भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

| ४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गत्वा स विपिनेऽपश्यत् प्रसेनं हरिणा हतम्।<br>ययौ मृगेन्द्रमन्विष्यनसृग्बिन्द्वङ्किताध्वना ॥ १८वनमें पहुँचनेपर श्रीकृष्णने सिंहद्वारा मारे गये प्रसेनको देखा और तदनन्तर गिरे हुए रक्त-बिन्दुओंसे चिह्नित मार्गका अनुसरण करके सिंहको खोजते हुए वे कुछ दूर गये ॥ १८ ॥
अथ कृष्णो हतं सिंहं बिलद्वारि विलोक्य च।<br>उवाच भगवान् वाचं कृपया पुरवासिनः ॥ १९<br><br>तिष्ठध्वं यूयमत्रैव यावदागमनं मम।<br>प्रविशामि बिलं त्वेतन्मणिहारकलब्धये ॥ २०इसके पश्चात् एक गुफाके द्वारपर मरे हुए सिंहको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण करुणायुक्त वाणीमें नागरिकोंसे बोले—मणिका हरण करनेवालेको खोजनेके लिये मैं इस गुफाके भीतर प्रवेश कर रहा हूँ। जबतक मैं वापस न आ जाऊँ, तुम लोग यहींपर ठहरो ॥ १९-२० ॥
तथेत्युक्त्वा तु ते तस्थुस्तत्रैव द्वारकौकसः।<br>जगामान्तर्बिलं कृष्णो यत्र जाम्बवतो गृहम् ॥ २१वे द्वारकावासी 'ठीक है'—ऐसा बोलकर वहींपर ठहर गये और श्रीकृष्ण गुफाके भीतर प्रविष्ट हुए, जहाँ जाम्बवान्‌का घर था ॥ २१ ॥
ऋक्षराजसुतं दृष्ट्वा कृष्णो मणिधरं तदा।<br>हर्तुमैच्छन्मणिं तावद् धात्री चुक्रोश भीतवत् ॥ २२तत्पश्चात् वहाँ पहुँचनेपर श्रीकृष्णने ऋक्षराजके पुत्रको मणि धारण किये देखकर मणिको छीनना चाहा, इसपर उसकी धात्री (धाय) भयभीत होकर चिल्लाने लगी ॥ २२ ॥
श्रुत्वा धात्रीरवं सद्यः समागत्यर्क्षराट् तदा।<br>युयुधे स्वामिना साकमविश्रममहर्निशम् ॥ २३तब धात्रीकी आवाज सुनकर जाम्बवान् तुरंत वहाँ आ गया और वह अपने [पूर्व] स्वामी श्रीकृष्णके साथ दिन-रात निरन्तर युद्ध करने लगा ॥ २३ ॥
एवं त्रिनवरात्रं तु महद्युद्धमभूत्तयोः।<br>कृष्णागमं प्रतीक्षन्तस्तस्थुर्द्वारि पुरौकसः ॥ २४<br><br>द्वादशाहं ततो भीत्या प्रतिजग्मुर्निजालयम्।<br>तत्र ते कथयामासुर्वृत्तान्तं सर्वमादितः ॥ २५इस प्रकार उन दोनोंके बीच सत्ताईस दिनोंतक भयंकर युद्ध हुआ। इधर द्वारकावासी गुफाके द्वारपर बारह दिनोंतक तो श्रीकृष्णके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए ठहरे रहे, किंतु इसके बाद वे भयभीत होकर अपने-अपने घर चले गये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने लोगोंसे सारा वृत्तान्त कहा ॥ २४-२५ ॥
सत्राजितं शपन्तस्ते सर्वे शोकाकुला भृशम्।<br>वसुदेवो महाभागः श्रुत्वा पुत्रस्य तां कथाम् ॥ २६<br><br>मुमोह सपरीवारस्तदा परमया शुचा।<br>चिन्तयामास बहुधा कथं श्रेयो भवेन्मम ॥ २७द्वारकापुरीके सभी नागरिक यह सब सुनकर सत्राजित्‌की भर्त्सना करते हुए अत्यन्त शोकविह्वल हो गये। महाभाग वसुदेवजी अपने पुत्रका वह समाचार सुनकर परिवारसहित महान् शोकसे मूर्च्छित हो गये और बार-बार सोचने लगे कि मेरा कल्याण किस प्रकारसे हो ? ॥ २६-२७ ॥
अथाजगाम भगवान् देवर्षिर्ब्रह्मलोकतः।<br>उत्थाय तं प्रणम्यासौ वसुदेवोऽभ्यपूजयत् ॥ २८उसी समय ब्रह्मलोकसे देवर्षि नारद वहाँ आ गये। वसुदेवजीने उठकर उन्हें प्रणाम करके विधिवत् उनकी पूजा की ॥ २८ ॥
नारदोऽनामयं पृष्ट्वा वसुदेवं महामतिम्।<br>पप्रच्छ च यदुश्रेष्ठं किं चिन्तयसि तद् वद ॥ २९देवर्षि नारद महामति यदुश्रेष्ठ वसुदेवजीसे कुशल-क्षेम पूछकर उनसे बोले—आप क्यों चिन्तित हैं, यह मुझे बताइये ॥ २९ ॥