रणाम करके सामने खड़ी हो गयीं॥ २९॥ |
| जगुश्छलेन ताः सर्वाः पृथिव्यामतिदुर्लभम् ।<br>तत्तथावस्थितं दिव्यं मन्मथादिविवर्धनम् ॥ ३० | तत्पश्चात् वे अनेक प्रकारके हाव-भाव प्रदर्शित करती हुई छलपूर्वक पृथ्वीतलपर अत्यन्त दुर्लभ एवं कामवासनावर्धक गीत गाने लगीं। |
| शुश्राव भगवान्विष्णुर्नरो नारायणस्तदा ।<br>श्रुत्वा प्रोवाच तास्तत्र प्रीत्या नारायणो मुनिः ॥ ३१ | भगवान् नर-नारायणने उस गीतको सुना। तदनन्तर उसे सुनकर नारायणमुनिने प्रेमपूर्वक उनसे कहा—तुमलोग आनन्दसे बैठो, मैं तुम्हारा अद्भुत आतिथ्य-सत्कार करूँगा। |
| आस्यतां सुखमत्रैव करोम्यातिथ्यमद्भुतम् ।<br>भवत्योऽतिथिधर्मेण प्राप्ताः स्वर्गात्सुमध्यमाः ॥ ३२ | हे सुन्दरियो! तुमलोग स्वर्गसे यहाँ आयी हो, अतएव हमारी अतिथिरूपा हो॥ ३०—३२॥ |
| व्यास उवाच<br>साभिमानस्तु सञ्जातस्तदा नारायणो मुनिः ।<br>इन्द्रेण प्रेषिता नूनं तथा विघ्नचिकीर्षया ॥ ३३ | व्यासजी बोले— हे राजन्! उस समय मुनि नारायण अभिमानमें आकर सोचने लगे कि निश्चितरूपसे इन्द्रने हमारे तपमें बाधा डालनेकी इच्छासे इन्हें भेजा है। ये सब बेचारी क्या चीज हैं, मैं अभी अपना तपोबल दिखाता हूँ और इनसे भी अधिक दिव्य रूपवाली नवीन अप्सराएँ उत्पन्न करता हूँ॥ ३३-३४॥ |
| वराक्यः का इमाः सर्वाः सृजाम्यद्य नवाः किल ।<br>एताभ्यो दिव्यरूपाश्च दर्शयामि तपोबलम् ॥ ३४ | |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा करेणोरुं प्रताड्य वै ।<br>तरसोत्पादयामास नारीं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥ ३५ | मनमें ऐसा विचार करके उन्होंने हाथसे अपनी जंघापर आघातकर तत्काल एक सर्वाङ्गसुन्दरी स्त्री उत्पन्न कर दी॥ ३५॥ |
| नारायणोरुसम्भूता ह्युर्वशीति ततः शुभा ।<br>ददृशुस्ताः स्थितास्तत्र विस्मयं परमं ययुः ॥ ३६ | वह सुन्दरी भगवान् नारायणके ऊरुदेश (जंघा)-से उत्पन्न हुई थी, अतः उसका नाम उर्वशी पड़ा। वहाँ उपस्थित वे अप्सराएँ उर्वशीको देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं॥ ३६॥ |
| तासां च परिचर्यार्थं तावतीश्चातिसुन्दरीः ।<br>प्रादुश्चकार तरसा तदा मुनिरसम्भ्रमः ॥ ३७ | तदनन्तर उन अप्सराओंकी सेवाके लिये मुनिने तत्काल उतनी ही अन्य अत्यन्त सुन्दर अप्सराएँ उत्पन्न कर दीं। हाथमें विविध प्रकारके उपहार लिये हँसती हुई तथा मधुर गीत गाती हुई उन सब अप्सराओंने उन मुनियोंको प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़ी हो गयीं॥ ३७-३८॥ |
| गायन्त्यश्च हसन्त्यश्च नानोपायनपाणयः ।<br>प्रणेमुस्ता मुनी सर्वाः स्थिताः कृत्वाञ्जलिं पुरः ॥ ३८ | |
| तां वीक्ष्य विभ्रमकरीं तपसो विभूतिं<br>देवाङ्गना हि मुमुहुः प्रविमोहयन्त्यः ।<br>ऊचुश्च तौ प्रमुदिताननपद्मशोभा<br>रोमोद्गमोल्लसितचारुनिजाङ्गवल्ल्यः ॥ ३९ | लोगोंको मोहमें डाल देनेवाली वे [इन्द्रप्रेषित] अप्सराएँ तपस्याकी विभूति उस विस्मयकारिणी उर्वशीको देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठीं। उन अप्सराओंके मुखकमल आनन्दातिरेकसे खिल उठे तथा उनके मनोहर शरीररूपी वल्लरियोंपर रोमांचरूपी अंकुर निकल आये। वे अप्सराएँ उन दोनों मुनियोंसे कहने लगीं—॥ ३९॥ |
| अ० ६ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुर्युः कथं स्तुतिमहो तपसो महत्त्वं<br> धैर्यं तथैव भवतामभिवीक्ष्य बालाः।<br>अस्मत्कटाक्षविषदिग्धशरेण दग्धः<br> को वा न तत्र भवतां मनसो व्यथा न॥ ४० | अहो! हम मूर्ख अप्सराएँ आपकी स्तुति कैसे करें? हम तो आपके धैर्य तथा तपके प्रभावको देखकर परम विस्मयमें पड़ गयी हैं। ऐसा कौन है जो हमलोगोंके कटाक्षरूपी विषसे बुझे बाणोंसे दग्ध न हो गया हो, फिर भी आपके मनको थोड़ी भी व्यथा नहीं हुई॥ ४०॥ |
| ज्ञातौ युवां नरहरेः परमांशभूतौ<br> देवौ मुनी शमदमादिनिधी सदैव।<br>सेवानिमित्तमिह नो गमनं न कामं<br> कार्यं हरेः शतमखस्य विधातुमेव॥ ४१ | अब हमलोगोंको ज्ञात हो गया कि आप दोनों देवस्वरूप मुनि साक्षात् भगवान् विष्णुके परम अंश हैं और सदा ही शम, दम आदि गुणोंके निधान हैं। आप दोनोंकी सेवाके लिये यहाँ हमारा आगमन नहीं हुआ है, अपितु देवराज इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही हम सब यहाँ आयी हुई हैं॥ ४१॥ |
