देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ४ ] माहात्म्य ५१
अथ चतुर्थोऽध्यायः
श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें रेवती नक्षत्रके पतन और पुनः स्थापनकी कथा तथा श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे राजा दुर्दमको मन्वन्तराधिप-पुत्रकी प्राप्ति
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| इति श्रुत्वा कथां दिव्यां विचित्रां कुम्भसम्भवः।<br>शुश्रूषुः पुनराहेदं विशाखं विनयान्वितः॥ १ | इस अलौकिक एवं विचित्र कथाको सुनकर पुनः सुननेकी इच्छावाले अगस्त्यजीने बड़ी विनम्रतापूर्वक भगवान् कार्तिकेयसे कहा— ॥ १ ॥ |
| अगस्त्य उवाच<br>देवसेनापते देव विचित्रेयं श्रुता कथा।<br>पुनरन्यच्च माहात्म्यं वद भागवतस्य मे॥ २ | अगस्त्यजी बोले— हे देवसेनापते! हे देव! मैंने यह विचित्र कथा सुन ली, अब आप श्रीमद्देवीभागवतका दूसरा माहात्म्य मुझे बतायें ॥ २ ॥ |
| स्कन्द उवाच<br>मित्रावरुणसम्भूत मुने शृणु कथामिमाम्।<br>यत्रैकदेशमहिमा प्रोक्तो भागवतस्य तु॥ ३<br>वर्ण्यते धर्मविस्तारो गायत्रीमधिकृत्य च।<br>गायत्र्या महिमा यत्र तद् भागवतमिष्यते॥ ४ | कार्तिकेयजी बोले— हे मित्रावरुणसे प्रकट होनेवाले मुने! अब आप यह कथा सुनें, जिसके एक अंशमें भागवतकी महिमा कही गयी हो, धर्मका विशद वर्णन किया गया हो और गायत्रीका प्रसंग आरम्भ करके उसकी महिमा दर्शायी गयी हो, उसे भागवतके रूपमें जाना जाता है ॥ ३-४ ॥ |
| भगवत्या इदं यस्मात्तस्माद् भागवतं विदुः।<br>ब्रह्मविष्णुशिवारध्या परा भगवती हि सा॥ ५ | यह पुराण देवी भगवतीके माहात्म्यसे परिपूर्ण होनेके कारण देवीभागवत कहा जाता है। वे परा भगवती ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी आराध्या हैं ॥ ५ ॥ |
| ऋतवागिति विख्यातो मुनिरासीन्महामतिः।<br>तस्य पुत्रोऽभवत्काले गण्डान्ते पौष्णभान्तिमे॥ ६ | ऋतवाक् नामसे विख्यात एक महान् बुद्धिसम्पन्न मुनि थे। रेवती नक्षत्रके अन्तिम भाग गण्डान्तयोगमें उनके यहाँ समयानुसार एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥ |
| स तस्य जातकर्मादिक्रियाश्चक्रे यथाविधि।<br>चूड़ोपनयनादींश्च संस्कारानपि सोऽकरोत्॥ ७ | उन्होंने उस पुत्रकी जातकर्म आदि क्रियाएँ तथा चूड़ाकरण एवं उपनयन आदि संस्कार भी विधिपूर्वक सम्पन्न किये ॥ ७ ॥ |
| यत आरभ्य जातोऽसौ पुत्रस्तस्य महात्मनः।<br>तत एवाथ स मुनिः शोकरोगाकुलोऽभवत्॥ ८<br>रोषलोभपरीतात्मा तथा मातापि तस्य च।<br>बहुरोगार्दिता नित्यं शुचा दुःखीकृता भृशम्॥ ९ | महात्मा ऋतवाक्के यहाँ जबसे वह पुत्र उत्पन्न हुआ, उसी समयसे वे शोक तथा रोगसे ग्रस्त रहने लगे और क्रोध एवं लोभने उन्हें घेर लिया। उस बालककी माता भी अनेक रोगोंसे ग्रसित होकर नित्य शोकाकुल और अति दुःखी रहने लगीं ॥ ८-९ ॥ |
| ऋतवाक् स मुनिश्चिन्तामवाप भृशदुःखितः।<br>किमेतत् कारणं जातं पुत्रो मेऽत्यन्तदुर्मतिः॥ १० | मुनि ऋतवाक् अत्यन्त दुःखी और चिन्तित होकर सोचने लगे कि ऐसा क्या कारण है कि मेरे यह अत्यन्त दुर्मति पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥ |
| कस्यचिन्मुनिपुत्रस्य बलात् पत्नीं जहार च।<br>मेने शिक्षां पितुर्नासौ न च मातुर्विमूढधीः॥ ११ | [तरुणावस्थाको प्राप्त होनेपर] उसने किसी मुनिपुत्रकी पत्नीका बलपूर्वक हरण कर लिया। वह दुर्बुद्धि अपने माता-पिताकी शिक्षाओंपर कभी भी ध्यान नहीं देता था ॥ ११ ॥ |