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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| ४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गत्वा स विपिनेऽपश्यत् प्रसेनं हरिणा हतम्।<br>ययौ मृगेन्द्रमन्विष्यनसृग्बिन्द्वङ्किताध्वना ॥ १८वनमें पहुँचनेपर श्रीकृष्णने सिंहद्वारा मारे गये प्रसेनको देखा और तदनन्तर गिरे हुए रक्त-बिन्दुओंसे चिह्नित मार्गका अनुसरण करके सिंहको खोजते हुए वे कुछ दूर गये ॥ १८ ॥
अथ कृष्णो हतं सिंहं बिलद्वारि विलोक्य च।<br>उवाच भगवान् वाचं कृपया पुरवासिनः ॥ १९<br><br>तिष्ठध्वं यूयमत्रैव यावदागमनं मम।<br>प्रविशामि बिलं त्वेतन्मणिहारकलब्धये ॥ २०इसके पश्चात् एक गुफाके द्वारपर मरे हुए सिंहको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण करुणायुक्त वाणीमें नागरिकोंसे बोले—मणिका हरण करनेवालेको खोजनेके लिये मैं इस गुफाके भीतर प्रवेश कर रहा हूँ। जबतक मैं वापस न आ जाऊँ, तुम लोग यहींपर ठहरो ॥ १९-२० ॥
तथेत्युक्त्वा तु ते तस्थुस्तत्रैव द्वारकौकसः।<br>जगामान्तर्बिलं कृष्णो यत्र जाम्बवतो गृहम् ॥ २१वे द्वारकावासी 'ठीक है'—ऐसा बोलकर वहींपर ठहर गये और श्रीकृष्ण गुफाके भीतर प्रविष्ट हुए, जहाँ जाम्बवान्‌का घर था ॥ २१ ॥
ऋक्षराजसुतं दृष्ट्वा कृष्णो मणिधरं तदा।<br>हर्तुमैच्छन्मणिं तावद् धात्री चुक्रोश भीतवत् ॥ २२तत्पश्चात् वहाँ पहुँचनेपर श्रीकृष्णने ऋक्षराजके पुत्रको मणि धारण किये देखकर मणिको छीनना चाहा, इसपर उसकी धात्री (धाय) भयभीत होकर चिल्लाने लगी ॥ २२ ॥
श्रुत्वा धात्रीरवं सद्यः समागत्यर्क्षराट् तदा।<br>युयुधे स्वामिना साकमविश्रममहर्निशम् ॥ २३तब धात्रीकी आवाज सुनकर जाम्बवान् तुरंत वहाँ आ गया और वह अपने [पूर्व] स्वामी श्रीकृष्णके साथ दिन-रात निरन्तर युद्ध करने लगा ॥ २३ ॥
एवं त्रिनवरात्रं तु महद्युद्धमभूत्तयोः।<br>कृष्णागमं प्रतीक्षन्तस्तस्थुर्द्वारि पुरौकसः ॥ २४<br><br>द्वादशाहं ततो भीत्या प्रतिजग्मुर्निजालयम्।<br>तत्र ते कथयामासुर्वृत्तान्तं सर्वमादितः ॥ २५इस प्रकार उन दोनोंके बीच सत्ताईस दिनोंतक भयंकर युद्ध हुआ। इधर द्वारकावासी गुफाके द्वारपर बारह दिनोंतक तो श्रीकृष्णके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए ठहरे रहे, किंतु इसके बाद वे भयभीत होकर अपने-अपने घर चले गये और वहाँ पहुँचकर उन्होंने लोगोंसे सारा वृत्तान्त कहा ॥ २४-२५ ॥
सत्राजितं शपन्तस्ते सर्वे शोकाकुला भृशम्।<br>वसुदेवो महाभागः श्रुत्वा पुत्रस्य तां कथाम् ॥ २६<br><br>मुमोह सपरीवारस्तदा परमया शुचा।<br>चिन्तयामास बहुधा कथं श्रेयो भवेन्मम ॥ २७द्वारकापुरीके सभी नागरिक यह सब सुनकर सत्राजित्‌की भर्त्सना करते हुए अत्यन्त शोकविह्वल हो गये। महाभाग वसुदेवजी अपने पुत्रका वह समाचार सुनकर परिवारसहित महान् शोकसे मूर्च्छित हो गये और बार-बार सोचने लगे कि मेरा कल्याण किस प्रकारसे हो ? ॥ २६-२७ ॥
अथाजगाम भगवान् देवर्षिर्ब्रह्मलोकतः।<br>उत्थाय तं प्रणम्यासौ वसुदेवोऽभ्यपूजयत् ॥ २८उसी समय ब्रह्मलोकसे देवर्षि नारद वहाँ आ गये। वसुदेवजीने उठकर उन्हें प्रणाम करके विधिवत् उनकी पूजा की ॥ २८ ॥
नारदोऽनामयं पृष्ट्वा वसुदेवं महामतिम्।<br>पप्रच्छ च यदुश्रेष्ठं किं चिन्तयसि तद् वद ॥ २९देवर्षि नारद महामति यदुश्रेष्ठ वसुदेवजीसे कुशल-क्षेम पूछकर उनसे बोले—आप क्यों चिन्तित हैं, यह मुझे बताइये ॥ २९ ॥
अ० २ ]माहात्म्य४१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वसुदेव उवाच<br>पुत्रो मेऽतिप्रियः कृष्णः प्रसेनान्वेषणाय तु।<br>पौरैः साकं वनं गत्वा निहतं तं तदैक्षत॥ ३०<br>प्रसेनघातकं दृष्ट्वा बिलद्वारे मृतं हरिम्।<br>द्वारि पौरानधिष्ठाप्य बिलान्तर्गतवान् स्वयं॥ ३१<br>बहवो दिवसा याता नायात्यद्यापि मे सुतः।<br>अतः शोचामि तद् ब्रूहि येन लप्स्ये सुतं मुने॥ ३२वसुदेवजी बोले—मेरा अतिशय प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण प्रसेनको खोजनेके लिये द्वारकाके नागरिकोंके साथ वनमें गया था, जहाँ उसने प्रसेनको मरा हुआ देखा। इसके पश्चात् प्रसेनको मारनेवाले सिंहको भी एक गुफाके द्वारपर मरा देखकर श्रीकृष्ण नागरिकोंको द्वारपर ही रोककर स्वयं गुफाके अन्दर चले गये। बहुत दिन व्यतीत हो चुके हैं, किंतु मेरा पुत्र अभीतक नहीं लौटा, जिससे मैं चिन्तित हूँ, अतः हे मुने! आप कोई ऐसा उपाय बताइये, जिससे मैं अपने प्रिय पुत्रको प्राप्त कर सकूँ॥ ३०–३२॥
नारद उवाच<br>पुत्रप्राप्त्यै यदुश्रेष्ठ देवीमाराधयाम्बिकाम्।<br>तस्या आराधनैनैव सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि॥ ३३नारदजी बोले—हे यदुश्रेष्ठ! आप पुत्रकी प्राप्तिके लिये अम्बिकादेवीकी आराधना कीजिये। उनकी आराधनासे शीघ्र ही आपका कल्याण होगा॥ ३३॥
वसुदेव उवाच<br>भगवन् का हि सा देवी किंप्रभावा महेश्वरी।<br>कथमाराधनं तस्या देवर्षे कृपया वद॥ ३४वसुदेवजी बोले—हे भगवन्! वे देवी कौन हैं, वे महेश्वरी किस प्रकारके प्रभाववाली हैं तथा उनकी आराधना किस प्रकार की जाती है? हे देवर्षे! कृपा करके यह बतायें॥ ३४॥
नारद उवाच<br>वसुदेव महाभाग शृणु संक्षेपतो मम।<br>देव्या माहात्म्यमतुलं को वक्तुं विस्तरात् क्षमः॥ ३५नारदजी बोले—हे महाभाग वसुदेव! देवीके अतुलित माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कौन समर्थ है? अतः मैं संक्षेपमें ही कह रहा हूँ, आप उसे सुनें॥ ३५॥
या सा भगवती नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी।<br>परात्परतरा देवी यया व्याप्तमिदं जगत्॥ ३६<br>यदाराधनतो ब्रह्मा सृजतीदं चराचरम्।<br>यां च स्तुत्वा विनिर्मुक्तो मधुकैटभजाद् भयात्॥ ३७<br>विष्णुर्यत्कृपया विश्वं बिभर्ति भगवानिदम्।<br>रुद्रः संहरते यस्याः कृपापाङ्गनिरीक्षणात्॥ ३८<br>संसारबन्धहेतुर्या सैव मुक्तिप्रदायिनी।<br>सा विद्या परमा देवी सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ ३९जो भगवती शाश्वत, सच्चिदानन्दस्वरूपा और परात्परतरा देवी हैं तथा जिनके द्वारा यह जगत् व्याप्त है, जिनकी आराधनाके प्रभावसे ही ब्रह्मा इस चराचर सृष्टिकी रचना करते हैं, जिनका स्तवन करके भगवान् विष्णु मधु-कैटभके भयसे मुक्त हुए तथा जिनकी कृपासे वे विश्वका पालन-पोषण करते हैं, जिनके कृपा-कटाक्षमात्रसे भगवान् शंकर जगत्का संहार करते हैं और जो संसारके बन्धनकी कारणरूपा हैं, वे ही मुक्ति प्रदान करनेवाली हैं, वे ही परम विद्यास्वरूपा हैं और वे ही समस्त ईश्वरोंकी भी ईश्वरी हैं॥ ३६–३९॥
नवरात्रविधानेन सम्पूज्य जगदम्बिकाम्।<br>नवाहोभिः पुराणं च देव्या भागवतं शृणु॥ ४०<br>यस्य श्रवणमात्रेण सद्यः पुत्रमवाप्स्यसि।<br>भुक्तिर्मुक्तिर्न दूरस्था पठतां शृण्वतां नृणाम्॥ ४१अतः आप नवरात्रविधानके अनुसार जगदम्बाकी विधिवत् पूजा करके नौ दिनोंमें इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणका श्रवण कीजिये, जिसके श्रवणमात्रसे आप शीघ्र ही अपने पुत्रकी प्राप्ति कर लेंगे। इस पुराणका पाठ तथा श्रवण करनेवाले मनुष्योंसे भोग एवं मोक्ष दूर नहीं रहते॥ ४०–४१॥

