भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 889 में से

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पृष्ठ 486
अ० १५ ]चतुर्थ स्कन्ध४७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उक्ताः सकर्तृकं विश्वं विवदन्ते जडात्मकाः।<br>कर्ता भवति चेदस्मिन्संसारे वितते किल ॥ ५५<br><br>विरोधः कीदृशस्तत्र चैककर्मणि वै मिथः।<br>वेदे नैकमतिः कस्माच्छास्त्रेष्वपि तथा पुनः ॥ ५६<br><br>नैकवाक्यं वचस्तेषामपि वेदविदां पुनः।<br>यतः स्वार्थपरं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ५७<br><br>निःस्पृहः कोऽपि संसारे न भवेन्न भविष्यति।कुछ लोग विश्वको सकर्तृक मानते हैं। [उनमें कुछ लोग विश्वका रचयिता ‘पुरुष’ को और कुछ लोग ‘प्रकृति’ को बताते हैं] जड़वादी लोग इससे विपरीत प्रकारकी बात करते हैं। यदि इस विस्तृत संसारमें कोई एक कर्ता होता तो एक ही कर्मके विषयमें लोगोंमें परस्पर विरोध कैसे होता ? वेदमें एक मत नहीं है और उसी प्रकार शास्त्रोंमें भी मतैक्य नहीं है। उन वेदविदोंके वचनमें भी एकवाक्यता नहीं है; क्योंकि यह समस्त स्थावर-जंगमात्मक जगत् ही स्वार्थपरायण है। संसारमें कोई भी न तो निःस्पृह हुआ है और न होगा॥ ५४—५७ १/२ ॥
शशिनाथ गुरोर्भार्या हृता ज्ञात्वा बलादपि ॥ ५८<br><br>गौतमस्य तथेन्द्रेण जानता धर्मनिश्चयम्।<br>गुरुणानुजभार्या च भुक्ता गर्भवती बलात् ॥ ५९<br><br>शप्तो गर्भगतो बालः कृतश्चान्धस्तथा पुनः।चन्द्रमाने जान-बूझकर अपने गुरु बृहस्पतिकी भार्याका बलपूर्वक हरण कर लिया। उसी प्रकार धर्मका निर्णय जानते हुए भी इन्द्रने महर्षि गौतमकी पत्नीके साथ अनाचार किया। देवगुरु बृहस्पतिने अपने छोटे भाईकी गर्भवती भार्याके साथ रमण किया और गर्भस्थ शिशुको शाप दे दिया तथा उसे अन्धा बना दिया॥ ५८-५९ १/२ ॥
विष्णुना च शिरश्छिन्नं राहोश्चक्रेण वै बलात् ॥ ६०<br><br>अपराधं विना कामं तदा सत्त्ववताम्बिके।<br>पौत्रो धर्मवतां शूरः सत्यव्रतपरायणः ॥ ६१<br><br>यज्वा दानपतिः शान्तः सर्वज्ञः सर्वपूजकः।<br>कृत्वाथ वामनं रूपं हरिणा छलवेदिना ॥ ६२<br><br>वञ्चितोऽसौ बलिः सर्वं हृतं राज्यं पुरा किल।<br>तथापि देवान्धर्मस्थान्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ६३<br><br>वदन्ति चाटुवादांश्च धर्मवादाञ्जयं गताः।<br>एवं ज्ञात्वा जगन्मातर्यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६४<br><br>शरणा दानवाः सर्वे जहि वा रक्ष वा पुनः।हे अम्बिके! सत्त्व-सम्पन्न होते हुए भी विष्णुने बलपूर्वक सुदर्शनचक्रसे निरपराध राहुका सिर काट लिया। मेरा पौत्र बलि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, वीर, सत्यव्रतमें संलग्न रहनेवाला, यज्ञकर्ता, महादानी, शान्त, सर्वज्ञ तथा सबका सम्मान करनेवाला था। पूर्वकालमें कपटज्ञानी विष्णुने वामनका रूप धारण करके उस बलिके साथ भी छल किया और उसका सारा राज्य छीन लिया। फिर भी विद्वान् लोग देवताओंको धर्मनिष्ठ कहते हैं और चाटुकारितापूर्ण वचन बोलते हैं कि धर्मवादी होनेके कारण ही देवता विजयको प्राप्त हुए। हे जगज्जननि! यह सब सोच-समझकर आप जैसा चाहें, वैसा करें। सभी दानव आपकी शरणमें हैं, अब आप उनका संहार करें अथवा उनकी रक्षा करें॥ ६०—६४ १/२ ॥
श्रीदेव्युवाच<br>सर्वे गच्छत पातालं तत्र वासं यथेप्सितम् ॥ ६५<br><br>कुरुध्वं दानवाः सर्वे निर्भया गतमन्यवः।<br>कालः प्रतीक्ष्यो युष्माभिः कारणं स शुभेऽशुभे ॥ ६६श्रीदेवी बोलीं— हे दानवो! तुम सबलोग पाताल चले जाओ और वहाँपर निर्भय तथा शोकरहित होकर इच्छानुसार निवास करो। अभी तुमलोगोंको समयकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। वह काल ही अच्छे या बुरे कार्यमें कारण बनता है॥ ६५-६६॥