| भाग्येन केन युवयोः किल दर्शनं नः<br> सम्पादितं न विदितं खलु सञ्चितं तत्।<br>चित्तं क्षमं निजजने विहितं युवाभ्या-<br> मस्मद्विधे किल कृतागसि तापमुक्तम्॥ ४२<br><br>कुर्वन्ति नैव विबुधास्तपसो व्ययं वै<br> शापेन तुच्छफलदेन महानुभावाः। | न जाने हमारे किस भाग्यसे आप दोनों मुनिवरोंके दर्शन हुए। हम यह नहीं जान पा रही हैं कि हमारे द्वारा सम्पादित किस संचित पुण्यकर्मका यह फल है। [शाप देनेमें समर्थ होते हुए भी] आप दोनों मुनियोंने हम-जैसे अपराधीजनोंको स्वजन समझकर अपने चित्तको क्षमाशील बनाया और हमें सन्तापरहित कर दिया। विवेकशील महानुभाव तुच्छ फल देनेवाले शापको उपयोगमें लाकर अपने तपका अपव्यय नहीं करते॥ ४२ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्थं निशम्य वचनं सुरकामिनीनां<br> तावूचतुर्मुनिवरौ विनयानतानाम्॥ ४३<br><br>प्रीतौ प्रसन्नवदनौ जितकामलोभौ<br> धर्मात्मजौ निजतपोरुचिशोभिताङ्गौ। | व्यासजी बोले—उन अति विनम्र देवसुन्दरियोंका वचन सुनकर प्रसन्न मुखमण्डलवाले, काम तथा लोभको जीत लेनेवाले तथा अपनी तपस्याके प्रभावसे देदीप्यमान अंगोंवाले वे धर्मपुत्र मुनिवर नर-नारायण प्रेमपूर्वक कहने लगे॥ ४३ १/२॥ |
| नरनारायणावूचतुः<br>ब्रुवन्तु वाञ्छितान् कामान्दावावस्तुष्टमानसौ॥ ४४<br><br>यान्तु स्वर्गं गृहीत्वेमामुर्वशीं चारुलोचनाम्।<br>उपायनमियं बाला गच्छत्वद्य मनोहरा॥ ४५ | नर-नारायण बोले—हम दोनों तुम सभीपर अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुमलोग अपने वांछित मनोरथ बताओ, हम उसे देंगे। इस सुन्दर नयनोंवाली उर्वशीको भी अपने साथ लेकर तुम सब स्वर्गके लिये प्रस्थान करो। उपहारस्वरूप यह मनोहर युवती अब यहाँसे तुमलोगोंके साथ जाय॥ ४४-४५॥ |
| दत्तावाभ्यां मघवतः प्रीणनायोरुसम्भवा।<br>स्वस्त्यस्तु सर्वदेवेभ्यो यथेष्टं प्रव्रजन्तु च॥ ४६<br>( न कस्यापि तपोविघ्नं प्रकर्तव्यमतः परम्।) | ऊरुसे प्रादुर्भूत इस उर्वशीको इन्द्रके प्रसन्नार्थ हमने उनको दे दिया है। सभी देवताओंका कल्याण हो और अब सभी लोग इच्छानुसार यहाँसे प्रस्थान करें॥ ४६॥ (अब इसके बाद तुमलोग किसीकी तपस्यामें विघ्न मत उत्पन्न करना।) |
४३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ६
४३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ६
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देव्य ऊचुः<br>क्व गच्छामो महाभाग प्राप्तास्ते पादपङ्कजम्।<br>नारायण सुरश्रेष्ठ भक्त्या परमया मुदा॥ ४७ | देवियाँ बोलीं— हे महाभाग! हे नारायण! हे सुरश्रेष्ठ! परमभक्तिके साथ प्रसन्नतापूर्वक हम सभी अप्सराएँ आपके चरणकमलोंका सान्निध्य प्राप्त कर चुकी हैं; अब हम सब कहाँ जायें? ॥ ४७॥ |
| वाञ्छितं चेद्वरं नाथ ददासि मधुसूदन।<br>तुष्टः कमलपत्राक्ष ब्रवीमो मनसेप्सितम्॥ ४८ | हे नाथ! हे मधुसूदन! हे कमलपत्राक्ष! यदि आप हमारे ऊपर प्रसन्न होकर वांछित वरदान देना चाहते हैं, तो हम अपने मनकी इच्छा प्रकट कर रही हैं॥ ४८॥ |
| पतिस्त्वं भव देवेश वरमेनं परन्तप।<br>भवामः प्रीतियुक्तास्त्वां सेवितुं जगदीश्वर॥ ४९ | हे देवेश! आप हमारे पति बन जायँ। हे परन्तप! हमलोगोंके इसी वरदानको पूर्ण कीजिये। हे जगदीश्वर! आपकी सेवा करनेमें हम सभीको प्रसन्नता होगी॥ ४९॥ |
| त्वया चोत्पादिता नार्यः सन्त्वन्याश्चारुलोचनाः।<br>उर्वश्याद्यास्तथा यान्तु स्वर्गं वै भवदाज्ञया॥ ५०<br><br>स्त्रीणां षोडशसाहस्त्रं तिष्ठत्वत्र शतार्धकम्।<br>सेवां तेऽत्र करिष्यामो युवयोस्तापसोत्तमौ॥ ५१ | आपने जिन उर्वशी आदि सुन्दर नयनोंवाली अन्य रमणियोंको उत्पन्न किया है, वे अब आपकी आज्ञासे स्वर्ग चली जायँ। हे श्रेष्ठ तपस्वियो! हम सोलह हजार पचास अप्सराएँ यहीं रहेंगी और यहाँ हम सब आप दोनोंकी सेवा करेंगी॥ ५०-५१॥ |
| वाञ्छितं देहि देवेश सत्यवाग्भव माधव।<br>आशाभङ्गो हि नारीणां हिंसनं परिकीर्तितम्॥ ५२<br><br>कामार्तानाञ्च मुनिभिर्धर्मज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>भाग्ययोगादिह प्राप्ताः स्वर्गात्प्रेमपरिप्लुताः॥ ५३<br><br>त्यक्तुं नार्हसि देवेश समर्थोऽसि जगत्पते। | हे देवेश! आप हमारा मनोवांछित वर दीजिये और अपने सत्यव्रतका पालन कीजिये। हे माधव! धर्मज्ञ तथा तत्त्वदर्शी मुनियोंने प्रेमासक्त स्त्रियोंकी आशाको भंग करना हिंसा बताया है। दैवयोगसे हम अप्सराएँ भी स्वर्गसे यहाँ आकर आप दोनोंके प्रेमरससे संसिक्त हो गयी हैं। हे देवेश! आप हमारा त्याग न कीजिये। हे जगत्पते! आप तो सर्वसमर्थ हैं॥ ५२-५३ १/२॥ |
