देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० ८ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४३१ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| कारणं मन एवात्र नान्यद्राजन्विचिन्तय ।<br>मनःशुद्धिः प्रकर्तव्या सततं शुद्धिमिच्छता ॥ ३४ | हे राजन्! आप यह निश्चित समझिये कि मन ही इसमें प्रमुख कारण है; इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं। अतः शुद्धिकी इच्छा रखनेवाले प्राणीको निरन्तर अपने मनको शुद्ध बनाये रखना चाहिये ॥ ३४ ॥ |
| तीर्थवासी महापापी भवेत्तत्रात्मवञ्चनात् ।<br>तत्रैवाचरितं पापमानन्त्याय प्रकल्पते ॥ ३५ | तीर्थमें निवास करनेवाला प्राणी भी आत्मवंचनाके कारण महापापी हो जाता है। वहाँ किया गया पाप अनन्तगुना हो जाता है ॥ ३५ ॥ |
| यथेन्द्रवारुणं पक्वं मिष्टं नैवोपजायते ।<br>भावदुष्टस्तथा तीर्थे कोटिस्नातो न शुध्यति ॥ ३६ | जिस प्रकार इन्द्रवारुणका फल पक जानेपर भी मीठा नहीं होता, उसी प्रकार दूषित भावनाओंवाला मनुष्य तीर्थमें करोड़ों बार स्नान करके भी पवित्र नहीं हो पाता ॥ ३६ ॥ |
| प्रथमं मनसः शुद्धिः कर्तव्या शुभमिच्छता ।<br>शुद्धे मनसि द्रव्यस्य शुद्धिर्भवति नान्यथा ॥ ३७ | अतः कल्याणकी कामना करनेवाले पुरुषको सर्वप्रथम अपने मनको शुद्ध कर लेना चाहिये। मनके शुद्ध हो जानेपर द्रव्यशुद्धि स्वतः हो जाती है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है ॥ ३७ ॥ |
| तथैवाचारशुद्धिः स्यात्ततस्तीर्थं प्रसिध्यति ।<br>अन्यथा तु कृतं सर्वं व्यर्थं भवति तत्क्षणात् ॥ ३८ | उसी प्रकार आचार-शुद्धि भी आवश्यक है; इसके अनन्तर ही तीर्थयात्राकी पूर्ण सिद्धि होती है। इसके विपरीत उसका किया हुआ सारा कर्म उसी क्षण व्यर्थ हो जाता है ॥ ३८ ॥ |
| ( हीनवर्णस्य संसर्गं तीर्थे गत्वा सदा त्यजेत् । )<br>भूतानुकम्पनं चैव कर्तव्यं कर्मणा धिया ।<br>यदि पृच्छसि राजेन्द्र तीर्थं वक्ष्याम्यनुत्तमम् ॥ ३९ | (तीर्थमें पहुँचकर नीच प्राणीके संसर्गका सर्वदाके लिये त्याग कर देना चाहिये।) कर्म तथा बुद्धिसे प्राणियोंके प्रति सदा दयाभाव रखना चाहिये। फिर भी हे राजेन्द्र! यदि आप पूछते ही हैं तो मैं आपको प्रमुख तीर्थोंके विषयमें बता रहा हूँ ॥ ३९ ॥ |
| प्रथमं नैमिषं पुण्यं चक्रतीर्थं च पुष्करम् ।<br>अन्येषां चैव तीर्थानां संख्या नास्ति महीतले ॥ ४०<br><br>पावनानि च स्थानानि बहूनि नृपसत्तम । | प्रथम श्रेणीका तीर्थ पुण्यमय नैमिषारण्य है। इसी प्रकार चक्रतीर्थ, पुष्करतीर्थ तथा अन्य भी अनेक तीर्थ पृथ्वीलोकमें हैं, जिनकी संख्या निश्चित नहीं है। हे नृपश्रेष्ठ! और भी बहुत-से पवित्र स्थान हैं ॥ ४० १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा नैमिषं गन्तुमुद्यतः ॥ ४१ | व्यासजी बोले— च्यवनऋषिका वचन सुनकर राजा प्रह्लाद नैमिषारण्यतीर्थ जानेको तैयार हो गये। हर्षातिरेकसे परिपूर्ण हृदयवाले प्रह्लादने अन्य दैत्योंको भी चलनेकी आज्ञा दी ॥ ४१ १/२ ॥ |
| नोदयामास दैत्यान्वै हर्षनिर्भरमानसः ।<br><br>प्रह्लाद उवाच<br>उत्तिष्ठन्तु महाभागा गमिष्यामोऽद्य नैमिषम् ॥ ४२<br>द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् । | प्रह्लाद बोले— हे महाभाग दैत्यगण ! आपलोग उठिये, हम सभी लोग आज नैमिषारण्य चलेंगे। वहाँ हमलोग पीताम्बर धारण करनेवाले कमलनयन भगवान् अच्युत (विष्णु)-का दर्शन करेंगे ॥ ४२ १/२ ॥ |
अथ नवमोऽध्यायः
| ४४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इत्युक्ता विष्णुभक्तेन सर्वे ते दानवास्तदा ॥ ४३<br>तेनैव सह पातालात्रिर्ययुः परया मुदा।<br>ते समेत्य च दैतेया दानवाश्च महाबलाः ॥ ४४<br>नैमिषारण्यमासाद्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः।<br>प्रह्लादस्तत्र तीर्थेषु चरन्दैत्यैः समन्वितः ॥ ४५<br>सरस्वतीं महापुण्यां ददर्श विमलोदकाम्।<br>तीर्थे तत्र नृपश्रेष्ठ प्रह्लादस्य महात्मनः ॥ ४६<br>मनः प्रसन्नं सञ्जातं स्नात्वा सारस्वते जले।<br>विधिवत्तत्र दैत्येन्द्रः स्नानदानादिकं शुभे ॥ ४७<br>चकारातिप्रसन्नात्मा तीर्थे परमपावने ॥ ४८ | विष्णुभक्त प्रह्लादके ऐसा कहनेपर वे समस्त दानव परम प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ पाताललोकसे निकल पड़े। उन महाबली दैत्यों तथा दानवोंने एक साथ नैमिषारण्य पहुँचकर आनन्दपूर्वक स्नान किया। दैत्योंके साथ वहाँके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए प्रह्लादने स्वच्छ जलसे परिपूर्ण तथा महापुण्यदायिनी सरस्वतीनदीका दर्शन किया। हे नृपश्रेष्ठ! उस पवित्र तीर्थमें सरस्वतीके जलमें स्नान करनेसे महात्मा प्रह्लादका मन प्रसन्न हो गया। दैत्येन्द्र प्रह्लादने उस शुभ तथा परम पावन तीर्थमें प्रसन्न मनसे स्नान, दान आदि कर्म विधिवत् सम्पन्न किये॥ ४३—४८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादतीर्थयात्रावर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः
प्रह्लादजीका तीर्थयात्राके क्रममें नैमिषारण्य पहुँचना और वहाँ नर-नारायणसे उनका घोर युद्ध, भगवान् विष्णुका आगमन और उनके द्वारा प्रह्लादको नर-नारायणका परिचय देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| कुर्वंस्तीर्थविधिं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः।<br>न्यग्रोधं सुमहच्छायमपश्यत्पुरतस्तदा ॥ १ | [हे राजन्!] इस प्रकार तीर्थके कृत्य सम्पन्न करते हुए हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लादको अपने समक्ष एक विशाल छाया सम्पन्न वटवृक्ष दिखायी पड़ा॥ १॥ |
| ददर्श बाणानपरान्नानाजातीयकांस्तदा।<br>गृध्रपक्षयुतांस्तीव्राञ्शिलाधौतान्महोज्ज्वलान् ॥ २ | वहाँपर प्रह्लादने गीधोंके पंखोंसे सुसज्जित, नुकीले तथा शिलापर घर्षित करके अत्यन्त दीप्त एवं उज्ज्वल बनाये गये अनेक प्रकारके बाण देखे॥ २॥ |
| चिन्तयामास मनसा कस्येमे विशिखास्त्विह।<br>ऋषीणामाश्रमे पुण्ये तीर्थे परमपावने ॥ ३ | उन्हें देखकर प्रह्लादने मनमें सोचा कि इस परम पवित्र तीर्थमें ऋषियोंके पुण्यमय आश्रममें ये बाण किसके हैं?॥ ३॥ |
| एवं चिन्तयतानेन कृष्णाजिनधरौ मुनी।<br>समुन्नतजटाभारौ दृष्टौ धर्मसुतौ तदा ॥ ४ | इस प्रकार चिन्तन करते हुए प्रह्लादने कृष्ण-मृगचर्म धारण किये हुए तथा सिरपर विशाल जटाओंसे सुशोभित धर्मपुत्र नर-नारायण मुनियोंको देखा॥ ४॥ |
| तयोरग्रे धृते शुभ्रे धनुषी लक्षणान्विते।<br>शार्ङ्गमाजगवञ्चैव तथाक्षय्यौ महेषुधी ॥ ५ | उनके आगे धनुर्वेदके लक्षणोंसे सम्पन्न चमकीले शार्ङ्ग तथा आजगव नामक दो धनुष तथा दो अक्षय तरकस रखे हुए थे॥ ५॥ |
| अ० ९ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४४१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ध्यानस्थौ तौ महाभागौ नरनारायणावृषी।<br>दृष्ट्वा धर्मसुतौ तत्र दैत्यानामधिपस्तदा॥ ६<br><br>क्रोधरक्तेक्षणस्तौ तु प्रोवाचासुरपालकः।<br>किं भवद्भ्यां समारब्धो दम्भो धर्मविनाशनः॥ ७ | उन महाभाग धर्मपुत्र नर-नारायण ऋषियोंको उस समय ध्यानावस्थित देखकर क्रोधसे लाल आँखें किये हुए दैत्याधिपति असुररक्षक प्रह्लादने उनसे कहा—आप दोनोंने धर्मको नष्ट करनेवाला यह कैसा पाखण्ड कर रखा है?॥ ६-७॥ |
| न श्रुतं नैव दृष्टं हि संसारेऽस्मिन्कदापि हि।<br>तपसश्चरणं तीव्रं तथा चापस्य धारणम्॥ ८ | इस प्रकारकी घोर तपस्या तथा धनुष-धारण करना—ऐसा तो इस संसारमें न कभी सुना गया और न देखा ही गया॥ ८॥ |
| विरोधोऽयं युगे चाद्ये कथं युक्तं कलिप्रियम्।<br>ब्राह्मणस्य तपो युक्तं तत्र किं चापधारणम्॥ ९ | ये तो परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं। कलियुगके लिये प्रिय यह विरोधभाव भला सत्ययुगमें किस प्रकार उचित है? ब्राह्मणके लिये तो तपश्चरण ही उचित है, उन्हें धनुष-धारण करनेकी क्या आवश्यकता है?॥ ९॥ |
| क्व जटाधारणं देहे क्वेषुधी च विडम्बनौ।<br>धर्मस्याचरणं युक्तं युवयोर्दिव्यभावयोः॥ १० | कहाँ तो मस्तकपर जटा धारण करना और कहाँ यह तरकस रखना—ये दोनों बातें आडम्बरमात्र हैं। दिव्य भावनावाले आप दोनोंके लिये धर्मका आचरण ही उचित है॥ १०॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा नरः प्रोवाच भारत।<br>का ते चिन्तात्र दैत्येन्द्र वृथा तपसि चावयोः॥ ११ | **व्यासजी बोले—**हे भारत! प्रह्लादका यह वचन सुनकर मुनिवर नरने कहा—हे दैत्येन्द्र! हम दोनोंकी तपस्याके विषयमें आप यह व्यर्थ चिन्ता क्यों कर रहे हैं?॥ ११॥ |
