भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 889 में से

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पृष्ठ 456

| अ० १० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४४७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शब्दोच्चारणमात्रेण पातितो वज्रपाणिना।<br>अहङ्कारमृते युद्धं न भवत्येव निश्चयः॥ १६युद्ध हो ही नहीं सकता। अन्ततः मुनिको उस युद्धका क्या फल मिला, उससे तो केवल उनका पुण्य ही नष्ट हुआ॥ १४—१६ १/२ ॥
किं फलं तस्य युद्धस्य मुनेः पुण्यविनाशनम्।<br><br>व्यास उवाच<br>राजन् संसारमूलं हि त्रिविधः परिकीर्तितः॥ १७<br><br>अहङ्कारस्तु सर्वज्ञैर्मुनिभिर्धर्मनिश्चये।<br>स कथं मुनिना त्यक्तुं योग्यो देहभृता किल॥ १८<br><br>कारणेन विना कार्यं न भवत्येव निश्चयः।**व्यासजी बोले—**हे राजन्! धर्मका निर्णय करते समय सर्वज्ञ मुनियोंने अहंकारको ही संसारका मूल कारण कहा है और इसे [सत्त्वादि भेदसे] तीन प्रकारका बतलाया है। [ऐसी स्थितिमें] शरीरधारी होकर मुनि नारायण उस अहंकारका त्याग करनेमें कैसे समर्थ हो सकते थे? यह निश्चित है कि बिना कारणके कार्य नहीं होता॥ १७–१८ १/२ ॥
तपो दानं तथा यज्ञाः सात्त्विकात्प्रभवन्ति ते॥ १९<br><br>राजसाद्वा महाभाग तामसात्कलहस्तथा।<br>क्रिया स्वल्पापि राजेन्द्र नाहङ्कारं विना क्वचित्॥ २०<br><br>शुभा वाप्यशुभा वापि प्रभवत्यपि निश्चयः।<br>अहङ्काराद् बन्धकारी नान्योऽस्ति जगतीतले॥ २१<br><br>येनेदं रचितं विश्वं कथं तद्रहितं भवेत्।तप, दान तथा यज्ञ सात्त्विक अहंकारसे होते हैं। हे महाभाग! राजस और तामस अहंकारसे कलह उत्पन्न होता है। हे राजेन्द्र! यह निश्चय है कि छोटी-सी भी क्रिया चाहे वह शुभ हो अथवा अशुभ—बिना अहंकारके कभी नहीं हो सकती। जगत्में अहंकारसे बढ़कर बन्धनमें डालनेवाला दूसरा कोई पदार्थ नहीं है। अतः जिस अहंकारसे ही यह विश्व निर्मित है, उसके बिना यह संसार कैसे रह सकता है?॥ १९—२१ १/२ ॥
ब्रह्मा रुद्रस्तथा विष्णुरहङ्कारयुतास्त्वमी॥ २२<br><br>अन्येषां चैव का वार्ता मुनीनां वसुधाधिप।<br>अहङ्कारावृतं विश्वं भ्रमतीदं चराचरम्॥ २३<br><br>पुनर्जन्म पुनर्मृत्युः सर्वं कर्मवशानुगम्।<br>देवतिर्यङ्मनुष्याणां संसारेऽस्मिन्महीपते॥ २४<br><br>रथाङ्गवदसर्वार्थं भ्रमणं सर्वदा स्मृतम्।हे पृथिवीपते! जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अहंकारयुक्त रहते हैं, तब अन्य प्राणियों और मुनियोंकी बात ही क्या? यह चराचर जगत् अहंकारके वशीभूत होकर भ्रमण करता रहता है। सभी जीव कर्मके अधीन हैं और उसीके अनुसार बार-बार उनका जन्म तथा मरण होता रहता है। हे महीपते! देवता, मनुष्य और पशु-पक्षियोंका इस संसारमें बराबर चक्कर काटना रथके पहियेके भ्रमणके समान बताया गया है॥ २२—२४ १/२ ॥
विष्णोरप्यवताराणां संख्यां जानाति कः पुमान्॥ २५<br><br>विततेऽस्मिंस्तु संसारे उत्तमाधमयोनिषु।<br>नारायणो हरिः साक्षान्मात्स्यं वपुराश्रितः॥ २६<br><br>कामठं सौकरं चैव नारसिंहञ्च वामनम्।<br>युगे युगे जगन्नाथो वासुदेवो जनार्दनः॥ २७<br><br>अवतारानासंख्यातान्करोति विधियन्त्रितः।इस विस्तृत संसारमें उत्तम–अधम सभी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अवतारोंकी संख्या कौन मनुष्य जान सकता है? साक्षात् नारायण श्रीहरिको मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह और वामनतकका शरीर धारण करना पड़ा। वे जगत्प्रभु, वासुदेव, भगवान् जनार्दन भी विधिके अधीन होकर विभिन्न युगोंमें असंख्य अवतार धारण करते रहते हैं॥ २५—२७ १/२ ॥