देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ४३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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अथाष्टमोऽध्यायः
व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको प्रह्लादकी कथा सुनाना और इस प्रसंगमें च्यवनऋषिके पाताललोक जानेका वर्णन
</div>| <div align="center">सूत उवाच</div>इति पृष्टस्तदा विप्रो राज्ञा पारीक्षितेन वै।<br>उवाच विस्तरात्सर्वं व्यासः सत्यवतीसुतः॥ १॥ | **सूतजी बोले—**परीक्षित्-पुत्र राजा जनमेजयके यह पूछनेपर सत्यवतीसुत विप्र व्यासजीने विस्तारपूर्वक सारा वृत्तान्त बताया॥ १॥ |
| जनमेजयोऽपि धर्मात्मा निर्वेदं परमं गतः।<br>चित्तं दुश्चरितं मत्वा वैराटीतनयस्य वै॥ २॥ | धर्मपरायण राजा जनमेजय भी उत्तरापुत्र अपने पिता परीक्षित्की कुत्सित चेष्टाको सोच-सोचकर अत्यन्त दुःखी हो गये थे॥ २॥ |
| तस्यैवोद्धरणार्थाय चकार सततं मनः।<br>विप्रावमानपापेन यमलोकं गतस्य वै॥ ३॥ | विप्रको अपमानित करनेके परिणामस्वरूप पापके कारण यमलोकको प्राप्त अपने उन पिताके उद्धारके लिये वे निरन्तर अपने मनमें अनेक प्रकारके उपाय सोचा करते थे॥ ३॥ |
| पुन्नामनरकाद्यस्मात्त्रायते पितरं स्वकम्।<br>पुत्रेति नाम सार्थं स्यात्तेन तस्य मुनीश्वराः॥ ४॥ | हे मुनीश्वरो! जब पुत्र अपने पिताकी 'पुम्' नामक नरकसे रक्षा कर देता है, तभी उसका 'पुत्र' नाम सार्थक होता है॥ ४॥ |
| सर्पदष्टं नृपं श्रुत्वा हर्म्योपरि मृतं तथा।<br>विप्रशापादौत्तरेयं स्नानदानविवर्जितम्॥ ५॥<br>पितुर्गतिं निशम्यासौ निर्वेदं गतवान्नृपः।<br>पारीक्षितो महाभागः सन्तप्तो भयविह्वलः॥ ६॥ | जब उन्हें यह विदित हुआ कि एक महलकी ऊपरी मंजिलमें स्नान-दान किये बिना ही विप्रके शापवश सर्प-दंशसे महाराज परीक्षित्की मृत्यु हुई थी, तब अपने पिताकी दुर्गति सुनकर वे राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखित हुए और शोकसे सन्तप्त तथा भयसे व्याकुल हो उठे॥ ५-६॥ |
| पप्रच्छाथ मुनिं व्यासं गृहागतमनिन्दितः।<br>नरनारायणस्येमां कथां परमविस्तृताम्॥ ७॥ | इसके अनन्तर निष्पाप राजा जनमेजयने अपने घरपर स्वतः आये हुए महामुनि व्याससे नर-नारायणकी अति विस्तृत इस कथाके विषयमें पूछा॥ ७॥ |
| <div align="center">व्यास उवाच</div>स यदा निहतो रौद्रो हिरण्यकशिपुर्नृप।<br>अभिषिक्तस्तदा राज्ये प्रह्लादो नाम तत्सुतः॥ ८॥ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! जब नृसिंहभगवान्के द्वारा उस भयानक हिरण्यकशिपुका वध हो गया, तब प्रह्लाद नामक उसके पुत्रका राज्याभिषेक किया गया॥ ८॥ |
| तस्मिञ्छासति दैत्येन्द्रे देवब्राह्मणपूजके।<br>मखैर्भूमौ नृपतयो यजन्तः श्रद्धयान्विताः॥ ९॥ | देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन-सम्मान करनेवाले उस दैत्यराज प्रह्लादके शासनकालमें पृथ्वी-लोकके सभी राजागण श्रद्धापूर्वक यज्ञादिका अनुष्ठान करने लगे॥ ९॥ |
| ब्राह्मणाश्च तपोधर्मतीर्थयात्राश्च कुर्वते।<br>वैश्याश्च स्वस्ववृत्तिस्थाः शूद्राः शुश्रूषणे रताः॥ १०॥ | ब्राह्मणलोग तपश्चरण, धर्मानुष्ठान तथा तीर्थाटनमें तत्पर हो गये; वैश्यसमुदाय अपने-अपने व्यावसायिक कार्योंमें लग गये तथा शूद्रगण सेवापरायण हो गये॥ १०॥ |