देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 484, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 484
अ० १५ ] चतुर्थ स्कन्ध ४७५
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वत्तः सर्वमिदं विश्वं स्थावरं जङ्गमं तथा।<br>अन्ये निमित्तमात्रास्ते कर्तारस्तव निर्मिताः॥ ३५ | यह स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण विश्व आपसे ही उत्पन्न हुआ है। जो दूसरे कर्ता हैं, वे तो निमित्तमात्र हैं; क्योंकि वे भी आपके बनाये हुए हैं॥ ३५॥ |
| नमो देवि महामाये सर्वेषां जननी स्मृता।<br>को भेदस्तव देवेषु दैत्येषु स्वकृतेषु च॥ ३६ | हे देवि! आपको नमस्कार है। हे महामाये! आप सभी प्राणियोंकी जननी कही गयी हैं। स्वयं आपके ही द्वारा बनाये गये देवताओं और दैत्योंमें आपका यह कैसा भेदभाव !॥ ३६॥ |
| मातुः पुत्रेषु को भेदोऽप्यशुभेषु शुभेषु च।<br>तथैव देवेष्वस्मासु न कर्तव्यस्त्वयाधुना॥ ३७ | पुत्र अच्छे हों अथवा बुरे, उनमें माताका कैसा भेदभाव ? उसी प्रकार देवताओं और हम दैत्योंमें आपको इस समय भेदभाव नहीं करना चाहिये॥ ३७॥ |
| यादृशास्तादृशा मातः सुतास्ते दानवाः किल।<br>यतस्त्वं विश्वजननी पुराणेषु प्रकीर्तिता॥ ३८ | हे माता! दानव चाहे जिस किसी भी प्रकारके हों, किंतु वे आपके ही पुत्र हैं; क्योंकि आप पुराणोंमें विश्वजननी बतायी गयी हैं॥ ३८॥ |
| तेऽपि स्वार्थपरा नूनं यथैव वयमप्युत।<br>नान्तरं दैत्यसुरयोर्भेदोऽयं मोहसम्भवः॥ ३९ | वे देवता भी तो निश्चितरूपसे वैसे ही स्वार्थी हैं जैसे हम दैत्यगण। देवताओं और दैत्योंमें अन्तर नहीं है। यह भेद केवल मोहजनित है॥ ३९॥ |
| धनदारादिभोगेषु वयं सक्ता दिवानिशम्।<br>तथैव देवा देवेशि को भेदोऽसुरदेवयोः॥ ४० | जैसे हमलोग धन, स्त्री आदिके भोगोंमें दिन-रात आसक्त रहते हैं, वैसे ही देवता भी तो [विषय-भोगोंमें लीन] रहते हैं। अतः हे देवेश्वरि! असुरों और देवताओंमें भेद कैसा ?॥ ४०॥ |
| तेऽपि कश्यपदायादा वयं तत्सम्भवाः किल।<br>कुतो विरोधसम्भूतिर्जाता मातस्तवाधुना॥ ४१ | वे भी कश्यपजीकी संतान हैं और हम भी उन्हीं कश्यपजीसे उत्पन्न हुए हैं। हे माता! ऐसी स्थितिमें हमारे प्रति आपके मनमें यह विरोधभाव कैसे उत्पन्न हो गया ?॥ ४१॥ |
| न तथा विहितं मातस्त्वयि सर्वसमुद्भवे।<br>साम्यतैव त्वया स्थाप्या देवेष्वस्मासु चैव हि॥ ४२ | हे माता! जब सबकी उत्पत्तिमें आप ही मूल कारण हैं, तो इस प्रकार भेद करना आपके लिये उचित नहीं है। देवताओं तथा हम दैत्योंमें आपको समान व्यवहार रखना चाहिये॥ ४२॥ |
| गुणव्यतिकरात्सर्वे समुत्पन्नाः सुरासुराः।<br>गुणान्विता भवेयुस्ते कथं देहभृतोऽमराः॥ ४३ | गुणोंसे सम्बन्ध होनेके कारण ही सम्पूर्ण देवता तथा दैत्य उत्पन्न हुए हैं। तब गुणोंसे युक्त केवल वे देहधारी देवता ही आपके प्रिय क्यों हैं?॥ ४३॥ |
| कामः क्रोधश्च लोभश्च सर्वदेहेषु संस्थिताः।<br>वर्तन्ते सर्वदा तस्मात् कोऽविरोधी भवेज्जनः॥ ४४ | काम, क्रोध और लोभ सभी प्राणियोंके भीतर सदा विद्यमान रहते हैं। अतः कौन व्यक्ति विरोधभावसे शून्य रह सकता है?॥ ४४॥ |