| सामर्थ्ये सति यत्कुर्यात्तत्संपद्येत तस्य हि।<br>आवां कार्यद्वये मन्द समर्थौ लोकविश्रुतौ॥ १२ | सामर्थ्यसम्पन्न हो जानेपर व्यक्ति जो कुछ करता है, उसका वह सब कुछ पूर्ण हो जाता है। हे मन्दबुद्धि! हम इन दोनों प्रकारके कार्योंको [एक साथ] करनेमें समर्थ हैं; इसके लिये हम लोकमें प्रसिद्ध हैं॥ १२॥ |
| युद्धे तपसि सामर्थ्यं त्वं पुनः किं करिष्यसि।<br>गच्छ मार्गे यथाकामं कस्मादत्र विकत्थसे॥ १३ | युद्ध तथा तपस्या दोनोंमें हम समान रूपसे समर्थ हैं। फिर इस विषयमें आप पूछकर क्या करेंगे? आप इच्छानुसार अपने रास्ते चले जाइये, यहाँ व्यर्थकी बात क्यों कर रहे हैं?॥ १३॥ |
| ब्रह्मतेजो दुराराध्यं न त्वं वेद विमोहितः।<br>विप्रचर्चा न कर्तव्या प्राणिभिः सुखमीप्सुभिः॥ १४ | मोहग्रस्त होनेके कारण आप अत्यन्त कठिनतासे प्राप्त किये जानेवाले ब्रह्मतेजको नहीं जानते। सुखकी कामना करनेवाले प्राणियोंको ब्राह्मणोंसे बहस नहीं करनी चाहिये॥ १४॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>तापसौ मन्दबुद्धी स्थो मृषा वां गर्वमोहितौ।<br>मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके॥ १५ | **प्रह्लाद बोले—**आप दोनों तपस्वी मन्द बुद्धिवाले हैं और व्यर्थ ही अहंकारके वशवर्ती हो गये हैं। धर्मसेतुका प्रवर्तन करनेवाले मुझ दैत्येन्द्र प्रह्लादके रहते |
| ४४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न युक्तमेतत्तीर्थेऽस्मिन्धर्माचरणं पुनः।<br>का शक्तिस्तव युद्धेऽस्ति दर्शयाद्य तपोधन॥ १६ | इस पवित्र तीर्थमें इस प्रकारका अधर्मपूर्ण आचरण उचित नहीं है। हे तपोधन! आपमें कितनी शक्ति है, इसे युद्धमें अभी प्रदर्शित कीजिये॥ १५-१६॥ |
| व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तस्य नरस्तं प्रत्युवाच ह।<br>युद्धस्वाद्य मया सार्धं यदि ते मतिरीदृशी॥ १७<br>अद्य ते स्फोटयिष्यामि मूर्धानमसुराधम।<br>(युद्धे श्रद्धा न ते पश्चाद्भविष्यति कदाचन।)<br>व्यास उवाच | व्यासजी बोले—तब प्रह्लादका वचन सुनकर ऋषि नरने उनसे कहा—यदि आपकी ऐसी ही धारणा है तो मेरे साथ इसी समय युद्ध कर लीजिये। हे असुराधम! आज मैं तुम्हारा सिर विदीर्ण कर डालूँगा (इसके बाद युद्ध करनेकी तुम्हारी कभी इच्छा नहीं होगी)॥ १७ १/२॥ |
| तन्निशम्य वचस्तस्य दैत्येन्द्रः कुपितस्तदा॥ १८<br>प्रह्लादो बलवानत्र प्रतिज्ञामारुरोह सः।<br>येन केनाप्युपायेन जे ष्यामि तावुभावपि॥ १९<br>नरनारायणौ दान्तावृषी तपिसमन्वितौ।<br>व्यास उवाच | व्यासजी बोले—तब ऋषि नरका वचन सुनकर दैत्यपति प्रह्लाद कुपित हो उठे। बलशाली उन प्रह्लादने प्रतिज्ञा की कि जिस किसी भी उपायसे मैं इन दोनों जितेन्द्रिय तथा परम तपस्वी नर-नारायण ऋषियोंको जीतकर रहूँगा॥ १८-१९ १/२॥ |
| इत्युक्त्वा वचनं दैत्यः प्रतिगृह्य शरासनम्॥ २०<br>आकृष्य तरसा चापं ज्याशब्दञ्च चकार ह।<br>नरोऽपि धनुरादाय शरांस्तीव्राञ्छिलाशितान्॥ २१<br>मुमोच बहुशः क्रोधात्प्रह्लादोपरि पार्थिव॥ २२ | व्यासजी बोले—ऐसा वचन बोलकर दैत्य प्रह्लादने धनुष उठाकर और शीघ्रतापूर्वक उसे खींचकर प्रत्यंचाकी टंकार की। हे राजन्! मुनि नरने भी धनुष लेकर शिलापर घिसकर तेज किये हुए अनेक तीक्ष्ण बाण प्रह्लादके ऊपर क्रोधपूर्वक छोड़े॥ २०—२२॥ |
| तान्दैत्यराजस्तपनीयपुङ्खै-<br>श्चिच्छेद बाणैस्तरसा समेत्य।<br>समीक्ष्य छिन्नांश्च नरः स्वसृष्टा-<br>नन्यान्मुमोचाशु रुषान्वितो वै॥ २३ | दैत्यराज प्रह्लादने अपने सुनहले पंखोंवाले बाणोंसे शीघ्र ही उन बाणोंको आते ही काट डाला। तब नर अपने द्वारा छोड़े गये बाणोंको प्रह्लादद्वारा छिन्न किया गया देखकर अत्यन्त कोपाविष्ट हो शीघ्रतासे उनपर अन्य बाणोंसे प्रहार करने लगे॥ २३॥ |
| दैत्याधिपस्तानपि तीव्रवेगै-<br>श्छित्त्वा जघानोरसि तं मुनीन्द्रम्।<br>नरोऽपि तं पञ्चभिराशुगैश्च<br>क्रुद्धोऽहनद्दैत्यपतिं बाहुदेशे॥ २४ | दैत्यपति प्रह्लादने उन बाणोंको भी अपने द्रुतगामी बाणोंसे काटकर उन मुनिराज नरके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। नरने भी क्रुद्ध होकर अपने तीव्रगामी पाँच बाणोंसे दैत्येन्द्र प्रह्लादके बाहुदेशपर प्रहार किया॥ २४॥ |
| सेन्द्राः सुरास्तत्र तयोर्हि युद्धं<br>द्रष्टुं विमानैर्गगनस्थिताश्च।<br>नरस्य वीर्यं युधि संस्थितस्य<br>ते तुष्टुवुर्दैत्यपतेश्च भूयः॥ २५ | इन्द्रसहित सभी देवगण उन दोनोंका युद्ध देखनेके लिये विमानोंमें बैठकर आकाशमण्डलमें स्थित हो गये। वे कभी समरांगणमें विराजमान नरके पराक्रमकी प्रशंसा करते थे और फिर कभी दैत्यपति प्रह्लादके पराक्रमकी प्रशंसा करने लगते थे॥ २५॥ |
| ववर्ष दैत्याधिप आत्तचापः<br>शिलीमुखानम्बुधरो यथापः।<br>आदाय शार्ङ्गं धनुरप्रमेयं<br>मुमोच बाणाञ्छितहेमपुङ्खान्॥ २६ | धनुष धारण किये हुए दैत्यराज प्रह्लाद इस प्रकार बाणोंकी वर्षा कर रहे थे, मानो मेघ जल बरसा रहे हों। [ऋषि नर भी अपना] अप्रतिम शार्ङ्ग धनुष लेकर तीक्ष्ण तथा सुनहले पंखवाले बाण छोड़ रहे थे॥ २६॥ |
अ० ९] चतुर्थ स्कन्ध ४४३
अ० ९] चतुर्थ स्कन्ध ४४३
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बभूव युद्धं तुमुलं तयोस्तु<br>जयैषिणोः पार्थिव देवदैत्ययोः।<br>ववर्षुराकाशपथे स्थितास्ते<br>पुष्पाणि दिव्यानि प्रहृष्टचित्ताः॥ २७ | हे राजन्! इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेके इच्छुक उन ऋषि नर तथा दैत्यराज प्रह्लादके बीच भीषण युद्ध होने लगा। आकाशमार्गमें स्थित वे [देवतागण] प्रसन्नचित्त होकर उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ २७॥ |
| चुकोप दैत्याधिपतिर्हरौ स<br>मुमोच बाणानतितीव्रवेगान्।<br>चिच्छेद तान्धर्मसुतः सुतीक्ष्णै-<br>र्धनुर्विमुक्तैर्विशिखैस्तदाशु ॥ २८ | अचानक प्रह्लाद कुपित हो उठे और उन्होंने अति तीव्रगामी बाण ऋषि नारायणपर छोड़े। धर्मपुत्र नारायणने शीघ्र ही उन बाणोंको अपने धनुषसे छोड़े गये अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंसे खण्ड-खण्ड कर डाला॥ २८॥ |
| ततो नारायणं बाणैः प्रह्लादश्चातिकर्षितैः।<br>ववर्ष सुस्थितं वीरं धर्मपुत्रं सनातनम्।<br>नारायणोऽपि तं वेगोन्मुक्तैर्बाणैः शिलाशितैः॥ २९<br>तुतोदातीव पुरतो दैत्यानामधिपं स्थितम्।<br>सन्निपातोऽम्बरे तत्र दिदृक्षूणां बभूव ह॥ ३० | दैत्यराज प्रह्लाद समरांगणमें डटकर खड़े अतीव पराक्रमी तथा सनातन धर्मपुत्र नारायणपर अपने अति तीक्ष्ण बाण बरसाने लगे। नारायणने भी सानपर चढ़ाकर तेज किये गये अपने वेगपूर्वक छोड़े गये बाणोंके द्वारा सम्मुख खड़े दैत्यपति प्रह्लादको अत्यन्त भीषण चोट पहुँचायी। उस युद्धका अवलोकन करनेके इच्छुक देवताओं तथा दैत्योंका एक विशाल समूह अपने-अपने पक्षका जयघोष करते हुए आकाशमें एकत्र हो गया॥ २९-३० १/२॥ |
| देवानां दानवानाञ्च कुर्वतां जयघोषणाम्।<br>उभयोः शरवर्षेण छादिते गगने तदा॥ ३१<br>दिवापि रात्रिसदृशं बभूव तिमिरं महत्।<br>ऊचुः परस्परं देवा दैत्याश्चातीव विस्मिताः॥ ३२<br>अदृष्टपूर्वं युद्धं वै वर्ततेऽद्य सुदारुणम्।<br>देवर्षयोऽथ गन्धर्वा यक्षकिन्नरपन्नगाः॥ ३३ | दोनों पक्षोंकी बाणवर्षासे आकाशके आच्छादित हो जानेपर उस समय इतना घना अन्धकार हो गया कि दिन भी रातके समान प्रतीत होने लगा। इससे अति आश्चर्यचकित होकर देवता तथा दैत्य परस्पर कहने लगे कि यह अत्यन्त भयावह संग्राम हो रहा है। ऐसा भीषण युद्ध तो पहले कभी नहीं देखा गया। बड़े-बड़े देवर्षि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, विद्याधर तथा चारणगण इस युद्धको देखकर अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये॥ ३१-३३ १/२॥ |
| विद्याधराश्चारणाश्च विस्मयं परमं ययुः।<br>नारदः पर्वतश्चैव प्रेक्षणार्थं स्थितौ मुनी॥ ३४<br>नारदः पर्वतं प्राह नेदृशं चाभवत्पुरा।<br>तारकासुरयुद्धञ्च तथा वृत्रासुरस्य च॥ ३५<br>मधुकैटभयोर्युद्धं हरिणा चेदृशं कृतम्।<br>प्रह्लादः प्रबलः शूरो यस्मान्नारायणेन च॥ ३६<br>करोति सदृशं युद्धं सिद्धेनाद्भुतकर्मणा। | उस युद्धका अवलोकन करनेके लिये मुनि नारद तथा पर्वत भी आये हुए थे। नारदमुनिने पर्वतसे कहा—ऐसा घोर संग्राम पहले नहीं हुआ था; तारकासुरयुद्ध, वृत्रासुरका युद्ध यहाँतक कि मधु-कैटभका युद्ध भी वैसा नहीं हुआ था, जैसा कि इस समय नारायणके द्वारा किया गया। प्रह्लाद अत्यन्त वीर हैं जो कि वे अद्भुत कर्मवाले सिद्धिसम्पन्न नारायणके साथ यह बराबरीका युद्ध कर रहे हैं॥ ३४-३६ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>दिने दिने तथा रात्रौ कृत्वा कृत्वा पुनः पुनः॥ ३७ | व्यासजी बोले— इस प्रकार प्रतिदिन तथा प्रतिरात्रि बार-बार युद्ध करते हुए वे दोनों दैत्य तथा |
