भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 455
४४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १०
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रह्लादेन समं पूर्णं दिव्यवर्षशतं किल।<br>हित्वा शान्तिसुखं युद्धं कृतवन्तौ कथं मुनी॥ ४उन दोनों मुनियोंने शान्ति-सुखका त्याग करके प्रह्लादके साथ पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक युद्ध किसलिये किया?॥ ४॥
कथं तौ चक्रतुर्युद्धं प्रह्लादेन समं मुनी।<br>कथयस्व महाभाग कारणं विग्रहस्य वै॥ ५उन दोनों मुनियोंने प्रह्लादके साथ वह संग्राम क्यों किया? हे महाभाग! आप मुझे उस युद्धका कारण बताइये॥ ५॥
(कामिनी कनकं कार्यं कारणं विग्रहस्य वै)<br>युद्धबुद्धिः कथं जाता तयोश्च तद्विरक्तयोः।<br>तथाविधं तपस्तप्तं ताभ्याञ्च केन हेतुना॥ ६<br><br>मोहार्थं सुखभोगार्थं स्वर्गार्थं वा परन्तप।<br>कृतमत्युत्कटं ताभ्यां तपः सर्वफलप्रदम्॥ ७<br><br>मुनिभ्यां शान्तचित्ताभ्यां प्राप्तं किं फलमद्भुतम्।<br>तपसा पीडितो देहः संग्रामेण पुनः पुनः॥ ८<br><br>दिव्यवर्षशतं पूर्णं श्रमेण परिपीडितौ।<br>न राज्यार्थे धने वापि न दारेषु गृहेषु च॥ ९<br><br>किमर्थं तु कृतं युद्धं ताभ्यां तेन महात्मना।(स्त्री, धन तथा कोई कार्यविशेष ही प्रायः युद्धके कारण होते हैं।) उन विरक्त मुनियोंको युद्धका विचार क्यों उत्पन्न हुआ? हे परन्तप! उन्होंने उस प्रकारका तप किसीको प्रसन्न करनेके लिये, सुखभोगके लिये अथवा स्वर्गके लिये—किस उद्देश्यसे किया था? शान्त चित्तवाले उन मुनियोंने समस्त फल प्रदान करनेवाला कठोर तप तो किया था, किंतु उन्होंने कौन-सा अद्भुत फल प्राप्त किया? उन्होंने तपस्यासे शरीरको कष्ट दिया और पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक बार-बार संग्राम करके परिश्रमके द्वारा अपनेको संतप्त किया। उन मुनियोंने न राज्यके लिये, न धनके लिये, न स्त्रीके लिये और न तो गृहके लिये ही यह युद्ध किया तो फिर उन्होंने महात्मा प्रह्लादके साथ किसलिये युद्ध किया?॥ ६–९ १/२॥
निरीहः पुरुषः कस्मात्कुर्याद्युद्धमीदृशम्॥ १०<br><br>दुःखदं सर्वथा देहे जानन्धर्मं सनातनम्।<br>सुबुद्धिः सुखदानीह कर्माणि कुरुते सदा॥ ११<br><br>न दुःखदानि धर्मज्ञ स्थितिरेषा सनातनी।<br>धर्मपुत्रौ हरेरंशौ सर्वज्ञौ सर्वभूषितौ॥ १२<br><br>कृतवन्तौ कथं युद्धं दुःखं धर्मविनाशकम्।<br>त्यक्त्वा तपः समाधीतं सुखारामं महत्फलम्॥ १३<br><br>संयुगं दारुणं कृष्ण नैव मूर्खोऽपि वाञ्छति।युद्ध शरीरके लिये कष्टदायक होता है—इस सनातन बातको जानते हुए कोई तृणारहित पुरुष आखिर ऐसा युद्ध किसलिये करेगा? हे धर्मज्ञ! उत्तम बुद्धिवाला मनुष्य इस लोकमें सदा सुखदायी कर्म ही करता है, दुःखप्रद कर्म नहीं—यह सनातन सिद्धान्त है। तब धर्मपुत्र, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, सर्वज्ञ तथा सभी गुणोंसे विभूषित उन मुनियोंने वह दुःखदायक तथा धर्मविनाशक युद्ध क्यों किया? हे व्यासजी! कोई मूर्ख भी अच्छी प्रकार आचरित, सुख तथा आनन्द देनेवाले और महाफलदायी तपका त्याग करके दारुण युद्ध करना नहीं चाहता॥ १०–१३ १/२॥
श्रुतो मया ययातिस्तु च्युतः स्वर्गान्महीपतिः॥ १४<br><br>अहङ्कारभवात्पापात्पातितः पृथिवीतले।<br>यज्ञकृद्दानकर्ता च धार्मिकः पृथिवीपतिः॥ १५मैंने सुना है कि राजा ययाति स्वर्गसे च्युत हो गये थे। अहंकारजन्य पापके कारण वे पृथवीतलपर गिरा दिये गये थे। वे यज्ञकर्ता, दानी और धर्मनिष्ठ थे; किंतु केवल थोड़ेसे अहंकारभरे शब्दोंका उच्चारण करनेके कारण वज्रपाणि इन्द्रने उन्हें [स्वर्गसे पृथ्वीपर] गिरा दिया था। यह निश्चित है कि बिना अहंकारके