| नारायण उवाच<br>पूर्णं वर्षसहस्त्रं तु तपस्तप्तं मयात्र वै॥ ५४<br><br>जितेन्द्रियेण चार्वङ्ग्यः कथं भङ्गं करोम्यतः।<br>नेच्छा कामे सुखे काचित्सुखधर्मविनाशके॥ ५५<br><br>पशूनामपि साधर्म्ये रमेत मतिमान्कथम्। | नारायण बोले— इन्द्रियोंको जीतकर मैंने पूरे एक हजार वर्षोंतक यहाँ तपस्या की है, अतएव हे सुन्दरियो! उसे कैसे नष्ट कर दूँ? सुख तथा धर्मका नाश करनेवाले वासनात्मक सुखमें मेरी कोई रुचि नहीं है। पाशविक धर्मके समान सुखमें विवेकशील पुरुष कैसे प्रवृत्त हो सकता है? ॥ ५४-५५ १/२॥ |
| अप्सरस ऊचुः<br>शब्दादीनां च पञ्चानां मध्ये स्पर्शसुखं वरम्॥ ५६<br><br>आनन्दरसमूलं वै नान्यदस्ति सुखं किल।<br>अतोऽस्माकं महाराज वचनं कुरु सर्वथा॥ ५७ | अप्सराएँ बोलीं— शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—इन पाँच सुखोंमें स्पर्श-सुख सर्वश्रेष्ठ है। यह आनन्दरसका मूल है और इससे बढ़कर अन्य कोई भी सुख नहीं है। अतः हे महाराज! आप हमारी बात मान लीजिये॥ ५६-५७॥ |
अ० ७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३१
| निर्भरं सुखमासाद्य चरस्व गन्धमादने।<br>यदि वाञ्छसि नाकत्वं नाधिको गन्धमादनात्॥ ५८<br><br>रमस्वात्र शुभे स्थाने प्राप्य सर्वाः सुराङ्गनाः॥ ५९ | पूर्ण आनन्द प्राप्त करते हुए आप गन्धमादन-पर्वतपर विचरण कीजिये। यदि आप स्वर्ग-प्राप्तिकी आकांक्षा रखते हैं तो यह निश्चय जान लीजिये कि वह स्वर्ग इस गन्धमादनसे अच्छा नहीं है। अतः हम सभी अप्सराओंको अंगीकार करके आप इस दिव्य स्थानमें विहार कीजिये॥ ५८-५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे अप्सरसां नारायणसमीपे प्रार्थनाकरणं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
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अथ सप्तमोऽध्यायः
अप्सराओंके प्रस्तावसे नारायणके मनमें ऊहापोह और नरका उन्हें समझाना तथा अहंकारके कारण प्रह्लादके साथ हुए युद्धका स्मरण कराना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्याकर्ण्य वचस्तासां धर्मपुत्रः प्रतापवान्।<br>विमर्शमकरोञ्चित्ते किं कर्तव्यं मयाधुना॥ १<br><br>हास्योऽहं मुनिवृन्देषु भविष्याम्यद्य सङ्गमात्।<br>अहंकारादिदं प्राप्तं दुःखं नात्र विचारणा।<br>मूलं धर्मविनाशस्य प्रथमं यदहङ्कृतिः॥ २<br><br>मूलं संसारवृक्षस्य यतः प्रोक्तो महात्मभिः।<br>दृष्ट्वा मौनं समाधाय न स्थितोऽहं समागतम्॥ ३<br><br>वाराङ्गनागणं जुष्टं तेनासं दुःखभाजनम्।<br>उत्पादितास्तथा नार्यो मया धर्मव्ययेन वै॥ ४<br><br>तास्तु मां बाधितुं वृत्ताः कामार्ताः प्रमदोत्तमाः।<br>ऊर्णनाभिरिवाद्याहं जालेन स्वकृतेन वै॥ ५<br><br>बद्धोऽस्मि सुदृढेनात्र किं कर्तव्यमतः परम्।<br>यदि चिन्तां समुत्सृज्य सन्त्यजाम्यबला इमाः॥ ६<br><br>शप्त्वा भ्रष्टा व्रजिष्यन्ति सर्वा भग्नमनोरथाः।<br>मुक्तोऽहं सञ्चरिष्यामि विजने परमं तपः॥ ७<br>तस्मात्क्रोधं समुत्पाद्य त्यक्ष्यामि सुन्दरीगणम्। | उन देवांगनाओंका वचन सुनकर धर्मपुत्र प्रतापी नारायण अपने मनमें विचार करने लगे कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं इस समय विषयभोगमें लिप्त होता हूँ तो मुनिसमुदायमें उपहासका पात्र बनूँगा। अहंकारसे ही मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है; इसमें कोई संशय नहीं। धर्मके विनाशका मूल तथा प्रधान कारण अहंकार है। अतः महात्माओंने उसे संसाररूपी वृक्षका मूल कहा है॥ १-२\frac{१}{२}॥<br><br>इन वारांगनाओंके समूहको आया हुआ देखकर मैं मौन धारणकर स्थित नहीं रह सका और प्रसन्नतापूर्वक मैंने इनसे वार्तालाप किया, इसीलिये मैं दुःखका भाजन हुआ। अपने धर्मका व्यय करके मैंने उन उर्वशी आदि स्त्रियोंकी व्यर्थ रचना की। ये कामार्त अप्सराएँ मेरी तपस्यामें विघ्न डालनेमें प्रवृत्त हैं। मकड़ियोंके द्वारा बनाये गये जालकी भाँति अब अपने ही द्वारा उत्पादित सुदृढ़ जालमें मैं बुरी तरह फँस गया हूँ, अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि चिन्ता छोड़कर इन स्त्रियोंको अस्वीकार कर देता हूँ तो अपना मनोरथ निष्फल हुआ पाकर ये भ्रष्ट स्त्रियाँ मुझे शाप देकर चली जायेंगी। तब इनसे छुटकारा पाकर मैं निर्जन स्थानमें कठोर तप करूँगा। अतएव क्रोध उत्पन्न करके मैं इनका परित्याग कर दूँगा॥ ३—७\frac{१}{२}॥ |
