भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| ४३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ | | :--- | :--- | | विद्धि मां भृगुपुत्रं तं स्वनेत्रं धर्मतत्परम्।<br>मा शङ्कां कुरु दैत्येन्द्र वासवप्रेषितस्य वै॥ २२ | हे दैत्यराज! आप मुझे महर्षि भृगुका धर्मनिष्ठ तथा ज्ञाननेत्रसम्पन्न पुत्र च्यवन जानिये। आप मेरे प्रति इन्द्रके द्वारा भेजे गये किसी दूतकी शंका मत करें॥ २२॥ | | स्नानार्थं नर्मदां प्राप्तः पुण्यतीर्थे नृपोत्तम।<br>नद्यामेवावतीर्णोऽहं गृहीतश्च महाहिना॥ २३ | हे नृपश्रेष्ठ! मैं नर्मदानदीमें स्नान करनेके लिये पुण्यतीर्थमें गया था। मैं नदीमें उतरा ही था कि एक विशाल सर्पने मुझे पकड़ लिया॥ २३॥ | | जातोऽसौ निर्विषः सर्पो विष्णोः संस्मरणादिव।<br>मुक्तोऽहं तेन नागेन प्रभावात्स्मरणस्य वै॥ २४ | मेरे द्वारा भगवान् विष्णुका स्मरण करनेसे वह सर्प विषहीन हो गया और विष्णुस्मरणके प्रभावसे मैं उस नागसे मुक्त हो गया॥ २४॥ | | अत्रागतेन राजेन्द्र मयाप्तं तव दर्शनम्।<br>विष्णुभक्तोऽसि दैत्येन्द्र तद्भक्तं मां विचिन्तय॥ २५ | हे राजेन्द्र! यहाँ आनेसे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हो गया। हे दैत्यराज! आप भगवान् विष्णुके भक्त हैं और मुझे भी उनका भक्त ही समझिये॥ २५॥ | | व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचः श्लक्ष्णं हिरण्यकशिपोः सुतः।<br>पप्रच्छ परया प्रीत्या तीर्थानि विविधानि च॥ २६ | व्यासजी बोले—महर्षि च्यवनका मधुर वचन सुनकर हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लाद अत्यन्त प्रेमपूर्वक नानाविध तीर्थोंके विषयमें उनसे पूछने लगे॥ २६॥ | | प्रह्लाद उवाच<br>पृथिव्यां कानि तीर्थानि पुण्यानि मुनिसत्तम।<br>पाताले च तथाकाशे तानि नो वद विस्तरात्॥ २७ | प्रह्लाद बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! पृथ्वी, पाताल तथा आकाशमें कौन-कौनसे पवित्र तीर्थ हैं? उनके सम्बन्धमें विस्तारपूर्वक मुझे बताइये॥ २७॥ | | च्यवन उवाच<br>मनोवाक्कायशुद्धानां राजंस्तीर्थं पदे पदे।<br>तथा मलिनचित्तानां गङ्गापि कीकटाधिका॥ २८ | च्यवन बोले—हे राजन्! मन, वचन तथा कर्मसे शुद्ध प्राणियोंके लिये तो पद-पदपर तीर्थ हैं, किंतु दूषित मनवाले प्राणियोंके लिये गंगा भी मगधसे अधिक अपवित्र हो जाती हैं॥ २८॥ | | प्रथमं चेन्मनः शुद्धं जातं पापविवर्जितम्।<br>तदा तीर्थानि सर्वाणि पावनानि भवन्ति वै॥ २९<br><br>गङ्गातीरे हि सर्वत्र वसन्ति नगराणि च।<br>व्रजाश्चैवाकरा ग्रामाः सर्वे खेटास्तथापरे॥ ३०<br><br>निषादानां निवासाश्च कैवर्तानां तथापरे।<br>हूणबङ्गरवसानां च म्लेच्छानां दैत्यसत्तम॥ ३१<br><br>पिबन्ति सर्वदा गाङ्गं जलं ब्रह्मोपमं सदा।<br>स्नानं कुर्वन्ति दैत्येन्द्र त्रिकालं स्वेच्छया जनाः॥ ३२<br><br>तत्रैकोऽपि विशुद्धात्मा न भवत्येव मारिष।<br>किं फलं तर्हि तीर्थस्य विषयोपहतात्मसु॥ ३३ | यदि मनुष्यका मन शुद्ध तथा पापरहित हो गया तो उसके लिये सभी तीर्थ पवित्र हो जाते हैं। गंगाके तटपर तो सर्वत्र नानाविध नगर, गोष्ठ (गायोंका बाड़ा), बाजार, गाँव तथा अनेक कस्बे वहाँ बसे हैं। हे दैत्यराज! निषादों, धीवरों, हूणों, बंगों, खसों तथा म्लेच्छ जातियोंका निवास भी वहाँ रहता है। हे दैत्येन्द्र! वे सदैव ब्रह्मसदृश गंगाजलका पान करते हैं और अपनी इच्छासे त्रिकाल गंगा-स्नान भी करते हैं। किंतु हे धर्मात्मन्! उनमेंसे कोई एक भी शुद्ध अन्तःकरणवाला नहीं हो पाता। तब नानाविध वासनाओंसे प्रदूषित चित्तवाले लोगोंके लिये तीर्थका क्या फल हो सकता है?॥ २९—३३॥ |