देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 480, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५] चतुर्थ स्कन्ध ४७१
| तथाहं खररूपेण संस्थितः कालयोगतः।<br>यथा त्वं कमले लीनः संस्थितो ब्रह्महत्यया ॥ ५४<br><br>पीडितश्च तथा ह्यद्य स्थितोऽहं खररूपधृक्।<br>दैवाधीनस्य किं दुःखं किं सुखं पाकशासन ॥ ५५<br><br>कालः करोति वै नूनं यदिच्छति यथा तथा।<br><br>भार्गव उवाच<br>इति तौ बलिदेवेशौ कृत्वा संविदमुत्तमाम् ॥ ५६<br><br>प्रबोधं प्राप्तुः कामं यथास्थानञ्च जग्मतुः।<br>इत्येतत्ते समाख्याता मया दैवबलिष्ठता ॥ ५७<br><br>दैवाधीनं जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ५८ | रूप धारण किया था, उसी प्रकार मैं भी समयके फेरसे गर्दभरूपसे स्थित हूँ। जिस प्रकार तुम ब्रह्महत्यासे दुःखी होकर कमलमें छिपकर पड़े रहे, उसी तरह मैं भी आज गर्दभका रूप धारण करके स्थित हूँ। हे पाकशासन! दैवके अधीन रहनेवालोंको क्या दुःख और क्या सुख? दैव जिस रूपमें जो चाहता है, वैसा निश्चितरूपसे करता है॥ ५२—५५ १/२॥<br><br>शुक्राचार्य बोले— इस प्रकार बलि और देवराज इन्द्रने परस्पर उत्तम बातें करके परम सन्तुष्टि प्राप्त की और इसके बाद वे अपने-अपने स्थानको चले गये। यह मैंने तुमसे प्रारब्धकी बलवत्ताका भलीभाँति वर्णन कर दिया। देवताओं, असुरों और मानवोंसे युक्त सम्पूर्ण जगत् दैवके अधीन है॥ ५६—५८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादेन शुक्रकोपसान्त्वनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
### अथ पञ्चदशोऽध्यायः
#### देवता और दैत्योंके युद्धमें दैत्योंकी विजय, इन्द्रद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीका प्रकट होकर दैत्योंके पास जाना, प्रह्लादद्वारा भगवतीकी स्तुति, देवीके आदेशसे दैत्योंका पातालगमन
| _व्यास उवाच_<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा भार्गवस्य महात्मनः।<br>प्रह्लादस्तु सुसंहृष्टो बभूव नृपनन्दनः॥ १<br><br>ज्ञात्वा दैवं बलिष्ठञ्च प्रह्लादस्तानुवाच ह।<br>कृतेऽपि युद्धे न जयो भविष्यति कदाचन ॥ २<br><br>तदा ते जयिनः प्रोचुर्दानवा मदगर्विताः।<br>संग्रामस्तु प्रकर्तव्यो दैवं किं न विदामहे॥ ३<br><br>निरुद्यमानां दैवं हि प्रधानमसुराधिप।<br>केन दृष्टं क्व वा दृष्टं कीदृशं केन निर्मितम्॥ ४<br><br>तस्माद्युद्धं करिष्यामो बलमास्थाय साम्प्रतम्।<br>भवाग्रे दैत्यवर्य त्वं सर्वज्ञोऽसि महामते॥ ५ | **व्यासजी बोले—** उन महात्मा शुक्राचार्यका यह वचन सुनकर राजकुमार प्रह्लाद अत्यन्त हर्षित हुए। प्रारब्धको बलवान् मानकर प्रह्लादने उन दैत्योंसे कहा—युद्ध करनेपर भी विजय कभी नहीं होगी॥ १-२॥<br><br>तदनन्तर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले उन दानवोंने अभिमानसे चूर होकर कहा—हमें तो निश्चितरूपसे संग्राम करना चाहिये। दैव क्या है! इसे हमलोग नहीं जानते। हे दानवेश्वर! उद्यमरहित लोगोंके लिये ही दैव प्रधान होता है। दैवको किसने देखा है, कहाँ देखा है, दैव कैसा है और उसे किसने बनाया है! अतएव अब हमलोग बलका आश्रय लेकर युद्ध करेंगे। हे दैत्यश्रेष्ठ! हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं, आप केवल हमारे आगे रहें॥ ३—५॥ |