भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 889 में से

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पृष्ठ 468

| अ० १२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४५९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः सा तु मुनिं प्राह जयन्ती मुदितानना।<br>चिकीर्षितं मे भगवंस्तपसा ज्ञातुमर्हसि॥ ४१तदनन्तर प्रसन्न मुखमण्डलवाली जयन्तीने मुनिसे कहा—हे भगवन्! आप तो अपनी तपस्यासे मेरा अभिलषित जान लेनेमें समर्थ हैं॥ ४१॥
शुक्र उवाच<br>ज्ञातं मया तथापि त्वं ब्रूहि यन्मनसेप्सितम्।<br>करोमि सर्वथा भद्रं प्रीतोऽस्मि परिचर्यया॥ ४२**शुक्राचार्य बोले—**वह तो मैंने जान लिया, फिर भी जो तुम्हारा मनोभिलषित है, उसे तुम मुझे बताओ। मैं हर तरहसे तुम्हारा कल्याण करूँगा; क्योंकि मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ॥ ४२॥
जयन्त्युवाच<br>शक्रस्याहं सुता ब्रह्मन् पित्रा तुभ्यं समर्पिता।<br>जयन्ती नामतश्चाहं जयन्तावरजा मुने॥ ४३**जयन्ती बोली—**हे ब्रह्मन्! मैं इन्द्रकी पुत्री हूँ और पिताजीने मुझे आपको सौंप दिया है। हे मुने! मेरा नाम जयन्ती है और मैं जयन्तकी छोटी बहन हूँ॥ ४३॥
सकामास्मि त्वयि विभो वाञ्छितं कुरु मेऽधुना।<br>रंस्ये त्वया महाभाग धर्मतः प्रीतिपूर्वकम्॥ ४४हे विभो! मैं आपपर आसक्त हूँ, अतः मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिये। हे महाभाग! मैं पातिव्रत-धर्मके अनुसार प्रेमपूर्वक आपके साथ विहार करूँगी॥ ४४॥
शुक्र उवाच<br>मया सह त्वं सुश्रोणि दशवर्षाणि भामिनि।<br>सर्वैर्भूतैरदृश्या च रमस्वेह यदृच्छया॥ ४५**शुक्राचार्य बोले—**हे सुश्रोणि! हे भामिनि! तुम सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहती हुई दस वर्षोंतक इच्छानुसार मेरे साथ यहाँ विहार करो॥ ४५॥
व्यास उवाच<br>एवमुक्त्वा गृहं गत्वा जयन्त्याः पाणिमुद्वहन्।<br>तया सहावसद्देव्या दशवर्षाणि भार्गवः॥ ४६**व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर शुक्राचार्यने घर जाकर जयन्तीके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् मायासे आच्छादित होकर सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए वे ऐश्वर्यसम्पन्न मुनि शुक्राचार्य देवी जयन्तीके साथ दस वर्षोंतक वहाँ रहे॥ ४६ ½॥
अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः।<br>दैत्यास्तमागतं श्रुत्वा कृतार्थं मन्त्रसंयुक्तम्॥ ४७<br><br>अभिजग्मुर्गृहे तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः।<br>नापश्यन् रममाणं ते जयन्त्या सह संयुक्तम्॥ ४८गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल हो मन्त्रसे युक्त होकर आया हुआ सुनकर सभी दैत्य उनके दर्शनकी इच्छासे प्रसन्नतापूर्वक उनके घर गये, किंतु वे उन्हें देख न सके; क्योंकि उस समय वे जयन्तीके साथ विहार कर रहे थे॥ ४७-४८॥
तदा विमनसः सर्वे जाता भग्नोद्यमाश्च ते।<br>चिन्तापरातिदीनाश्च वीक्षमाणाः पुनः पुनः॥ ४९<br><br>अदृष्ट्वा तं तु संवृतं प्रतिजग्मुर्यथागतम्।<br>स्वगृहान्दैत्यवर्यास्ते चिन्ताविष्टा भयातुराः॥ ५०इससे उन सभी दैत्योंका मन उदास हो गया और उनके सभी उद्योग व्यर्थ हो गये। वे बहुत चिन्तित और दुःखी होकर उन्हें बार-बार खोजते रहे। अन्तमें [मायासे] आच्छादित उन मुनिको न देखकर वे चिन्तित तथा भयभीत दैत्य जैसे आये थे वैसे ही अपने घर लौट गये॥ ४९-५०॥
रममाणं तथा ज्ञात्वा शक्रः प्रोवाच तं गुरुम्।<br>बृहस्पतिं महाभागं किं कर्तव्यमितः परम्॥ ५१तत्पश्चात् शुक्राचार्यको विहार करता हुआ जानकर इन्द्रने अपने गुरु महाभाग बृहस्पतिसे कहा—अब क्या किया जाय?॥ ५१॥