| ४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इत्युक्तो नारदेनासौ वसुदेवः प्रणम्य तम्।<br>उवाच परया प्रीत्या नारदं मुनिसत्तमम्॥ ४२नारदजीके ऐसा कहनेपर वे वसुदेवजी मुनि-श्रेष्ठ नारदको प्रणाम करके अत्यन्त प्रेमपूर्वक कहने लगे॥ ४२॥
वसुदेव उवाच<br>भगवंस्तव वाक्येन संस्मृतं वृत्तमात्मनः।<br>श्रूयतां तच्च वक्ष्यामि देवीमाहात्म्यसम्भवम्॥ ४३वसुदेवजी बोले— हे भगवन्! आपके इस कथनसे देवी-माहात्म्यसे सम्बन्धित एक अपना वृत्तान्त मुझे याद आ गया; मैं उसे कह रहा हूँ, आप सुनिये॥ ४३॥
पुरा नभोगिरा कंसो देवक्यष्टमगर्भतः।<br>ज्ञात्वात्ममृत्युं पापो मां सभार्यं न्यरुणद्धिया॥ ४४पूर्वकालमें पापी कंसने आकाशवाणीके माध्यमसे देवकीके आठवें गर्भसे अपनी मृत्यु जानकर भयभीत हो भार्यासहित मुझको बन्दी बना लिया॥ ४४॥
कारागारेऽहमवसं देवक्या सह भार्यया।<br>जातं जातं समवधीत्पुत्रं कंसोऽपि पापकृत्॥ ४५तदनन्तर मैं अपनी पत्नी देवकीके साथ कारागारमें रहने लगा और पापी कंस भी मेरे पैदा होनेवाले पुत्रोंको एक-एक करके मारता रहा॥ ४५॥
षट् पुत्रा निहतास्तेन तदा शोकाकुला भृशम्।<br>अतप्यद् देवकी देवी नक्तन्दिवमनिन्दिता॥ ४६इस प्रकार जब कंसके द्वारा मेरे छः पुत्र मार डाले गये तब मेरी निर्दोष भार्या देवी देवकी अत्यन्त शोकाकुल हो उठीं और दिन-रात दुखी रहने लगीं॥ ४६॥
तदाहं गर्गमाहूय मुनिं नत्वाभिपूज्य च।<br>निवेद्य देवकीदुःखमवोचं पुत्रकाम्यया॥ ४७<br><br>भगवन् करुणासिन्धो यादवानां गुरुर्भवान्।<br>आयुष्मत्पुत्रसम्प्राप्तिसाधनं वद मे मुने॥ ४८<br><br>ततो गर्गः प्रसन्नात्मा मामुवाच दयानिधिः।तत्पश्चात् गर्गमुनिको बुलाकर उनका अभिवादन तथा पूजन करके पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे मैंने उनसे देवकीका दुःख बताकर कहा—हे भगवन्! हे दयासिन्धो! हे मुनिवर! आप यदुकुलके गुरु हैं, अतः मुझे आयुष्मान् पुत्रकी प्राप्तिका कोई उपाय बताइये। इसके अनन्तर दयानिधान गर्गजी प्रसन्न होकर मुझसे कहने लगे॥ ४७-४८ १/२॥
गर्ग उवाच<br>वसुदेव महाभाग शृणु तत् साधनं परम्॥ ४९<br><br>या सा भगवती दुर्गा भक्तदुर्गतिहारिणी।<br>तामाराधय कल्याणीं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि॥ ५०<br><br>यदाराधनतः सर्वे सर्वान् कामानवाप्नुयुः।<br>न किञ्चिद् दुर्लभं लोके दुर्गार्चनवतां नृणाम्॥ ५१गर्गजी बोले— हे महाभाग वसुदेव! अब आप उस सर्वश्रेष्ठ साधनको सुनिये। जो भगवती दुर्गा अपने भक्तोंकी दुर्गति का विनाश कर देती हैं, आप उन कल्याणकारिणी देवीकी आराधना कीजिये। इससे शीघ्र ही आपका कल्याण होगा; क्योंकि उनकी आराधनासे सभी लोगोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। दुर्गाकी उपासना करनेवाले मनुष्योंके लिये संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ ४९-५१॥
इत्युक्तोऽहं मुदा युक्तः सभार्यो मुनिपुङ्गवम्।<br>प्रणम्य परया भक्त्या प्रावोचं विहिताञ्जलिः॥ ५२गर्गमुनिके ऐसा कहनेपर मैं प्रसन्न हो गया और अपनी पत्नीसहित मुनिश्रेष्ठ गर्गको परम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर मैंने उनसे कहा॥ ५२॥
वसुदेव उवाच<br>यद्यस्ति भगवन् प्रीतिर्मयि ते करुणानिधे।<br>तदा गुरो मदर्थे त्वं समाराधय चण्डिकाम्॥ ५३वसुदेवजी बोले— हे भगवन्! हे करुणासागर! हे गुरो! यदि आप मुझपर स्नेह रखते हैं तो मेरे कल्याणके निमित्त आप ही उन भगवती चण्डिकाकी
अ० २ ]माहात्म्य४३
संस्कृतहिन्दी
निरुद्धः कंसगेहेऽहं न किञ्चित् कर्तुमुत्सहे।<br>अतस्त्वमेव दुःखाब्धेर्मामुद्धर महामते॥ ५४आराधना कर दें। मैं तो कंसके घरमें बन्दी रहनेके कारण कुछ भी कर सकनेमें समर्थ नहीं हूँ। अतः हे महामते! अब आप ही इस दुःखसागरसे मेरा उद्धार कीजिये॥ ५३-५४॥
इत्युक्तस्तु मया प्रीतः प्रोवाच मुनिपुङ्गवः।<br>वसुदेव तव प्रीत्या करिष्यामि हितं तव॥ ५५मेरे इस प्रकार कहनेपर वे मुनिश्रेष्ठ प्रसन्न होकर बोले—हे वसुदेव! आपकी प्रीतिके कारण मैं आपका कल्याण करूँगा॥ ५५॥
अथ गर्गमुनिः प्रीत्या मया सम्प्रार्थितोऽगमत्।<br>आरिराधयिषुदुर्गां विन्ध्याद्रिं ब्राह्मणैः सह॥ ५६मेरे द्वारा प्रीतिपूर्वक प्रार्थना किये जानेके उपरान्त गर्गमुनि देवी दुर्गाकी आराधनाकी इच्छासे ब्राह्मणोंके साथ विन्ध्यपर्वतपर चले गये॥ ५६॥
तत्र गत्वा जगद्धात्रीं भक्ताभीष्टप्रदायिनीम्।<br>आराधयामास मुनिर्जपपाठपरायणः॥ ५७वहाँ जाकर जप एवं पाठमें तत्पर रहते हुए गर्गमुनि जगत्की मातृस्वरूपा और भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली भगवतीकी आराधना करने लगे॥ ५७॥
ततः समाप्ते नियमे वागुवाचाशरीरिणी।<br>प्रसन्नाहं मुने कार्यसिद्धिस्तव भविष्यति॥ ५८जप-पूजनादि अनुष्ठानोंकी समाप्तिके पश्चात् आकाशवाणी हुई कि हे मुने! मैं प्रसन्न हो गयी हूँ, अतएव तुम्हारे कार्यकी सिद्धि होगी॥ ५८॥
भूभारहरणार्थाय मया सम्प्रेरितो हरिः।<br>वसुदेवस्य देवक्यां स्वांशेनावतरिष्यति॥ ५९[समस्त प्रकारके पाप एवं अनाचारस्वरूप] पृथ्वीके भारका नाश करनेके लिये मुझसे प्रेरणा प्राप्तकर स्वयं भगवान् विष्णु अपने अंशसे वसुदेवकी भार्या देवकीके गर्भसे अवतार लेंगे॥ ५९॥
कंसभीत्या तमादाय बालमानकदुन्दुभिः।<br>प्रापयिष्यति सद्यस्तु गोकुले नन्दवेश्मनि॥ ६०कंसके भयसे वसुदेवजी उस शिशुको लेकर शीघ्र ही गोकुलमें नन्दके घर पहुँचा देंगे और वहाँसे
यशोदातनयां नीत्वा स्वगृहे कंसभूपुजे।<br>दास्यत्यथ च तां हन्तुं कंस आक्षेप्स्यति क्षितौ॥ ६१यशोदाकी कन्याको लाकर अपने घरमें राजा कंसको दे देंगे। तब कंस उस कन्याको मारनेके लिये उसे पृथ्वीपर पटक देगा॥ ६०-६१॥
सा तद्धस्ताद् विनिर्गत्य सद्यो दिव्यवपुर्धरा।<br>मदंशभूता विन्ध्याद्रौ करिष्यति जगद्धितम्॥ ६२तदनन्तर उसके हाथसे छूटकर मेरी अंशस्वरूपा वह कन्या तत्क्षण अलौकिक रूप धारण करके विन्ध्यपर्वतपर चली जायगी और निरन्तर जगत्का कल्याण करेगी॥ ६२॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा प्रणम्य जगदम्बिकाम्।<br>गर्गा मुनिः प्रसन्नात्मा मथुरामागमत् पुरीम्॥ ६३इस प्रकार उस आकाशवाणीको सुनकर गर्गमुनि भगवती जगदम्बाको प्रणाम करके प्रसन्न मनसे मथुरापुरी आ गये॥ ६३॥
वरदानं महादेव्या गर्गाचार्यमुखादहम्।<br>श्रुत्वा सभार्यः सम्प्रीतः परां मुदमथागमम्॥ ६४आचार्य गर्गके मुखसे महादेवीके वरदानकी बात सुनकर मैं पत्नीसहित अत्यन्त प्रसन्न हुआ और परम आनन्दविभोर हो उठा॥ ६४॥

४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २

तदारभ्य परं जाने देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>अधुनापि हि देवर्षे श्रुतं तव मुखाम्बुजात्॥ ६५तभीसे मैं देवीके अत्युत्तम माहात्म्यको जान रहा हूँ और हे देवर्षे ! आज भी आपके मुखारविन्दसे मैंने वही देवीमाहात्म्य सुना है॥ ६५॥
अतो भागवतं देव्यास्त्वमेव श्रावय प्रभो।<br>मद्भाग्यादेव देवर्षे सम्प्राप्तोऽसि दयानिधे॥ ६६अतः हे प्रभो ! अब आप ही मुझे श्रीमद्देवीभागवत सुनाइये। हे दयानिधान ! मेरे सौभाग्यसे ही आप यहाँ पधारे हुए हैं॥ ६६॥
वसुदेववचः श्रुत्वा नारदः प्रीतमानसः।<br>सुदिने शुभनक्षत्रे कथारम्भमथाकरोत्॥ ६७वसुदेवजीका वचन सुनकर प्रसन्न मनवाले नारदजीने शुभ दिन एवं शुभ नक्षत्रमें श्रीमद्देवीभागवतकी कथा आरम्भ की॥ ६७॥
कथाविघ्नविघातार्थं द्विजा जेपुर्नवाक्षरम्।<br>मार्कण्डेयपुराणोक्तं पेठुर्देव्याः स्तवं तथा॥ ६८कथामें आनेवाली विघ्न-बाधाओंके शमनार्थ ब्राह्मण देवीके नवाक्षर (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे)-मन्त्रका जप तथा मार्कण्डेयपुराणमें वर्णित देवीस्तोत्रका पाठ करने लगे॥ ६८॥
प्रथमस्कन्धमारभ्य श्रीनारदमुखोद्गतम्।<br>शुश्राव वसुदेवश्च भक्त्या भागवतामृतम्॥ ६९प्रथम स्कन्धके आरम्भसे ही वसुदेवजी देवर्षि नारदके मुखसे निःसृत अमृतरूप श्रीमद्देवीभागवत-पुराणका भक्तिपूर्वक श्रवण करने लगे॥ ६९॥
नवमेऽह्नि कथापूर्तौ पुस्तकं वाचकं तथा।<br>प्रसन्नः पूजयामास वसुदेवो महामनाः॥ ७०नौवें दिन कथाकी समाप्ति होनेपर महामनस्वी वसुदेवजीने श्रीमद्देवीभागवतग्रन्थ तथा कथावाचक दोनोंकी प्रसन्नतापूर्वक पूजा की॥ ७०॥
अथ तत्र बिलस्यान्तः कृष्णाजाम्बवतोर्मृधे।<br>कृष्णमुष्टिविनिष्पातश्लथाङ्गो जाम्बवानभूत्॥ ७१उधर कन्दरामें श्रीकृष्ण तथा जाम्बवान्के बीच चल रहे युद्धमें श्रीकृष्णके मुष्टिकाप्रहारोंसे जाम्बवान्का शरीर अत्यन्त शिथिल पड़ गया था॥ ७१॥
अथागतस्मृतिः सोऽपि भगवन्तं प्रणम्य च।<br>उवाच परया भक्त्या स्वापराधं क्षमापयन्॥ ७२उसी समय जाम्बवान्‌को भी पूर्वकालकी घटनाएँ याद आ गयीं और भगवान् श्रीकृष्णको परम भक्तिके साथ प्रणाम करके अपने अपराधके लिये क्षमा-याचना करते हुए उसने श्रीकृष्णसे कहा—अब मुझे
ज्ञातोऽसि रघुवर्यस्त्वं यद्रोषात् सरितांपतिः।<br>क्षोभं जगाम लङ्का च रावणः सानुगो हतः॥ ७३ज्ञात हो गया कि आप रघुश्रेष्ठ श्रीराम ही हैं, जिनके भयंकर कोपसे सागर तथा लंकानगरी—दोनों क्षुब्ध हो गये थे और रावण अपने बन्धु-बान्धवोंसहित मारा गया था॥ ७२-७३॥
स एवासि भवान् कृष्ण मद्दौरात्म्यं क्षमस्व भोः।<br>ब्रूहि यत् करणीयं मे भृत्योऽहं तव सर्वथा॥ ७४हे श्रीकृष्ण! वे राम आप ही हैं, अतः मेरी धृष्टताको क्षमा करें। मैं आपका सर्वथा सेवक हूँ, अतएव मेरेयोग्य जो भी कार्य हो, उसके लिये मुझे आदेश दीजिये॥ ७४॥
श्रुत्वा जाम्बवतो वाचमब्रवीज्जगदीश्वरः।<br>मणिहेतोरिह प्राप्ता वयमृक्षपते बिलम्॥ ७५जाम्बवान्का वचन सुनकर जगत्पति श्रीकृष्ण बोले—हे ऋक्षराज! मणि प्राप्त करनेके लिये हमलोग इस कन्दरामें आये हुए हैं॥ ७५॥

