भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 475
४६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

शुक्राचार्यद्वारा दैत्योंको बृहस्पतिका पाखण्डपूर्ण कृत्य बताना, बृहस्पतिकी मायासे मोहित दैत्योंका उन्हें फटकारना, क्रुद्ध शुक्राचार्यका दैत्योंको शाप देना, बृहस्पतिका अन्तर्धान हो जाना, प्रह्लादका शुक्राचार्यजीसे क्षमा माँगना और शुक्राचार्यका उन्हें प्रारब्धकी बलवत्ता समझाना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इति सञ्चिन्त्य मनसा तानुवाच हसन्निव।<br>वञ्चिता मत्स्वरूपेण दैत्याः किं गुरुणा किल॥ १<br><br>अहं काव्यो गुरुश्चायं देवकार्यप्रसाधकः।<br>अनेन वञ्चिता यूयं मद्याज्या नात्र संशयः॥ २<br><br>मा श्रद्दध्वं वचोऽस्यार्या दाम्भिकोऽयं मदाकृतिः।<br>अनुगच्छत मां याज्यास्त्यजतैनं बृहस्पतिम्॥ ३मनमें ऐसा सोचकर उन दैत्योंसे शुक्राचार्यने हँसते हुए कहा—हे दैत्यगण! मेरा स्वरूप बनाये हुए इस देवगुरु बृहस्पतिने तुमलोगोंको ठग लिया क्या? शुक्राचार्य मैं हूँ और ये तो देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाले देवगुरु बृहस्पति हैं। हे मेरे यजमानो! इन्होंने तुम सबको अवश्य ठग लिया; इसमें सन्देह नहीं है। हे आर्यो! इनकी बातोंपर विश्वास मत करो। ये पाखण्डी हैं तथा मेरा स्वरूप बनाये हुए हैं। हे यजमानो! तुमलोग मेरा अनुसरण करो और इन बृहस्पतिका त्याग कर दो॥ १—३॥
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य दृष्ट्वा तौ सदृशौ पुनः।<br>विस्मयं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चिताः॥ ४उनका यह वचन सुनकर और फिर उन दोनोंको समान रूपवाला देखकर सभी दैत्य महान् आश्चर्यमें पड़ गये। पुनः उन्होंने विचार किया कि हो सकता है ये ही शुक्राचार्य हों॥ ४॥
स तान्वीक्ष्य सुसम्भ्रान्तान्गुरुर्वाक्यमुवाच ह।<br>गुरुर्वो वञ्चयत्येव मद्रूपोऽयं बृहस्पतिः॥ ५<br><br>प्राप्तो वञ्चयितुं युष्मान्देवकार्यार्थसिद्धये।<br>मा विश्वासं वचस्तस्य कुरुध्वं दैत्यसत्तमाः॥ ६<br><br>प्राप्ता विद्या मया शम्भोर्युष्मानध्यापयामि ताम्।<br>देवेभ्यो विजयं नूनं करिष्यामि न संशयः॥ ७इस प्रकार उन दैत्योंको अत्यन्त विस्मित देखकर [शुक्राचार्यरूपधारी] गुरु बृहस्पतिने यह बात कही—मेरा स्वरूप बनाये हुए ये देवगुरु बृहस्पति तुम सबको धोखा दे रहे हैं। ये देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके निमित्त तुमलोगोंको ठगनेके लिये आये हुए हैं। हे श्रेष्ठ दैत्यगण! तुमलोग इनकी बातपर विश्वास मत करो। मैंने शंकरजीसे विद्या प्राप्त कर ली है और उसे तुम सबको पढ़ा रहा हूँ। इस प्रकार मैं तुम्हें देवताओंपर विजय दिला दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५—७॥
इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं काव्यरूपधरस्य ते।<br>विश्वासं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चयात्॥ ८<br><br>काव्येन बहुधा तत्र बोधिताः किल दानवाः।<br>बुबुधुर्न गुरोर्मायामोहिताः कालपर्ययात्॥ ९शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिका यह वाक्य सुनकर उन दैत्योंको पूर्ण विश्वास हो गया कि ये ही निश्चितरूपसे [हमारे गुरु] शुक्राचार्य हैं। उस समय शुक्राचार्यने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया फिर भी समयके फेरसे गुरु बृहस्पतिकी मायासे मोहित होनेके कारण वे दैत्य समझ नहीं सके॥ ८-९॥