देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 485, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ |
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| त्वया मिथो विरोधोऽयं कल्पितः किल कौतुकात् ।<br>मन्यामहे विभेदेन नूनं युद्धदिदृक्षया ॥ ४५<br><br>अन्यथा खलु भ्रातॄणां विरोधः कीदृशोऽनघे ।<br>त्वं चेनेच्छसि चामुण्डे वीक्षितुं कलहं किल ॥ ४६ | मैं तो समझता हूँ कि अपने विनोदके लिये आपने ही युद्ध देखनेकी इच्छासे निश्चय ही [हम दैत्यों तथा देवताओंके बीच] भेद उत्पन्न करके परस्पर यह विरोधभाव पैदा कर दिया है। अन्यथा हे अनघे! भाइयोंमें परस्पर विरोध कैसा ? हे चामुण्डे! यदि आप [दैत्यों तथा देवताओंमें] कलह देखना न चाहतीं तो यह विरोधभाव नहीं होता॥ ४५-४६॥ | | जानामि धर्मं धर्मज्ञे वेद्मि चाहं शतक्रतुम् ।<br>तथापि कलहोऽस्माकं भोगार्थं देवि सर्वदा ॥ ४७ | हे धर्मज्ञे! मैं धर्मको जानता हूँ और इन्द्रको भी भलीभाँति जानता हूँ, तथापि हे देवि! भोगके लिये हमलोगोंके बीच कलह सदासे होता रहा है॥ ४७॥ | | एकः कोऽपि न शास्तास्ति संसारे त्वां विनाम्बिके ।<br>स्पृहावतस्तु कः कर्तुं क्षमते वचनं बुधः ॥ ४८<br><br>देवासुरैरयं सिन्धुर्मथितः समये क्वचित् ।<br>विष्णुना विहितो भेदः सुधारत्नच्छलेन वै ॥ ४९ | हे अम्बिके! आपके अतिरिक्त संसारमें कोई भी एक शासक नहीं है। कौन बुद्धिमान् प्राणी किसी लोभीकी बातपर विश्वास करेगा ? किसी समयकी बात है देवताओं और असुरोंने मिलकर इस समुद्रका मन्थन किया। किंतु विष्णुने अमृतरत्नके विभाजनमें छलपूर्वक देवताओं और असुरोंमें भेदभाव किया॥ ४८-४९॥ | | त्वयासौ कल्पितः शौरिः पालकत्वे जगद्गुरुः ।<br>तेन लक्ष्मीः स्वयं लोभाद् गृहीतामरसुन्दरी ॥ ५० | आपने पालन-कार्यके लिये विष्णुको जगद्गुरु बनाया है, किंतु उन्होंने लोभवश दिव्य सुन्दरी लक्ष्मीको स्वयं अपना लिया॥ ५०॥ | | ऐरावतस्तथेन्द्रेण पारिजातोऽथ कामधुक् ।<br>उच्चैःश्रवाः सुरैः सर्वं गृहीतं वैष्णवेच्छया ॥ ५१ | उसी प्रकार विष्णुकी ही इच्छासे इन्द्रने ऐरावत हाथी, पारिजात, कामधेनु तथा उच्चैःश्रवा घोड़ेको ले लिया तथा अन्य देवताओंने शेष सब कुछ ग्रहण कर लिया॥ ५१॥ | | अनयं तादृशं कृत्वा जाता देवास्तु साधवः ।<br>(अन्यायिनः सुरा नूनं पश्य त्वं धर्मलक्षणम् ।)<br>संस्थापिताः सुरा नूनं विष्णुना बहुमानिना ॥ ५२<br><br>नूनं दैत्याः पराभूवन्पश्य त्वं धर्मलक्षणम् ।<br>क्व धर्मः कीदृशो धर्मः क्व कार्यं क्व च साधुता ॥ ५३ | इस प्रकारका अन्याय करके देवता साधु बन गये! (यदि आप धर्मका लक्षण देखें तो उससे ज्ञात हो जायगा कि देवता निश्चितरूपसे अन्यायी हैं।) महाभिमानी विष्णुने ऐसे अन्यायी देवताओंको उच्च स्थानोंपर प्रतिष्ठित किया। इसके विपरीत दैत्यगण पराभूत हुए; अब आप ही धर्मका लक्षण देख लीजिये। धर्म कहाँ है, धर्मका स्वरूप कैसा है, कैसा कार्य हुआ है और साधुता कहाँ है? ॥ ५२-५३॥ | | कथयामि च कस्याग्रे सिद्धं मैमांसिकं मतम् ।<br>तार्किका युक्तिवादज्ञा विधिज्ञा वेदवादकाः ॥ ५४ | अब मैं किसके आगे अपनी बात कहूँ? मीमांसक मत तो प्रसिद्ध ही है। [मीमांसक निरीश्वर-वादका समर्थन करते हैं] नैयायिक विद्वान् युक्तिवादके ज्ञाता और वैदिक विद्वान् विधिके ज्ञाता कहे गये हैं। |