| ४४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चक्रतुः परमं युद्धं तौ तदा दैत्यतापसौ।<br>नारायणस्तु चिच्छेद प्रह्लादस्य शरासनम्॥ ३८<br>तरसैकेन बाणेन स चान्यद्धनुराददे।<br>नारायणस्तु तरसा मुक्त्वाऽन्यञ्च शिलीमुखम्॥ ३९<br>तदैव मध्यतश्चापं चिच्छेद लघुहस्तकः।<br>छिन्नं छिन्नं पुनर्देत्यो धनुरन्यत्समाददे॥ ४०<br>नारायणस्तु चिच्छेद विशिखैराशु कोपितः।<br>छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रः परिघं तु समाददे॥ ४१<br>जघान धर्मजं तूर्णं बाह्वोर्मध्येऽतिकोपनः। | तपस्वी घोर संग्राममें तत्पर रहे। नारायणने एक बाणसे प्रह्लादका धनुष काट दिया। तब प्रह्लादने तत्काल दूसरा धनुष ले लिया। नारायणने हस्तकौशल दिखाते हुए पुनः बड़ी शीघ्रतासे दूसरा बाण चलाकर उस धनुषको भी बीचोबीचसे काट डाला। इस प्रकार नारायण बार-बार धनुष काटते जाते थे और प्रह्लाद दूसरा धनुष लेते जाते थे। अन्तमें नारायणने कुपित होकर अपने बाणोंसे उसके धनुषको शीघ्रतासे पुनः काट दिया। उस धनुषके भी कट जानेपर दैत्यराज प्रह्लादने अपना परिघ उठा लिया और अत्यन्त क्रोधित होकर बड़ी फुर्तीसे धर्मपुत्र नारायणकी भुजाओंपर प्रहार किया॥ ३७—४१ १/२ ॥ |
| तमायान्तं स बलवान्मार्गणैर्नवभिर्मुनिः॥ ४२<br>चिच्छेद परिघं घोरं दशभिस्तमताडयत्। | प्रतापी नारायणने अपनी ओर आते हुए उस परिघको नौ बाणोंसे काट दिया और दस बाणोंसे प्रह्लादपर चोट की॥ ४२ १/२ ॥ |
| गदामादाय दैत्येन्द्रः सर्वायसमयीं दृढाम्॥ ४३<br>जानुदेशे जघानाशु देवं नारायणं रुषा। | तत्पश्चात् दैत्येन्द्र प्रह्लादने पूर्णतः लोहमयी सुदृढ़ गदा उठाकर क्रोधपूर्वक नारायणमुनिकी जाँघपर शीघ्रतापूर्वक प्रहार किया॥ ४३ १/२ ॥ |
| गदया चापि गिरिवत्संस्थितः स्थिरमानसः॥ ४४<br>धर्मपुत्रोऽतिबलवान्मुमोचाशु शिलीमुखान्।<br>गदां चिच्छेद भगवांस्तदा दैत्यपतेर्दृढाम्॥ ४५<br>विस्मयं परमं जग्मुः प्रेक्षका गगने स्थिताः। | उस गदा-प्रहारसे भी धर्मपुत्र नारायण पर्वतकी भाँति अविचल भावसे स्थिरचित्त होकर खड़े रहे। तदनन्तर परम पराक्रमी भगवान् नारायणने बड़ी तेजीसे अनेक बाण छोड़े और दैत्यपति प्रह्लादकी सुदृढ़ गदाको खण्ड-खण्ड कर दिया। आकाशमें स्थित होकर युद्ध देखनेवाले बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४४-४५ १/२ ॥ |
| स तु शक्तिं समादाय प्रह्लादः परवीरहा॥ ४६<br>चिक्षेप तरसा क्रुद्धो बलान्नारायणोरसि।<br>तामापतन्तीं संवीक्ष्य बाणेनैकेन लीलया॥ ४७<br>सप्तधा कृतवानाशु सप्तभिस्तं जघान ह। | तत्पश्चात् शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रह्लादने शक्ति उठाकर कुपित हो बलपूर्वक बड़ी तेजीसे नारायणके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। तब सामने आती हुई उस शक्तिको देखकर नारायणने एक ही बाणसे बड़ी आसानीसे उसके सात खण्ड कर दिये और साथ ही सात बाणोंसे प्रह्लादपर प्रहार किया॥ ४६—४७ १/२ ॥ |
| दिव्यवर्षशतं चैव तद्युद्धं परमं तयोः॥ ४८<br>जातं विस्मयदं राजन् सर्वेषां तत्र चाश्रमे।<br>तदाजगाम तरसा पीतवासाश्चतुर्भुजः॥ ४९<br>प्रह्लादस्याश्रमं तत्र जगाम च गदाधरः।<br>चतुर्भुजो रमाकान्तो रथाङ्गदरपद्मभृत्॥ ५० | हे राजन्! इस प्रकार सबको विस्मित कर देनेवाला वह युद्ध एक सौ दिव्य वर्षतक चलता रहा। तदनन्तर चार भुजाओंसे शोभा पानेवाले पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु शीघ्रतापूर्वक उस आश्रममें आ गये। तत्पश्चात् हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले वे चतुर्भुज लक्ष्मीपति विष्णु प्रह्लादके आश्रमपर पहुँचे॥ ४८—५० ॥ |
| अ० १० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| दृष्ट्वा तमागतं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः।<br>प्रणम्य परया भक्त्या प्राञ्जलिः प्रत्युवाच ह॥ ५१ | वहाँ उन्हें आये हुए देखकर हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लाद बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहने लगे॥ ५१॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>देवदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल माधव।<br>कथं न जितवानाजावहमेतौ तपस्विनौ।<br>संग्रामस्तु मया देव कृतः पूर्णं शतं समाः॥ ५२<br>सुराणां न जितौ कस्मादिति मे विस्मयो महान्। | प्रह्लाद बोले— हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भक्तवत्सल! हे माधव! मैं इन दोनों तपस्वियोंको युद्धमें क्यों नहीं जीत सका? हे देव! मैंने देवताओंके पूरे सौ वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, फिर भी ये जीते न जा सके—मुझे यह महान् आश्चर्य है!॥ ५२ १/२ ॥ |
| विष्णुरुवाच<br>सिद्धाविमौ मदंशौ च विस्मयः कोऽत्र मारिष॥ ५३<br>तापसौ न जितात्मानौ नरनारायणौ जितौ।<br>गच्छ त्वं वितलं राजन् कुरु भक्तिं ममाचलाम्॥ ५४<br>नाभ्यां कुरु विरोधं त्वं तापसाभ्यां महामते। | विष्णु बोले— हे आर्य! ये दोनों सिद्ध पुरुष हैं और मेरे अंशसे आविर्भूत हैं; अतः [इन्हें न जीत पानेमें] आश्चर्य क्या! नर-नारायण नामसे प्रसिद्ध इन जितात्मा तपस्वियोंको तुम नहीं जीत सकते। अतः हे राजन्! तुम अपने वितललोकको चले जाओ और वहाँ मेरी अविचल भक्ति करो। हे महामते! तुम इन दोनों तपस्वियोंसे विरोध मत करो॥ ५३-५४ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याज्ञप्तो दैत्यराजो निर्ययावसुरैः सह॥ ५५<br>नरनारायणौ भूयस्तपोयुक्तौ बभूवतुः॥ ५६ | व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुसे ऐसी आज्ञा पाकर दैत्यपति प्रह्लाद असुरोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हो गये। तदनन्तर नर-नारायण पुनः तपस्यामें संलग्न हो गये॥ ५५-५६॥ |
iti श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादनारायणयोर्युद्धे विष्णोरागमनवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
राजा जनमेजयद्वारा प्रह्लादके साथ नर-नारायणके युद्धका कारण पूछना, व्यासजीद्वारा उत्तरमें संसारके मूल कारण अहंकारका निरूपण करना तथा महर्षि भृगुद्वारा भगवान् विष्णुको शाप देनेकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>सन्देहोऽयं महानत्र पाराशर्य कथानके।<br>नरनारायणौ शान्तौ वैष्णवांशौ तपोधनौ॥ १<br><br>तीर्थाश्रयौ सत्त्वयुक्तौ वन्याशनपरौ सदा।<br>धर्मपुत्रौ महात्मानौ तापसौ सत्यसंस्थितौ॥ २<br><br>कथं रागसमायुक्तौ जातौ युद्धे परस्परम्।<br>संग्रामं चक्रतुः कस्मात्त्यक्त्वा तपमनुत्तमम्॥ ३ | जनमेजय बोले— हे व्यासजी! इस कथानकमें मुझे यह महान् संशय हो रहा है कि जब वे नर-नारायण शान्तस्वभाव, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, तपको ही अपना सर्वस्व माननेवाले, तीर्थमें निवास करनेवाले, सत्त्वगुणसम्पन्न, वनके फल-मूलका सदा आहार करनेवाले, धर्मपुत्र, महात्मा, तपस्वी तथा सत्यनिष्ठ थे; तब वे युद्धमें परस्पर राग-द्वेषसे ग्रस्त कैसे हो गये और उन्होंने उत्कृष्ट तपस्याका त्याग करके संग्राम क्यों किया?॥ १-३॥ |
| ४४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रह्लादेन समं पूर्णं दिव्यवर्षशतं किल।<br>हित्वा शान्तिसुखं युद्धं कृतवन्तौ कथं मुनी॥ ४ | उन दोनों मुनियोंने शान्ति-सुखका त्याग करके प्रह्लादके साथ पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक युद्ध किसलिये किया?॥ ४॥ |
| कथं तौ चक्रतुर्युद्धं प्रह्लादेन समं मुनी।<br>कथयस्व महाभाग कारणं विग्रहस्य वै॥ ५ | उन दोनों मुनियोंने प्रह्लादके साथ वह संग्राम क्यों किया? हे महाभाग! आप मुझे उस युद्धका कारण बताइये॥ ५॥ |