अ० ३ ] माहात्म्य ४५

अ० ३ ] माहात्म्य ४५

ऋक्षराजस्ततः प्रीत्या कन्यां जाम्बवतीं निजाम्।<br>ददौ कृष्णाय सम्पूज्य स्यमन्तकमणिं तथा॥ ७६तत्पश्चात् ऋक्षराज जाम्बवान्‌ने श्रीकृष्णकी विधिवत् पूजा करके स्यमन्तकमणि तथा अपनी पुत्री जाम्बवती उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अर्पित कर दी॥ ७६॥
स तां पत्नीं समादाय मणिं कण्ठे तथादधत्।<br>अभिमन्त्र्यर्क्षराजञ्च प्रतस्थे द्वारकां प्रति॥ ७७श्रीकृष्णने जाम्बवतीको पत्नीके रूपमें अंगीकार करके मणिको गलेमें धारण कर लिया और ऋक्षराज जाम्बवान्‌से विदा लेकर वे द्वारकापुरीके लिये प्रस्थित हुए॥ ७७॥
कथासमाप्तिदिवसे वसुदेव उदारधीः।<br>ब्राह्मणान् भोजयामास दक्षिणाभिरतोषयत्॥ ७८उधर द्वारकामें उदारहृदय श्रीवसुदेवजीने श्रीमद्देवीभागवतपुराण-कथाकी समाप्तिके दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराया तथा नानाविध दक्षिणाओंसे उन्हें सन्तुष्ट किया॥ ७८॥
आशीर्वाचं प्रयुञ्जाना द्विजा यत्समये हरिः।<br>आजगाम क्षणे तस्मिन् पत्न्या सह मणिं दधत्॥ ७९जिस समय वे ब्राह्मण वसुदेवको आशीर्वचन प्रदान कर रहे थे, उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण मणि धारण किये हुए पत्नी जाम्बवतीके साथ वहाँ आ पहुँचे॥ ७९॥
भार्यया सहितं कृष्णं वसुदेवपुरोगमाः।<br>दृष्ट्वा हर्षाश्रुपूर्णाक्षाः समवापुः परां मुदम्॥ ८०भार्यासहित भगवान् श्रीकृष्णको देखकर वसुदेवजी तथा उपस्थित जनसमूहकी आँखें हर्षातिरेकके अश्रुसे परिपूर्ण हो गयीं और वे परम आनन्दित हुए॥ ८०॥
देवर्षिर्नारदश्चाथ कृष्णागमनहर्षितः।<br>आमन्त्र्य वसुदेवं च कृष्णं ब्रह्मसभां ययौ॥ ८१देवर्षि नारद भी श्रीकृष्णके आगमनसे हर्षित हुए और उन्होंने वसुदेवजी तथा श्रीकृष्णसे विदा लेकर ब्रह्मसभाके लिये प्रस्थान किया॥ ८१॥
हरिचरितमिदं यत्कीर्तितं दुर्यशोघ्नं<br>पठति विमलभक्त्या शुद्धचित्तः शृणोति।<br>स भवति सुखपूर्णः सर्वदा सिद्धकामो<br>जगति च वपुषोऽन्ते मुक्तिमार्गं लभेच्च॥ ८२जो मनुष्य निष्कपट भक्ति एवं शुद्ध हृदयसे भगवान्‌के इस विख्यात तथा कलंकनाशक चरित्रका पाठ एवं श्रवण करता है, वह पूर्ण सुखी हो जाता है, जगत्‌में उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा मृत्युके अनन्तर वह मोक्षपद प्राप्त करता है॥ ८२॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये वसुदेवस्य देवीभागवतनवाह-
श्रवणात्पुत्रप्राप्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


### अथ तृतीयोऽध्यायः
#### श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुद्युम्नकी कथा

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|---|---|
| **सूत उवाच**<br>अथेतिहासमन्यच्च शृणुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>देवीभागवतस्यास्य माहात्म्यं यत्र गीयते॥ १ | **सूतजी बोले—** हे मुनिवरो! अब आपलोग एक अन्य इतिहास सुनिये, जिसमें इस देवीभागवतके माहात्म्यका वर्णन किया गया है॥ १॥ |
| एकदा कुम्भयोनिस्तु लोपामुद्रापतिर्मुनिः।<br>गत्वा कुमारमभ्यर्च्य पप्रच्छ विविधाः कथाः॥ २ | एक बार कुम्भयोनि लोपामुद्रापति महर्षि अगस्त्यने कुमार कार्तिकेयके पास जाकर उनकी भलीभाँति पूजा करके उनसे विविध प्रकारकी बातें पूछीं॥ २॥ |
४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
स तस्मै भगवान् स्कन्दः कथयामास भूरिशः।<br>दानतीर्थव्रतादीनां माहात्म्योपचिताः कथाः॥ ३<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं मणिकर्णीभवं तथा।<br>गङ्गायाश्चापि तीर्थानां वर्णितं बहुविस्तरम्॥ ४भगवान् कार्तिकेयने दान-तीर्थ-व्रतादिके माहात्म्यसे परिपूर्ण अनेक कथाओंका वर्णन उनसे किया। उन्होंने वाराणसी, मणिकर्णिका, गंगा तथा अनेक तीर्थोंके माहात्म्यका अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन किया॥ ३-४॥
श्रुत्वाथ स मुनिः प्रीतः कुमारं भूरिवर्चसम्।<br>पुनः पप्रच्छ लोकानां हितार्थं कुम्भसम्भवः॥ ५उसे सुनकर अगस्त्यमुनि परम प्रसन्न हुए और उन्होंने महातेजसम्पन्न कुमार कार्तिकेयसे लोक-कल्याणके लिये पुनः पूछा॥ ५॥
अगस्त्य उवाच<br>भगवंस्तारकाराते देवीभागवतस्य तु।<br>माहात्म्यं श्रवणे तस्य विधिं चापि वद प्रभो॥ ६अगस्त्यजी बोले—हे तारकरिपु! हे भगवन्! हे प्रभो! आप मुझे देवीभागवतके माहात्म्य तथा उसके श्रवणकी विधि भी बतायें॥ ६॥
देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम्।<br>त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती॥ ७श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है॥ ७॥
स्कन्द उवाच<br>श्रीभागवतमाहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात् क्षमः।<br>शृणु संक्षेपतो ब्रह्मन् कथयिष्यामि साम्प्रतम्॥ ८कार्तिकेय बोले—हे ब्रह्मन्! श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यको विस्तारपूर्वक कहनेमें कौन समर्थ है? मैं इस समय संक्षेपमें इसे कहूँगा, आप सुनिये॥ ८॥
या नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी जगदम्बिका।<br>साक्षात् समाश्रिता यत्र भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी॥ ९जो शाश्वती, सच्चिदानन्दस्वरूपा, भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली जगदम्बा हैं, वे स्वयं इस पुराणमें विराजमान रहती हैं॥ ९॥
अतस्तद्वाङ्मयी मूर्तिर्देवीभागवते मुने।<br>पठनाच्छ्रवणाद्यस्य न किञ्चिदिह दुर्लभम्॥ १०अतएव हे मुने! यह श्रीमद्देवीभागवत उन जगदम्बिकाकी वाङ्मयी मूर्ति है, जिसके पठन एवं श्रवणसे इस लोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ १०॥
आसीद्विवस्वतः पुत्रः श्राद्धदेव इति श्रुतः।<br>सोऽनपत्योऽकरोदिष्टं वसिष्ठानुमतो नृपः॥ ११विवस्वान्‌के एक पुत्र हुए, जो श्राद्धदेव नामसे प्रसिद्ध थे। सन्तानरहित होनेके कारण उन राजा श्राद्धदेवने वसिष्ठमुनिकी अनुमतिसे पुत्रेष्टि यज्ञ किया॥ ११॥
होतारं प्रार्थयामास श्रद्धाथ दयिता मनोः।<br>कन्या भवतु मे ब्रह्मंस्तथोपायो विधीयताम्॥ १२तत्पश्चात् मनु श्राद्धदेवकी भार्या श्रद्धाने यज्ञके होतासे प्रार्थना की—हे ब्रह्मन्! आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे मुझे कन्याकी प्राप्ति हो॥ १२॥
मनसा चिन्तयन् होता कन्यामेवाजुहोद्धविः।<br>ततस्तद्व्यभिचारेण कन्येला नाम चाभवत्॥ १३अतः होताने मनमें कन्या-प्राप्तिका संकल्प करते हुए आहुति डाली और उसके विपरीत भावके फलस्वरूप एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'इला' रखा गया॥ १३॥
अथ राजा सुतां दृष्ट्वा प्रोवाच विमना गुरुम्।<br>कथं सङ्कल्पवैषम्यमिह जातं प्रभो तव॥ १४इसके बाद पुत्रीको देखकर उदास मनवाले राजा श्राद्धदेवने गुरु वसिष्ठसे कहा—हे प्रभो! पुत्र-प्राप्तिके आपके संकल्पके विपरीत यह कन्या कैसे उत्पन्न हो गयी?॥ १४॥