| ४३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ | | :--- | :--- |
| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा मुनिर्नारायणस्तदा ॥ ८<br><br>विमर्षमकरोच्चित्ते सुखोत्पादनसाधने ।<br>द्वितीयोऽयं महाशत्रुः क्रोधः सन्तापकारकः ॥ ९<br><br>कामादप्यधिको लोके लोभादपि च दारुणः ।<br>क्रोधाभिभूतः कुरुते हिंसां प्राणविघातिनीम् ॥ १०<br><br>दुःखदां सर्वभूतानां नरकारामदीर्घिकाम् ।<br>यथाग्निर्घर्षणाज्जातः पादपं प्रदहेत्तथा ॥ ११<br><br>देहोत्पन्नस्तथा क्रोधो देहं दहति दारुणः । | व्यासजी बोले—मुनि नारायणने ऐसा निश्चय करके अपने मनमें विचार किया कि सुख-प्राप्तिके समस्त साधनोंमें [अहंकारके बाद] यह क्रोध दूसरा प्रबल शत्रु है, जो अत्यन्त कष्ट प्रदान करता है। यह क्रोध संसारमें काम तथा लोभसे भी अधिक भयंकर है। क्रोधके वशीभूत प्राणी प्राणघातक हिंसातक कर डालता है, जो (हिंसा) सभी प्राणियोंके लिये दुःखदायिनी तथा नरकरूपी बगीचेकी बावलीके तुल्य है। जिस प्रकार वृक्षोंके परस्पर घर्षणसे उत्पन्न अग्नि वृक्षको ही जला डालती है, उसी प्रकार शरीरसे उत्पन्न भीषण क्रोध उसी शरीरको जला डालता है॥ ८–११ १/२॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्यमानं तं भ्रातरं दीनमानसम् ॥ १२<br><br>उवाच वचनं तथ्यं नरो धर्मसुतोऽनुजः । | व्यासजी बोले—इस प्रकार खिन्नमनस्क होकर चिन्तन करते हुए अपने भाई नारायणसे उनके लघु भ्राता धर्मपुत्र नरने यह तथ्यपूर्ण वचन कहा॥ १२ १/२॥ | | नर उवाच<br>नारायण महाभाग कोपं यच्छ महामते ॥ १३<br><br>शान्तं भावं समाश्रित्य नाशयाहङ्कृतिं पराम् ।<br>पुराहङ्कारदोषेण तपो नष्टं किलावयोः ॥ १४ | नर बोले—हे नारायण! हे महाभाग! हे महामते! आप क्रोधका त्याग कीजिये और शान्तभावका आश्रय लेकर इस प्रबल अहंकारका नाश कीजिये; क्योंकि पूर्व समयमें इसी अहंकारके दोषसे हम दोनोंका तप विनष्ट हो गया था॥ १३-१४॥ | | संग्रामश्चाभवत्ताभ्यां भावाभ्यामसुरेण ह ।<br>दिव्यवर्षसहस्रं तु प्रह्लादेन महाद्भुतम् ॥ १५<br><br>दुःखं बहुतरं प्राप्तं तत्रावाभ्यां सुरोत्तम ।<br>तस्मात्क्रोधं परित्यज्य शान्तो भव मुनीश्वर ॥ १६<br><br>(शान्तत्वं तपसो मूलं मुनिभिः परिकीर्तितम् ।) | अहंकार तथा क्रोध—इन्हीं दोनों भावोंके कारण हमलोगोंको असुरराज प्रह्लादके साथ एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त अद्भुत युद्ध करना पड़ा था। हे सुरश्रेष्ठ! उस युद्धमें हम दोनोंको महान् क्लेश मिला था। अतएव हे मुनीश्वर! आप क्रोधका परित्याग करके शान्त हो जाइये॥ १५-१६॥ (मुनियोंने शान्तिको तपस्याका मूल बतलाया है।) | | व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा शान्तोऽभूद्धर्मनन्दनः । | व्यासजी बोले—उनकी यह बात सुनकर धर्मपुत्र नारायण शान्त हो गये॥ १६ १/२॥ | | जनमेजय उवाच<br>संशयोऽयं मुनिश्रेष्ठ प्रह्लादेन महात्मना ॥ १७<br><br>विष्णुभक्तेन शान्तेन कथं युद्धं कृतं पुरा ।<br>कृतवन्तौ कथं युद्धं नरनारायणावृषी ॥ १८ | जनमेजय बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनमें यह सन्देह उत्पन्न हो गया है कि शान्त स्वभाववाले विष्णुभक्त महात्मा प्रह्लादने पूर्वकालमें यह युद्ध क्यों किया और ऋषि नर-नारायणने भी संग्राम क्यों किया?॥ १७-१८॥ | | तापसौ धर्मपुत्रौ द्वौ सुशान्तमानसावुभौ ।<br>समागमः कथं जातस्तयोर्दैत्यसुतस्य च ॥ १९ | धर्मपुत्र नर-नारायण—ये दोनों ही अत्यन्त शान्त स्वभाववाले तपस्वी थे। ऐसी स्थितिमें दैत्यपुत्र प्रह्लाद तथा उन दोनों ऋषियोंका सम्पर्क कैसे हुआ?॥ १९॥ |
| अ० ७ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३३ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| संग्रामस्तु कथं ताभ्यां कृतस्तेन महात्मना।<br>प्रह्लादोऽप्यतिधर्मात्मा ज्ञानवान्विष्णुतत्परः॥ २० | प्रह्लाद भी अत्यन्त धर्मपरायण, ज्ञानसम्पन्न तथा विष्णुभक्त थे, तब महात्मा प्रह्लादने उन ऋषियोंके साथ युद्ध क्यों किया ?॥ २०॥ |
