देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 448, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 448
| अ० ८ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३१ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कारणं मन एवात्र नान्यद्राजन्विचिन्तय ।<br>मनःशुद्धिः प्रकर्तव्या सततं शुद्धिमिच्छता ॥ ३४ | हे राजन्! आप यह निश्चित समझिये कि मन ही इसमें प्रमुख कारण है; इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं। अतः शुद्धिकी इच्छा रखनेवाले प्राणीको निरन्तर अपने मनको शुद्ध बनाये रखना चाहिये ॥ ३४ ॥ |
| तीर्थवासी महापापी भवेत्तत्रात्मवञ्चनात् ।<br>तत्रैवाचरितं पापमानन्त्याय प्रकल्पते ॥ ३५ | तीर्थमें निवास करनेवाला प्राणी भी आत्मवंचनाके कारण महापापी हो जाता है। वहाँ किया गया पाप अनन्तगुना हो जाता है ॥ ३५ ॥ |
| यथेन्द्रवारुणं पक्वं मिष्टं नैवोपजायते ।<br>भावदुष्टस्तथा तीर्थे कोटिस्नातो न शुध्यति ॥ ३६ | जिस प्रकार इन्द्रवारुणका फल पक जानेपर भी मीठा नहीं होता, उसी प्रकार दूषित भावनाओंवाला मनुष्य तीर्थमें करोड़ों बार स्नान करके भी पवित्र नहीं हो पाता ॥ ३६ ॥ |
| प्रथमं मनसः शुद्धिः कर्तव्या शुभमिच्छता ।<br>शुद्धे मनसि द्रव्यस्य शुद्धिर्भवति नान्यथा ॥ ३७ | अतः कल्याणकी कामना करनेवाले पुरुषको सर्वप्रथम अपने मनको शुद्ध कर लेना चाहिये। मनके शुद्ध हो जानेपर द्रव्यशुद्धि स्वतः हो जाती है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है ॥ ३७ ॥ |
| तथैवाचारशुद्धिः स्यात्ततस्तीर्थं प्रसिध्यति ।<br>अन्यथा तु कृतं सर्वं व्यर्थं भवति तत्क्षणात् ॥ ३८ | उसी प्रकार आचार-शुद्धि भी आवश्यक है; इसके अनन्तर ही तीर्थयात्राकी पूर्ण सिद्धि होती है। इसके विपरीत उसका किया हुआ सारा कर्म उसी क्षण व्यर्थ हो जाता है ॥ ३८ ॥ |
| ( हीनवर्णस्य संसर्गं तीर्थे गत्वा सदा त्यजेत् । )<br>भूतानुकम्पनं चैव कर्तव्यं कर्मणा धिया ।<br>यदि पृच्छसि राजेन्द्र तीर्थं वक्ष्याम्यनुत्तमम् ॥ ३९ | (तीर्थमें पहुँचकर नीच प्राणीके संसर्गका सर्वदाके लिये त्याग कर देना चाहिये।) कर्म तथा बुद्धिसे प्राणियोंके प्रति सदा दयाभाव रखना चाहिये। फिर भी हे राजेन्द्र! यदि आप पूछते ही हैं तो मैं आपको प्रमुख तीर्थोंके विषयमें बता रहा हूँ ॥ ३९ ॥ |
| प्रथमं नैमिषं पुण्यं चक्रतीर्थं च पुष्करम् ।<br>अन्येषां चैव तीर्थानां संख्या नास्ति महीतले ॥ ४०<br><br>पावनानि च स्थानानि बहूनि नृपसत्तम । | प्रथम श्रेणीका तीर्थ पुण्यमय नैमिषारण्य है। इसी प्रकार चक्रतीर्थ, पुष्करतीर्थ तथा अन्य भी अनेक तीर्थ पृथ्वीलोकमें हैं, जिनकी संख्या निश्चित नहीं है। हे नृपश्रेष्ठ! और भी बहुत-से पवित्र स्थान हैं ॥ ४० १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा नैमिषं गन्तुमुद्यतः ॥ ४१ | व्यासजी बोले— च्यवनऋषिका वचन सुनकर राजा प्रह्लाद नैमिषारण्यतीर्थ जानेको तैयार हो गये। हर्षातिरेकसे परिपूर्ण हृदयवाले प्रह्लादने अन्य दैत्योंको भी चलनेकी आज्ञा दी ॥ ४१ १/२ ॥ |
| नोदयामास दैत्यान्वै हर्षनिर्भरमानसः ।<br><br>प्रह्लाद उवाच<br>उत्तिष्ठन्तु महाभागा गमिष्यामोऽद्य नैमिषम् ॥ ४२<br>द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् । | प्रह्लाद बोले— हे महाभाग दैत्यगण ! आपलोग उठिये, हम सभी लोग आज नैमिषारण्य चलेंगे। वहाँ हमलोग पीताम्बर धारण करनेवाले कमलनयन भगवान् अच्युत (विष्णु)-का दर्शन करेंगे ॥ ४२ १/२ ॥ |