| (कामिनी कनकं कार्यं कारणं विग्रहस्य वै)<br>युद्धबुद्धिः कथं जाता तयोश्च तद्विरक्तयोः।<br>तथाविधं तपस्तप्तं ताभ्याञ्च केन हेतुना॥ ६<br><br>मोहार्थं सुखभोगार्थं स्वर्गार्थं वा परन्तप।<br>कृतमत्युत्कटं ताभ्यां तपः सर्वफलप्रदम्॥ ७<br><br>मुनिभ्यां शान्तचित्ताभ्यां प्राप्तं किं फलमद्भुतम्।<br>तपसा पीडितो देहः संग्रामेण पुनः पुनः॥ ८<br><br>दिव्यवर्षशतं पूर्णं श्रमेण परिपीडितौ।<br>न राज्यार्थे धने वापि न दारेषु गृहेषु च॥ ९<br><br>किमर्थं तु कृतं युद्धं ताभ्यां तेन महात्मना। | (स्त्री, धन तथा कोई कार्यविशेष ही प्रायः युद्धके कारण होते हैं।) उन विरक्त मुनियोंको युद्धका विचार क्यों उत्पन्न हुआ? हे परन्तप! उन्होंने उस प्रकारका तप किसीको प्रसन्न करनेके लिये, सुखभोगके लिये अथवा स्वर्गके लिये—किस उद्देश्यसे किया था? शान्त चित्तवाले उन मुनियोंने समस्त फल प्रदान करनेवाला कठोर तप तो किया था, किंतु उन्होंने कौन-सा अद्भुत फल प्राप्त किया? उन्होंने तपस्यासे शरीरको कष्ट दिया और पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक बार-बार संग्राम करके परिश्रमके द्वारा अपनेको संतप्त किया। उन मुनियोंने न राज्यके लिये, न धनके लिये, न स्त्रीके लिये और न तो गृहके लिये ही यह युद्ध किया तो फिर उन्होंने महात्मा प्रह्लादके साथ किसलिये युद्ध किया?॥ ६–९ १/२॥ |
| निरीहः पुरुषः कस्मात्कुर्याद्युद्धमीदृशम्॥ १०<br><br>दुःखदं सर्वथा देहे जानन्धर्मं सनातनम्।<br>सुबुद्धिः सुखदानीह कर्माणि कुरुते सदा॥ ११<br><br>न दुःखदानि धर्मज्ञ स्थितिरेषा सनातनी।<br>धर्मपुत्रौ हरेरंशौ सर्वज्ञौ सर्वभूषितौ॥ १२<br><br>कृतवन्तौ कथं युद्धं दुःखं धर्मविनाशकम्।<br>त्यक्त्वा तपः समाधीतं सुखारामं महत्फलम्॥ १३<br><br>संयुगं दारुणं कृष्ण नैव मूर्खोऽपि वाञ्छति। | युद्ध शरीरके लिये कष्टदायक होता है—इस सनातन बातको जानते हुए कोई तृणारहित पुरुष आखिर ऐसा युद्ध किसलिये करेगा? हे धर्मज्ञ! उत्तम बुद्धिवाला मनुष्य इस लोकमें सदा सुखदायी कर्म ही करता है, दुःखप्रद कर्म नहीं—यह सनातन सिद्धान्त है। तब धर्मपुत्र, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, सर्वज्ञ तथा सभी गुणोंसे विभूषित उन मुनियोंने वह दुःखदायक तथा धर्मविनाशक युद्ध क्यों किया? हे व्यासजी! कोई मूर्ख भी अच्छी प्रकार आचरित, सुख तथा आनन्द देनेवाले और महाफलदायी तपका त्याग करके दारुण युद्ध करना नहीं चाहता॥ १०–१३ १/२॥ |
| श्रुतो मया ययातिस्तु च्युतः स्वर्गान्महीपतिः॥ १४<br><br>अहङ्कारभवात्पापात्पातितः पृथिवीतले।<br>यज्ञकृद्दानकर्ता च धार्मिकः पृथिवीपतिः॥ १५ | मैंने सुना है कि राजा ययाति स्वर्गसे च्युत हो गये थे। अहंकारजन्य पापके कारण वे पृथवीतलपर गिरा दिये गये थे। वे यज्ञकर्ता, दानी और धर्मनिष्ठ थे; किंतु केवल थोड़ेसे अहंकारभरे शब्दोंका उच्चारण करनेके कारण वज्रपाणि इन्द्रने उन्हें [स्वर्गसे पृथ्वीपर] गिरा दिया था। यह निश्चित है कि बिना अहंकारके |
| अ० १० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शब्दोच्चारणमात्रेण पातितो वज्रपाणिना।<br>अहङ्कारमृते युद्धं न भवत्येव निश्चयः॥ १६ | युद्ध हो ही नहीं सकता। अन्ततः मुनिको उस युद्धका क्या फल मिला, उससे तो केवल उनका पुण्य ही नष्ट हुआ॥ १४—१६ १/२ ॥ |
| किं फलं तस्य युद्धस्य मुनेः पुण्यविनाशनम्।<br><br>व्यास उवाच<br>राजन् संसारमूलं हि त्रिविधः परिकीर्तितः॥ १७<br><br>अहङ्कारस्तु सर्वज्ञैर्मुनिभिर्धर्मनिश्चये।<br>स कथं मुनिना त्यक्तुं योग्यो देहभृता किल॥ १८<br><br>कारणेन विना कार्यं न भवत्येव निश्चयः। | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! धर्मका निर्णय करते समय सर्वज्ञ मुनियोंने अहंकारको ही संसारका मूल कारण कहा है और इसे [सत्त्वादि भेदसे] तीन प्रकारका बतलाया है। [ऐसी स्थितिमें] शरीरधारी होकर मुनि नारायण उस अहंकारका त्याग करनेमें कैसे समर्थ हो सकते थे? यह निश्चित है कि बिना कारणके कार्य नहीं होता॥ १७–१८ १/२ ॥ |
| तपो दानं तथा यज्ञाः सात्त्विकात्प्रभवन्ति ते॥ १९<br><br>राजसाद्वा महाभाग तामसात्कलहस्तथा।<br>क्रिया स्वल्पापि राजेन्द्र नाहङ्कारं विना क्वचित्॥ २०<br><br>शुभा वाप्यशुभा वापि प्रभवत्यपि निश्चयः।<br>अहङ्काराद् बन्धकारी नान्योऽस्ति जगतीतले॥ २१<br><br>येनेदं रचितं विश्वं कथं तद्रहितं भवेत्। | तप, दान तथा यज्ञ सात्त्विक अहंकारसे होते हैं। हे महाभाग! राजस और तामस अहंकारसे कलह उत्पन्न होता है। हे राजेन्द्र! यह निश्चय है कि छोटी-सी भी क्रिया चाहे वह शुभ हो अथवा अशुभ—बिना अहंकारके कभी नहीं हो सकती। जगत्में अहंकारसे बढ़कर बन्धनमें डालनेवाला दूसरा कोई पदार्थ नहीं है। अतः जिस अहंकारसे ही यह विश्व निर्मित है, उसके बिना यह संसार कैसे रह सकता है?॥ १९—२१ १/२ ॥ |
| ब्रह्मा रुद्रस्तथा विष्णुरहङ्कारयुतास्त्वमी॥ २२<br><br>अन्येषां चैव का वार्ता मुनीनां वसुधाधिप।<br>अहङ्कारावृतं विश्वं भ्रमतीदं चराचरम्॥ २३<br><br>पुनर्जन्म पुनर्मृत्युः सर्वं कर्मवशानुगम्।<br>देवतिर्यङ्मनुष्याणां संसारेऽस्मिन्महीपते॥ २४<br><br>रथाङ्गवदसर्वार्थं भ्रमणं सर्वदा स्मृतम्। | हे पृथिवीपते! जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अहंकारयुक्त रहते हैं, तब अन्य प्राणियों और मुनियोंकी बात ही क्या? यह चराचर जगत् अहंकारके वशीभूत होकर भ्रमण करता रहता है। सभी जीव कर्मके अधीन हैं और उसीके अनुसार बार-बार उनका जन्म तथा मरण होता रहता है। हे महीपते! देवता, मनुष्य और पशु-पक्षियोंका इस संसारमें बराबर चक्कर काटना रथके पहियेके भ्रमणके समान बताया गया है॥ २२—२४ १/२ ॥ |
| विष्णोरप्यवताराणां संख्यां जानाति कः पुमान्॥ २५<br><br>विततेऽस्मिंस्तु संसारे उत्तमाधमयोनिषु।<br>नारायणो हरिः साक्षान्मात्स्यं वपुराश्रितः॥ २६<br><br>कामठं सौकरं चैव नारसिंहञ्च वामनम्।<br>युगे युगे जगन्नाथो वासुदेवो जनार्दनः॥ २७<br><br>अवतारानासंख्यातान्करोति विधियन्त्रितः। | इस विस्तृत संसारमें उत्तम–अधम सभी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अवतारोंकी संख्या कौन मनुष्य जान सकता है? साक्षात् नारायण श्रीहरिको मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह और वामनतकका शरीर धारण करना पड़ा। वे जगत्प्रभु, वासुदेव, भगवान् जनार्दन भी विधिके अधीन होकर विभिन्न युगोंमें असंख्य अवतार धारण करते रहते हैं॥ २५—२७ १/२ ॥ |
| ४४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वैवस्वते महाराज सप्तमे भगवान्हरिः ॥ २८<br>मन्वन्तरेऽवताराग्वै चक्रे ताञ्छृणु तत्त्वतः।<br>भृगुशापान्महाराज विष्णुर्देववरः प्रभुः ॥ २९<br>अवताराननेकांस्तु कृतवानखिलेश्वरः। | हे महाराज! सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें भगवान् श्रीहरिने जो-जो अवतार लिये थे, उन्हें आप ध्यानपूर्वक सुनें। हे महाराज! देवश्रेष्ठ और सबके स्वामी भगवान् विष्णुको महर्षि भृगुके शापके कारण अनेक अवतार धारण करने पड़े थे॥ २८-२९ १/२॥ |
| राजोवाच<br>सन्देहोऽयं महाभाग हृदये मम जायते ॥ ३०<br>भृगुणा भगवान्विष्णुः कथं शप्तः पितामह।<br>हरिणा च मुनेस्तस्य विप्रियं किं कृतं मुने ॥ ३१<br>यद्रोषाद् भृगुणा शप्तो विष्णुर्देवनमस्कृतः। | राजा बोले—हे महाभाग! हे पितामह! मेरे मनमें यह संदेह हो रहा है कि भृगुने भगवान्को शाप क्यों दे दिया? हे मुने! भगवान् विष्णुने उन भृगुमुनिका कौन-सा अप्रिय कार्य कर दिया था, जिससे रुष्ट होकर महर्षि भृगुने सभी देवताओंद्वारा नमस्कार किये जानेवाले भगवान् विष्णुको शाप दे दिया॥ ३०-३१ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजनप्रवक्ष्यामि भृगोः शापस्य कारणम् ॥ ३२<br>पुरा कश्यपदायादो हिरण्यकशिपुर्नृपः।<br>यदा तदा सुरैः सार्धं कृतं संख्यं परस्परम् ॥ ३३ | व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, मैं आपको भृगुके शापका कारण बताता हूँ। पूर्वकालमें कश्यपतनय हिरण्यकशिपु नामक एक राजा था। उस समय जब भी वह देवताओंके साथ परस्पर संघर्ष करने लगता था, तब युद्ध आरम्भ हो जानेपर सारा संसार व्याकुल हो उठता था॥ ३२-३३ १/२॥ |
| कृते संख्ये जगत्सर्वं व्याकुलं समजायत।<br>हते तस्मिन्नृपे राजा प्रह्लादः समजायत ॥ ३४<br>देवान्स पीडयामास प्रह्लादः शत्रुकर्षणः।<br>संग्रामो ह्यभवद् घोरः शक्रप्रह्लादयोस्तदा ॥ ३५<br>पूर्णं वर्षशतं राजँल्लोकविस्मयकारकम्।<br>देवैर्युद्धं कृतं चोग्रं प्रह्लादस्तु पराजितः ॥ ३६<br>निर्वेदं परमं प्राप्तो ज्ञात्वा धर्मं सनातनम्।<br>विरोचनसुतं राज्ये प्रतिष्ठाप्य बलिं नृप ॥ ३७ | बादमें हिरण्यकशिपुका वध हो जानेपर प्रह्लाद राजा बने। शत्रुओंको कष्ट पहुँचानेवाले वे प्रह्लाद भी देवताओंको पीड़ित करने लगे। अतः इन्द्र और प्रह्लादमें भयानक संग्राम आरम्भ हो गया। हे राजन्! पूरे सौ वर्षतक देवताओंने लोगोंको अचम्भेमें डाल देनेवाला भीषण युद्ध किया और प्रह्लादको पराजित कर दिया। हे राजन्! तब शाश्वत धर्मको समझकर वे महान् विरक्तिको प्राप्त हुए और विरोचनपुत्र बलिको राज्यपर प्रतिष्ठित करके तप करनेके लिये गन्धमादनपर्वतपर चले गये॥ ३४-३७ १/२॥ |