| अ० ३ ] | माहात्म्य | ४७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तच्छ्रुत्वा स मुनिर्दध्यौ ज्ञात्वा होतुर्व्यतिक्रमम्।<br>ईश्वरं शरणं यात इलायाः पुंस्त्वकाम्यया॥ १५यह सुनकर महर्षि वसिष्ठने ध्यान लगाया, इसमें होताका व्यतिक्रम जानकर वे इलाको पुत्र बनानेकी कामनासे ईश्वरकी शरणमें गये॥ १५॥
मुनेस्तपःप्रभावाच्च परेशानुग्रहात्तथा।<br>पश्यतां सर्वलोकानामिला पुरुषतामगात्॥ १६मुनिके तपप्रभाव और भगवान्‌की कृपासे सभी लोगोंके देखते-देखते इला कन्यासे पुरुषरूपमें परिवर्तित हो गयी॥ १६॥
गुरुणा कृतसंस्कारः सुद्युम्नोऽथ मनोः सुतः।<br>निधिर्बभूव विद्यानां सरितामिव सागरः॥ १७इसके बाद गुरु वसिष्ठने पूर्णरूपसे संस्कार करके उसका नाम 'सुद्युम्न' रखा। वे मनुपुत्र सुद्युम्न सभी नदियोंके निधानभूत सागरकी भाँति सभी विद्याओंके निधान हो गये॥ १७॥
अथ कालेन सुद्युम्नस्तारुण्यं समवाप्य च।<br>मृगयार्थं वनं यातो हयमारुह्य सैन्धवम्॥ १८कुछ समय बीतनेपर सुद्युम्न युवा हुए और एक दिन सिन्धुदेशीय घोड़ेपर चढ़कर वे आखेटके लिये वनमें गये॥ १८॥
वनाद् वनान्तरं गच्छन् बहु बभ्राम सानुगः।<br>दैवादधस्ताद्धेमाद्रेः स कुमारो वनं ययौ॥ १९<br><br>कस्मिंश्चित् समये यत्र भार्यायापर्णया सह।<br>अरमद्देवदेवस्तु शङ्करो भगवान् मुदा॥ २०अपने सहचरोंके साथ वे कुमार सुद्युम्न एक वनसे दूसरे वनमें जाते हुए भटकते रहे और फिर संयोगसे वे हिमालयकी तलहटीके उस वनमें पहुँच गये जहाँ किसी समय देवाधिदेव भगवान् शंकर अपनी भार्या अपर्णाके साथ आनन्दपूर्ण मुद्रामें रमण कर रहे थे॥ १९-२०॥
तदा तु मुनयस्तत्र शिवदर्शनलालसाः।<br>आजग्मुरथ तान् दृष्ट्वा गिरिजा व्रीडिताभवत्॥ २१उसी समय भगवान् शंकरके दर्शनकी अभिलाषासे मुनिगण वहाँ आ गये और उन्हें देखकर पार्वतीजी लज्जित हो गयीं॥ २१॥
रममाणौ तु तौ दृष्ट्वा गिरिशौ संशितव्रताः।<br>निवृत्ता मुनयो जग्मुर्वैकुण्ठनिलयं तदा॥ २२तब शिव एवं पार्वतीको रमण करते देखकर उत्तम व्रत धारण करनेवाले वे मुनिगण वहाँसे लौटकर वैकुण्ठ-धामकी ओर चल दिये॥ २२॥
प्रियायाः प्रियमन्विच्छञ्छिवोऽरण्यं शशाप ह।<br>अद्यारभ्य विशेद्योऽत्र पुमान् योषिद् भवेदिति॥ २३तदनन्तर अपनी प्रियतमाको प्रसन्न करनेके लिये भगवान्‌ने उस अरण्यको शाप दे दिया कि आजसे जो भी पुरुष यहाँ प्रवेश करेगा, वह स्त्री हो जायगा॥ २३॥
तत आरभ्य तं देशं पुरुषा वर्जयन्ति हि।<br>तत्र प्रविष्टः सुद्युम्नो बभूव प्रमदोत्तमा॥ २४तभीसे पुरुषोंने उस वनमें जाना त्याग दिया था और संयोगवश वहाँ पहुँचते ही सुद्युम्न एक लावण्यमयी स्त्रीके रूपमें परिवर्तित हो गये॥ २४॥
स्त्रीभूताननुगानश्वं वडवां वीक्ष्य विस्मितः।<br>अथ सा सुन्दरी योषा विचचार वने वने॥ २५अपने सभी अनुचरोंको पुरुषसे स्त्री तथा घोड़ोंको घोड़ियोंमें रूपान्तरित हुआ देखकर सुद्युम्न आश्चर्यचकित हो गये। अब वह रूपवती तरुणी वन-वनमें विचरण करने लगी॥ २५॥
४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३

| एकदा सा जगामाथ बुधस्याश्रमसन्निधौ।<br>दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं पीनोन्नतपयोधराम्॥ २६<br><br>बिम्बोष्ठीं कुन्ददशनां सुमुखीमुत्पलेक्षणाम्।<br>अनङ्गशरविद्धाङ्गश्चकमे भगवान् बुधः॥ २७ | एक बार वह बुधके आश्रमके समीप पहुँची। स्थूल तथा उन्नत स्तनोंवाली, बिम्ब-फलके समान लाल ओठोंवाली, कुन्दफूलके समान श्वेत दाँतोंवाली, सुन्दर मुख तथा कमलके समान नयनोंवाली उस सर्वाङ्गसुन्दरी तरुणीको देखकर कामदेवके बाणोंसे बिंधे हुए अंगोंवाले भगवान् बुध उसपर मोहित हो गये॥ २६-२७॥ | | सापि तं चकमे सुभ्रूः कुमारं सोमनन्दनम्।<br>ततस्तस्याश्रमेऽवात्सीद्रममाणा बुधेन सा॥ २८ | वह सुन्दर भौंहोंवाली युवती भी चन्द्रपुत्र कुमार बुधपर आसक्त हो गयी और बुधके साथ रमण करती हुई उनके आश्रममें रहने लगी॥ २८॥ | | अथ कालेन कियता पुरूरवसमात्मजम्।<br>स तस्यां जनयामास मित्रावरुणसम्भवः॥ २९ | हे महर्षि अगस्त्य! कुछ समय बाद बुधने उस तरुणीसे पुरूरवा नामक पुत्रको उत्पन्न किया॥ २९॥ | | अथ वर्षेषु यातेषु कदाचित् सा बुधाश्रमे।<br>स्मृत्वा स्वं पूर्ववृत्तान्तं दुःखिता निर्जगाम ह॥ ३० | इस प्रकार बुधके आश्रममें रहते हुए कई वर्ष बीत जानेपर किसी समय उसे अपने पूर्व वृत्तान्तका स्मरण हो आया और वह दुःखित होकर आश्रमसे चली गयी॥ ३०॥ | | गुरोरथाश्रमं गत्वा वसिष्ठस्य प्रणम्य तम्।<br>निवेद्य वृत्तं शरणं ययौ पुंस्त्वमभीप्सती॥ ३१ | इसके बाद गुरु वसिष्ठके आश्रममें पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया और सारा वृत्तान्त कहकर पुरुषत्वकी कामना करती हुई वह उनके शरणागत हो गयी॥ ३१॥ | | वसिष्ठो ज्ञातवृत्तान्तो गत्वा कैलासपर्वतम्।<br>सम्पूज्य शम्भुं तुष्टाव भक्त्या परमया युतः॥ ३२ | इस प्रकार सभी बातोंको जानकर वसिष्ठजी कैलास-पर्वतपर जाकर विधि-विधानसे भगवान् शंकरकी पूजा करके परम भक्तिसे उनकी स्तुति करने लगे॥ ३२॥ | | वसिष्ठ उवाच<br>नमो नमः शिवायस्तु शङ्कराय कपर्दिने।<br>गिरिजार्द्धाङ्गदेहाय नमस्ते चन्द्रमौलये॥ ३३ | **वसिष्ठजी बोले—**शिव, शंकर, कपर्दी, गिरिजाके अर्धांग एवं चन्द्रमौलिको बार-बार नमस्कार है॥ ३३॥ | | मृडाय सुखदात्रे ते नमः कैलासवासिने।<br>नीलकण्ठाय भक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने॥ ३४ | मृड, सुखदाता, कैलासवासी, नीलकण्ठ, भक्तोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है॥ ३४॥ | | शिवाय शिवरूपाय प्रपन्नभयहारिणे।<br>नमो वृषभवाहाय शरण्याय परात्मने॥ ३५ | शिव, शिवस्वरूप, शरणागतभयहारी, वृषभवाहन, शरणदाता परमात्माको नमस्कार है॥ ३५॥ | | ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाय सर्गस्थितिलयेषु च।<br>नमो देवाधिदेवाय वरदाय पुरारये॥ ३६ | सृजन, पालन तथा संहारके समय ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशरूपधारी, देवाधिदेव, वरदायक तथा त्रिपुरारिको मेरा नमस्कार है॥ ३६॥ | | यज्ञरूपाय यजतां फलदात्रे नमो नमः।<br>गङ्गाधराय सूर्येन्दुशिखिनेत्राय ते नमः॥ ३७ | यज्ञरूप तथा याजकोंके फलदाताको बार-बार नमस्कार है। आप गंगाधर, सूर्य-चन्द्र-अग्निस্বরূপ त्रिनेत्रको मेरा नमस्कार है॥ ३७॥ |

अ० ३ ] माहात्म्य ४९

अ० ३ ] माहात्म्य ४९


एवं स्तुतः स भगवान् प्रादुरासीज्जगत्पतिः।<br>वृषारूढोऽम्बिकोपेतः कोटिसूर्यसमप्रभः॥ ३८<br><br>रजताचलगसंकाशस्त्रिनेत्रश्चन्द्रशेखरः ।<br>प्रणतं परितुष्टात्मा प्रोवाच मुनिसत्तमम्॥ ३९इस प्रकार मुनि वसिष्ठके द्वारा स्तुति किये जानेपर करोड़ों सूर्यसदृश प्रभासे युक्त एवं भगवती पार्वतीके साथ नन्दीपर आरूढ़ वे जगत्पति भगवान् शंकर प्रकट हो गये॥ ३८॥<br>चाँदीके पर्वतके समान प्रभाववाले, त्रिनेत्रधारी भगवान् चन्द्रशेखर शरणमें आये हुए मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले॥ ३९॥
श्रीभगवानुवाच<br>वरं वरय विप्रर्षे यत्ते मनसि वर्तते।<br>इत्युक्तस्तं प्रणम्येलापुंस्त्वमभ्यर्थयन्मुनिः॥ ४०श्रीभगवान्‌ने कहा— हे विप्रर्षे! आपके मनमें जो भी इच्छा हो, वह वर माँगिये। उनके इस प्रकार कहनेपर गुरु वसिष्ठने प्रणाम करके इलाकी पुरुषत्वप्राप्तिके लिये उनसे प्रार्थना की॥ ४०॥
अथ प्रसन्नो भगवानुवाच मुनिसत्तमम्।<br>मासं पुमान् स भविता मासं नारी भविष्यति॥ ४१इसके बाद प्रसन्न होकर शंकरजीने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे कहा कि एक मासतक वह पुरुषरूपमें तथा एक मासतक नारीरूपमें रहेगी॥ ४१॥
इति प्राप्य वरं शाम्भोर्महर्षिर्जगदम्बिकाम्।<br>वरदानोन्मुखीं देवीं प्रणनाम महेश्वरीम्॥ ४२इस प्रकार शिवजीसे वर प्राप्त करके महर्षि वसिष्ठने वर प्रदान करनेके लिये सदा उत्सुक रहनेवाली जगदम्बिका पार्वतीको प्रणाम किया॥ ४२॥
कोटिचन्द्रकलाकान्तिं सुस्मितां परिपूज्य च।<br>तुष्टाव भक्त्या सततमिलायाः पुंस्त्वकाम्यया॥ ४३करोड़ों चन्द्रमाकी कला-कान्तिसे युक्त तथा सुन्दर मुसकानवाली भगवतीकी सम्यक् पूजा करके सदाके लिये इलाकी पुरुषत्वप्राप्तिकी कामनासे वसिष्ठजी श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करने लगे॥ ४३॥
जय देवि महादेवि भक्तानुग्रहकारिणि।<br>जय सर्वसुराराध्ये जयानन्तगुणालये॥ ४४हे देवि! हे महादेवि! हे भक्तोंपर कृपा करनेवाली भगवति! आपकी जय हो। हे समस्त देवोंकी आराध्यस्वरूपा और अनन्त गुणोंकी आगार! आपकी जय हो॥ ४४॥
नमो नमस्ते देवेशि शरणागतवत्सले।<br>जय दुर्गे दुःखहन्त्रि दुष्टदैत्यनिषूदिनि॥ ४५हे देवेश्वरि! हे शरणागतवत्सले! आपको बार-बार नमस्कार है। हे दुःखहारिणि! हे दुष्ट दानवोंका नाश करनेवाली भगवति! आपकी जय हो॥ ४५॥
भक्तिगम्ये महामाये नमस्ते जगदम्बिके।<br>संसारसागरोत्तारपोतीभूतपदाम्बुजे ॥ ४६हे भक्तिसे प्राप्त होनेवाली भगवति! हे महामाये! हे जगदम्बिके! हे भवसागरसे पार उतारनेके लिये नौका-स्वरूप चरणकमलवाली! आपको नमस्कार है॥ ४६॥
ब्रह्मादयोऽपि विबुधास्त्वत्पादाम्बुजसेवया।<br>विश्वसर्गस्थितिलयप्रभुत्वं समवाप्नुयुः॥ ४७आपके चरणकमलोंकी सेवासे ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश आदि देवता विश्वके सृजन, पालन तथा संहारहेतु सामर्थ्य प्राप्त करते हैं॥ ४७॥
प्रसन्ना भव देवेशि चतुर्वर्गप्रदायिनि।<br>कस्त्वां स्तोतुं क्षमो देवि केवलं प्रणतोऽस्म्यहम्॥ ४८पुरुषार्थचतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) प्रदान करनेवाली हे देवेश्वरि! आप प्रसन्न हों। हे देवि! आपकी स्तुति करनेमें भला कौन समर्थ है, अतः मैं आपको केवल प्रणाम कर रहा हूँ॥ ४८॥
५०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३

