भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 889 में से

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पृष्ठ 466
अ० १२ ]चतुर्थ स्कन्ध४५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इन्द्रः सुरानथोवाच मुनिना जीविता सती।<br>काव्यस्तप्त्वा तपो घोरं किं करिष्यति मन्त्रवित्॥ १८तत्पश्चात् इन्द्रने देवताओंसे कहा—भृगुमुनिने अपनी साध्वी भार्याको जीवित कर दिया। साथ ही मन्त्रज्ञानी शुक्राचार्य कठोर तपस्या करके [शिवसे मन्त्र प्राप्तकर] पता नहीं क्या कर डालेंगे!॥ १८॥
व्यास उवाच<br>गता निद्रा सुरेन्द्रस्य देहेऽक्षेममभून्नृप।<br>स्मृत्वा काव्यस्य वृत्तान्तं मन्त्रार्थमतिदारुणम्॥ १९**व्यासजी बोले—**हे राजन्! मन्त्रप्राप्तिके लिये शुक्राचार्यके अत्यन्त कठोर तपका स्मरण करके इन्द्रकी नींद समाप्त हो गयी और उनके शरीरमें व्याकुलता होने लगी॥ १९॥
विमृश्य मनसा शक्रो जयन्तीं स्वसुतां तदा।<br>उवाच कन्यां चार्वङ्गीं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ २०<br><br>गच्छ पुत्रि मया दत्ता काव्याय त्वं तपस्विने।<br>समाराधय तन्वङ्गि मत्कृते तं वशं कुरु॥ २१<br><br>उपचारैर्मुनिं तैस्तैः समाराध्य मनःप्रियैः।<br>भयं मे तरसा गत्वा हर तत्र वराश्रमे॥ २२तब मनमें भली-भाँति विचार करके इन्द्रने सुन्दर स्वरूपवाली अपनी पुत्री जयन्तीसे मुसकराते हुए कहा—हे पुत्रि! मैंने तुम्हें तपस्वी शुक्राचार्यको सौंप दिया। अतः हे तन्वंगि! अब तुम जाओ और मेरे कल्याणके लिये उनकी सेवा करो और उन्हें वशमें कर लो। उस उत्तम आश्रममें शीघ्र जाकर उनके मनको प्रिय लगनेवाले विविध उपचारोंसे उन्हें प्रसन्न करके मेरा भय दूर करो॥ २०—२२॥
सा पितुर्वचनं श्रुत्वा तत्रागच्छन्मनोरमा।<br>तमपश्यद्विशालाक्षी पिबन्तं धूममाश्रमे॥ २३विशाल नयनोंवाली वह सुन्दर कन्या पिताकी बात सुनकर [शुक्राचार्यके] आश्रममें गयी और वहाँपर उसने मुनिको [नीचेकी ओर सिर करके] धुएँका सेवन करते हुए देखा॥ २३॥
तस्य देहं समालोक्य स्मृत्वा वाक्यं पितुस्तदा।<br>कदलीदलमादाय वीजयामास तं मुनिम्॥ २४तब उनके [तपोरत] शरीरको देखकर और पिताकी बात याद करके वह केलेका एक पत्ता लेकर मुनिको पंखा झलने लगी॥ २४॥
निर्मलं शीतलं वारि समानीय सुवासितम्।<br>पानाय कल्पयामास भक्त्या परमया लघु॥ २५<br><br>छायां वस्त्रातपत्रेण भास्करे मध्यगे सति।<br>रचयामास तन्वङ्गी स्वयं धर्मे स्थिता सती॥ २६तबसे वह उनके पीनेके लिये अत्यन्त स्वच्छ, शीतल, सुगन्धित तथा रुचिकर जल ले आकर [उनके समक्ष] श्रद्धापूर्वक उपस्थित किया करती। सूर्यके मध्य आकाशमें होते ही वह सुन्दरी उनके ऊपर वस्त्रसे छतरी बनाकर छाया कर देती थी। वह साध्वी सदा पातिव्रत्य धर्मका पालन करती थी॥ २५—२६॥
फलान्यानीय दिव्यानि पक्वानि मधुराणि च।<br>मुमोचाग्रे मुनेस्तस्य भक्षार्थं विहितानि च॥ २७<br><br>कुशाः प्रादेशमात्रा हि हरिताः शुकसन्निभाः।<br>दधाराग्रेऽथ पुष्पाणि नित्यकर्मसमृद्धये॥ २८<br><br>निद्रार्थं कल्पयामास संस्तरं पल्लवान्वितम्।<br>तस्मिन्मुनौ चादरस्था चकार व्यजनं शनैः॥ २९वह शास्त्रविहित दिव्य, पके तथा मीठे फल लाकर खानेके लिये उन मुनिके समक्ष रख देती थी। वह कन्या उनके नित्यकर्मके सम्पादनार्थ पुष्प और तोतेके वर्णके समान प्रादेशमात्र मापवाले हरे-हरे कुश उनके आगे प्रस्तुत कर देती थी। उनके शयनके लिये वह कोमल-कोमल पत्तोंका बिछौना तैयार करती थी और फिर उन मुनिके प्रति आदरभाव रखकर धीरे-धीरे पंखा झलने लगती थी॥ २७—२९॥