भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 465
४५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ये च त्वां सात्त्विकं प्राहुस्ते मूर्खा मुनयः किल।<br>तामसस्त्वं दुराचारः प्रत्यक्षं मे जनार्दन॥ ७<br><br>अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसम्भवाः।<br>प्रायो गर्भभवं दुःखं भुंक्ष्व पापाज्जनार्दन॥ ८हे जनार्दन! जो मुनि तुम्हें सात्त्विक कहते हैं, वे निश्चय ही मूर्ख हैं। मैंने तो प्रत्यक्ष जान लिया कि तुम तमोगुणी तथा दुराचारी हो। अतः हे जनार्दन! मेरे शापसे मृत्युलोकमें तुम्हारे अनेक अवतार हों और [इस स्त्री-वधजन्य] पापके कारण बार-बार गर्भवाससे होनेवाले दुःखको भोगो॥ ७-८॥
व्यास उवाच<br>ततस्तेनाथ शापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः।<br>लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह॥ ९व्यासजी बोले—उसी शापके कारण भगवान् विष्णु धर्मका ह्रास होनेपर संसारके कल्याणके लिये बार-बार मानवरूपोंमें प्रकट होते हैं॥ ९॥
राजोवाच<br>भृगुभार्या हता तत्र चक्रेणामिततेजसा।<br>गार्हस्थ्यञ्च पुनस्तस्य कथं जातं महात्मनः॥ १०राजा बोले—[हे व्यासजी!] जब अमित तेजस्वी चक्रके द्वारा भृगुपत्नीका वध हो गया, उसके बाद महात्मा भृगुका गार्हस्थ्य-जीवन कैसे व्यतीत हुआ?॥ १०॥
व्यास उवाच<br>इति शप्त्वा हरिं रोषात्तदादाय शिरस्त्वरन्।<br>काये संयोज्य तरसा भृगुः प्रोवाच कार्यवित्॥ ११<br><br>अद्य त्वां विष्णुना देवि हतां सञ्जीवयाम्यहम्।<br>यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा॥ १२<br><br>तेन सत्येन जीवेत यदि सत्यं ब्रवीम्यहम्।<br>पश्यन्तु देवताः सर्वा मम तेजोबलं महत्॥ १३<br><br>अद्भिस्त्वां प्रोक्ष्य शीताभिर्जीवयामि तपोबलात्।<br>सत्यं शौचं तथा वेदा यदि मे तपसो बलम्॥ १४व्यासजी बोले—इस प्रकार रोषपूर्वक भगवान् विष्णुको शाप देकर कार्यकुशल महर्षि भृगु तत्काल उस [कटे] सिरको लेकर शीघ्रतापूर्वक [अपनी पत्नीके] धड़में जोड़ करके बोले—हे देवि! विष्णुके द्वारा तुम मारी जा चुकी हो, किंतु अब मैं तुम्हें फिरसे जीवित कर रहा हूँ। यदि मैं सम्पूर्ण धर्म जानता हूँ तथा उसका सम्यक् आचरण करता हूँ और सदा सत्य भाषण करता हूँ तो उसी सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ। सभी देवता मेरे महान् तेज-बलको देख लें। यदि मुझमें सत्य, पवित्रता, वेदाध्ययन तथा तपस्याका बल होगा तो मैं उन्हींके प्रभावसे शीतल जलसे तुम्हारा प्रोक्षण करके तुम्हें जीवित कर दूँगा॥ ११-१४॥
व्यास उवाच<br>अद्भिः सम्प्रोक्षिता देवी सद्यः सञ्जीविता तदा।<br>उत्थिता परमप्रीता भृगोर्भार्या शुचिस्मिता॥ १५व्यासजी बोले—तब जलसे प्रोक्षित करते ही मधुर मुसकानवाली वे भृगुपत्नी शीघ्र ही जीवित हो गयीं और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उठकर खड़ी हो गयीं॥ १५॥
ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव।<br>साधु साध्विति तं तां तु तुष्टुवुः सर्वतो दिशम्॥ १६तब सोकर उठी हुईके समान उसे देखकर सब ओरसे लोग 'साधु-साधु'—ऐसा कहकर भृगुमुनि तथा उनकी भार्या दोनोंकी स्तुति करने लगे॥ १६॥
एवं सञ्जीविता तेन भृगुणा वरवर्णिनी।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवाः सेन्द्रा विलोक्य तत्॥ १७इस प्रकार उन महर्षि भृगुने उस सुन्दरीको जीवित कर दिया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवता अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे॥ १७॥