देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 467, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 467
| ४५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १२ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हावभावादिकं किञ्चिद्विकारजननं च तत्।<br>न चकार जयन्ती सा शापभीता मुनेस्तदा॥ ३० | मुनिके शापसे भयभीत होकर वह जयन्ती उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेवाला कोई हाव-भाव प्रदर्शित नहीं करती थी॥ ३०॥ |
| स्तुतिं चकार तन्वङ्गी गीर्भिस्तस्य महात्मनः।<br>सुभाषिण्यनुकूलाभिः प्रीतिकर्त्रीभिरप्युत॥ ३१<br>प्रबुद्धे जलमादाय दधाराचमनाय च।<br>मनोऽनुकूलं सततं कुर्वन्ती व्यचरत्तदा॥ ३२ | सुकुमार अंगोंवाली तथा मृदुभाषण करनेवाली वह कन्या उन महात्माके मनके अनुकूल तथा प्रीति उत्पन्न करनेवाले शब्दोंसे उनकी स्तुति करती थी। तत्पश्चात् उनके जाग जानेपर आचमनके लिये जल लाकर रख देती थी। इस प्रकार सदा उनके मनके अनुकूल कार्य करती हुई उनके साथ व्यवहार करती थी॥ ३१-३२॥ |
| इन्द्रोऽपि सेवकांस्तत्र प्रेषयामास चतुरः।<br>प्रवृत्तिं ज्ञातुकामो वै मुनेस्तस्य जितात्मनः॥ ३३ | चिन्तासे व्याकुल इन्द्र भी उन जितेन्द्रिय मुनिकी प्रवृत्ति जाननेकी इच्छासे अपने सेवक भेजते रहते थे॥ ३३॥ |
| एवं बहूनि वर्षाणि परिचर्यापरावभूत्।<br>निर्विकारा जितक्रोधा ब्रह्मचर्यपरा सती॥ ३४ | इस प्रकार वह साध्वी कन्या क्रोधपर विजय प्राप्त करके, निर्विकार होकर तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहती हुई बहुत वर्षोंतक मुनिकी सेवामें संलग्न रही॥ ३४॥ |
| पूर्णे वर्षसहस्रे तु परितुष्टो महेश्वरः।<br>वरेण छन्दयामास काव्यं प्रीतमना हरः॥ ३५ | तदनन्तर हजार वर्ष पूर्ण होनेपर महेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक वे शुक्राचार्यसे वर माँगनेके लिये कहने लगे॥ ३५॥ |
| ईश्वर उवाच<br>यच्च किञ्चिदपि ब्रह्मान्विद्यते भृगुनन्दन।<br>प्रतिपश्यसि यत्सर्वं यच्च वाच्यं न कस्यचित्॥ ३६<br>सर्वाभिभावकत्वेन भविष्यसि न संशयः।<br>अवध्यः सर्वभूतानां प्रजेशश्च द्विजोत्तमः॥ ३७ | ईश्वर बोले— हे ब्रह्मन्! हे भृगुनन्दन! जगत्में जो कुछ भी विद्यमान है, आप जो सब देख रहे हैं तथा जो किसीकी भी वाणीका विषय नहीं है—उन सबके स्वामित्वसे आप युक्त हो जायेंगे; इसमें कोई सन्देह नहीं है। आप सभी प्राणियोंसे अवध्य होंगे। आप प्रजाओंके स्वामी तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे॥ ३६-३७॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं दत्त्वा वराञ्छम्भुस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>काव्यस्तामथ संवीक्ष्य जयन्तीं वाक्यमब्रवीत्॥ ३८<br>कासि कस्यासि सुश्रोणि ब्रूहि किं ते चिकीर्षितम्।<br>किमर्थमिह सम्प्राप्ता कार्यं वद वरोरु मे॥ ३९<br>किं वाञ्छसि करोम्यद्य दुष्करं चेत्सुलोचने।<br>प्रीतोऽस्मि त्वत्कृतेनाद्य वरं वरय सुव्रते॥ ४० | व्यासजी बोले— इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् जयन्तीको देखकर शुक्राचार्यने उससे कहा—हे सुश्रोणि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो; मुझे अपनी अभिलाषा बताओ। हे सुन्दरि! तुम यहाँ किसलिये आयी हो, अपना कार्य बताओ। हे सुनयने! तुम क्या चाहती हो; यदि वह कार्य दुष्कर भी हो तो भी मैं उसे अभी कर दूँगा। हे सुव्रते! आज मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ, अतः वर माँग लो॥ ३८-४०॥ |