देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 487, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 487
<div align="center">
| ४७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
|---|
| सुनिर्वैदपराणां हि सुखं सर्वत्र सर्वदा।<br>त्रैलोक्यस्य च राज्येऽपि न सुखं लोभचेतसाम्॥ ६७<br><br>कृतेऽपि न सुखं पूर्णं सस्पृहाणां फलैरपि।<br>तस्मात्त्यक्त्वा महीमेतां प्रयान्त्वद्य महीतलम्॥ ६८<br><br>ममाज्ञां पुरतः कृत्वा सर्वे विगतकल्मषाः। | परम सन्तोषी लोगोंको सभी जगह सदा सुख-ही-सुख है, किंतु लोभयुक्त मनवाले लोगोंको तीनों लोकोंका राज्य मिल जानेपर भी सुख नहीं प्राप्त होता। सत्ययुगमें भी नानाविध भोगोंके रहते प्रबल कामनावाले लोगोंका सुख कभी पूरा नहीं हुआ। अतः सभी दैत्य मेरी आज्ञा मानकर इस पृथ्वीको छोड़कर अभी पातालमें चले जायँ और वहाँ निष्पाप होकर रहें॥ ६७-६८ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्यास्तथेत्युक्त्वा रसातलं॥ ६९<br><br>प्रणम्य दानवाः सर्वे गताः शक्त्याभिरक्षिताः।<br>अन्तर्दधे ततो देवी देवाः स्वभुवनं गताः॥ ७०<br><br>त्यक्त्वा वैरं स्थिताः सर्वे ते तदा देवदानवाः। | व्यासजी बोले— भगवतीका यह वचन सुनकर सभी दानवोंने 'ठीक है'—ऐसा कहकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी शक्तिसे रक्षित होकर वे वहाँसे चल पड़े। तत्पश्चात् भगवती अन्तर्धान हो गयीं और देवता अपने-अपने लोक चले गये। उस समय सभी देवता तथा दानव वैर-भाव छोड़कर रहने लगे॥ ६९-७० १/२॥ |
| एतदाख्यानमखिलं यः शृणोति वदत्यथ॥ ७१<br>सर्वदुःखविनिर्मुक्तः प्रयाति पदमुत्तमम्॥ ७२ | जो मनुष्य इस सम्पूर्ण कथानकको सुनता अथवा कहता है, वह सभी दुःखोंसे मुक्त होकर परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ७१-७२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवीकथनेन<br>दानवानां रसातलं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
भगवान् श्रीहरिके विविध अवतारोंका संक्षिप्त वर्णन
</div>| जनमेजय उवाच<br>भृगुशापान्मुनिश्रेष्ठ हरेरद्भुतकर्मणः।<br>अवताराः कथं जाताः कस्मिन्मन्वन्तरे विभो॥ १<br><br>विस्तराद्वद धर्मज्ञ अवतारकथां हरेः।<br>पापनाशकरीं ब्रह्मञ्छ्रुतां सर्वसुखावहाम्॥ २ | जनमेजय बोले— हे मुनिश्रेष्ठ! हे विभो! अद्भुत चरित्रवाले भगवान् विष्णुने भृगुके शापसे किस मन्वन्तरमें किस प्रकार अवतार ग्रहण किये। हे धर्मज्ञ! हे ब्रह्मन्! श्रवण करनेपर समस्त सुख सुलभ करानेवाली तथा पापोंका नाश कर देनेवाली भगवान् विष्णुकी अवतार-कथाका विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १-२॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि अवतारान् हरेर्यथा।<br>यस्मिन्मन्वन्तरे जाता युगे यस्मिन्नराधिप॥ ३<br><br>येन रूपेण यत्कार्यं कृतं नारायणेन वै।<br>तत्सर्वं नृप वक्ष्यामि संक्षेपेण तवाधुना॥ ४ | व्यासजी बोले— हे राजन्! हे नराधिप! जिस मन्वन्तर तथा जिस युगमें जैसे-जैसे भगवान् विष्णुके अवतार हुए हैं, उन अवतारोंको मैं बता रहा हूँ, आप सुनें। हे नृप! भगवान् नारायणने जिस रूपसे जो कार्य किया, वह सब मैं आपको इस समय संक्षेपमें बताता हूँ॥ ३-४॥ |
| धर्मस्यैवावतारोऽभूच्चाक्षुषे मनुसम्भवे।<br>नरनारायणौ धर्मपुत्रौ ख्यातौ महीतले॥ ५ | चाक्षुष मन्वन्तरमें साक्षात् विष्णुका धर्मावतार हुआ था। उस समय वे धर्मपुत्र होकर नर-नारायण नामसे धरातलपर विख्यात हुए॥ ५॥ |