| नरनारायणौ तद्वत्तापसौ सत्त्वसंस्थितौ।<br>तेन ताभ्यां समुद्भूतं वैरं यदि परस्परम्॥ २१<br><br>तदा तपसि धर्मे च श्रम एव हि केवलम्।<br>क्व जपः क्व तपश्चर्या पुरा सत्ययुगेऽपि च॥ २२ | तपस्वी नर-नारायण भी प्रह्लादकी ही भाँति सात्त्विक भावसे सम्पन्न थे। उन दोनों ऋषियों तथा प्रह्लादमें यदि परस्पर वैर उत्पन्न हो गया तो फिर उनकी तपस्या तथा धर्माचरणके पालनमें केवल परिश्रम ही उनके हाथ लगा। उस सत्ययुगमें भी उनके जप तथा घोर तप कहाँ चले गये थे ?॥ २१-२२॥ |
| तादृशैनं जितं चित्तं क्रोधाहङ्कारसंवृतम्।<br>न क्रोधो न च मात्सर्यमहङ्कारांकुरं विना॥ २३<br><br>अहङ्कारात्समुत्पन्नाः कामक्रोधादयः किल।<br>वर्षकोटिसहस्रं तु तपः कृत्वातिदारुणम्॥ २४<br><br>अहङ्कारांकुरे जाते व्यर्थं भवति सर्वथा।<br>यथा सूर्योदये जाते तमोरूपं न तिष्ठति॥ २५<br><br>अहङ्कारांकुरस्याग्रे तथा पुण्यं न तिष्ठति। | वैसे वे महात्मा भी क्रोध और अहंकारसे भरे अपने मनको वशमें नहीं कर सके। अहंकाररूपी बीजके अंकुरित हुए बिना क्रोध तथा मात्सर्य उत्पन्न नहीं होते हैं। यह निश्चित है कि काम-क्रोध आदि अहंकारसे ही उत्पन्न होते हैं। हजार करोड़ वर्षोंतक घोर तपस्या करनेके पश्चात् भी यदि अहंकारका अंकुरण हुआ तो फिर सब कुछ निरर्थक हो जाता है। जिस प्रकार सूर्योदय होनेपर अन्धकार नहीं ठहरता, उसी प्रकार अहंकाररूपी अंकुरके समक्ष पुण्य नहीं ठहर पाता है॥ २३-२५ ½॥ |
| प्रह्लादोऽपि महाभाग हरिणा समयुध्यत॥ २६<br><br>तदा व्यर्थं कृतं सर्वं सुकृतं किल भूतले। | हे महाभाग! प्रह्लादने भी भगवान् नर-नारायणके साथ संग्राम किया, जिसके कारण पृथ्वीपर उनके द्वारा अर्जित समस्त पुण्य व्यर्थ हो गया॥ २६ ½॥ |
| नरनारायणौ शान्तौ विहाय परमं तपः॥ २७<br><br>कृतवन्तौ यदा युद्धं क्व शमः सुकृतं पुनः। | शान्त स्वभाववाले नर-नारायण भी अपनी कठिन तपस्या त्यागकर यदि युद्ध करनेमें तत्पर हुए तो फिर उनकी शान्तिवृत्ति तथा पुण्यशीलताका क्या महत्त्व रहा ?॥ २७ ½॥ |
| ईदृग्भ्यां सत्त्वयुक्ताभ्यामजेया यद्यहङ्कृतिः॥ २८<br><br>मादृशानाञ्च का वार्ता मुनेऽहङ्कारसंक्षये।<br>अहङ्कारपरित्यक्तो न कोऽप्यस्ति जगत्त्रये॥ २९<br><br>न भूतो भविता नैव यस्त्यक्तस्तेन सर्वथा। | हे मुने! जब सात्त्विक भावोंसे सम्पन्न इस प्रकारके वे दोनों महात्मा भी अहंकारपर विजय प्राप्त करनेमें असमर्थ रहे, तब मेरे-जैसे व्यक्तियोंके लिये अहंकार नष्ट करनेकी बात ही क्या है? इस त्रिलोकमें ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जो अहंकारसे मुक्त हो, इसी तरह ऐसा कोई भी न तो हुआ है और न होगा, जो अहंकारसे पूर्णतया मुक्त हो॥ २८-२९ ½॥ |
| मुच्यते लोहनिगडैर्बद्धः काष्ठमयैस्तथा॥ ३०<br><br>अहङ्कारनिबद्धस्तु न कदाचिद्विमुच्यते।<br>अहङ्कारावृतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ३१ | काष्ठ तथा लोहेकी जंजीरमें बँधा हुआ व्यक्ति बन्धनमुक्त हो सकता है, किंतु अहंकारसे बँधा व्यक्ति कभी भी नहीं छूट सकता। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् अहंकारसे व्याप्त है॥ ३०-३१॥ |
| ४३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ | | :--- | :--- |
| भ्रमत्येव हि संसारे विष्ठामूत्रप्रदूषिते ।<br>ब्रह्मज्ञानं कुतस्तावत्संसारे मोहसंवृते ॥ ३२ | अहंकारी मनुष्य मल-मूत्रसे प्रदूषित इस संसारमें चक्कर काटता रहता है, तो फिर इस मोहाच्छन्न संसारमें ब्रह्मज्ञानकी कल्पना ही कहाँ रह गयी ? ॥ ३२ ॥ | | मतं मीमांसकानां वै सम्मतं भाति सुव्रत ।<br>महान्तोऽपि सदा युक्ताः कामक्रोधादिभिर्मुने ॥ ३३<br><br>मादृशानां कलावस्मिन्का कथा मुनिसत्तम । | हे सुव्रत! मुझे तो मीमांसकोंका कर्म-सिद्धान्त ही उचित प्रतीत होता है। हे मुने! जब महान्-से-महान् लोग भी काम, क्रोध आदिसे सदा ग्रस्त रहते हैं, तब हे मुनिश्रेष्ठ! इस कलियुगमें मुझ-जैसे लोगोंकी बात ही क्या ? ॥ ३३ १/२ ॥ | | व्यास उवाच<br>कार्यं वै कारणाद्भिन्नं कथं भवति भारत ॥ ३४<br><br>कटकं कुण्डलञ्चैव सुवर्णसदृशं भवेत् ।