भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 889 में से

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पृष्ठ 476
अ० १४ ]चतुर्थ स्कन्ध४६७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं ते निश्चयं कृत्वा ततो भार्गवमब्रुवन् ।<br>अयं गुरुर्नो धर्मात्मा बुद्धिदश्च हिते रतः ॥ १०<br><br>दशवर्षाणि सततमयं नः शास्ति भार्गवः ।<br>गच्छ त्वं कुहको भासि नास्माकं गुरुरप्युत ॥ ११ऐसा निश्चय करनेके उपरान्त उन्होंने शुक्राचार्यसे कहा—ये ही हमारे गुरु हैं। ये धर्मात्मा हमें बुद्धि प्रदान करनेवाले हैं और हमारा हित करनेमें तत्पर हैं। इन शुक्राचार्यजीने हमें निरन्तर दस वर्षतक शिक्षा दी है। तुम चले जाओ, तुम धूर्त जान पड़ते हो; तुम हमारे गुरु बिलकुल नहीं हो सकते ॥ १०-११ ॥
इत्युक्त्वा भार्गवं मूढा निर्भर्त्स्य च पुनः पुनः ।<br>जगृहुस्तं गुरुं प्रीत्या प्रणिपत्याभिवाद्य च ॥ १२ऐसा कहकर उन मूर्ख दैत्योंने शुक्राचार्यको बार-बार फटकारा और बृहस्पतिको प्रेमपूर्वक प्रणाम तथा अभिवादन करके उन्हें ही अपना गुरु स्वीकार कर लिया ॥ १२ ॥
काव्यस्तु तन्मयान्दृष्ट्वा चुकोपाथ शशाप च ।<br>दैत्यान्विबोधितान्मत्वा गुरुणा चातिवञ्चितान् ॥ १३<br><br>यस्मान्मया बोधिता वै गृह्णीयुर्न च मे वचः ।<br>तस्मात्प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ ॥ १४<br><br>मदवज्ञाफलं कामं स्वल्पे काले ह्यवाप्स्यथ ।<br>तदास्य कपटं सर्वं परिज्ञातं भविष्यति ॥ १५देवगुरु बृहस्पतिने इन दैत्योंको पूर्णरूपसे सिखा-पढ़ा दिया है तथा इन्हें खूब ठगा है—ऐसा मानकर और इन्हें गुरु बृहस्पतिमें तन्मय देखकर शुक्राचार्य बहुत कुपित हुए और उन्होंने शाप दे दिया कि मेरे बार-बार समझानेपर भी तुमलोगोंने मेरी बात नहीं मानी, इसलिये नष्ट बुद्धिवाले तुम सब पराभवको प्राप्त होओगे। तुमलोग थोड़े ही समयमें मेरे तिरस्कारका फल पाओगे। तब इनका सारा कपट तुम सबको मालूम पड़ जायगा ॥ १३–१५ ॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वासौ जगामाशु भार्गवः क्रोधसंयुतः ।<br>बृहस्पतिर्मुदं प्राप्य तस्थौ तत्र समाहितः ॥ १६व्यासजी बोले— ऐसा कहकर क्रोधमें भरे शुक्राचार्य तत्काल चल दिये और [शुक्राचार्यरूपधारी] बृहस्पति प्रसन्न होकर निश्चिन्तभावसे वहाँ रहने लगे ॥ १६ ॥
ततः शप्तानगुरुर्ज्ञात्वा दैत्यांस्तान्भार्गवेण हि ।<br>जगाम तरसा त्यक्त्वा स्वरूपं स्वं विधाय च ॥ १७<br><br>गत्वोवाच तदा शक्रं कृतं कार्यं मया ध्रुवम् ।<br>शप्ताः शुक्रेण ते दैत्या मया त्यक्ताः पुनः किल ॥ १८<br><br>निराधाराः कृता नूनं यतध्वं सुरसत्तमाः ।<br>संग्रामार्थं महाभाग शापदग्धा मया कृताः ॥ १९तदनन्तर शुक्राचार्यके द्वारा उन दैत्योंको शापित हुआ जानकर गुरु बृहस्पति तत्काल उन्हें छोड़कर अपना रूप धारणकर वहाँसे चल पड़े। उन्होंने जाकर इन्द्रसे कहा—मैंने [आपका] सम्पूर्ण कार्य भलीभाँति बना दिया है। शुक्राचार्यने उन दैत्योंको शाप दे दिया और बादमें मैंने भी उनका त्याग कर दिया। अब मैंने उन्हें पूर्णरूपसे असहाय बना दिया है। अतः हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग युद्धके लिये अब उद्योग करें। हे महाभाग! मैंने उन दैत्योंको शापसे दग्ध कर दिया है ॥ १७–१९ ॥
इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं मघवा मुदमाप्तवान् ।<br>जहृषुश्च सुराः सर्वे प्रतिपूज्य बृहस्पतिम् ॥ २०गुरु बृहस्पतिका यह वचन सुनकर इन्द्र बहुत आनन्दित हुए और सभी देवता भी हर्षित हो उठे। तत्पश्चात् गुरु बृहस्पतिकी पूजा करके वे युद्धके लिये