| जगाम स तपस्तप्तुं पर्वते गन्धमादने।<br>प्राप्य राज्यं बलिः श्रीमान्सुरैर्वैरं चकार ह ॥ ३८<br>यतः परस्परं युद्धं जातं परमदारुणम्।<br>ततः सुरैर्जिता दैत्या इन्द्रेणामिततेजसा ॥ ३९<br>विष्णुना च सहायेन राज्यभ्रष्टाः कृता नृप। | राज्य प्राप्त करके ऐश्वर्यशाली राजा बलिने देवताओंसे शत्रुता कर ली, जिससे [देवताओं और दैत्योंमें] पुनः परस्पर अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा। उसमें देवताओं तथा अमित तेजस्वी इन्द्रने दैत्योंको जीत लिया। हे राजन्! उस समय इन्द्रके सहायक बनकर भगवान् विष्णुने दैत्योंको राज्यसे च्युत कर दिया॥ ३८-३९ १/२॥ |
अ० १०] चतुर्थ स्कन्ध ४४९
अ० १०] चतुर्थ स्कन्ध ४४९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः पराजिता दैत्याः काव्यस्य शरणं गताः ॥ ४०<br><br>किं त्वं न कुरुषे ब्रह्मन् साहाय्यं नः प्रतापवान् ।<br>स्थातुं न शक्नुमो ह्यत्र प्रविशामो रसात लम् ॥ ४१<br><br>यदि त्वं न सहायोऽसि त्रातुं मन्त्रविदुत्तम ।<br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तः सोऽब्रवीद्दैत्यान्काव्यः कारुणिको मुनिः ॥ ४२ | तदनन्तर हारे हुए दैत्य [अपने गुरु] शुक्राचार्यकी शरणमें गये। [सभी दैत्य उनसे कहने लगे—] हे ब्रह्मन्! आप प्रतापशाली होते हुए भी हमारी सहायता क्यों नहीं कर रहे हैं? हे मन्त्रज्ञोंमें श्रेष्ठ! यदि हमारी रक्षाहेतु आप सहायक न हुए तो हमलोग यहाँ नहीं रह पायेंगे और निश्चय ही हमें पातालमें जाना पड़ेगा ॥ ४०-४१ १/२ ॥<br>व्यासजी बोले— दैत्योंके ऐसा कहनेपर दयालु शुक्राचार्यमुनिने उनसे कहा—हे असुरो! डरो मत। मैं अपने तेजसे [तुमलोगोंको धरातलपर] स्थापित करूँगा और मन्त्रों तथा औषधियोंसे सर्वदा तुमलोगोंकी सहायता करूँगा। तुमलोग चिन्तामुक्त होकर उत्साह बनाये रखो ॥ ४२-४३ १/२ ॥ |
| मा भैष्ट धारयिष्यामि तेजसा स्वेन भोऽसुराः ।<br>मन्त्रैस्तथौषधीभिश्च साहाय्यं वः सदैव हि ॥ ४३<br><br>करिष्यामि कृतोत्साहा भवन्तु विगतज्वराः ।<br>व्यास उवाच<br>ततस्ते निर्भया जाता दैत्याः काव्यस्य संश्रयात् ॥ ४४<br><br>देवैः श्रुतस्तु वृत्तान्तः सर्वैश्चारमुखात्किल ।<br>तत्र संमन्त्र्य ते देवाः शक्रेण च परस्परम् ॥ ४५<br><br>मन्त्रं चक्रुः सुसंविग्नाः काव्यमन्त्रप्रभावतः ।<br>योद्धुं गच्छामहे तूर्णं यावन्न च्यावयन्ति वै ॥ ४६ | व्यासजी बोले— इस प्रकार शुक्राचार्यका आश्रय पाकर वे दैत्य निर्भय हो गये। उधर देवताओंने गुप्तचरोंसे यह समाचार सुन लिया। तत्पश्चात् शुक्राचार्यके मन्त्रके प्रभावको समझकर अत्यन्त घबराये हुए देवताओंने इन्द्रके साथ परस्पर मन्त्रणा करके यह योजना बनायी कि जबतक शुक्राचार्यके मन्त्रके प्रभावसे दैत्य हमें राज्यच्युत करें, उसके पहले ही हमलोग युद्ध करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर दें और बलपूर्वक उनका वध करके बचे हुए दैत्योंको पाताल भेज दें ॥ ४४-४६ १/२ ॥ |
| प्रसह्य हत्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे ।<br>दैत्याञ्जग्मुस्ततो देवाः संरुष्टाः शस्त्रपाणयः ॥ ४७<br><br>जग्मुस्तान्विष्णुसहिता दानवान् हरिणोदिताः ।<br>वध्यमानास्तु ते दैत्याः सन्त्रस्ता भयपीडिताः ॥ ४८<br><br>काव्यस्य शरणं जग्मू रक्ष रक्षेति चाब्रुवन् ।<br>ताञ्छुक्रः पीडितान्दृष्ट्वा देवैर्दैत्यान्महाबलान् ॥ ४९ | तदनन्तर अत्यधिक रोषमें भरे देवताओंने हाथोंमें शस्त्र धारणकर दैत्योंपर चढ़ाई कर दी। इन्द्रकी प्रेरणासे भगवान् विष्णुसहित सभी देवता उनपर टूट पड़े। तब देवताओंके द्वारा मारे जा रहे वे दैत्य आतंकित तथा भयभीत होकर शुक्राचार्यकी शरणमें गये और 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'—ऐसा बार-बार कहने लगे ॥ ४७-४८ १/२ ॥ |
| मा भैष्टेति वचः प्राह मन्त्रौषधिबलाद्विभुः ।<br>दृष्ट्वा काव्यं सुराः सर्वे त्यक्त्वा तान्प्रययुः किल ॥ ५० | देवताओंके द्वारा पीड़ित किये गये उन महाबली दैत्योंको देखकर मन्त्र और औषधिके प्रभावसे शक्तिशाली बने शुक्राचार्यने उनसे 'डरो मत'—ऐसा वचन कहा। तब शुक्राचार्यको देखते ही सभी देवता उन दैत्योंको छोड़कर चले गये ॥ ४९-५० ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
भृगुशापकारणवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
○
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 A
| ४५० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
|---|
अथैकादशोऽध्यायः
मन्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये शुक्राचार्यका तपस्यारत होना, देवताओं द्वारा दैत्योंपर आक्रमण, शुक्राचार्यकी माताद्वारा दैत्योंकी रक्षा और इन्द्र तथा विष्णुको संज्ञाशून्य कर देना, विष्णुद्वारा शुक्रमाताका वध
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| तथा गतेषु देवेषु काव्यस्तान्प्रत्युवाच ह।<br>ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं यच्छृणुध्वं दानवोत्तमाः॥ १ | तत्पश्चात् देवताओंके चले जानेपर शुक्राचार्यने उन दैत्योंसे कहा—हे श्रेष्ठ दानवो! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मुझसे जो कहा था, उसे तुमलोग सुनो। दैत्योंके वधके लिये भगवान् विष्णु सदा प्रत्यनरत रहते हैं, वे दैत्योंका वध अवश्य करेंगे। जैसे वाराहका रूप धारण करके उन्होंने हिरण्याक्षका वध किया और नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको मारा, उसी प्रकार उत्साहसम्पन्न होकर वे सब दैत्योंका संहार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥ १-३॥ |
| विष्णुर्दैत्यवधे युक्तो हनिष्यति जनार्दनः।<br>वाराहरूपं संस्थाय हिरण्याक्षो यथा हतः॥ २ | |
| यथा नृसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>तथा सर्वान्कृतोत्साहो हनिष्यति न चान्यथा॥ ३ | |
| न मे मन्त्रबलं सम्यक्प्रतिभाति यथा हरिम्।<br>जेतुं यूयं समर्थाः स्थ मया त्राताः सुरानथ॥ ४ | मुझे जान पड़ता है कि वैसा समुचित मन्त्रबल अभी मेरे पास नहीं है, जिससे मेरे द्वारा सुरक्षित होकर तुमलोग इन्द्र तथा देवताओंको जीतनेमें समर्थ हो सको। अतः हे श्रेष्ठ दानवगण! तुमलोग कुछ समयतक प्रतीक्षा करो। मैं मन्त्रसिद्धिके लिये आज ही भगवान् शिवके पास जा रहा हूँ। हे श्रेष्ठ दानवो! महादेवजीसे मन्त्र लेकर मैं तत्काल आऊँगा और यथावत् रूपमें तुमलोगोंको सिखा दूँगा॥ ४-६॥ |
| तस्मात्कालं प्रतीक्षध्वं कियन्तं दानवोत्तमाः।<br>अहमद्य महादेवं मन्त्रार्थं प्रव्रजामि वै॥ ५ | |
| प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि साम्प्रतम्।<br>युष्मभ्यं तान्प्रदास्यामि यथार्थं दानवोत्तमाः॥ ६ | |
| दैत्या ऊचुः | दैत्यों ने कहा— |
| पराजिताः कथं स्थातुं पृथिव्यां मुनिसत्तम।<br>शक्ता भवामोऽप्यबलास्तावत्कालं प्रतीक्षितुम्॥ ७ | हे मुनिश्रेष्ठ! देवताओंसे पराजित होकर हमलोग अत्यन्त निर्बल हो गये हैं, अतः उतने समयतक प्रतीक्षा करनेके लिये हम पृथ्वीपर रहनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं? सभी पराक्रमी दानव मारे जा चुके हैं और जो शेष बचे हुए हैं, सुखकी इच्छा करनेवाले वे अब युद्धमें ठहरनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ७-८॥ |
| निहता बलिनः सर्वे केचिच्छिष्टाश्च दानवाः।<br>नाद्य युक्ताश्च संग्रामे स्थातुमेवं सुखावहाः॥ ८ | |
| शुक्र उवाच | शुक्राचार्य बोले— |
| यावदहं मन्त्रविद्यामानयिष्यामि शङ्करात्।<br>तावद्भवद्भिः स्थातव्यं तपोयुक्तैः शमान्वितैः॥ ९ | जबतक मैं शिवजीसे मन्त्रविद्या लेकर नहीं आता हूँ, तबतक तुमलोग शान्ति और तपस्यासे युक्त होकर यहीं रुके रहो॥ ९॥ |
| सामदानादयः प्रोक्ता विद्वद्भिः समयोचिताः।<br>देशं कालं बलं वीरैर्ज्ञात्वा शक्तिं बलं बुधैः॥ १० | विद्वानोंने कहा है कि समयानुसार साम, दान आदिका प्रयोग करना चाहिये। बुद्धिमान् तथा वीर पुरुष देश, काल, बल, शक्ति और सेनाकी जानकारी करके ही अपना सामर्थ्य दिखाते हैं॥ १०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 15 B
अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१
अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१
| सेवाथ समये कार्या शत्रूणां शुभकाम्यया ।<br>स्वशक्त्युपचये काले हन्तव्यास्ते मनीषिभिः ॥ ११ | बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अपने कल्याणकी इच्छासे समयपर शत्रुओंकी भी सेवा करे और अपनी शक्तिका संचय हो जानेपर उन्हें मार डाले ॥ ११ ॥ |
| तदद्य विनयं कृत्वा सामपूर्वं छलेन वै।<br>तिष्ठध्वं स्वनिकेतेषु मदागमनकाङ्क्षया ॥ १२ | अतः देवताओंकी विनती करके छलपूर्वक सामनीतिका प्रयोग करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षाके साथ अपने-अपने घरोंमें रहो ॥ १२ ॥ |
| प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि दानवाः ।<br>युध्यामहे पुनर्दैवान्मन्त्रमास्थाय वै बलम् ॥ १३ | हे दानवो! महादेवजीसे मन्त्र प्राप्त करके मैं आऊँगा और तब उसी मन्त्रबलका आश्रय लेकर हमलोग देवताओंसे युद्ध करेंगे ॥ १३ ॥ |
| इत्युक्त्वाथ भृगुस्तेभ्यो जगाम कृतनिश्चयः ।<br>महादेवं महाराज मन्त्रार्थं मुनिसत्तमः ॥ १४ | हे महाराज! उन दानवोंसे ऐसा कहकर दृढ़ संकल्पवाले मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्य मन्त्रप्राप्तिके लिये शिवजीके पास चले गये ॥ १४ ॥ |
| दानवाः प्रेषयामासुः प्रह्लादं सुरसन्निधौ ।<br>सत्यवादिनमव्यग्रं सुराणां प्रत्ययप्रदम् ॥ १५ | तदनन्तर दैत्योंने सत्यवादी, धैर्यवान् तथा देवताओंके विश्वासपात्र प्रह्लादको देवताओंके पास भेजा ॥ १५ ॥ |
| प्रह्लादस्तु सुरान्प्राह प्रश्रयावनतो नृपः ।<br>असुरैः सहितस्तत्र वचनं नम्रतायुतम् ॥ १६<br><br>न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःसन्नाहास्तथैव च ।<br>देवास्तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैर्युताः ॥ १७ | असुरोंके साथ वहाँ जाकर राजा प्रह्लाद विनय-सम्पन्न होकर देवताओंसे नम्रतायुक्त वचन बोले। हे देवताओ! हम सभी लोगोंने शस्त्र रख दिये हैं और कवचका त्याग कर दिया है। अब हम वल्कल धारण करके तपस्या करेंगे ॥ १६-१७ ॥ |
| प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं तु तत् ।<br>ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते ॥ १८ | प्रह्लादका वचन सुनकर देवताओंने उसे सत्य मान लिया और इसके बाद वे निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे लौट गये ॥ १८ ॥ |
| न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः ।<br>विश्रब्धाः स्वगृहान्गत्वा क्रीडासक्ताः सुसंस्थिताः ॥ १९ | तब दैत्योंके शस्त्र त्याग देनेपर देवता युद्धसे विरत हो गये और चिन्तारहित होकर अपने-अपने घर जाकर स्वस्थचित्त हो क्रीड़ाविलासमें संलग्न हो गये ॥ १९ ॥ |
| दैत्या दम्भं समालम्ब्य तापसास्तपिसंयुताः ।<br>कश्यपस्याश्रमे वासं चक्रुः काव्यागमेच्छया ॥ २० | उस समय दैत्यगण पाखण्डका सहारा लेकर तपस्वीके रूपमें तपस्यारत होकर शुक्राचार्यके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए कश्यपमुनिके आश्रममें रहने लगे ॥ २० ॥ |
| काव्यो गत्वाथ कैलासं महादेवं प्रणम्य च।<br>उवाच विभुना पृष्टः किं ते कार्यमिति प्रभुः ॥ २१<br><br>मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ ।<br>पराजयाय देवानामसुरणां जयाय च ॥ २२ | उधर, मुनि शुक्राचार्यने कैलासपर्वतपर पहुँचकर शंकरजीको प्रणाम किया। भगवान् शिवके पूछनेपर कि 'आपका क्या कार्य है?'—उन्होंने कहा—हे देव! मैं देवताओंकी पराजय और असुरोंकी विजयके लिये उन मन्त्रोंको चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके भी पास न हों ॥ २१-२२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 C
| ४५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
|---|
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सर्वज्ञः शङ्करः शिवः।<br>चिन्तयामास मनसा किं कर्तव्यमतः परम्॥ २३<br><br>सुरेषु द्रोहबुद्ध्यासौ मन्त्रार्थमिह साम्प्रतम्।<br>प्राप्तः काव्यो गुरुस्तेषां दैत्यानां विजयाय च॥ २४<br><br>रक्षणीया मया देवा इति सञ्चिन्त्य शङ्करः।<br>दुष्करं व्रतमत्युग्रं तमुवाच महेश्वरः॥ २५<br><br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममवाक्शिराः।<br>यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मन्त्रानवाप्स्यसि॥ २६ | व्यासजी बोले—उनका वचन सुनकर सर्वज्ञ और कल्याणकारी भगवान् शिव मनमें सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? ये दैत्यगुरु शुक्राचार्य देवताओंके प्रति द्रोह-बुद्धिसे युक्त होकर उन दैत्योंकी विजयके लिये मन्त्रहेतु इस समय यहाँ आये हैं, अतः मुझे देवताओंकी रक्षा करनी चाहिये—ऐसा सोचकर शिवजीने उन्हें यह अत्यन्त कठोर और दुष्कर व्रत करनेको कहा—पूरे एक हजार वर्षोंतक यदि आप सिर नीचे करके कणधूम (भूसीके धुएँ)-का पान करेंगे, तभी आपका कल्याण होगा और आप मन्त्र प्राप्त कर सकेंगे॥ २३—२६॥ | | इत्युक्तोऽसौ प्रणम्येशं बाढमित्यब्रवीद्वचः।<br>व्रतं चराम्यहं देव त्वयाज्ञप्तः सुरेश्वर॥ २७ | शिवजीके ऐसा कहनेपर उन्होंने महेश्वरको प्रणाम करके यह वचन कहा—'बहुत अच्छा', हे देव! हे सुरेश्वर! आपने मुझे जो आदेश दिया है, मैं उस व्रतका पालन करूँगा॥ २७॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा शङ्करं काव्यश्चकार व्रतमुत्तमम्।<br>धूमपानरतः शान्तो मन्त्रार्थं कृतनिश्चयः॥ २८ | व्यासजी बोले—शिवजीसे ऐसा कहकर मन्त्रप्राप्तिके लिये दृढ़संकल्प शुक्राचार्यजी शान्त होकर धुएँका सेवन करते हुए कठोर व्रत करने लगे॥ २८॥ | | ततो देवाः परिज्ञाय काव्यं व्रतरतं तदा।<br>दैत्यान्दम्भरतांश्चैव बभूवुर्मन्त्रतत्पराः॥ २९ | तब उस समय शुक्राचार्यको व्रतमें संलग्न तथा दैत्योंको [तपस्वी बनकर] पाखण्डमें निरत देखकर देवता लोग आपसमें मन्त्रणा करने लगे॥ २९॥ | | विचार्य मनसा सर्वे संग्रामायोद्यता नृप।<br>ययुर्धृतायुधास्तत्र यत्र ते दानवोत्तमाः॥ ३० | हे राजन्! भलीभाँति विचार करके सभी देवता संग्रामके लिये उद्यत हो गये और शस्त्रास्त्र धारणकर वहाँ पहुँच गये, जहाँ वे बड़े-बड़े दानव विद्यमान थे॥ ३०॥ | | तानागतानसमीक्ष्याथ सायुधान्दंशितांस्तथा।<br>आसंस्ते भयसंविग्ना दैत्या देवान्समन्ततः॥ ३१ | तदनन्तर दैत्यगण उन आये हुए देवताओंको आयुधोंसे सज्जित और कवच धारण किये तथा अपनेको उनसे सब ओरसे घिरा देखकर भयसे व्याकुल हो उठे॥ ३१॥ | | उत्पेतुः सहसा ते वै सन्नद्धान्भयकर्शिताः।<br>अब्रुवन्वचनं तथ्यं ते देवान्बलदर्पितान्॥ ३२ | वे भयातुर दानव तुरंत उठकर खड़े हो गये और युद्धके लिये उद्यत बलाभिमानी देवताओंसे सारगर्भित वचन कहने लगे—हमने शस्त्र रख दिये हैं, हम भयभीत हैं और हमारे आचार्य इस समय व्रतमें संलग्न हैं। हे देवताओ! पहले अभयदान देकर भी आप लोग हमें मारनेकी इच्छासे आ गये। हे | | न्यस्तशस्त्रे भयवति आचार्ये व्रतमास्थिते।<br>दत्त्वाभयं पुरा देवाः सम्प्राप्ता नो जिघांसया॥ ३३ | |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 D
अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५३
अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सत्यं वः क्व गतं देवा धर्मश्च श्रुतिनोदितः ।<br>न्यस्तशस्त्रा न हन्तव्या भीताश्च शरणं गताः ॥ ३४ | देवगण! आप लोगोंका सत्य और श्रुतिसम्मत वह धर्म कहाँ चला गया कि ‘जो शस्त्र रख चुके हों, भयभीत हों और शरणागत हो गये हों, उन्हें नहीं मारना चाहिये’॥ ३२–३४॥ |
| देवा ऊचुः<br>भवद्भिः प्रेषितः काव्यो मन्त्रार्थं कुहकेन च ।<br>तपो ज्ञातं हि युष्माकं तेन युध्याम एव हि ॥ ३५ | देवता बोले—आप लोगोंने छलसे शुक्राचार्यको मन्त्र प्राप्त करनेके लिये भेजा है। हम आपलोगोंके तपको जान गये हैं, इसीलिये हमलोग युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हैं॥ ३५॥ |
| सज्जा भवन्तु युद्धाय संरब्धाः शस्त्रपाणयः ।<br>शत्रुश्छिद्रेण हन्तव्य एष धर्मः सनातनः ॥ ३६ | अब क्षुब्ध हुए आपलोग भी हाथोंमें शस्त्र धारणकर युद्धके लिये तैयार हो जाइये। यह सनातन सिद्धान्त है कि जब शत्रु दुर्बल हो, तभी उसे मार डालना चाहिये॥ ३६॥ |
| व्यास उवाच<br> |
४५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| इत्युक्त्वा प्रेरिता निद्रा तानागत्य पपात च।<br>सेन्द्रा निद्रावशं याता देवा मूकवदास्थिताः॥ ४४ | ऐसा कहकर उन्होंने निद्राको प्रेरित किया। उस निद्राने देवताओंके पास आकर उनपर अपना प्रभाव डाल दिया, जिससे इन्द्रसहित सभी देवता निद्राके वशीभूत हो गये और गूँगेकी भाँति पड़े रहे॥ ४४॥ |
