देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 452, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 452
अ० ९] चतुर्थ स्कन्ध ४४३
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| बभूव युद्धं तुमुलं तयोस्तु<br>जयैषिणोः पार्थिव देवदैत्ययोः।<br>ववर्षुराकाशपथे स्थितास्ते<br>पुष्पाणि दिव्यानि प्रहृष्टचित्ताः॥ २७ | हे राजन्! इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेके इच्छुक उन ऋषि नर तथा दैत्यराज प्रह्लादके बीच भीषण युद्ध होने लगा। आकाशमार्गमें स्थित वे [देवतागण] प्रसन्नचित्त होकर उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ २७॥ |
| चुकोप दैत्याधिपतिर्हरौ स<br>मुमोच बाणानतितीव्रवेगान्।<br>चिच्छेद तान्धर्मसुतः सुतीक्ष्णै-<br>र्धनुर्विमुक्तैर्विशिखैस्तदाशु ॥ २८ | अचानक प्रह्लाद कुपित हो उठे और उन्होंने अति तीव्रगामी बाण ऋषि नारायणपर छोड़े। धर्मपुत्र नारायणने शीघ्र ही उन बाणोंको अपने धनुषसे छोड़े गये अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंसे खण्ड-खण्ड कर डाला॥ २८॥ |
| ततो नारायणं बाणैः प्रह्लादश्चातिकर्षितैः।<br>ववर्ष सुस्थितं वीरं धर्मपुत्रं सनातनम्।<br>नारायणोऽपि तं वेगोन्मुक्तैर्बाणैः शिलाशितैः॥ २९<br>तुतोदातीव पुरतो दैत्यानामधिपं स्थितम्।<br>सन्निपातोऽम्बरे तत्र दिदृक्षूणां बभूव ह॥ ३० | दैत्यराज प्रह्लाद समरांगणमें डटकर खड़े अतीव पराक्रमी तथा सनातन धर्मपुत्र नारायणपर अपने अति तीक्ष्ण बाण बरसाने लगे। नारायणने भी सानपर चढ़ाकर तेज किये गये अपने वेगपूर्वक छोड़े गये बाणोंके द्वारा सम्मुख खड़े दैत्यपति प्रह्लादको अत्यन्त भीषण चोट पहुँचायी। उस युद्धका अवलोकन करनेके इच्छुक देवताओं तथा दैत्योंका एक विशाल समूह अपने-अपने पक्षका जयघोष करते हुए आकाशमें एकत्र हो गया॥ २९-३० १/२॥ |
| देवानां दानवानाञ्च कुर्वतां जयघोषणाम्।<br>उभयोः शरवर्षेण छादिते गगने तदा॥ ३१<br>दिवापि रात्रिसदृशं बभूव तिमिरं महत्।<br>ऊचुः परस्परं देवा दैत्याश्चातीव विस्मिताः॥ ३२<br>अदृष्टपूर्वं युद्धं वै वर्ततेऽद्य सुदारुणम्।<br>देवर्षयोऽथ गन्धर्वा यक्षकिन्नरपन्नगाः॥ ३३ | दोनों पक्षोंकी बाणवर्षासे आकाशके आच्छादित हो जानेपर उस समय इतना घना अन्धकार हो गया कि दिन भी रातके समान प्रतीत होने लगा। इससे अति आश्चर्यचकित होकर देवता तथा दैत्य परस्पर कहने लगे कि यह अत्यन्त भयावह संग्राम हो रहा है। ऐसा भीषण युद्ध तो पहले कभी नहीं देखा गया। बड़े-बड़े देवर्षि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, विद्याधर तथा चारणगण इस युद्धको देखकर अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये॥ ३१-३३ १/२॥ |
| विद्याधराश्चारणाश्च विस्मयं परमं ययुः।<br>नारदः पर्वतश्चैव प्रेक्षणार्थं स्थितौ मुनी॥ ३४<br>नारदः पर्वतं प्राह नेदृशं चाभवत्पुरा।<br>तारकासुरयुद्धञ्च तथा वृत्रासुरस्य च॥ ३५<br>मधुकैटभयोर्युद्धं हरिणा चेदृशं कृतम्।<br>प्रह्लादः प्रबलः शूरो यस्मान्नारायणेन च॥ ३६<br>करोति सदृशं युद्धं सिद्धेनाद्भुतकर्मणा। | उस युद्धका अवलोकन करनेके लिये मुनि नारद तथा पर्वत भी आये हुए थे। नारदमुनिने पर्वतसे कहा—ऐसा घोर संग्राम पहले नहीं हुआ था; तारकासुरयुद्ध, वृत्रासुरका युद्ध यहाँतक कि मधु-कैटभका युद्ध भी वैसा नहीं हुआ था, जैसा कि इस समय नारायणके द्वारा किया गया। प्रह्लाद अत्यन्त वीर हैं जो कि वे अद्भुत कर्मवाले सिद्धिसम्पन्न नारायणके साथ यह बराबरीका युद्ध कर रहे हैं॥ ३४-३६ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>दिने दिने तथा रात्रौ कृत्वा कृत्वा पुनः पुनः॥ ३७ | व्यासजी बोले— इस प्रकार प्रतिदिन तथा प्रतिरात्रि बार-बार युद्ध करते हुए वे दोनों दैत्य तथा |