| एवं स्तुता भगवती दुर्गा नारायणी परा।<br>भक्त्या वसिष्ठमुनिना प्रसन्ना तत्क्षणादभूत्॥ ४९ | महर्षि वसिष्ठजीद्वारा इस प्रकार भक्ति-भावसे स्तुति किये जानेपर नारायणी पराम्बा दुर्गा भगवती तत्काल प्रसन्न हो गयीं॥ ४९॥ | | तदोवाच महादेवी प्रणतार्तिहरी मुनिम्।<br>सुद्युम्नभवनं गत्वा कुरु भक्त्या मदर्चनम्॥ ५० | तदनन्तर भक्तजनोंका दुःख दूर करनेवाली महादेवीने मुनि वसिष्ठसे कहा—हे मुनिश्रेष्ठ! आप सुद्युम्नके घर जाकर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करें॥ ५०॥ | | सुद्युम्नं श्रावय प्रीत्या पुराणं मत्प्रियङ्करम्।<br>देवीभागवतं नाम नवाहोभिर्द्विजोत्तम॥ ५१ | हे द्विजश्रेष्ठ! सुद्युम्नको नौ दिनोंमें मुझे प्रसन्नता प्रदान करनेवाले श्रीमद्देवीभागवतपुराणका प्रेमपूर्वक श्रवण कराइये॥ ५१॥ | | श्रवणादेव सततं पुंस्त्वमस्य भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा च तिरोधानं गच्छतः स्म शिवेश्वरौ॥ ५२ | उसके श्रवणमात्रसे उसे सर्वदाके लिये पुरुषत्वकी प्राप्ति हो जायगी। ऐसा कहकर भगवती पार्वती तथा भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये॥ ५२॥ | | वसिष्ठस्तां दिशं नत्वा समागत्याश्रमं निजम्।<br>समाहूय च सुद्युम्नं देव्याराधनमादिशत्॥ ५३ | इसके पश्चात् वसिष्ठजी उस दिशाको नमस्कारकर अपने आश्रमको लौट आये और सुद्युम्नको बुलाकर उन्होंने देवीकी आराधना करनेके लिये उन्हें आदेश दिया॥ ५३॥ | | आश्विनस्य सिते पक्षे सम्पूज्य जगदम्बिकाम्।<br>नवरात्रविधानेन श्रावयामास भूपतिम्॥ ५४ | आश्विनमासके शुक्लपक्षमें जगदम्बाकी विधिवत् पूजा करके वसिष्ठजीने राजाको नवरात्र-विधानके अनुसार श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनाया॥ ५४॥ | | श्रुत्वा भक्त्यापि सुद्युम्नः श्रीमद्भागवतामृतम्।<br>प्रणम्याभ्यर्च्य च गुरुं लेभे पुंस्त्वं निरन्तरम्॥ ५५ | इस प्रकार अमृतरूप श्रीमद्देवीभागवतपुराणको भक्तिपूर्वक सुनकर और गुरु वसिष्ठका पूजन-वन्दन करके सुद्युम्नने सदाके लिये पुरुषत्व प्राप्त कर लिया॥ ५५॥ | | राज्यासनेऽभिषिक्तस्तु वसिष्ठेन महर्षिणा।<br>भुवं शशास धर्मेण प्रजाश्चैवानुरञ्जयन्॥ ५६ | महर्षि वसिष्ठने सुद्युम्नका राज्याभिषेक किया और वे प्रजाओंको प्रसन्न रखते हुए धर्मपूर्वक भूमण्डलपर शासन करने लगे॥ ५६॥ | | ईजे च विविधैर्यज्ञैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः।<br>पुत्रेषु राज्यं सन्दिश्य प्राप देव्याः सलोकताम्॥ ५७ | सुद्युम्नने अत्यन्त श्रेष्ठ दक्षिणावाले भाँति-भाँतिके यज्ञ किये और अन्तमें पुत्रोंको राज्यका शासन सौंपकर वे देवीलोकको प्राप्त हुए॥ ५७॥ | | इति कथितमशेषं सेतिहासं च विप्रा<br>यदि पठति सुभक्त्या मानवो वा शृणोति।<br>स इह सकलकामान् प्राप्य देव्याः प्रसादात्<br>परममृतमथान्ते याति देव्याः सलोकम्॥ ५८ | हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंको इतिहाससहित देवीमाहात्म्य बता दिया। यदि कोई मनुष्य सद्भक्तिके साथ इसे पढ़ता अथवा सुनता है तो वह देवीकी कृपासे इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करके अन्तमें देवीके परम सत्यस्वरूप सालोक्यको प्राप्त कर लेता है॥ ५८॥ |

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवतनवाहश्रवणादिलायाः पुंस्त्वप्राप्तिवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अ० ४ ] माहात्म्य ५१

अ० ४ ] माहात्म्य ५१

अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें रेवती नक्षत्रके पतन और पुनः स्थापनकी कथा तथा श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे राजा दुर्दमको मन्वन्तराधिप-पुत्रकी प्राप्ति

सूत उवाचसूतजी बोले—
इति श्रुत्वा कथां दिव्यां विचित्रां कुम्भसम्भवः।<br>शुश्रूषुः पुनराहेदं विशाखं विनयान्वितः॥ १इस अलौकिक एवं विचित्र कथाको सुनकर पुनः सुननेकी इच्छावाले अगस्त्यजीने बड़ी विनम्रतापूर्वक भगवान् कार्तिकेयसे कहा— ॥ १ ॥
अगस्त्य उवाच<br>देवसेनापते देव विचित्रेयं श्रुता कथा।<br>पुनरन्यच्च माहात्म्यं वद भागवतस्य मे॥ २अगस्त्यजी बोले— हे देवसेनापते! हे देव! मैंने यह विचित्र कथा सुन ली, अब आप श्रीमद्देवीभागवतका दूसरा माहात्म्य मुझे बतायें ॥ २ ॥
स्कन्द उवाच<br>मित्रावरुणसम्भूत मुने शृणु कथामिमाम्।<br>यत्रैकदेशमहिमा प्रोक्तो भागवतस्य तु॥ ३<br>वर्ण्यते धर्मविस्तारो गायत्रीमधिकृत्य च।<br>गायत्र्या महिमा यत्र तद् भागवतमिष्यते॥ ४कार्तिकेयजी बोले— हे मित्रावरुणसे प्रकट होनेवाले मुने! अब आप यह कथा सुनें, जिसके एक अंशमें भागवतकी महिमा कही गयी हो, धर्मका विशद वर्णन किया गया हो और गायत्रीका प्रसंग आरम्भ करके उसकी महिमा दर्शायी गयी हो, उसे भागवतके रूपमें जाना जाता है ॥ ३-४ ॥
भगवत्या इदं यस्मात्तस्माद् भागवतं विदुः।<br>ब्रह्मविष्णुशिवारध्या परा भगवती हि सा॥ ५यह पुराण देवी भगवतीके माहात्म्यसे परिपूर्ण होनेके कारण देवीभागवत कहा जाता है। वे परा भगवती ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी आराध्या हैं ॥ ५ ॥
ऋतवागिति विख्यातो मुनिरासीन्महामतिः।<br>तस्य पुत्रोऽभवत्काले गण्डान्ते पौष्णभान्तिमे॥ ६ऋतवाक् नामसे विख्यात एक महान् बुद्धिसम्पन्न मुनि थे। रेवती नक्षत्रके अन्तिम भाग गण्डान्तयोगमें उनके यहाँ समयानुसार एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥
स तस्य जातकर्मादिक्रियाश्चक्रे यथाविधि।<br>चूड़ोपनयनादींश्च संस्कारानपि सोऽकरोत्॥ ७उन्होंने उस पुत्रकी जातकर्म आदि क्रियाएँ तथा चूड़ाकरण एवं उपनयन आदि संस्कार भी विधिपूर्वक सम्पन्न किये ॥ ७ ॥
यत आरभ्य जातोऽसौ पुत्रस्तस्य महात्मनः।<br>तत एवाथ स मुनिः शोकरोगाकुलोऽभवत्॥ ८<br>रोषलोभपरीतात्मा तथा मातापि तस्य च।<br>बहुरोगार्दिता नित्यं शुचा दुःखीकृता भृशम्॥ ९महात्मा ऋतवाक्‌के यहाँ जबसे वह पुत्र उत्पन्न हुआ, उसी समयसे वे शोक तथा रोगसे ग्रस्त रहने लगे और क्रोध एवं लोभने उन्हें घेर लिया। उस बालककी माता भी अनेक रोगोंसे ग्रसित होकर नित्य शोकाकुल और अति दुःखी रहने लगीं ॥ ८-९ ॥
ऋतवाक् स मुनिश्चिन्तामवाप भृशदुःखितः।<br>किमेतत् कारणं जातं पुत्रो मेऽत्यन्तदुर्मतिः॥ १०मुनि ऋतवाक् अत्यन्त दुःखी और चिन्तित होकर सोचने लगे कि ऐसा क्या कारण है कि मेरे यह अत्यन्त दुर्मति पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥
कस्यचिन्मुनिपुत्रस्य बलात् पत्नीं जहार च।<br>मेने शिक्षां पितुर्नासौ न च मातुर्विमूढधीः॥ ११[तरुणावस्थाको प्राप्त होनेपर] उसने किसी मुनिपुत्रकी पत्नीका बलपूर्वक हरण कर लिया। वह दुर्बुद्धि अपने माता-पिताकी शिक्षाओंपर कभी भी ध्यान नहीं देता था ॥ ११ ॥
५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४

