भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५


संस्कृतहिन्दी
गृहीत्वा तत्करे चक्रं शिरश्चिच्छेद रंहसा।<br>हतां दृष्ट्वा तु तां शक्रो मुदितश्चाभवत्तदा॥ ५५<br><br>देवाश्चातीव सन्तुष्टा हरिं जय जयेति च।<br>तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे सञ्जाता विगतज्वराः॥ ५६उस चक्रको हाथमें लेकर भगवान् विष्णुने बड़े वेगसे उसका सिर काट दिया। तब उसे मृत देखकर इन्द्र हर्षित हो उठे। सभी देवता भी अत्यन्त सन्तुष्ट होकर विष्णुकी जयकार करने लगे। वे प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे और सन्तापरहित हो गये॥ ५५-५६॥
इन्द्रविष्णू तु सञ्जातौ तत्क्षणाद्धृदयव्यथौ।<br>स्त्रीवधाच्छंकमानौ तु भृगोः शापं दुरत्ययम्॥ ५७स्त्रीवधसे [होनेवाले पाप] तथा भृगुमुनिके भीषण शापकी शंका करते हुए वे भगवान् विष्णु तथा इन्द्र उसी समयसे दुःखितचित्त रहने लगे॥ ५७॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे<br>शुक्रमातृवधवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥

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अथ द्वादशोऽध्यायः

महात्मा भृगुद्वारा विष्णुको मानवयोनिमें जन्म लेनेका शाप देना, इन्द्रद्वारा अपनी पुत्री जयन्तीको शुक्राचार्यके लिये अर्पित करना, देवगुरु बृहस्पतिद्वारा शुक्राचार्यका रूप धारणकर दैत्योंका पुरोहित बनना

संस्कृतहिन्दी
व्यास उवाच<br>तं दृष्ट्वा तु वधं घोरं चुक्रोध भगवान्भृगुः।<br>वेपमानोऽतिदुःखार्तः प्रोवाच मधुसूदनम्॥ १व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उस भयानक वधको देखकर भगवान् भृगु अत्यन्त कुपित हुए और दुःखसे व्याकुल होकर काँपते हुए वे मधुसूदन विष्णुसे कहने लगे॥ १॥
भृगुरुवाच<br>अकृत्यं ते कृतं विष्णो जानन्पापं महामते।<br>वधोऽयं विप्रजाताया मनसा कर्तुमक्षमः॥ २**भृगु बोले—**हे महाबुद्धिमान् विष्णो! जो नहीं करना चाहिये वह पाप आपने जान-बूझकर कर डाला। विप्र-स्त्रीके इस वधकी तो मनसे कल्पना करना भी अनुचित है॥ २॥
आख्यातस्त्वं सत्त्वगुणः स्मृतो ब्रह्मा च राजसः।<br>तथासौ तामसः शम्भुर्विपरीतं कथं स्मृतम्॥ ३<br><br>तामसस्त्वं कथं जातः कृतं कर्मातिनिन्दितम्।<br>अवध्या स्त्री त्वया विष्णो हता कस्मान्निरागसा॥ ४आप तो सत्त्वगुणसे सम्पन्न कहे गये हैं, ब्रह्मा रजोगुणी और शिव तमोगुणी बताये गये हैं; तब आपने अपने गुणके विपरीत कार्य क्यों किया? आप तामसी कैसे हो गये, जिससे आपने यह घोर निन्दनीय कर्म कर डाला? हे विष्णो! आपने उस अवध्य तथा निरपराध स्त्रीको क्यों मार डाला?॥ ३-४॥
शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत्प्रकरोमि ते।<br>विधुरोऽहं कृतः पाप त्वयाहं शुक्रकारणात्॥ ५[उन्होंने क्रोधपूर्वक कहा कि] अब मैं तुझ दुराचारीको शाप दे रहा हूँ, इसके अतिरिक्त तुम्हारा क्या प्रतीकार करूँ? अरे पापी! तुमने इन्द्रके हितके लिये मुझे विधुर बना दिया। हे मधुसूदन! मैं इन्द्रको शाप नहीं दूँगा, बल्कि तुम्हें ही शाप दूँगा।
न शपेऽहं तथा शक्रं शपे त्वां मधुसूदन।<br>सदा छलपरोऽसि त्वं कीटयोनिर्दुराशयः॥ ६कृष्ण सर्पसदृश दुरभिप्रायवाले तुम सदा छल करनेमें ही तत्पर रहते हो॥ ५-६॥