<br>अहङ्कारोद्भवं सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम् ॥ ३५<br><br>पटस्तन्तुवशः प्रोक्तस्तद्वियुक्तः कथं भवेत् ।<br>मायागुणैस्त्रिभिः सर्वं रचितं स्थिरजङ्गमम् ॥ ३६<br><br>सतृणस्तम्बपर्यन्तं का तत्र परिदेवना ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्ते चाहङ्कारमोहिताः ॥ ३७<br><br>भ्रमन्त्यस्मिन्महागाधे संसारे नृपसत्तम ।<br>वसिष्ठनारदाद्याश्च मुनयो ज्ञानिनः परम् ॥ ३८<br><br>तेऽभिभूताः संसरन्ति संसारेऽस्मिन्पुनः पुनः ।<br>न कोऽप्यस्ति नृपश्रेष्ठ त्रिषु लोकेषु देहभृत् ॥ ३९<br><br>एभिर्मायागुणैर्मुक्तः शान्त आत्मसुखे स्थितः ।<br>कामक्रोधौ तथा लोभो मोहोऽहङ्कारसम्भवः ॥ ४० | व्यासजी बोले—हे भारत (जनमेजय)! कारणसे कार्य भिन्न कैसे हो सकता है? कड़ा तथा कुण्डल आकारमें भिन्न होते हुए भी स्वर्णके सदृश होते हैं। चराचरसहित समस्त ब्रह्माण्ड अहंकारसे उत्पन्न हुआ है। [धागेसे निर्मित होनेके कारण] वस्त्र उसके अधीन कहा गया है, अतएव वस्त्ररूपी कार्य तन्तुरूपी कारणसे पृथक् कैसे रह सकता है? जब मायाके तीनों गुणोंद्वारा ही तिनकेसे लेकर पर्वततक स्थावर-जंगमात्मक यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विरचित है, तब सृष्टिके विषयमें खेद किस बातका? हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव भी अहंकारसे मोहित होकर इस अत्यन्त अगाध संसारमें भ्रमण करते रहते हैं। वसिष्ठ, नारद आदि परम ज्ञानी मुनिगण भी अहंकारके वशवर्ती होकर इस संसारमें बार-बार आते-जाते रहते हैं। हे नृपश्रेष्ठ! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई भी देहधारी नहीं है जो मायाके इन गुणोंसे मुक्त होकर शान्ति धारण करता हुआ आत्मसुखका अनुभव कर सके। हे नृपश्रेष्ठ! अहंकारसे उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ तथा मोह किसी भी देहधारी प्राणीको नहीं छोड़ते ॥ ३४-४० १/२ ॥ | | न मुञ्चन्ति नरं सर्वं देहवन्तं नृपोत्तम ।<br>अधीत्य वेदशास्त्राणि पुराणानि विचिन्त्य च ॥ ४१<br><br>कृत्वा तीर्थाटनं दानं ध्यानञ्चैव सुरार्चनम् ।<br>करोति विषयासक्तः सर्वं कर्म च चौरवत् ॥ ४२<br><br>विचारयति नो पूर्वं काममोहमदान्वितः । | वेद-शास्त्रोंका अध्ययन, पुराणोंका पर्यालोचन, तीर्थभ्रमण, दान, ध्यान तथा देव-पूजन करके भी विषयासक्त प्राणी चोरोंकी भाँति सभी कर्म करता रहता है। काम, मोह और मदसे युक्त होनेके कारण प्राणी आरम्भमें कुछ विचार ही नहीं करता ॥ ४१-४२ १/२ ॥ | | कृते युगेऽपि त्रेतायां द्वापरे कुरुनन्दन ॥ ४३<br>विद्धोऽत्रास्ति च धर्मोऽपि का कथाद्य कलौ पुनः । | हे कुरुनन्दन! सत्ययुग, त्रेता तथा द्वापरमें भी धर्मका विरोध किया गया था, तो आज कलियुगमें |
| अ० ७ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्पर्धा सदैव सद्द्रोहा लोभामर्षौ च सर्वदा ॥ ४४<br><br>एवंविधोऽस्ति संसारो नात्र कार्या विचारणा।<br>साधवो विरला लोके भवन्ति गतमत्सराः ॥ ४५<br><br>जितक्रोधा जितामर्षा दृष्टान्तार्थं व्यवस्थिताः। | उसकी बात ही क्या! इसमें तो द्रोह, स्पर्धा, लोभ तथा क्रोध सर्वदा ही विद्यमान हैं। संसार ऐसे ही स्वभाववाला है; इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये। संसारमें मत्सरहीन साधु पुरुष विरले ही होते हैं। क्रोध तथा ईर्ष्यापर विजय प्राप्त कर लेनेवाले तो दृष्टान्तमात्रके लिये मिलते हैं॥ ४३—४५ १/२ ॥ |
| राजोवाच<br>ते धन्याः कृतपुण्यास्ते मदमोहविवर्जिताः ॥ ४६<br><br>जितेन्द्रियाः सदाचारा जितं तैर्भुवनत्रयम्।<br>दुनोमि पातकं स्मृत्वा पितुर्मम महात्मनः ॥ ४७<br><br>कृतस्तपस्विनः कण्ठे मृतसर्पो ह्यघं विना।<br>अतस्तस्य मुनिश्रेष्ठ भविता किं ममाग्रतः ॥ ४८<br><br>न जाने बुद्धिसम्मोहात्किं वा कार्यं भविष्यति।<br>मधु पश्यति मूढात्मा प्रपातं नैव पश्यति ॥ ४९<br><br>करोति निन्दितं कर्म नरकान्न बिभेति च। | राजा बोले—वे लोग धन्य तथा पुण्यात्मा हैं, जिन्होंने मद तथा मोहसे छुटकारा प्राप्त कर लिया है। जो सदाचारपरायण तथा जितेन्द्रिय हैं, उन्होंने मानो तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर ली है। अपने महात्मा पिताके पापका स्मरण करके मैं दुःखित रहता हूँ। उन्होंने बिना किसी अपराधके एक तपस्वीके गलेमें मरा हुआ सर्प डाल दिया। अतः हे मुनिवर! अब मेरे आगे उनकी क्या गति होगी? बुद्धिके मोहग्रस्त हो जानेपर क्या कार्य हो जायगा, यह मैं नहीं जानता। मूर्ख मनुष्य केवल मधु देखता है, किंतु उसके पास ही विद्यमान [गहरे] प्रपातकी ओर नहीं निहारता। वह निन्दनीय कर्म करता रहता है और नरकसे नहीं डरता॥ ४६—४९ १/२ ॥ |
