भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 453

| ४४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
चक्रतुः परमं युद्धं तौ तदा दैत्यतापसौ।<br>नारायणस्तु चिच्छेद प्रह्लादस्य शरासनम्॥ ३८<br>तरसैकेन बाणेन स चान्यद्धनुराददे।<br>नारायणस्तु तरसा मुक्त्वाऽन्यञ्च शिलीमुखम्॥ ३९<br>तदैव मध्यतश्चापं चिच्छेद लघुहस्तकः।<br>छिन्नं छिन्नं पुनर्देत्यो धनुरन्यत्समाददे॥ ४०<br>नारायणस्तु चिच्छेद विशिखैराशु कोपितः।<br>छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रः परिघं तु समाददे॥ ४१<br>जघान धर्मजं तूर्णं बाह्वोर्मध्येऽतिकोपनः।तपस्वी घोर संग्राममें तत्पर रहे। नारायणने एक बाणसे प्रह्लादका धनुष काट दिया। तब प्रह्लादने तत्काल दूसरा धनुष ले लिया। नारायणने हस्तकौशल दिखाते हुए पुनः बड़ी शीघ्रतासे दूसरा बाण चलाकर उस धनुषको भी बीचोबीचसे काट डाला। इस प्रकार नारायण बार-बार धनुष काटते जाते थे और प्रह्लाद दूसरा धनुष लेते जाते थे। अन्तमें नारायणने कुपित होकर अपने बाणोंसे उसके धनुषको शीघ्रतासे पुनः काट दिया। उस धनुषके भी कट जानेपर दैत्यराज प्रह्लादने अपना परिघ उठा लिया और अत्यन्त क्रोधित होकर बड़ी फुर्तीसे धर्मपुत्र नारायणकी भुजाओंपर प्रहार किया॥ ३७—४१ १/२ ॥
तमायान्तं स बलवान्मार्गणैर्नवभिर्मुनिः॥ ४२<br>चिच्छेद परिघं घोरं दशभिस्तमताडयत्।प्रतापी नारायणने अपनी ओर आते हुए उस परिघको नौ बाणोंसे काट दिया और दस बाणोंसे प्रह्लादपर चोट की॥ ४२ १/२ ॥
गदामादाय दैत्येन्द्रः सर्वायसमयीं दृढाम्॥ ४३<br>जानुदेशे जघानाशु देवं नारायणं रुषा।तत्पश्चात् दैत्येन्द्र प्रह्लादने पूर्णतः लोहमयी सुदृढ़ गदा उठाकर क्रोधपूर्वक नारायणमुनिकी जाँघपर शीघ्रतापूर्वक प्रहार किया॥ ४३ १/२ ॥
गदया चापि गिरिवत्संस्थितः स्थिरमानसः॥ ४४<br>धर्मपुत्रोऽतिबलवान्मुमोचाशु शिलीमुखान्।<br>गदां चिच्छेद भगवांस्तदा दैत्यपतेर्दृढाम्॥ ४५<br>विस्मयं परमं जग्मुः प्रेक्षका गगने स्थिताः।उस गदा-प्रहारसे भी धर्मपुत्र नारायण पर्वतकी भाँति अविचल भावसे स्थिरचित्त होकर खड़े रहे। तदनन्तर परम पराक्रमी भगवान् नारायणने बड़ी तेजीसे अनेक बाण छोड़े और दैत्यपति प्रह्लादकी सुदृढ़ गदाको खण्ड-खण्ड कर दिया। आकाशमें स्थित होकर युद्ध देखनेवाले बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४४-४५ १/२ ॥
स तु शक्तिं समादाय प्रह्लादः परवीरहा॥ ४६<br>चिक्षेप तरसा क्रुद्धो बलान्नारायणोरसि।<br>तामापतन्तीं संवीक्ष्य बाणेनैकेन लीलया॥ ४७<br>सप्तधा कृतवानाशु सप्तभिस्तं जघान ह।तत्पश्चात् शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रह्लादने शक्ति उठाकर कुपित हो बलपूर्वक बड़ी तेजीसे नारायणके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। तब सामने आती हुई उस शक्तिको देखकर नारायणने एक ही बाणसे बड़ी आसानीसे उसके सात खण्ड कर दिये और साथ ही सात बाणोंसे प्रह्लादपर प्रहार किया॥ ४६—४७ १/२ ॥
दिव्यवर्षशतं चैव तद्युद्धं परमं तयोः॥ ४८<br>जातं विस्मयदं राजन् सर्वेषां तत्र चाश्रमे।<br>तदाजगाम तरसा पीतवासाश्चतुर्भुजः॥ ४९<br>प्रह्लादस्याश्रमं तत्र जगाम च गदाधरः।<br>चतुर्भुजो रमाकान्तो रथाङ्गदरपद्मभृत्॥ ५०हे राजन्! इस प्रकार सबको विस्मित कर देनेवाला वह युद्ध एक सौ दिव्य वर्षतक चलता रहा। तदनन्तर चार भुजाओंसे शोभा पानेवाले पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु शीघ्रतापूर्वक उस आश्रममें आ गये। तत्पश्चात् हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले वे चतुर्भुज लक्ष्मीपति विष्णु प्रह्लादके आश्रमपर पहुँचे॥ ४८—५० ॥
देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 453, कुल 889 में से · BharatKosha