| इन्द्रं निद्राजितं दृष्ट्वा दीनं विष्णुिरभाषत।<br>मां त्वं प्रविश भद्रं ते नये त्वां च सुरोत्तम॥ ४५ | इन्द्रको निद्राके द्वारा नियन्त्रित तथा दीन देखकर भगवान् विष्णुने कहा—हे देवश्रेष्ठ! तुम मुझमें प्रविष्ट हो जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें अन्यत्र पहुँचाता हूँ॥ ४५॥ |
| एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरन्दरः।<br>निर्भयो गतनिद्रश्च बभूव हरिरक्षितः॥ ४६ | विष्णुके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र उनमें प्रवेश कर गये और उन श्रीहरिसे रक्षित होकर वे निर्भय तथा निद्रारहित हो गये॥ ४६॥ |
| रक्षितं हरिणा दृष्ट्वा शक्रं तत्र गतव्यथम्।<br>काव्यमाता ततः क्रुद्धा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>मघवंस्त्वां भक्षयामि सविष्णुं वै तपोबलात्।<br>पश्यतां सर्वदेवानामीदृशं मे तपोबलम्॥ ४८ | तब भगवान् विष्णुके द्वारा रक्षित इन्द्रको व्यथाशून्य देखकर शुक्राचार्यकी माता कुपित हो उठीं और यह वचन बोलीं—हे इन्द्र! सभी देवताओंके देखते-देखते मैं अपने तपोबलसे विष्णुसहित तुम्हें खा जाऊँगी; ऐसा मेरा तपोबल है॥ ४७-४८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्तौ तु तया देवौ विष्ण्विन्द्रौ योगविद्यया।<br>अभिभूतौ महात्मानौ स्तब्धौ तौ सम्बभूवतुः॥ ४९ | व्यासजी बोले—ऐसा कहकर उन्होंने अपनी योगविद्याके द्वारा इन्द्र तथा विष्णुको आक्रान्त कर दिया और वे दोनों महात्मा स्तब्ध हो गये॥ ४९॥ |
| विस्मितास्तु तदा देवा दृष्ट्वा तावतिबाधितौ।<br>चक्रुः किलकिलाशब्दं ततस्ते दीनमानसाः॥ ५० | उन दोनोंको बहुत बड़े संकटमें पड़ा देखकर देवताओंको महान् आश्चर्य हुआ और वे दुःखित्त हो जोर-जोरसे चीखने-चिल्लाने लगे॥ ५०॥ |
| क्रोशमानान्सुरान्दृष्ट्वा विष्णुं प्राह शचीपतिः।<br>विशेषेणाभिभूतोऽस्मि त्वत्तोऽहं मधुसूदन॥ ५१<br><br>जह्येनां तरसा विष्णो यावन्नौ न दहेत्प्रभो।<br>तपसा दर्पितां दुष्टां मा विचारय माधव॥ ५२ | देवताओंको चीखते-चिल्लाते देखकर इन्द्रने विष्णुसे कहा—हे मधुसूदन! मैं [इस समय] आपकी अपेक्षा अधिक आक्रान्त हूँ। अतः हे विष्णो! हे प्रभो! यह हमें जबतक भस्म न कर दे, आप तपस्याके अभिमानमें चूर इस दुष्टाको शीघ्रतापूर्वक मार डालिये। हे माधव! अब आप सोच-विचार न करें॥ ५१-५२॥ |
| इत्युक्तो भगवान्विष्णुः शक्रण प्रथितेन च।<br>चक्रं सस्मार तरसा घृणां त्यक्त्वाथ माधवः॥ ५३<br><br>स्मृतमात्रं तु सम्प्राप्तं चक्रं विष्णुवशानुगम्।<br>दधार च करे क्रुद्धो वधार्थं शक्रनोदितः॥ ५४ | कीर्तिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने दया छोड़कर तत्काल सुदर्शन चक्रका स्मरण किया। विष्णुके वशमें रहनेवाला वह चक्र उनके स्मरण करते ही आ पहुँचा और इन्द्रसे प्रेरित होकर उन्होंने कुपित हो उसके वधके लिये चक्रको अपने हाथमें ले लिया॥ ५३-५४॥ |
अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५
अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| गृहीत्वा तत्करे चक्रं शिरश्चिच्छेद रंहसा।<br>हतां दृष्ट्वा तु तां शक्रो मुदितश्चाभवत्तदा॥ ५५<br><br>देवाश्चातीव सन्तुष्टा हरिं जय जयेति च।<br>तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे सञ्जाता विगतज्वराः॥ ५६ | उस चक्रको हाथमें लेकर भगवान् विष्णुने बड़े वेगसे उसका सिर काट दिया। तब उसे मृत देखकर इन्द्र हर्षित हो उठे। सभी देवता भी अत्यन्त सन्तुष्ट होकर विष्णुकी जयकार करने लगे। वे प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे और सन्तापरहित हो गये॥ ५५-५६॥ |
| इन्द्रविष्णू तु सञ्जातौ तत्क्षणाद्धृदयव्यथौ।<br>स्त्रीवधाच्छंकमानौ तु भृगोः शापं दुरत्ययम्॥ ५७ | स्त्रीवधसे [होनेवाले पाप] तथा भृगुमुनिके भीषण शापकी शंका करते हुए वे भगवान् विष्णु तथा इन्द्र उसी समयसे दुःखितचित्त रहने लगे॥ ५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे<br>शुक्रमातृवधवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥
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अथ द्वादशोऽध्यायः
महात्मा भृगुद्वारा विष्णुको मानवयोनिमें जन्म लेनेका शाप देना, इन्द्रद्वारा अपनी पुत्री जयन्तीको शुक्राचार्यके लिये अर्पित करना, देवगुरु बृहस्पतिद्वारा शुक्राचार्यका रूप धारणकर दैत्योंका पुरोहित बनना
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तं दृष्ट्वा तु वधं घोरं चुक्रोध भगवान्भृगुः।<br>वेपमानोऽतिदुःखार्तः प्रोवाच मधुसूदनम्॥ १ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उस भयानक वधको देखकर भगवान् भृगु अत्यन्त कुपित हुए और दुःखसे व्याकुल होकर काँपते हुए वे मधुसूदन विष्णुसे कहने लगे॥ १॥ |
| भृगुरुवाच<br>अकृत्यं ते कृतं विष्णो जानन्पापं महामते।<br>वधोऽयं विप्रजाताया मनसा कर्तुमक्षमः॥ २ | **भृगु बोले—**हे महाबुद्धिमान् विष्णो! जो नहीं करना चाहिये वह पाप आपने जान-बूझकर कर डाला। विप्र-स्त्रीके इस वधकी तो मनसे कल्पना करना भी अनुचित है॥ २॥ |
| आख्यातस्त्वं सत्त्वगुणः स्मृतो ब्रह्मा च राजसः।<br>तथासौ तामसः शम्भुर्विपरीतं कथं स्मृतम्॥ ३<br><br>तामसस्त्वं कथं जातः कृतं कर्मातिनिन्दितम्।<br>अवध्या स्त्री त्वया विष्णो हता कस्मान्निरागसा॥ ४ | आप तो सत्त्वगुणसे सम्पन्न कहे गये हैं, ब्रह्मा रजोगुणी और शिव तमोगुणी बताये गये हैं; तब आपने अपने गुणके विपरीत कार्य क्यों किया? आप तामसी कैसे हो गये, जिससे आपने यह घोर निन्दनीय कर्म कर डाला? हे विष्णो! आपने उस अवध्य तथा निरपराध स्त्रीको क्यों मार डाला?॥ ३-४॥ |
| शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत्प्रकरोमि ते।<br>विधुरोऽहं कृतः पाप त्वयाहं शुक्रकारणात्॥ ५ | [उन्होंने क्रोधपूर्वक कहा कि] अब मैं तुझ दुराचारीको शाप दे रहा हूँ, इसके अतिरिक्त तुम्हारा क्या प्रतीकार करूँ? अरे पापी! तुमने इन्द्रके हितके लिये मुझे विधुर बना दिया। हे मधुसूदन! मैं इन्द्रको शाप नहीं दूँगा, बल्कि तुम्हें ही शाप दूँगा। |
| न शपेऽहं तथा शक्रं शपे त्वां मधुसूदन।<br>सदा छलपरोऽसि त्वं कीटयोनिर्दुराशयः॥ ६ | कृष्ण सर्पसदृश दुरभिप्रायवाले तुम सदा छल करनेमें ही तत्पर रहते हो॥ ५-६॥ |
| ४५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ये च त्वां सात्त्विकं प्राहुस्ते मूर्खा मुनयः किल।<br>तामसस्त्वं दुराचारः प्रत्यक्षं मे जनार्दन॥ ७<br><br>अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसम्भवाः।<br>प्रायो गर्भभवं दुःखं भुंक्ष्व पापाज्जनार्दन॥ ८ | हे जनार्दन! जो मुनि तुम्हें सात्त्विक कहते हैं, वे निश्चय ही मूर्ख हैं। मैंने तो प्रत्यक्ष जान लिया कि तुम तमोगुणी तथा दुराचारी हो। अतः हे जनार्दन! मेरे शापसे मृत्युलोकमें तुम्हारे अनेक अवतार हों और [इस स्त्री-वधजन्य] पापके कारण बार-बार गर्भवाससे होनेवाले दुःखको भोगो॥ ७-८॥ |
| व्यास उवाच<br>ततस्तेनाथ शापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः।<br>लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह॥ ९ | व्यासजी बोले—उसी शापके कारण भगवान् विष्णु धर्मका ह्रास होनेपर संसारके कल्याणके लिये बार-बार मानवरूपोंमें प्रकट होते हैं॥ ९॥ |
| राजोवाच<br>भृगुभार्या हता तत्र चक्रेणामिततेजसा।<br>गार्हस्थ्यञ्च पुनस्तस्य कथं जातं महात्मनः॥ १० | राजा बोले—[हे व्यासजी!] जब अमित तेजस्वी चक्रके द्वारा भृगुपत्नीका वध हो गया, उसके बाद महात्मा भृगुका गार्हस्थ्य-जीवन कैसे व्यतीत हुआ?॥ १०॥ |
| व्यास उवाच<br>इति शप्त्वा हरिं रोषात्तदादाय शिरस्त्वरन्।<br>काये संयोज्य तरसा भृगुः प्रोवाच कार्यवित्॥ ११<br><br>अद्य त्वां विष्णुना देवि हतां सञ्जीवयाम्यहम्।<br>यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा॥ १२<br><br>तेन सत्येन जीवेत यदि सत्यं ब्रवीम्यहम्।<br>पश्यन्तु देवताः सर्वा मम तेजोबलं महत्॥ १३<br><br>अद्भिस्त्वां प्रोक्ष्य शीताभिर्जीवयामि तपोबलात्।<br>सत्यं शौचं तथा वेदा यदि मे तपसो बलम्॥ १४ | व्यासजी बोले—इस प्रकार रोषपूर्वक भगवान् विष्णुको शाप देकर कार्यकुशल महर्षि भृगु तत्काल उस [कटे] सिरको लेकर शीघ्रतापूर्वक [अपनी पत्नीके] धड़में जोड़ करके बोले—हे देवि! विष्णुके द्वारा तुम मारी जा चुकी हो, किंतु अब मैं तुम्हें फिरसे जीवित कर रहा हूँ। यदि मैं सम्पूर्ण धर्म जानता हूँ तथा उसका सम्यक् आचरण करता हूँ और सदा सत्य भाषण करता हूँ तो उसी सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ। सभी देवता मेरे महान् तेज-बलको देख लें। यदि मुझमें सत्य, पवित्रता, वेदाध्ययन तथा तपस्याका बल होगा तो मैं उन्हींके प्रभावसे शीतल जलसे तुम्हारा प्रोक्षण करके तुम्हें जीवित कर दूँगा॥ ११-१४॥ |
