देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 474, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 474
अ० १३ ] चतुर्थ स्कन्ध ४६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथेति तमुवाचाथ जयन्ती धर्मवित्तमा।<br>यथेष्टं गच्छ धर्मज्ञ न ते धर्मं विलोपये॥ ५२ | परम धर्मपरायणा जयन्तीने उनसे कहा—हे धर्मज्ञ! बहुत ठीक है, आप स्वेच्छापूर्वक जाइये। मैं आपका धर्म लुप्त नहीं होने दूँगी॥ ५२॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यो जगाम त्वरितस्ततः।<br>अपश्यद्दानवानां च पार्श्वे वाचस्पतिं तदा॥ ५३<br><br>छद्मरूपधरं सौम्यं बोधयन्तं छलेन तान्।<br>जैनं धर्मं कृतं स्वेन यज्ञनिन्दापरं तथा॥ ५४<br><br>भो देवरिपवः सत्यं ब्रवीमि भवतां हितम्।<br>अहिंसा परमो धर्मोऽहन्तव्या ह्याततायिनः॥ ५५<br><br>द्विजैर्भोगरतैर्वेदे दर्शितं हिंसनं पशोः।<br>जिह्वास्वादपरैः काममहिंसैव परा मता॥ ५६ | उसका यह वचन सुनकर शुक्राचार्य वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि दैत्योंके पास विराजमान होकर बृहस्पति छद्मरूप धारण करके शान्तचित्त हो छलसे उन्हें अपने द्वारा रचित जिन-धर्म तथा यज्ञनिन्दापरक वचनोंकी शिक्षा इस प्रकार दे रहे हैं—‘हे देवताओंके शत्रुगण! मैं सत्य तथा आपलोगोंके हितकी बात बता रहा हूँ कि अहिंसा सर्वोपरि धर्म है। आततायियोंको भी नहीं मारना चाहिये। भोगपरायण तथा अपनी जिह्वाके स्वादके लिये सदा तत्पर रहनेवाले द्विजोंने वेदमें पशुहिंसाका उल्लेख कर दिया है, किंतु सच्चाई यह है कि अहिंसाको ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है’॥ ५३-५६॥ |
| एवंविधानि वाक्यानि वेदशास्त्रपराणि च।<br>ब्रुवाणं गुरुमाकर्ण्य विस्मितोऽसौ भृगोः सुतः॥ ५७<br><br>चिन्तयामास मनसा मम द्वेष्यो गुरुः किल।<br>वञ्चिताः किल धूर्तेन याज्या मे नात्र संशयः॥ ५८ | इस प्रकारकी वेद-शास्त्रविरोधी बातें कहते हुए देवगुरु बृहस्पतिको देखकर वे भृगुपुत्र शुक्राचार्य आश्चर्यचकित हो गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि यह देवगुरु तो मेरा शत्रु है। इस धूर्तने मेरे यजमानोंको अवश्य ठग लिया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ५७-५८॥ |
| धिग्लोभं पापबीजं वै नरकद्वारमूर्जितम्।<br>गुरुरप्यनृतं ब्रूते प्रेरितो येन पाप्मना॥ ५९ | नरकके द्वारस्वरूप तथा पापके बीजरूप उस उग्र लोभको धिक्कार है, जिस लोभरूप पापसे प्रेरित होकर देवगुरु बृहस्पति भी झूठ बोल रहे हैं॥ ५९॥ |
| प्रमाणं वचनं यस्य सोऽपि पाखण्डधारकः।<br>गुरुः सुराणां सर्वेषां धर्मशास्त्रप्रवर्तकः॥ ६० | जिनका वचन प्रमाण माना जाता है और जो समस्त देवताओंके गुरु तथा धर्मशास्त्रोंके प्रवर्तक हैं, वे भी पाखण्डके पोषक हो गये हैं॥ ६०॥ |
| किं किं न लभते लोभान्मलिनीकृतमानसः।<br>अन्योऽपि गुरुरप्येवं जातः पाखण्डपण्डितः॥ ६१<br><br>शैलूषचेष्टितं सर्वं परिगृह्य द्विजोत्तमः।<br>वञ्चयत्यतिसम्मूढान्दैत्यान्याज्यान्ममाप्यसौ॥ ६२ | लोभसे विकृत मनवाला प्राणी क्या-क्या नहीं कर डालता। दूसरोंकी क्या बात, जबकि साक्षात् देवगुरु ही इस प्रकारके पाखण्डके पण्डित हो गये हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी ये धूर्तोंकी सारी भाव-भंगिमाएँ बनाकर मेरे इन घोर अज्ञानी दैत्य यजमानोंको ठग रहे हैं॥ ६१-६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे शुक्लरूपेण गुरुणा दैत्यवञ्चनावर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