देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 444, कुल 889 में से
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| अ० ७ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्पर्धा सदैव सद्द्रोहा लोभामर्षौ च सर्वदा ॥ ४४<br><br>एवंविधोऽस्ति संसारो नात्र कार्या विचारणा।<br>साधवो विरला लोके भवन्ति गतमत्सराः ॥ ४५<br><br>जितक्रोधा जितामर्षा दृष्टान्तार्थं व्यवस्थिताः। | उसकी बात ही क्या! इसमें तो द्रोह, स्पर्धा, लोभ तथा क्रोध सर्वदा ही विद्यमान हैं। संसार ऐसे ही स्वभाववाला है; इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये। संसारमें मत्सरहीन साधु पुरुष विरले ही होते हैं। क्रोध तथा ईर्ष्यापर विजय प्राप्त कर लेनेवाले तो दृष्टान्तमात्रके लिये मिलते हैं॥ ४३—४५ १/२ ॥ |
| राजोवाच<br>ते धन्याः कृतपुण्यास्ते मदमोहविवर्जिताः ॥ ४६<br><br>जितेन्द्रियाः सदाचारा जितं तैर्भुवनत्रयम्।<br>दुनोमि पातकं स्मृत्वा पितुर्मम महात्मनः ॥ ४७<br><br>कृतस्तपस्विनः कण्ठे मृतसर्पो ह्यघं विना।<br>अतस्तस्य मुनिश्रेष्ठ भविता किं ममाग्रतः ॥ ४८<br><br>न जाने बुद्धिसम्मोहात्किं वा कार्यं भविष्यति।<br>मधु पश्यति मूढात्मा प्रपातं नैव पश्यति ॥ ४९<br><br>करोति निन्दितं कर्म नरकान्न बिभेति च। | राजा बोले—वे लोग धन्य तथा पुण्यात्मा हैं, जिन्होंने मद तथा मोहसे छुटकारा प्राप्त कर लिया है। जो सदाचारपरायण तथा जितेन्द्रिय हैं, उन्होंने मानो तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त कर ली है। अपने महात्मा पिताके पापका स्मरण करके मैं दुःखित रहता हूँ। उन्होंने बिना किसी अपराधके एक तपस्वीके गलेमें मरा हुआ सर्प डाल दिया। अतः हे मुनिवर! अब मेरे आगे उनकी क्या गति होगी? बुद्धिके मोहग्रस्त हो जानेपर क्या कार्य हो जायगा, यह मैं नहीं जानता। मूर्ख मनुष्य केवल मधु देखता है, किंतु उसके पास ही विद्यमान [गहरे] प्रपातकी ओर नहीं निहारता। वह निन्दनीय कर्म करता रहता है और नरकसे नहीं डरता॥ ४६—४९ १/२ ॥ |
| कथं युद्धं पुरा वृत्तं विस्तरात्तद्वदस्व मे ॥ ५०<br><br>प्रह्लादेन यथा चोग्रं नरनारायणस्य वै।<br>प्रह्लादस्तु कथं यातः पातालात्तद्वदस्व मे ॥ ५१<br><br>सारस्वते महातीर्थे पुण्ये बदरिकाश्रमे।<br>नरनारायणौ शान्तौ तापसौ मुनिसत्तमौ ॥ ५२<br><br>कृतवन्तौ तथा युद्धं हेतुना केन मानद। | [हे मुने!] अब आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बताइये कि पूर्वकालमें प्रह्लादके साथ नर-नारायणका घोर युद्ध क्यों हुआ था? प्रह्लाद पाताल-लोकसे सारस्वत महातीर्थ पवित्र बदरिकाश्रममें कैसे पहुँचे, यह भी मुझे बताइये। शान्त स्वभाववाले मुनिश्रेष्ठ नर-नारायण तो महान् तपस्वी थे; तब हे मानद! उन दोनोंने प्रह्लादके साथ युद्ध किस कारणसे किया?॥ ५०—५२ १/२ ॥ |
| वैरं भवति वित्तार्थं दारार्थं वा परस्परम् ॥ ५३<br><br>एषणारहितौ कस्माच्चक्रतुः प्रधनं महत्।<br>प्रह्लादोऽपि च धर्मात्मा ज्ञात्वा देवौ सनातनौ ॥ ५४<br><br>कृतवान्स कथं युद्धं नरनारायणौ मुनी।<br>एतद्विस्तरतो ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि कारणम् ॥ ५५ | प्रायः धन अथवा स्त्रीके लिये लोगोंमें परस्पर शत्रुता होती है। तब हर प्रकारकी इच्छाओंसे रहित उन दोनोंने वह भीषण युद्ध क्यों किया और उन नर-नारायणको सनातन देवता जानते हुए भी महात्मा प्रह्लादने उनके साथ युद्ध क्यों किया? हे ब्रह्मन्! मैं विस्तारपूर्वक इसका कारण सुनना चाहता हूँ॥ ५३—५५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
अहङ्कारावर्तनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
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