देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
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| एवं स्तुता भगवती दुर्गा नारायणी परा।<br>भक्त्या वसिष्ठमुनिना प्रसन्ना तत्क्षणादभूत्॥ ४९ | महर्षि वसिष्ठजीद्वारा इस प्रकार भक्ति-भावसे स्तुति किये जानेपर नारायणी पराम्बा दुर्गा भगवती तत्काल प्रसन्न हो गयीं॥ ४९॥ | | तदोवाच महादेवी प्रणतार्तिहरी मुनिम्।<br>सुद्युम्नभवनं गत्वा कुरु भक्त्या मदर्चनम्॥ ५० | तदनन्तर भक्तजनोंका दुःख दूर करनेवाली महादेवीने मुनि वसिष्ठसे कहा—हे मुनिश्रेष्ठ! आप सुद्युम्नके घर जाकर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करें॥ ५०॥ | | सुद्युम्नं श्रावय प्रीत्या पुराणं मत्प्रियङ्करम्।<br>देवीभागवतं नाम नवाहोभिर्द्विजोत्तम॥ ५१ | हे द्विजश्रेष्ठ! सुद्युम्नको नौ दिनोंमें मुझे प्रसन्नता प्रदान करनेवाले श्रीमद्देवीभागवतपुराणका प्रेमपूर्वक श्रवण कराइये॥ ५१॥ | | श्रवणादेव सततं पुंस्त्वमस्य भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा च तिरोधानं गच्छतः स्म शिवेश्वरौ॥ ५२ | उसके श्रवणमात्रसे उसे सर्वदाके लिये पुरुषत्वकी प्राप्ति हो जायगी। ऐसा कहकर भगवती पार्वती तथा भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये॥ ५२॥ | | वसिष्ठस्तां दिशं नत्वा समागत्याश्रमं निजम्।<br>समाहूय च सुद्युम्नं देव्याराधनमादिशत्॥ ५३ | इसके पश्चात् वसिष्ठजी उस दिशाको नमस्कारकर अपने आश्रमको लौट आये और सुद्युम्नको बुलाकर उन्होंने देवीकी आराधना करनेके लिये उन्हें आदेश दिया॥ ५३॥ | | आश्विनस्य सिते पक्षे सम्पूज्य जगदम्बिकाम्।<br>नवरात्रविधानेन श्रावयामास भूपतिम्॥ ५४ | आश्विनमासके शुक्लपक्षमें जगदम्बाकी विधिवत् पूजा करके वसिष्ठजीने राजाको नवरात्र-विधानके अनुसार श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनाया॥ ५४॥ | | श्रुत्वा भक्त्यापि सुद्युम्नः श्रीमद्भागवतामृतम्।<br>प्रणम्याभ्यर्च्य च गुरुं लेभे पुंस्त्वं निरन्तरम्॥ ५५ | इस प्रकार अमृतरूप श्रीमद्देवीभागवतपुराणको भक्तिपूर्वक सुनकर और गुरु वसिष्ठका पूजन-वन्दन करके सुद्युम्नने सदाके लिये पुरुषत्व प्राप्त कर लिया॥ ५५॥ | | राज्यासनेऽभिषिक्तस्तु वसिष्ठेन महर्षिणा।<br>भुवं शशास धर्मेण प्रजाश्चैवानुरञ्जयन्॥ ५६ | महर्षि वसिष्ठने सुद्युम्नका राज्याभिषेक किया और वे प्रजाओंको प्रसन्न रखते हुए धर्मपूर्वक भूमण्डलपर शासन करने लगे॥ ५६॥ | | ईजे च विविधैर्यज्ञैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः।<br>पुत्रेषु राज्यं सन्दिश्य प्राप देव्याः सलोकताम्॥ ५७ | सुद्युम्नने अत्यन्त श्रेष्ठ दक्षिणावाले भाँति-भाँतिके यज्ञ किये और अन्तमें पुत्रोंको राज्यका शासन सौंपकर वे देवीलोकको प्राप्त हुए॥ ५७॥ | | इति कथितमशेषं सेतिहासं च विप्रा<br>यदि पठति सुभक्त्या मानवो वा शृणोति।<br>स इह सकलकामान् प्राप्य देव्याः प्रसादात्<br>परममृतमथान्ते याति देव्याः सलोकम्॥ ५८ | हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंको इतिहाससहित देवीमाहात्म्य बता दिया। यदि कोई मनुष्य सद्भक्तिके साथ इसे पढ़ता अथवा सुनता है तो वह देवीकी कृपासे इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करके अन्तमें देवीके परम सत्यस्वरूप सालोक्यको प्राप्त कर लेता है॥ ५८॥ |
इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवतनवाहश्रवणादिलायाः पुंस्त्वप्राप्तिवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