भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 889 में से

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पृष्ठ 482

| अ० १५ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४७३ | | :--- | :--- |

| ध्यायन्ति येऽपि सुखिनो नितरां भवन्ति<br>दुःखान्विताविगतशोकभयास्तथान्ये ।<br>मोक्षार्थिनो विगतमानविमुक्तसङ्गाः<br>संसारवारिधिजलं प्रतरन्ति सन्तः ॥ १६ | जो भी आपका ध्यान करते हैं, वे परम सुखी हो जाते हैं; और [आपकी उपासना न करनेवाले] दूसरे लोग दुःखी तथा शोक और भयसे युक्त रहते हैं। मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले अहंकारशून्य तथा आसक्तिरहित संतलोग संसार-सागरके असीम जलको पार कर लेते हैं ॥ १६ ॥ | | त्वं देवि विश्वजननि प्रथितप्रभावा<br>संरक्षणार्थमुदितार्तिहरप्रतापा ।<br>संहर्तुमेतदखिलं किल कालरूपा<br>को वेत्ति तेऽम्ब चरितं ननु मन्दबुद्धिः ॥ १७ | हे देवि ! हे विश्वजननि ! आप विस्तृत प्रभाववाली हैं। भक्तोंकी रक्षाके लिये आप प्रकट हो जाती हैं। आप भक्तजनोंका दुःख दूर करनेमें समर्थप्रतापवाली हैं। इस सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेके लिये आप कालस्वरूपिणी हैं। हे अम्ब ! कौन मन्दबुद्धि प्राणी आपका चरित्र जान सकता है ? ॥ १७ ॥ | | ब्रह्मा हरश्च हरिदश्वरथो हरिश्च<br>इन्द्रो यमोऽथ वरुणोऽग्निसमीरणौ च ।<br>ज्ञातुं क्षमा न मुनयोऽपि महानुभावा<br>यस्याः प्रभावमतुलं निगमागमाश्च ॥ १८ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, इन्द्र, यम, वरुण, अग्नि, वायु, निगम, आगम तथा महातपस्वी मुनिगण भी आपकी अनुपम महिमाको जाननेमें समर्थ नहीं हैं ॥ १८ ॥ | | धन्यास्त एव तव भक्तिपरा महान्तः<br>संसारदुःखरहिताः सुखसिन्धुमग्नाः ।<br>ये भक्तिभावरहिता न कदापि दुःखा-<br>म्भोधिं जनिष्यतरङ्गमुमे तरन्ति ॥ १९ | हे उमे ! जो आपकी भक्तिमें तत्पर हैं, वे ही परम धन्य हैं और सांसारिक दुःखोंसे मुक्त होकर सुखके समुद्रमें डूबे रहते हैं; किंतु जो लोग आपकी भक्तिभावनासे वंचित हैं, वे जन्म-मरणरूपी तरंगोंवाले दुःखमय भवसागरको कभी भी पार नहीं कर सकते ॥ १९ ॥ | | ये वीज्यमानाः सितचामरैश्च<br>क्रीडन्ति धन्याः शिबिकाधिरूढाः ।<br>तैः पूजिता त्वं किल पूर्वदेहे<br>नानोपहारैरिति चिन्तयामि ॥ २० | जिन भाग्यशाली लोगोंके ऊपर स्वच्छ चँवर डुलाये जा रहे हैं, जो हास-विलासका सुख भोग रहे हैं तथा जो सुन्दर यानोंपर सवारी कर रहे हैं—उनके विषयमें मैं तो यही सोचता हूँ कि उन्होंने पूर्वजन्ममें अनेकविध पूजनोपचारोंसे निश्चय ही आपकी पूजा की है ॥ २० ॥ | | ये पूज्यमाना वरवारणस्था<br>विलासिनीवृन्दविलासयुक्ताः ।<br>सामन्तैश्चोपनतैर्व्रजन्ति<br>मन्ये हि तैस्त्वं किल पूजितासि ॥ २१ | पूजित होते हुए जो लोग उत्तम हाथियोंपर विराजमान रहते हैं, जो रमणियोंके साथ आमोद-प्रमोदमें संलग्न हैं और जो विनम्र सामंतोंके साथ चलते हैं, मैं मानता हूँ कि उन्होंने अवश्य आपकी पूजा की है ॥ २१ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता मघवता देवी विश्वेश्वरी तदा ।<br>प्रादुर्बभूव तरसा सिंहारूढा चतुर्भुजा ॥ २२<br>शङ्खचक्रगदापद्मानिबिभ्रती चारुलोचना ।<br>रक्ताम्बरधरा देवी दिव्यमाल्यविभूषणा ॥ २३ | **व्यासजी बोले—**तब इन्द्रके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती विश्वेश्वरी तुरंत प्रकट हो गयीं। उस समय वे सिंहपर बैठी हुई थीं; वे चार भुजाओंसे युक्त थीं; उन्होंने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कर रखा था; उनके नेत्र सुन्दर थे; वे लाल वस्त्र पहने हुए थीं और वे देवी दिव्य मालाओंसे विभूषित थीं ॥ २२-२३ ॥ |

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