देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ४७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| इत्युक्तस्तैस्तदा राजन् प्रह्लादः प्रबलारिहा।<br>सेनानीश्च तदा भूत्वा देवान्युद्धे समाह्वयत्॥ ६ | हे राजन्! तब उन दैत्योंके ऐसा कहनेपर महाबली शत्रुओंको भी मार डालनेवाले प्रह्लादने उनका सेनाध्यक्ष बनकर देवताओंको युद्धके लिये ललकारा॥ ६॥ |
| तेऽपि तत्रासुरान्दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान्।<br>सर्वे सम्भृतसम्भारा देवास्तान्समयोधयन्॥ ७ | दैत्योंको समरांगणमें डटे हुए देखकर उन सभी देवताओंने भी अपनी पूरी तैयारी कर ली और वे उनके साथ युद्ध करने लगे॥ ७॥ |
| संग्रामस्तु तदा घोरः शक्रप्रह्लादयोरभूत्।<br>पूर्णं वर्षशतं तत्र मुनीनां विस्मयावहः॥ ८ | तदनन्तर इन्द्र और प्रह्लादका वह भीषण संग्राम पूरे सौ वर्षोंतक होता रहा। वह युद्ध मुनियोंको विस्मित कर देनेवाला था॥ ८॥ |
| वर्तमाने महायुद्धे शुक्रेण प्रतिपालिताः।<br>जयमापुस्तदा दैत्याः प्रह्लादप्रमुखा नृप॥ ९ | हे राजन्! शुक्राचार्यके द्वारा संरक्षित प्रह्लाद आदि प्रधान दैत्योंने उस हो रहे महायुद्धमें विजय प्राप्त की॥ ९॥ |
| तदैवेन्द्रो गुरोर्वाक्यात्सर्वदुःखविनाशिनीम्।<br>संस्मार मनसा देवीं मुक्तिदां परमां शिवाम्॥ १० | तब इन्द्रने गुरु बृहस्पतिके वचनानुसार सम्पूर्ण दुःखोंको दूर करनेवाली, मुक्ति देनेवाली तथा परम कल्याणस्वरूपिणी भगवतीका मन-ही-मन स्मरण किया॥ १०॥ |
| इन्द्र उवाच | इन्द्र बोले— |
| जय देवि महामाये शूलधारिणि चाम्बिके।<br>शङ्खचक्रगदापद्मखड्गहस्तेऽभयप्रदे ॥ ११ | हे महामाये! हे शूलधारिणि! हे अम्बिके! हे शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा खड्गसे सुशोभित हाथोंवाली! हे अभय प्रदान करनेवाली! हे देवि! आपकी जय हो॥ ११॥ |
| नमस्ते भुवनेशानि शक्तिदर्शननायिके।<br>दशतत्त्वात्मिके मातर्महाबिन्दुस्वरूपिणि॥ १२ | हे भुवनेश्वरि! हे शक्ति! हे शाक्तादि छः दर्शनोंकी नायिकास्वरूपिणि! हे दस तत्त्वोंकी अधिष्ठातृदेवि! हे महाबिन्दुस्वरूपिणि! हे माता! आपको नमस्कार है॥ १२॥ |
| महाकुण्डलिनीरूपे सच्चिदानन्दरूपिणि।<br>प्राणाग्निहोत्रविद्ये ते नमो दीपशिखात्मिके॥ १३<br><br>पञ्चकोशान्तरगते पुच्छब्रह्मस्वरूपिणि।<br>आनन्दकलिके मातः सर्वोपनिषदर्चिते॥ १४ | हे महाकुण्डलिनीस्वरूपे! हे सच्चिदानन्दरूपिणि! हे प्राणाग्निहोत्रविद्ये! हे दीपशिखात्मिके! हे [अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय] पंचकोशोंमें सदा विराजमान रहनेवाली! हे पुच्छब्रह्मस्वरूपिणि! हे आनन्दकलिके! सभी उपनिषदोंद्वारा स्तुत हे माता! आपको नमस्कार है॥ १३-१४॥ |
| मातः प्रसीद सुमुखि भव हीनसत्त्वां-<br>स्त्रायस्व नो जननि दैत्यपराजितान् वै।<br>त्वं देवि नः शरणदा भुवने प्रमाणा<br>शक्तासि दुःखशमनेऽखिलवीर्ययुक्ते॥ १५ | हे माता! आप हमपर प्रसन्न होनेकी कृपा करें और प्रफुल्लित मुखमण्डलवाली हो जायें। हे जननि! दैत्योंसे पराजित हम निर्बलोंकी रक्षा कीजिये। हे देवि! एकमात्र आप ही हमें शरण प्रदान करनेवाली हैं; आप संसारमें प्रमाणस्वरूपा हैं। हे समस्त पराक्रमोंसे युक्त भगवति! हमलोगोंका दुःख दूर करनेमें आप पूर्ण समर्थ हैं॥ १५॥ |