देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 454, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 454
| अ० १० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
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| दृष्ट्वा तमागतं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः।<br>प्रणम्य परया भक्त्या प्राञ्जलिः प्रत्युवाच ह॥ ५१ | वहाँ उन्हें आये हुए देखकर हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लाद बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहने लगे॥ ५१॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>देवदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल माधव।<br>कथं न जितवानाजावहमेतौ तपस्विनौ।<br>संग्रामस्तु मया देव कृतः पूर्णं शतं समाः॥ ५२<br>सुराणां न जितौ कस्मादिति मे विस्मयो महान्। | प्रह्लाद बोले— हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भक्तवत्सल! हे माधव! मैं इन दोनों तपस्वियोंको युद्धमें क्यों नहीं जीत सका? हे देव! मैंने देवताओंके पूरे सौ वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, फिर भी ये जीते न जा सके—मुझे यह महान् आश्चर्य है!॥ ५२ १/२ ॥ |
| विष्णुरुवाच<br>सिद्धाविमौ मदंशौ च विस्मयः कोऽत्र मारिष॥ ५३<br>तापसौ न जितात्मानौ नरनारायणौ जितौ।<br>गच्छ त्वं वितलं राजन् कुरु भक्तिं ममाचलाम्॥ ५४<br>नाभ्यां कुरु विरोधं त्वं तापसाभ्यां महामते। | विष्णु बोले— हे आर्य! ये दोनों सिद्ध पुरुष हैं और मेरे अंशसे आविर्भूत हैं; अतः [इन्हें न जीत पानेमें] आश्चर्य क्या! नर-नारायण नामसे प्रसिद्ध इन जितात्मा तपस्वियोंको तुम नहीं जीत सकते। अतः हे राजन्! तुम अपने वितललोकको चले जाओ और वहाँ मेरी अविचल भक्ति करो। हे महामते! तुम इन दोनों तपस्वियोंसे विरोध मत करो॥ ५३-५४ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याज्ञप्तो दैत्यराजो निर्ययावसुरैः सह॥ ५५<br>नरनारायणौ भूयस्तपोयुक्तौ बभूवतुः॥ ५६ | व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुसे ऐसी आज्ञा पाकर दैत्यपति प्रह्लाद असुरोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हो गये। तदनन्तर नर-नारायण पुनः तपस्यामें संलग्न हो गये॥ ५५-५६॥ |
iti श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादनारायणयोर्युद्धे विष्णोरागमनवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
राजा जनमेजयद्वारा प्रह्लादके साथ नर-नारायणके युद्धका कारण पूछना, व्यासजीद्वारा उत्तरमें संसारके मूल कारण अहंकारका निरूपण करना तथा महर्षि भृगुद्वारा भगवान् विष्णुको शाप देनेकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
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| जनमेजय उवाच<br>सन्देहोऽयं महानत्र पाराशर्य कथानके।<br>नरनारायणौ शान्तौ वैष्णवांशौ तपोधनौ॥ १<br><br>तीर्थाश्रयौ सत्त्वयुक्तौ वन्याशनपरौ सदा।<br>धर्मपुत्रौ महात्मानौ तापसौ सत्यसंस्थितौ॥ २<br><br>कथं रागसमायुक्तौ जातौ युद्धे परस्परम्।<br>संग्रामं चक्रतुः कस्मात्त्यक्त्वा तपमनुत्तमम्॥ ३ | जनमेजय बोले— हे व्यासजी! इस कथानकमें मुझे यह महान् संशय हो रहा है कि जब वे नर-नारायण शान्तस्वभाव, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, तपको ही अपना सर्वस्व माननेवाले, तीर्थमें निवास करनेवाले, सत्त्वगुणसम्पन्न, वनके फल-मूलका सदा आहार करनेवाले, धर्मपुत्र, महात्मा, तपस्वी तथा सत्यनिष्ठ थे; तब वे युद्धमें परस्पर राग-द्वेषसे ग्रस्त कैसे हो गये और उन्होंने उत्कृष्ट तपस्याका त्याग करके संग्राम क्यों किया?॥ १-३॥ |