| व्यास उवाच<br>अद्भिः सम्प्रोक्षिता देवी सद्यः सञ्जीविता तदा।<br>उत्थिता परमप्रीता भृगोर्भार्या शुचिस्मिता॥ १५ | व्यासजी बोले—तब जलसे प्रोक्षित करते ही मधुर मुसकानवाली वे भृगुपत्नी शीघ्र ही जीवित हो गयीं और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उठकर खड़ी हो गयीं॥ १५॥ |
| ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव।<br>साधु साध्विति तं तां तु तुष्टुवुः सर्वतो दिशम्॥ १६ | तब सोकर उठी हुईके समान उसे देखकर सब ओरसे लोग 'साधु-साधु'—ऐसा कहकर भृगुमुनि तथा उनकी भार्या दोनोंकी स्तुति करने लगे॥ १६॥ |
| एवं सञ्जीविता तेन भृगुणा वरवर्णिनी।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवाः सेन्द्रा विलोक्य तत्॥ १७ | इस प्रकार उन महर्षि भृगुने उस सुन्दरीको जीवित कर दिया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवता अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे॥ १७॥ |
| अ० १२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४५७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्रः सुरानथोवाच मुनिना जीविता सती।<br>काव्यस्तप्त्वा तपो घोरं किं करिष्यति मन्त्रवित्॥ १८ | तत्पश्चात् इन्द्रने देवताओंसे कहा—भृगुमुनिने अपनी साध्वी भार्याको जीवित कर दिया। साथ ही मन्त्रज्ञानी शुक्राचार्य कठोर तपस्या करके [शिवसे मन्त्र प्राप्तकर] पता नहीं क्या कर डालेंगे!॥ १८॥ |
| व्यास उवाच<br>गता निद्रा सुरेन्द्रस्य देहेऽक्षेममभून्नृप।<br>स्मृत्वा काव्यस्य वृत्तान्तं मन्त्रार्थमतिदारुणम्॥ १९ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! मन्त्रप्राप्तिके लिये शुक्राचार्यके अत्यन्त कठोर तपका स्मरण करके इन्द्रकी नींद समाप्त हो गयी और उनके शरीरमें व्याकुलता होने लगी॥ १९॥ |
| विमृश्य मनसा शक्रो जयन्तीं स्वसुतां तदा।<br>उवाच कन्यां चार्वङ्गीं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ २०<br><br>गच्छ पुत्रि मया दत्ता काव्याय त्वं तपस्विने।<br>समाराधय तन्वङ्गि मत्कृते तं वशं कुरु॥ २१<br><br>उपचारैर्मुनिं तैस्तैः समाराध्य मनःप्रियैः।<br>भयं मे तरसा गत्वा हर तत्र वराश्रमे॥ २२ | तब मनमें भली-भाँति विचार करके इन्द्रने सुन्दर स्वरूपवाली अपनी पुत्री जयन्तीसे मुसकराते हुए कहा—हे पुत्रि! मैंने तुम्हें तपस्वी शुक्राचार्यको सौंप दिया। अतः हे तन्वंगि! अब तुम जाओ और मेरे कल्याणके लिये उनकी सेवा करो और उन्हें वशमें कर लो। उस उत्तम आश्रममें शीघ्र जाकर उनके मनको प्रिय लगनेवाले विविध उपचारोंसे उन्हें प्रसन्न करके मेरा भय दूर करो॥ २०—२२॥ |
| सा पितुर्वचनं श्रुत्वा तत्रागच्छन्मनोरमा।<br>तमपश्यद्विशालाक्षी पिबन्तं धूममाश्रमे॥ २३ | विशाल नयनोंवाली वह सुन्दर कन्या पिताकी बात सुनकर [शुक्राचार्यके] आश्रममें गयी और वहाँपर उसने मुनिको [नीचेकी ओर सिर करके] धुएँका सेवन करते हुए देखा॥ २३॥ |
| तस्य देहं समालोक्य स्मृत्वा वाक्यं पितुस्तदा।<br>कदलीदलमादाय वीजयामास तं मुनिम्॥ २४ | तब उनके [तपोरत] शरीरको देखकर और पिताकी बात याद करके वह केलेका एक पत्ता लेकर मुनिको पंखा झलने लगी॥ २४॥ |
| निर्मलं शीतलं वारि समानीय सुवासितम्।<br>पानाय कल्पयामास भक्त्या परमया लघु॥ २५<br><br>छायां वस्त्रातपत्रेण भास्करे मध्यगे सति।<br>रचयामास तन्वङ्गी स्वयं धर्मे स्थिता सती॥ २६ | तबसे वह उनके पीनेके लिये अत्यन्त स्वच्छ, शीतल, सुगन्धित तथा रुचिकर जल ले आकर [उनके समक्ष] श्रद्धापूर्वक उपस्थित किया करती। सूर्यके मध्य आकाशमें होते ही वह सुन्दरी उनके ऊपर वस्त्रसे छतरी बनाकर छाया कर देती थी। वह साध्वी सदा पातिव्रत्य धर्मका पालन करती थी॥ २५—२६॥ |
| फलान्यानीय दिव्यानि पक्वानि मधुराणि च।<br>मुमोचाग्रे मुनेस्तस्य भक्षार्थं विहितानि च॥ २७<br><br>कुशाः प्रादेशमात्रा हि हरिताः शुकसन्निभाः।<br>दधाराग्रेऽथ पुष्पाणि नित्यकर्मसमृद्धये॥ २८<br><br>निद्रार्थं कल्पयामास संस्तरं पल्लवान्वितम्।<br>तस्मिन्मुनौ चादरस्था चकार व्यजनं शनैः॥ २९ | वह शास्त्रविहित दिव्य, पके तथा मीठे फल लाकर खानेके लिये उन मुनिके समक्ष रख देती थी। वह कन्या उनके नित्यकर्मके सम्पादनार्थ पुष्प और तोतेके वर्णके समान प्रादेशमात्र मापवाले हरे-हरे कुश उनके आगे प्रस्तुत कर देती थी। उनके शयनके लिये वह कोमल-कोमल पत्तोंका बिछौना तैयार करती थी और फिर उन मुनिके प्रति आदरभाव रखकर धीरे-धीरे पंखा झलने लगती थी॥ २७—२९॥ |
| ४५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १२ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हावभावादिकं किञ्चिद्विकारजननं च तत्।<br>न चकार जयन्ती सा शापभीता मुनेस्तदा॥ ३० | मुनिके शापसे भयभीत होकर वह जयन्ती उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेवाला कोई हाव-भाव प्रदर्शित नहीं करती थी॥ ३०॥ |
| स्तुतिं चकार तन्वङ्गी गीर्भिस्तस्य महात्मनः।<br>सुभाषिण्यनुकूलाभिः प्रीतिकर्त्रीभिरप्युत॥ ३१<br>प्रबुद्धे जलमादाय दधाराचमनाय च।<br>मनोऽनुकूलं सततं कुर्वन्ती व्यचरत्तदा॥ ३२ | सुकुमार अंगोंवाली तथा मृदुभाषण करनेवाली वह कन्या उन महात्माके मनके अनुकूल तथा प्रीति उत्पन्न करनेवाले शब्दोंसे उनकी स्तुति करती थी। तत्पश्चात् उनके जाग जानेपर आचमनके लिये जल लाकर रख देती थी। इस प्रकार सदा उनके मनके अनुकूल कार्य करती हुई उनके साथ व्यवहार करती थी॥ ३१-३२॥ |
| इन्द्रोऽपि सेवकांस्तत्र प्रेषयामास चतुरः।<br>प्रवृत्तिं ज्ञातुकामो वै मुनेस्तस्य जितात्मनः॥ ३३ | चिन्तासे व्याकुल इन्द्र भी उन जितेन्द्रिय मुनिकी प्रवृत्ति जाननेकी इच्छासे अपने सेवक भेजते रहते थे॥ ३३॥ |
| एवं बहूनि वर्षाणि परिचर्यापरावभूत्।<br>निर्विकारा जितक्रोधा ब्रह्मचर्यपरा सती॥ ३४ | इस प्रकार वह साध्वी कन्या क्रोधपर विजय प्राप्त करके, निर्विकार होकर तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहती हुई बहुत वर्षोंतक मुनिकी सेवामें संलग्न रही॥ ३४॥ |
| पूर्णे वर्षसहस्रे तु परितुष्टो महेश्वरः।<br>वरेण छन्दयामास काव्यं प्रीतमना हरः॥ ३५ | तदनन्तर हजार वर्ष पूर्ण होनेपर महेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक वे शुक्राचार्यसे वर माँगनेके लिये कहने लगे॥ ३५॥ |
| ईश्वर उवाच<br>यच्च किञ्चिदपि ब्रह्मान्विद्यते भृगुनन्दन।<br>प्रतिपश्यसि यत्सर्वं यच्च वाच्यं न कस्यचित्॥ ३६<br>सर्वाभिभावकत्वेन भविष्यसि न संशयः।<br>अवध्यः सर्वभूतानां प्रजेशश्च द्विजोत्तमः॥ ३७ | ईश्वर बोले— हे ब्रह्मन्! हे भृगुनन्दन! जगत्में जो कुछ भी विद्यमान है, आप जो सब देख रहे हैं तथा जो किसीकी भी वाणीका विषय नहीं है—उन सबके स्वामित्वसे आप युक्त हो जायेंगे; इसमें कोई सन्देह नहीं है। आप सभी प्राणियोंसे अवध्य होंगे। आप प्रजाओंके स्वामी तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे॥ ३६-३७॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं दत्त्वा वराञ्छम्भुस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>काव्यस्तामथ संवीक्ष्य जयन्तीं वाक्यमब्रवीत्॥ ३८<br>कासि कस्यासि सुश्रोणि ब्रूहि किं ते चिकीर्षितम्।<br>किमर्थमिह सम्प्राप्ता कार्यं वद वरोरु मे॥ ३९<br>किं वाञ्छसि करोम्यद्य दुष्करं चेत्सुलोचने।<br>प्रीतोऽस्मि त्वत्कृतेनाद्य वरं वरय सुव्रते॥ ४० | व्यासजी बोले— इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् जयन्तीको देखकर शुक्राचार्यने उससे कहा—हे सुश्रोणि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो; मुझे अपनी अभिलाषा बताओ। हे सुन्दरि! तुम यहाँ किसलिये आयी हो, अपना कार्य बताओ। हे सुनयने! तुम क्या चाहती हो; यदि वह कार्य दुष्कर भी हो तो भी मैं उसे अभी कर दूँगा। हे सुव्रते! आज मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ, अतः वर माँग लो॥ ३८-४०॥ |