| कथं युद्धं पुरा वृत्तं विस्तरात्तद्वदस्व मे ॥ ५०<br><br>प्रह्लादेन यथा चोग्रं नरनारायणस्य वै।<br>प्रह्लादस्तु कथं यातः पातालात्तद्वदस्व मे ॥ ५१<br><br>सारस्वते महातीर्थे पुण्ये बदरिकाश्रमे।<br>नरनारायणौ शान्तौ तापसौ मुनिसत्तमौ ॥ ५२<br><br>कृतवन्तौ तथा युद्धं हेतुना केन मानद। | [हे मुने!] अब आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बताइये कि पूर्वकालमें प्रह्लादके साथ नर-नारायणका घोर युद्ध क्यों हुआ था? प्रह्लाद पाताल-लोकसे सारस्वत महातीर्थ पवित्र बदरिकाश्रममें कैसे पहुँचे, यह भी मुझे बताइये। शान्त स्वभाववाले मुनिश्रेष्ठ नर-नारायण तो महान् तपस्वी थे; तब हे मानद! उन दोनोंने प्रह्लादके साथ युद्ध किस कारणसे किया?॥ ५०—५२ १/२ ॥ |
| वैरं भवति वित्तार्थं दारार्थं वा परस्परम् ॥ ५३<br><br>एषणारहितौ कस्माच्चक्रतुः प्रधनं महत्।<br>प्रह्लादोऽपि च धर्मात्मा ज्ञात्वा देवौ सनातनौ ॥ ५४<br><br>कृतवान्स कथं युद्धं नरनारायणौ मुनी।<br>एतद्विस्तरतो ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि कारणम् ॥ ५५ | प्रायः धन अथवा स्त्रीके लिये लोगोंमें परस्पर शत्रुता होती है। तब हर प्रकारकी इच्छाओंसे रहित उन दोनोंने वह भीषण युद्ध क्यों किया और उन नर-नारायणको सनातन देवता जानते हुए भी महात्मा प्रह्लादने उनके साथ युद्ध क्यों किया? हे ब्रह्मन्! मैं विस्तारपूर्वक इसका कारण सुनना चाहता हूँ॥ ५३—५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
अहङ्कारावर्तनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
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| ४३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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अथाष्टमोऽध्यायः
व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको प्रह्लादकी कथा सुनाना और इस प्रसंगमें च्यवनऋषिके पाताललोक जानेका वर्णन
</div>| <div align="center">सूत उवाच</div>इति पृष्टस्तदा विप्रो राज्ञा पारीक्षितेन वै।<br>उवाच विस्तरात्सर्वं व्यासः सत्यवतीसुतः॥ १॥ | **सूतजी बोले—**परीक्षित्-पुत्र राजा जनमेजयके यह पूछनेपर सत्यवतीसुत विप्र व्यासजीने विस्तारपूर्वक सारा वृत्तान्त बताया॥ १॥ |
| जनमेजयोऽपि धर्मात्मा निर्वेदं परमं गतः।<br>चित्तं दुश्चरितं मत्वा वैराटीतनयस्य वै॥ २॥ | धर्मपरायण राजा जनमेजय भी उत्तरापुत्र अपने पिता परीक्षित्की कुत्सित चेष्टाको सोच-सोचकर अत्यन्त दुःखी हो गये थे॥ २॥ |
| तस्यैवोद्धरणार्थाय चकार सततं मनः।<br>विप्रावमानपापेन यमलोकं गतस्य वै॥ ३॥ | विप्रको अपमानित करनेके परिणामस्वरूप पापके कारण यमलोकको प्राप्त अपने उन पिताके उद्धारके लिये वे निरन्तर अपने मनमें अनेक प्रकारके उपाय सोचा करते थे॥ ३॥ |
| पुन्नामनरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं स्वकम्।<br>पुत्रेति नाम सार्थं स्यात्तेन तस्य मुनीश्वराः॥ ४॥ | हे मुनीश्वरो! जब पुत्र अपने पिताकी 'पुम्' नामक नरकसे रक्षा कर देता है, तभी उसका 'पुत्र' नाम सार्थक होता है॥ ४॥ |
| सर्पदष्टं नृपं श्रुत्वा हर्म्योपरि मृतं तथा।<br>विप्रशापादौत्तरेयं स्नानदानविवर्जितम्॥ ५॥<br>पितुर्गतिं निशम्यासौ निर्वेदं गतवान्नृपः।<br>पारीक्षितो महाभागः सन्तप्तो भयविह्वलः॥ ६॥ | जब उन्हें यह विदित हुआ कि एक महलकी ऊपरी मंजिलमें स्नान-दान किये बिना ही विप्रके शापवश सर्प-दंशसे महाराज परीक्षित्की मृत्यु हुई थी, तब अपने पिताकी दुर्गति सुनकर वे राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखित हुए और शोकसे सन्तप्त तथा भयसे व्याकुल हो उठे॥ ५-६॥ |
| पप्रच्छाथ मुनिं व्यासं गृहागतमनिन्दितः।<br>नरनारायणस्येमां कथां परमविस्तृताम्॥ ७॥ | इसके अनन्तर निष्पाप राजा जनमेजयने अपने घरपर स्वतः आये हुए महामुनि व्याससे नर-नारायणकी अति विस्तृत इस कथाके विषयमें पूछा॥ ७॥ |
