देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 488
| अ० १६ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अथ वैवस्वताख्येऽस्मिन्द्वितीये तु युगे पुनः।<br>दत्तात्रेयावतारोऽत्रेः पुत्रत्वमगमद्धरिः॥ ६ | इस वैवस्वत मन्वन्तरके दूसरे चतुर्युगमें भगवान्का दत्तात्रेयावतार हुआ। वे भगवान् श्रीहरि महर्षि अत्रिके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए॥ ६॥ |
| ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रस्त्रयोऽमी देवसत्तमाः।<br>पुत्रत्वमगमन्देवास्तस्यात्रेर्भार्यया वृताः॥ ७ | उन अत्रिमुनिकी भार्या अनसूयाकी प्रार्थनापर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश—ये तीनों महान् देवता उनके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए॥ ७॥ |
| अनसूयात्रिपत्नी च सतीनामुत्तमा सती।<br>यया सम्प्रार्थिता देवाः पुत्रत्वमगमंस्त्रयः॥ ८ | अत्रिकी पत्नी साध्वी अनसूया सती स्त्रियोंमें श्रेष्ठ थीं, जिनके सम्यक् रूपसे प्रार्थना करनेपर वे तीनों देवता उनके पुत्ररूपमें अवतरित हुए॥ ८॥ |
| ब्रह्माभूत्सोमरूपस्तु दत्तात्रेयो हरिः स्वयम्।<br>दुर्वासा रुद्ररूपोऽसौ पुत्रत्वं ते प्रपेदिरे॥ ९ | उनमें ब्रह्माजी सोम (चन्द्रमा)-रूपमें, साक्षात् विष्णु दत्तात्रेयके रूपमें और शंकरजी दुर्वासाके रूपमें उनके यहाँ पुत्रत्वको प्राप्त हुए॥ ९॥ |
| नृसिंहस्यावतारस्तु देवकार्यार्थसिद्धये।<br>चतुर्थे तु युगे जातो द्विधारूपो मनोहरः॥ १०<br><br>हिरण्यकशिपोः सम्यग्वधाय भगवान् हरिः।<br>चक्रे रूपं नारसिंहं देवानां विस्मयप्रदम्॥ ११ | देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये चौथे चतुर्युगमें दो प्रकारके रूपोंवाला मनोहर नृसिंहावतार हुआ। भगवान् श्रीविष्णुने उस समय हिरण्यकशिपुका सम्यक् वध करनेके लिये ही देवताओंको भी चकित कर देनेवाला नारसंहरूप धारण किया था॥ १०-११॥ |
| बलेर्नियमनार्थाय श्रेष्ठे त्रेतायुगे तथा।<br>चकार रूपं भगवान् वामनं कश्यपान्मुनेः॥ १२<br><br>छलयित्वा मखे भूपं राज्यं तस्य जहार ह।<br>पाताले स्थापयामास बलिं वामनरूपधृक्॥ १३ | भगवान् विष्णुने दैत्यराज बलिका शमन करनेके उद्देश्यसे उत्तम त्रेतायुगमें कश्यपमुनिके यहाँ वामनरूपसे अवतार धारण किया था। उन वामनरूपधारी विष्णुने यज्ञमें राजा बलिको छलकर उनका राज्य हर लिया और उन्हें पातालमें स्थापित कर दिया॥ १२-१३॥ |
| युगे चैकोनविंशेऽथ त्रेताख्ये भगवान् हरिः।<br>जमदग्निसुतो जातो रामो नाम महाबलः॥ १४ | उन्नीसवें चतुर्युगके त्रेता नामक युगमें भगवान् विष्णु महर्षि जमदग्निके परशुराम नामक महाबली पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए॥ १४॥ |
| क्षत्रियान्तकरः श्रीमान्सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>दत्तान्मेदिनीं कृत्स्नां कश्यपाय महात्मने॥ १५ | क्षत्रियोंका नाश कर डालनेवाले उन प्रतापी, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय परशुरामने सम्पूर्ण पृथ्वी [क्षत्रियोंसे छीनकर] महात्मा कश्यपको दे दी थी॥ १५॥ |
| यो वै परशुरामाख्यो हरेरद्भुतकर्मणः।<br>अवतारस्तु राजेन्द्र कथितः पापनाशनः॥ १६ | हे राजेन्द्र! मैंने अद्भुत कर्मवाले भगवान् विष्णुके पापनाशक 'परशुराम' नामक अवतारका यह वर्णन कर दिया॥ १६॥ |
| त्रेतायुगे रघोर्वंशे रामो दशरथात्मजः।<br>नरनारायणांशौ द्वौ जातौ भुवि महाबलौ॥ १७ | भगवान् विष्णुने त्रेतायुगमें रघुके वंशमें दशरथपुत्र रामके रूपमें अवतार धारण किया था। इसी प्रकार अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें साक्षात् नर तथा नारायणके अंशसे कल्याणप्रद तथा महाबली अर्जुन |