| ततो विषण्णचित्तस्तु ऋतवागब्रवीदिदम्।<br>अपुत्रता वरं नृणां न कदाचित् कुपुत्रता ॥ १२ | तदनन्तर अत्यन्त दुःखित मनवाले ऋतवाक्ने यह कहा कि मनुष्योंके लिये पुत्रहीन रह जाना अच्छा है, किंतु कुपुत्रकी प्राप्ति कभी भी ठीक नहीं है ॥ १२ ॥ | | पितॄन् कुपुत्रः स्वर्गातान्निरये पातयत्यपि।<br>यावज्जीवेत् सदा पित्रोः केवलं दुःखदायकः ॥ १३ | कुपुत्र स्वर्गमें गये हुए पितरोंको भी नरकमें गिरा देता है। वह जबतक जीवित रहता है, तबतक माता-पिताको केवल कष्ट ही देता रहता है ॥ १३ ॥ | | पित्रोर्दुःखाय धिग्जन्म कुपुत्रस्य च पापिनः।<br>सुहृदां नोपकाराय नापकाराय वैरिणाम् ॥ १४ | अतएव माता-पिताको कष्ट पहुँचानेवाले पापी कुपुत्रके जन्मको धिक्कार है। ऐसा पुत्र मित्रोंका न तो उपकार कर सकता है और न शत्रुओंका अपकार ही ॥ १४ ॥ | | धन्यास्ते मानवा लोके सुपुत्रो यद्गृहे स्थितः।<br>परोपकारशीलश्च पितुर्मातुः सुखावहः ॥ १५ | संसारमें वे मानव धन्य हैं, जिनके घरमें परोपकारपरायण तथा माता-पिताको सुख देनेवाला पुत्र हुआ करता है ॥ १५ ॥ | | कुपुत्रेण कुलं नष्टं कुपुत्रेण हतं यशः।<br>कुपुत्रेणेह चामुत्र दुःखं निरययातनाः ॥ १६ | कुपुत्रसे कुल नष्ट हो जाता है, कुपुत्रसे यश नष्ट हो जाता है और कुपुत्रसे लौकिक तथा पारलौकिक—दोनों जगत्में दुःख तथा नारकीय यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं ॥ १६ ॥ | | कुपुत्रेणान्वयो नष्टो जन्म नष्टं कुभार्यया।<br>कुभोजनेन दिवसः कुमित्रेण सुखं कुतः ॥ १७ | कुपुत्रसे वंश नष्ट हो जाता है, दुष्ट पत्नीसे जीवन नष्ट हो जाता है, विकृत भोजनसे दिन व्यर्थ चला जाता है और दुरात्मा मित्रसे सुख कहाँसे मिल सकता है ! ॥ १७ ॥ | | स्कन्द उवाच<br>एवं दुष्टस्य पुत्रस्य दुष्टैराचरणैर्मुनिः।<br>तप्यमानोऽनिशं काले गत्वा गर्गमपृच्छत ॥ १८ | कार्तिकेयजी बोले— [ हे अगस्त्यजी ! ] अपने दुष्ट पुत्रके दुराचरणोंसे निरन्तर सन्तप्त रहते हुए मुनि ऋतवाक्ने किसी दिन गर्गऋषिके पास जाकर पूछा— ॥ १८ ॥ | | ऋतवागुवाच<br>भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छामि वद तत् प्रभो।<br>ज्योतिश्शास्त्रस्य चाचार्य पुत्रदौःशील्यकारणम् ॥ १९ | ऋतवाक् बोले— हे भगवन् ! हे ज्योतिषशास्त्रके आचार्य ! मैं आपसे अपने पुत्रकी दुःशीलताका कारण पूछना चाहता हूँ। हे प्रभो ! आप उसे बतायें ॥ १९ ॥ | | गुरुशुश्रूषया वेदा अधीता विधिवन्मया।<br>ब्रह्मचारिव्रतं तीर्त्वा विवाहो विधिवत् कृतः ॥ २० | गुरुकी निरन्तर सेवा करते हुए मैंने विधिपूर्वक वेदाध्ययन किया और ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके विधि-विधानके साथ विवाह किया ॥ २० ॥ | | भार्यया सह गार्हस्थ्यधर्मश्चानुष्ठितोऽनिशम्।<br>पञ्चयज्ञविधानं च मयाकारि यथाविधि ॥ २१ | अपनी भार्याके साथ मैंने गृहस्थधर्मका सदैव यथोचित पालन किया और विधिपूर्वक पंचयज्ञका अनुष्ठान किया ॥ २१ ॥ | | नरकाद् बिभ्यता विप्र न तु कामसुखेच्छया।<br>गर्भाधानं च विधिवत् पुत्रप्राप्त्यै मया कृतम् ॥ २२ | हे विप्र ! नरकप्राप्तिके भयसे बचनेके लिये पुत्र प्राप्त करनेकी कामनासे मैंने विधिवत् गर्भाधान किया था न कि वासनात्मक सुखप्राप्तिकी इच्छासे ॥ २२ ॥ |

| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुत्रोऽयं मम दोषेण मातुर्दोषेण वा मुने।<br>जातो दुःखাবহः पित्रोर्दुःशीलो बन्धुशोकदः॥ २३हे मुने! दुःखदायी, माता-पिताके प्रति उद्दण्ड तथा बन्धु-बान्धवोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह पुत्र मेरे दोषसे अथवा अपनी माताके दोषसे उत्पन्न हुआ ? ॥ २३ ॥
एतन्निशम्य वचनं गर्गाचार्यो मुनेस्तदा।<br>विचार्य सर्वं तद्धेतुं ज्योतिर्विद्वाचमब्रवीत्॥ २४तब ज्योतिषशास्त्रके ज्ञाता गर्गाचार्यने मुनि ऋतवाक्‌का यह वचन सुनकर सभी कारणोंपर सम्यक् रूपसे विचार करके कहा॥ २४॥
गर्ग उवाचगर्गाचार्यजी बोले—
मुने नैवापराधस्ते न मातुर्न कुलस्य च।<br>रेवत्यन्तं तु गण्डान्तं पुत्रदौःशील्यकारणम्॥ २५हे मुने! इसमें न तो आपका दोष है, न बालककी माताका दोष है और न तो कुलका दोष है। रेवती नक्षत्रका अन्तिम भाग—गण्डान्तयोग ही इस बालककी दुर्विनीतताका कारण है॥ २५॥
दुष्टे काले यतो जन्म पुत्रस्य तव भो मुने।<br>तेनैव तव दुःखाय नान्यो हेतुर्मनागपि॥ २६हे मुने! अशुभ वेलामें आपके पुत्रका जन्म हुआ है, इसी कारण यह आपको दुःख दे रहा है; इसमें लेशमात्र भी अन्य कोई कारण नहीं है॥ २६॥
तद्दुःखशान्तये ब्रह्मञ्जगतां मातरं शिवाम्।<br>समाराधय यत्नेन दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्॥ २७अतः हे ब्रह्मन्! इस दुःखके शमनके लिये आप प्रयत्नपूर्वक समस्त दुर्गत्तियोंका विनाश करनेवाली कल्याणी जगदम्बा दुर्गाकी आराधना कीजिये॥ २७॥
गर्गस्य वचनं श्रुत्वा ऋतवाक् क्रोधमूर्च्छितः।<br>रेवतीं तु शशापासौ व्योम्नः पततु रेवती॥ २८गर्गाचार्यजीका वचन सुनकर ऋतवाङ्मुनि क्रोधसे मूर्च्छित हो गये और उन्होंने रेवतीको शाप दे दिया कि वह आकाशसे नीचे गिर जाय॥ २८॥
दत्ते शापे तु तेनाथ पूष्णो भञ्च पपात खात्।<br>कुमुदाद्रौ भासमानं सर्वलोकस्य पश्यतः॥ २९ऋतवाक्‌के शाप देते ही चमकता हुआ रेवती नक्षत्र सभी लोगोंके देखते-देखते आकाशसे कुमुदपर्वतपर जा गिरा॥ २९॥
ख्यातो रैवतकश्चाभूत्तत्पातात् कुमुदाचलः।<br>अतीव रमणीयश्च ततः प्रभृति सोऽप्यभूत्॥ ३०वह कुमुदपर्वत रेवतीके गिरनेके कारण रैवतक नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसी समयसे वह अत्यन्त रमणीक हो गया॥ ३०॥
दत्त्वा शापं च रेवत्यै गर्गोक्तविधिना मुनिः।<br>समाराध्याम्बिकां देवीं सुखसौभाग्यभागभूत्॥ ३१रेवतीको शाप देकर मुनि ऋतवाक्‌ने महर्षि गर्गद्वारा बताये गये विधानके अनुसार देवी भगवतीकी सम्यक् आराधनाकर सुख और सौभाग्य प्राप्त किया॥ ३१॥
स्कन्द उवाचकार्तिकेयजी बोले—
रेवत्यृक्षस्य यत् तेजस्तस्माज्जाता तु कन्यका।<br>रूपेणाप्रतिमा लोके द्वितीया श्रीरिवाभवत्॥ ३२[हे अगस्त्यजी!] उस रेवती नक्षत्रके महान् तेजसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो अनुपम रूपवती होनेके कारण लोकमें दूसरी लक्ष्मीकी भाँति प्रतीत हो रही थी॥ ३२॥
अथ तां प्रमुचः कन्यां रेवतीकान्तिसम्भवाम्।<br>दृष्ट्वा नाम चकारास्या रेवतीति मुदा मुनिः॥ ३३रेवती नक्षत्रकी कान्तिसे प्रादुर्भूत उस कन्याको देखकर मुनि प्रमुचने प्रसन्न होकर उसका ‘रेवती’—यह नाम रख दिया॥ ३३॥

| ५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निन्येऽथ स्वाश्रमे चैनां पोषयामास धर्मतः।<br>ब्रह्मर्षिः प्रमुचो नाम कुमुदाद्रौ सुतामिव॥ ३४तदनन्तर ब्रह्मर्षि प्रमुच उसे कुमुदाचलपर स्थित अपने आश्रममें ले आये और पुत्रीकी भाँति उसका धर्मपूर्वक पालन-पोषण करने लगे॥ ३४॥
अथ कालेन च प्रौढां दृष्ट्वा तां रूपशालिनीम्।<br>स मुनिश्चिन्तयामास कोऽस्या योग्यो वरो भवेत्॥ ३५समय पाकर यौवनको प्राप्त उस रूपवती कन्याको देखकर मुनिने विचार किया कि इस कन्याके योग्य वर कौन होगा?॥ ३५॥
बहुधान्वेषयंस्तस्या नाससादोचितं पतिम्।<br>ततोऽग्निशालां संविश्य मुनिस्तुष्टाव पावकम्॥ ३६बहुत अन्वेषणके बाद भी जब मुनिको उसके योग्य कोई वर नहीं मिला, तब वे अग्निशालामें प्रवेश करके अग्निदेवकी स्तुति करने लगे॥ ३६॥
कन्यावरं तदाशंसत्प्रीतस्तमपि हव्यवाट्।<br>धर्म्मिष्ठो बलवान् वीरः प्रियवागपराजितः॥ ३७<br>दुर्दमो भविता भर्त्ता मुनेऽस्याः पृथिवीपतिः।<br>इति श्रुत्वा वचो वह्नेः प्रसन्नोऽभून्मुनिस्तदा॥ ३८प्रमुचऋषिके स्तुति-गानसे प्रसन्न होकर अग्निदेवने कन्याके योग्य वरका संकेत करते हुए कहा—हे मुने! इस कन्याके पति धर्मपरायण, बलशाली, वीर, प्रिय भाषण करनेवाले और अपराजेय राजा दुर्दम होंगे। तब अग्निदेवके इस वचनको सुनकर मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ ३७-३८॥
दैवादाखेटकव्याजात् तत्क्षणादागतो नृपः।<br>दुर्दमो नाम मेधावी तस्याश्रमपदं मुनेः॥ ३९संयोगसे उसी समय आखेटके बहाने दुर्दम नामक प्रतिभाशाली राजा मुनि प्रमुचके आश्रममें आ गये॥ ३९॥
पुत्रो विक्रमशीलस्य बलवान् वीर्य्यवत्तरः।<br>कालिन्दीजठरे जातः प्रियव्रतकुलोद्भवः॥ ४०बलवान् तथा अप्रतिम ओजसे सम्पन्न वे प्रियव्रतके वंशज राजा दुर्दम विक्रमशीलके पुत्र थे और कालिन्दीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे॥ ४०॥
मुनेराश्रममाविश्य तमदृष्ट्वा महामुनिम्।<br>आमन्त्र्य तां प्रिये चेति रेवतीं पृष्टवान् नृपः॥ ४१मुनिके आश्रममें प्रवेशकर और उन्हें वहाँ न देखकर राजा दुर्दमने रेवतीको ‘प्रिये’—इस शब्दसे सम्बोधित करके पूछा॥ ४१॥
राजोवाच<br>महर्षिर्भगवानस्मादाश्रमात् क्व गतः प्रिये।<br>तत्पादौ द्रष्टुमिच्छामि वद कल्याणि तत्त्वतः॥ ४२**राजा बोले—**हे प्रिये! महर्षि भगवान् प्रमुच इस आश्रमसे कहाँ गये हुए हैं? हे कल्याणि! मुझे सच-सच बताओ; मैं उनके चरणोंका दर्शन करना चाहता हूँ॥ ४२॥
कन्योवाच<br>अग्निशालामुपगतो महाराज महामुनिः।<br>निश्चक्रामाश्रमात् तूर्णं राजाप्याकर्ण्य तद्वचः॥ ४३**कन्या बोली—**हे महाराज! महामुनि अग्निशालामें गये हुए हैं। राजा भी यह वचन सुनकर शीघ्रतापूर्वक आश्रमसे बाहर निकल आये॥ ४३॥
अथाग्निशालाद्वारस्थं राजानं दुर्दमं मुनिः।<br>राजलक्षणसंयुक्तमपश्यत् प्रश्रयानतम्॥ ४४इसके बाद प्रमुचमुनिने राजलक्षणसम्पन्न एवं विनयावनत राजा दुर्दमको अग्निशालाके द्वारपर स्थित देखा॥ ४४॥
प्रणनाम च तं राजा मुनिः शिष्यमुवाच ह।<br>गौतमानीयतामर्घ्यमर्घ्ययोग्योऽस्ति भूपतिः॥ ४५मुनिको देखकर राजाने प्रणाम किया और तदनन्तर मुनि प्रमुचने शिष्यसे कहा—हे गौतम! ये राजा अर्घ्य पानेके योग्य हैं, अतः शीघ्र ही इनके लिये

| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५५ | | :--- | :--- |

| आगतश्चिरकालेन जामातेति विशेषतः।<br>इत्युक्त्वा‌र्घ्यं ददौ तस्मै सोऽपि जग्राह चिन्तयन्॥ ४६<br><br>मुनिरासनमासीनं गृहीतार्घ्यं च भूपतिम्।<br>आशीर्भिरभिनन्द्याथ कुशलं चाप्यपृच्छत॥ ४७<br><br>अपि तेऽनामयं राजन् बले कोशे सुहृत्सु च।<br>भृत्येष्वमात्ये पुरे देशे तथात्मनि जनाधिप॥ ४८<br><br>भार्यास्ति ते कुशलिनी यतः सात्रैव तिष्ठति।<br>अतो न पृच्छाम्यस्यास्ते चान्यासां कुशलं वद॥ ४९ | अर्घ्य ले आओ। बहुत दिन बाद ये पधारे हुए हैं और विशेषरूपसे ये हमारे जामाता हैं—ऐसा कहकर मुनिने राजाको अर्घ्य प्रदान किया और राजाने भी विचार करते हुए उसे ग्रहण किया॥ ४५-४६॥<br><br>तत्पश्चात् राजाके अर्घ्य ग्रहण करके आसनपर बैठ जानेके उपरान्त मुनि प्रभुने उन्हें आशीर्वचनोंसे अभिनन्दित करके उनका कुशल-क्षेम पूछा—हे राजन्! आप स्वस्थ तो हैं? आपकी सेना, कोष, बन्धु-बान्धव, सेवकगण, सचिव, नगर, देश आदिकी सर्वविध कुशलता तो है? हे नरेश! आपकी भार्या तो यहीं विद्यमान है और वह सकुशल है। अतएव, मैं उसकी कुशलता नहीं पूछूँगा, आप अपनी अन्य स्त्रियोंका कुशल-क्षेम बताइये॥ ४७-४९॥ | | <center>राजोवाच</center>भगवंस्त्वत्प्रसादेन सर्वत्रानामयं मम।<br>एतत् कुतूहलं ब्रह्मन् मद्भार्या कात्र विद्यते॥ ५० | **राजा बोले—**हे भगवन्! आपके कृपाप्रभावसे मेरी सर्वविध कुशलता है। हे ब्रह्मन्! अब मेरी यह जिज्ञासा है कि मेरी कौन-सी भार्या यहाँ है?॥ ५०॥ | | <center>ऋषिरुवाच</center>रेवती नाम ते भार्या रूपेणाप्रतिमा भुवि।<br>विद्यतेऽत्र कथं पत्नीं तां न वेत्सि महीपते॥ ५१ | **ऋषि बोले—**हे पृथ्वीपते! संसारमें अप्रतिम लावण्यसे सम्पन्न रेवती नामक आपकी पत्नी यहाँ ही रहती है। क्या आप उसे नहीं जानते?॥ ५१॥ | | <center>राजोवाच</center>सुभद्राद्यास्तु या भार्या मम सन्ति गृहे विभो।<br>जानामि तास्तु भगवन् नैव जानामि रेवतीम्॥ ५२ | **राजा बोले—**हे प्रभो! सुभद्रा आदि मेरी पत्नियाँ तो घरपर ही हैं। हे भगवन्! मैं तो केवल उन्हें ही जानता हूँ। मैं रेवतीको तो नहीं जानता॥ ५२॥ | | <center>ऋषिरुवाच</center>प्रियेति साम्प्रतं राजंस्त्वयोक्ता या महामते।<br>सा विस्मृता क्षणादेव या ते श्लाघ्यतमा प्रिया॥ ५३ | **ऋषि बोले—**हे महामते! हे राजन्! इसी समय 'प्रिये' के सम्बोधनसे आपने जिससे पूछा था, अपनी उस योग्यतम प्रियाको आपने क्षणभरमें ही भुला दिया!॥ ५३॥ | | <center>राजोवाच</center>त्वयोक्तं यन्मृषा तन्नो तथैवामन्त्रिता मया।<br>मुने दुष्टो न मे भावः कोपं मा कर्तुमर्हसि॥ ५४ | **राजा बोले—**हे मुने! आपने जो कहा, वह असत्य नहीं है; किंतु मैंने तो सामान्यरूपसे ऐसा कह दिया था। इसमें मेरा कोई दूषित भाव नहीं था, अतः आप मेरे ऊपर क्रोध न करें॥ ५४॥ | | <center>ऋषिरुवाच</center>राजन्नुक्तं त्वया सत्यं न भावो दूषितस्तव।<br>वह्निना प्रेरितेनेत्थं भवता व्याहृतं वचः॥ ५५<br><br>अद्य पृष्टो मया वह्निः कोऽस्या भर्ता भविष्यति।<br>तेनोक्तं दुर्दमॊ राजा भवितास्याः पतिर्ध्रुवम्॥ ५६ | **ऋषि बोले—**हे राजन्! आपका भाव दूषित नहीं था अपितु आपने सत्य ही कहा था। अग्निदेवके द्वारा प्रेरित किये जानेपर ही आपने ऐसा कहा था॥ ५५॥<br><br>'इसका पति कौन होगा'—ऐसा मेरे द्वारा आज अग्निदेवसे पूछे जानेपर उन्होंने कहा था कि इसके पति निश्चितरूपसे राजा दुर्दम ही होंगे॥ ५६॥ |

५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४

५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदादत्स्व मया दत्तामिमां कन्यां महीपते।<br>प्रियेत्यामन्त्रिता पूर्वं मा विचारं कुरुष्व भोः॥ ५७हे महीपते! अतः मेरे द्वारा प्रदत्त इस कन्याको आप स्वीकार कीजिये। आप इसे 'प्रिये' ऐसा सम्बोधित भी कर चुके हैं। अतएव अब शंकारहित होकर किसी अन्य विचारमें न पड़ें॥ ५७॥
श्रुत्वैतत् सोऽभवत् तूष्णीं चिन्तयन् मुनिभाषितम्।<br>वैवाहिकं विधिं तस्य मुनिः कर्तुं समुद्यतः॥ ५८मुनिका यह वचन सुनकर राजा दुर्दम चिन्तन करते हुए चुप हो गये और मुनि उनके वैवाहिक अनुष्ठानकी तैयारीमें जुट गये॥ ५८॥
अथोद्यतं विवाहाय दृष्ट्वा कन्याब्रवीन्मुनिम्।<br>रेवत्यृक्षे विवाहो मे तात कर्तुं त्वमर्हसि॥ ५९इसके बाद विवाह-कार्यके लिये मुनिको तत्पर देखकर रेवतीने कहा—हे तात! आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही सम्पन्न करायें॥ ५९॥
ऋषिरुवाच<br>वत्से विवाहयोग्यानि सन्त्यन्यर्क्षाणि भूरिशः।<br>रेवत्यां कथमुद्वाहः पौष्णभं न दिवि स्थितम्॥ ६०ऋषि बोले—वत्से! विवाहके योग्य अन्य बहुत-से नक्षत्र हैं। रेवती नक्षत्रमें विवाह कैसे होगा; क्योंकि रेवती तो आकाशमें स्थित है ही नहीं॥ ६०॥
कन्योवाच<br>रेवत्यृक्षं विना कालो ममोद्वाहोचितो न हि।<br>अतः संप्रार्थयाम्येतद्विवाहं पौष्णभे कुरु॥ ६१कन्या बोली—रेवती नक्षत्रके अतिरिक्त अन्य कोई भी नक्षत्र मेरे विवाहके लिये उचित नहीं है। अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही करें॥ ६१॥
ऋषिरुवाच<br>ऋतवाङ्मुनिना पूर्वं रेवतीभं निपातितम्।<br>भान्तरे चेन्न ते प्रीतिर्विवाहः स्यात् कथं तव॥ ६२ऋषि बोले—पूर्वकालमें मुनि ऋतवाक्ने रेवती नक्षत्रको पृथ्वीपर गिरा दिया था। इस प्रकार अन्य नक्षत्रमें यदि तुम्हारी श्रद्धा नहीं है, तब तुम्हारा विवाह कैसे होगा?॥ ६२॥
कन्योवाच<br>तपः किं तप्तवानेक ऋतवागेव केवलम्।<br>भवता किं तपो नेदृक् तप्तं वाक्कायमानसैः॥ ६३कन्या बोली—तात! क्या केवल एक ऋतवाक्ने ही तपश्चर्या की है? क्या आपने मन-वचन-कर्मसे ऐसी तपःसाधना नहीं की है?॥ ६३॥
जगत्स्रष्टुं समर्थस्त्वं वेद्यहं ते तपोबलम्।<br>रेवत्यृक्षं दिवि स्थाप्य ममोद्वाहं पितः कुरु॥ ६४हे पिताजी! मैं आपके तपोबलको जानती हूँ; आप जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। अतः आप अपने तपके प्रभावसे रेवतीको पुनः आकाशमें स्थापित करके उसी नक्षत्रमें मेरा विवाह कीजिये॥ ६४॥
ऋषिरुवाच<br>एवं भवतु भद्रं ते यथैव त्वं ब्रवीषि माम्।<br>त्वत्कृते सोममार्गेऽहं स्थापयिष्याद्य पौष्णभम्॥ ६५ऋषि बोले—तुम्हारा कल्याण हो। तुम जैसा मुझसे कह रही हो, वैसा ही होगा, तुम्हारे हितार्थ मैं आज ही रेवती नक्षत्रको सोममार्ग (नक्षत्र-मण्डल)-में स्थापित करूँगा॥ ६५॥
स्कन्द उवाच<br>एवमुक्त्वा मुनिस्तूर्णं पौष्णभं स्वतपोबलात्।<br>यथापूर्वं तथा चक्रे सोममार्गे घटोद्भव॥ ६६कार्तिकेयजी बोले—हे अगस्त्यजी! ऐसा कहकर मुनिने अपने तपोबलसे शीघ्र ही पूर्वकी भाँति रेवती नक्षत्रको फिरसे नक्षत्र-मण्डलमें स्थापित कर दिया॥ ६६॥
अ० ४ ]माहात्म्य५७
संस्कृतहिन्दी
रेवतीनाम्नि नक्षत्रे विवाहविधिना मुनिः।<br>रेवतीं प्रददौ राज्ञे दुर्दाय महात्मने॥ ६७तदनन्तर मुनि प्रमुचने रेवती नक्षत्रमें वैवाहिक विधिके अनुसार महात्मा राजा दुर्दमको वह रेवती कन्या सौंप दी॥ ६७॥
कृत्वा विवाहं कन्याया मुनी राजानमब्रवीत्।<br>किं तेऽभिलषितं वीर वद तत्पूरयाम्यहम्॥ ६८इस प्रकार कन्याका विवाह कर देनेके उपरान्त मुनिने राजासे कहा—हे वीर! तुम्हारी क्या अभिलाषा है? मुझे बताओ, मैं उसे पूरी करूँगा॥ ६८॥
राजोवाच<br>मनोः स्वायम्भुवस्याहं वंशे जातोऽस्मि हे मुने।<br>मन्वन्तराधिपं पुत्रं त्वत्प्रसादाच्च कामये॥ ६९राजा बोले— हे मुने! मैं स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न हुआ हूँ, अतः मैं यही कामना करता हूँ कि आपकी कृपासे मुझे मन्वन्तराधिपति पुत्रकी प्राप्ति हो॥ ६९॥
मुनिरुवाच<br>यद्येषा कामना तेऽस्ति देव्या आराधनं कुरु।<br>भविष्यत्येव ते पुत्रो मनुर्मन्वन्तराधिपः॥ ७०मुनि बोले— यदि आपकी यह अभिलाषा है तो आप देवी भगवतीकी आराधना कीजिये। ऐसा करनेपर आपका पुत्र मनु अवश्य ही मन्वन्तराधिपति होगा॥ ७०॥
देवीभागवतं नाम पुराणं यत्तु पञ्चमम्।<br>पञ्चकृत्वस्तु तच्छ्रुत्वा लप्स्यसेऽभिमतं सुतम्॥ ७१श्रीमद्देवीभागवत जो पंचम पुराणके रूपमें विख्यात है, उसका पाँच बार श्रवण करनेके उपरान्त आपको मनोवांछित पुत्र प्राप्त होगा॥ ७१॥
रेवत्यां रैवतो नाम पञ्चमो भविता मनुः।<br>वेदविच्छास्त्रतत्त्वज्ञो धर्मवानपराजितः॥ ७२रेवतीके गर्भसे उत्पन्न रैवत नामवाला पाँचवाँ मनु वेदवेत्ता, शास्त्रोंके तत्त्वोंको जाननेवाला, धर्मपरायण तथा अपराजेय होगा॥ ७२॥
इत्युक्तो मुनिना राजा प्रणम्य मुदितो मुनिम्।<br>भार्यया सह मेधावी जगाम नगरं निजम्॥ ७३मुनि प्रमुचके इस प्रकार कहनेपर प्रसन्न होकर प्रतिभासम्पन्न राजा दुर्दमने मुनिको प्रणाम किया और वे भार्या रेवतीके साथ अपने नगर चले गये॥ ७३॥
पितृपैतामहं राज्यं चकार स महामतिः।<br>पालयामास धर्मात्मा प्रजाः पुत्रानिवौरसान्॥ ७४महामति राजा दुर्दमने अपने पिता-पितामहसे प्राप्त राज्यपर शासन किया और उस धर्मात्माने औरस पुत्रोंकी भाँति अपनी प्रजाओंका पालन किया॥ ७४॥
एकदा लोमशो नाम महात्मा मुनिरागतः।<br>प्रणिपत्य तमभ्यर्च्य प्राञ्जलिश्चाब्रवीन्नृपः॥ ७५एक बार उनके यहाँ महात्मा लोमशऋषि पधारे। राजा दुर्दमने उन्हें प्रणाम किया और उनका विधिवत् पूजनकर दोनों हाथ जोड़कर कहा॥ ७५॥
राजोवाच<br>भगवंस्त्वत्प्रसादेन श्रोतुमिच्छामि भो मुने।<br>देवीभागवतं नाम पुराणं पुत्रलिप्सया॥ ७६राजा बोले— हे भगवन्! हे मुने! यदि आप कृपा करें तो मैं पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे आपसे देवीभागवत नामक पुराण सुनना चाहता हूँ॥ ७६॥
श्रुत्वा वाचं प्रजाभर्तुः प्रीतः प्रोवाच लोमशः।राजाका यह वचन सुनकर लोमशमुनि प्रसन्न हो गये और बोले—
धन्योऽसि राजंस्ते भक्तिर्जाता त्रैलोक्यमातरि॥ ७७<br>सुरासुरनराराध्या या परा जगदम्बिका।<br>तस्यां चेद्भक्तिरुत्पन्ना कार्यसिद्धिर्भविष्यति॥ ७८हे राजन्! आप धन्य हैं; क्योंकि तीनों लोकोंकी जननी देवी भगवतीमें आपकी ऐसी भक्ति हो गयी है। देव, दानव तथा मानवकी आराध्या परा भगवती जगदम्बामें यदि आपकी भक्ति उत्पन्न हुई है तो आपकी कार्य-सिद्धि अवश्य होगी॥ ७७-७८॥
५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४