| <div align="center">व्यास उवाच</div>स यदा निहतो रौद्रो हिरण्यकशिपुर्नृप।<br>अभिषिक्तस्तदा राज्ये प्रह्लादो नाम तत्सुतः॥ ८॥ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! जब नृसिंहभगवान्के द्वारा उस भयानक हिरण्यकशिपुका वध हो गया, तब प्रह्लाद नामक उसके पुत्रका राज्याभिषेक किया गया॥ ८॥ |
| तस्मिञ्छासति दैत्येन्द्रे देवब्राह्मणपूजके।<br>मखैर्भूमौ नृपतयो यजन्तः श्रद्धयान्विताः॥ ९॥ | देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन-सम्मान करनेवाले उस दैत्यराज प्रह्लादके शासनकालमें पृथ्वी-लोकके सभी राजागण श्रद्धापूर्वक यज्ञादिका अनुष्ठान करने लगे॥ ९॥ |
| ब्राह्मणाश्च तपोधर्मतीर्थयात्राश्च कुर्वते।<br>वैश्याश्च स्वस्ववृत्तिस्थाः शूद्राः शुश्रूषणे रताः॥ १०॥ | ब्राह्मणलोग तपश्चरण, धर्मानुष्ठान तथा तीर्थाटनमें तत्पर हो गये; वैश्यसमुदाय अपने-अपने व्यावसायिक कार्योंमें लग गये तथा शूद्रगण सेवापरायण हो गये॥ १०॥ |
अ० ८ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३७
अ० ८ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३७
| नृसिंहेन च पाताले स्थापितः सोऽथ दैत्यराट्।<br>राज्यं चकार तत्रैव प्रजापालनतत्परः ॥ ११ | नृसिंहभगवान्ने उस दैत्यराज प्रह्लादको पाताललोकके राजसिंहासनपर स्थापित कर दिया था और वे वहींपर प्रजापालनमें तत्पर होकर राज्य करने लगे॥ ११॥ |
| कदाचिद् भृगुपुत्रोऽथ च्यवनाख्यो महातपाः।<br>जगाम नर्मदां स्नातुं तीर्थं वै व्याहृतीश्वरम् ॥ १२ | एक बार भृगुके पुत्र महातपस्वी च्यवन नर्मदामें स्नान करनेके लिये व्याहृतीश्वर नामक तीर्थमें पहुँचे ॥ १२ ॥ |
| रेवां महानदीं दृष्ट्वा ततस्तस्यामवातरत्।<br>उत्तरन्तं प्रजग्राह नागो विषभयङ्करः ॥ १३ | वहाँपर रेवा नामक महानदीको देखकर वे उसमें उतरने लगे। इसी बीच एक भयंकर विषधर सर्पने उतरते हुए मुनिको पकड़ लिया॥ १३॥ |
| गृहीतो भयभीतस्तु पाताले मुनिसत्तमः।<br>सस्मार मनसा विष्णुं देवदेवं जनार्दनम् ॥ १४ | तदनन्तर उन महामुनि च्यवनको वह नागराज खींचकर पाताललोकमें ले गया। तब उन भयाक्रान्त मुनिने मन-ही-मन देवाधिदेव जनार्दन विष्णुका स्मरण किया॥ १४॥ |
| संस्मृते पुण्डरीकाक्षे निर्विषोऽभून्महोरगः।<br>न प्राप च्यवनो दुःखं नीयमानो रसातलम् ॥ १५ | मुनि च्यवनके द्वारा हृदयसे कमलनयन भगवान् विष्णुका स्मरण किये जानेपर वह भयंकर सर्प विषहीन हो गया। अतएव रसातलमें ले जाये गये उन मुनिको कष्ट नहीं हुआ॥ १५॥ |
| द्विजिह्वेन मुनिस्त्यक्तो निर्विण्णेनातिशङ्किना।<br>मां शपेत मुनिः क्रुद्धस्तापसोऽयं महानिति॥ १६ | तत्पश्चात् अत्यन्त दुःखी तथा सशंकित उस सर्पने यह सोचकर उन्हें छोड़ दिया कि ये महातपस्वी मुनि क्रोधित होकर कहीं मुझे शाप न दे दें ॥ १६॥ |
| चचार नागकन्याभिः पूजितो मुनिसत्तमः।<br>विवेशाप्यथ नागानां दानवानां महत्पुरम् ॥ १७ | वहाँकी नागकन्याओंद्वारा पूजित होते हुए मुनिश्रेष्ठ च्यवन पाताललोकमें विचरण करने लगे। वे नागों तथा दानवोंके विशाल पुरमें भी आने-जाने लगे॥ १७॥ |
| कदाचिद् भृगुपुत्रं तं विचरन्तं पुरोत्तमे।<br>ददर्श दैत्यराजोऽसौ प्रह्लादो धर्मवत्सलः ॥ १८ | एक बार उन धर्मानुरागी दैत्यराज प्रह्लादने अपनी श्रेष्ठ पुरीमें विचरण करते हुए उन भृगुपुत्र मुनि च्यवनको देखा ॥ १८ ॥ |
| दृष्ट्वा तं पूजयामास मुनिं दैत्यपतिस्तदा।<br>पप्रच्छ कारणं किं ते पातालागमने वद ॥ १९ | मुनिको देखकर दैत्यराज प्रह्लादने उनकी पूजा की और उनसे पूछा कि पाताललोकमें आपके आगमनका क्या कारण है, आप मुझे बताइये ? ॥ १९॥ |
| प्रेषितोऽसि किमिन्द्रेण सत्यं ब्रूहि द्विजोत्तम।<br>दैत्यविद्वेषयुक्तेन मम राज्यदिदृक्षया॥ २० | हे द्विजश्रेष्ठ! क्या दैत्योंके प्रति द्वेष-भाव रखनेवाले इन्द्रने मेरे राज्यके विषयमें जानकारीके लिये आपको यहाँ भेजा है ? आप मुझे सच-सच बताइये॥ २०॥ |
| च्यवन उवाच<br>किं मे मघवता राजन् यदहं प्रेषितः पुनः।<br>दूतकार्यं प्रकुर्वाणः प्राप्तवान्नगरे तव ॥ २१ | च्यवन बोले— हे राजन् ! इन्द्रसे मेरा क्या प्रयोजन है, जो कि वे मुझे यहाँ भेजें और मैं उनके दूतका कार्य करता हुआ आपके नगरमें घूमता फिरूँ ? ॥ २१॥ |