| अतस्त्वां श्रावयिष्यामि श्रीमद्भागवतं नृप।<br>यस्य श्रवणमात्रेण न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥ ७९ | अतएव हे राजन्! मैं आपको श्रीमद्देवीभागवत सुनाऊँगा, जिसके सुननेमात्रसे कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं रह जाता॥ ७९॥ | | इत्युक्त्वा सुदिने ब्रह्मन् कथारम्भमथाकरोत्।<br>पञ्चकृत्वः स शुश्राव विधिवद्भार्यया सह॥ ८० | हे ब्रह्मन्! ऐसा कहकर मुनिने किसी शुभ दिनमें कथाका आरम्भ किया। अपनी पत्नीके साथ राजाने पाँच बार श्रीमद्देवीभागवतपुराणका विधिवत् श्रवण किया॥ ८०॥ | | समाप्तिदिवसे राजा पुराणञ्च मुनिं तथा।<br>पूजयामास धर्मात्मा मुदा परमया युतः॥ ८१ | कथा-समाप्तिके दिन धर्मनिष्ठ राजा दुर्दमाने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतपुराण तथा लोमशमुनिकी पूजा की॥ ८१॥ | | हुत्वा नवार्णमन्त्रेण भोजयित्वा कुमारिकाः।<br>वाडवांश्च सपत्नीकान्दक्षिणाभिरतोषयत्॥ ८२ | राजाने नवार्णमन्त्रसे हवन करके कुमारी कन्याओंको भोजन कराया और सपत्नीक ब्राह्मणोंको प्रभूत दक्षिणादानद्वारा संतुष्ट किया॥ ८२॥ | | अथ कालेन कियता भगवत्याः प्रसादतः।<br>गर्भं दधार सा राज्ञी लोककल्याणकारकम्॥ ८३ | कुछ समय बीत जानेपर भगवतीकी कृपासे उस रानी रेवतीने लोककल्याणकारी गर्भ धारण किया॥ ८३॥ | | पुण्येऽथ समये प्राप्ते ग्रहैः सुस्थानसङ्गतैः।<br>सर्वमङ्गलसम्पन्ने रेवती सुषुवे सुतम्॥ ८४ | इसके बाद जब समस्त ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने अनुकूल स्थानोंपर थे और सभी मांगलिक कृत्य सम्पन्न हो गये थे—ऐसे शुभ समयमें रेवतीने पुत्रको जन्म दिया॥ ८४॥ | | श्रुत्वा पुत्रस्य जननं स्नात्वा राजा मुदान्वितः।<br>स सुवर्णाम्भसा चक्रे जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ८५ | पुत्रके जन्मका समाचार सुनकर राजा दुर्दाम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने स्नान करके स्वर्ण-कलशके जलसे पुत्रका जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न किया॥ ८५॥ | | यथाविधि च दानानि दत्त्वा विप्रानतोषयत्।<br>कृतोपनयनं राजा साङ्गान्वेदानपाठयत्॥ ८६ | तदनन्तर राजाने विधिपूर्वक दान देकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया। समयपर पुत्रका उपनयन-संस्कार करके राजाने अपने पुत्रको अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन कराया॥ ८६॥ | | सर्वविद्यानिधिर्जातो धर्मिष्ठोऽस्त्रविदां वरः।<br>धर्मस्य वक्ता कर्ता च रैवतो नाम वीर्यवान्॥ ८७ | इस प्रकार राजाका वह रैवत नामक तेजस्वी पुत्र समग्र विद्याओंका निधान, धर्मपरायण, अस्त्र-विशारदोंमें श्रेष्ठ, धर्मका वक्ता तथा धर्मका पालनकर्ता हो गया॥ ८७॥ | | नियुक्तवानथ ब्रह्मा रैवतं मानवे पदे।<br>मन्वन्तराधिपः श्रीमान् गां शशास स धर्मतः॥ ८८ | इसके बाद ब्रह्माजीने रैवतको मनुके पदपर नियुक्त किया और वे श्रीमान् मन्वन्तराधिपके रूपमें धर्मपूर्वक पृथ्वीपर शासन करने लगे॥ ८८॥ | | इत्थं देव्याः प्रभावोऽयं संक्षेपेणोपवर्णितः।<br>पुराणस्य च माहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात्क्षमः॥ ८९ | इस प्रकार मैंने देवी भगवतीके इस प्रभावका संक्षिप्तरूपसे वर्णन कर दिया। इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कौन समर्थ है?॥ ८९॥ |

अ० ५ ] माहात्म्य ५९

अ० ५ ] माहात्म्य ५९


| सूत उवाच<br>कुम्भयोनिस्तु माहात्म्यं विधिं भागवतस्य च।<br>श्रुत्वा कुमारं चाभ्यर्च्य स्वाश्रमं पुनराययौ॥ ९०<br><br>इदं मया भागवतस्य विप्रा<br>माहात्म्यमुक्तं भवतां समक्षम्।<br>शृणोति भक्त्या पठतीह भोगान्<br>भुक्त्वाखिलान्मुक्तिमुपैति चान्ते॥ ९१ | सूतजी बोले—[हे ब्राह्मणो!] इस प्रकार श्रीमद्देवीभागवतका माहात्म्य तथा उसकी विधि सुनकर और कुमार कार्तिकेयकी पूजाकर अगस्त्यजी अपने आश्रम चले आये॥ ९०॥<br><br>हे विप्रो! मैंने आपलोगोंके समक्ष श्रीमद्देवी-भागवतका यह माहात्म्य कह दिया। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण तथा पाठ करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका सुख प्राप्त करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है॥ ९१॥ |

इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये रैवतनामक-
मनुपुत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥


अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी श्रवण-विधि, श्रवणकर्ताके लिये पालनीय नियम, श्रवणके फल तथा माहात्म्यका वर्णन

ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग श्रुतं माहात्म्यमुत्तमम्।<br>अधुना श्रोतुमिच्छामः पुराणश्रवणे विधिम्॥ १**ऋषियोंने कहा—**हे महाभाग सूतजी! हमलोगोंने श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य सुन लिया और अब इस पुराणके श्रवणकी विधि सुनना चाहते हैं॥ १॥
सूत उवाच<br>श्रूयतां मुनयः सर्वे पुराणश्रवणे विधिम्।<br>नराणां शृण्वतां येन सिद्धिः स्यात्सार्वकामिकी॥ २**सूतजी बोले—**हे मुनियो! अब आपलोग इस पुराणके श्रवणका विधान सुनें, जिसे सुननेवाले मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं॥ २॥
आदौ दैवज्ञमाहूय मुहूर्तं कल्पयेत्सुधीः।<br>आरभ्य शुचिमासं तु मासषट्कं शुभावहम्॥ ३पुराणश्रवणके इच्छुक विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि वह सर्वप्रथम ज्योतिषीको बुलाकर शुभ मुहूर्त निर्धारित कर ले। इसके लिये ज्येष्ठमाससे लेकर छः महीने शुभकारक होते हैं॥ ३॥
हस्ताश्विमूलपुष्यर्क्षै ब्रह्ममैत्रेन्दुवैष्णवे।<br>सत्तिथौ शुभवारे च पुराणश्रवणं शुभम्॥ ४हस्त, अश्विनी, मूल, पुष्य, रोहिणी, अनुराधा, मृगशिरा तथा श्रवण नक्षत्र, पुण्य तिथि तथा शुभ दिनमें श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण कल्याणकारी होता है॥ ४॥
गुरुभाद्वेदवेदाब्जशराङ्गाब्धिगुणैः क्रमात्।<br>धर्माप्तिरिन्दिराप्राप्तिः कथासिद्धिः परं सुखम्॥ ५जिस नक्षत्रमें बृहस्पति हों, उससे चन्द्रमातक गिननेपर क्रमशः इस प्रकार फल होते हैं—चार नक्षत्रतक धर्म-प्राप्ति, पुनः चारतक लक्ष्मीकी प्राप्ति, इसके बाद एक नक्षत्र कथामें सिद्धि प्रदान करनेवाला, फिर पाँच नक्षत्र परम सुखकी प्राप्ति करानेवाले, बादमें छः नक्षत्र पीड़ा करनेवाले, इसके