देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ४ ] माहात्म्य ५१
अ० ४ ] माहात्म्य ५१
अथ चतुर्थोऽध्यायः
श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें रेवती नक्षत्रके पतन और पुनः स्थापनकी कथा तथा श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे राजा दुर्दमको मन्वन्तराधिप-पुत्रकी प्राप्ति
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| इति श्रुत्वा कथां दिव्यां विचित्रां कुम्भसम्भवः।<br>शुश्रूषुः पुनराहेदं विशाखं विनयान्वितः॥ १ | इस अलौकिक एवं विचित्र कथाको सुनकर पुनः सुननेकी इच्छावाले अगस्त्यजीने बड़ी विनम्रतापूर्वक भगवान् कार्तिकेयसे कहा— ॥ १ ॥ |
| अगस्त्य उवाच<br>देवसेनापते देव विचित्रेयं श्रुता कथा।<br>पुनरन्यच्च माहात्म्यं वद भागवतस्य मे॥ २ | अगस्त्यजी बोले— हे देवसेनापते! हे देव! मैंने यह विचित्र कथा सुन ली, अब आप श्रीमद्देवीभागवतका दूसरा माहात्म्य मुझे बतायें ॥ २ ॥ |
| स्कन्द उवाच<br>मित्रावरुणसम्भूत मुने शृणु कथामिमाम्।<br>यत्रैकदेशमहिमा प्रोक्तो भागवतस्य तु॥ ३<br>वर्ण्यते धर्मविस्तारो गायत्रीमधिकृत्य च।<br>गायत्र्या महिमा यत्र तद् भागवतमिष्यते॥ ४ | कार्तिकेयजी बोले— हे मित्रावरुणसे प्रकट होनेवाले मुने! अब आप यह कथा सुनें, जिसके एक अंशमें भागवतकी महिमा कही गयी हो, धर्मका विशद वर्णन किया गया हो और गायत्रीका प्रसंग आरम्भ करके उसकी महिमा दर्शायी गयी हो, उसे भागवतके रूपमें जाना जाता है ॥ ३-४ ॥ |
| भगवत्या इदं यस्मात्तस्माद् भागवतं विदुः।<br>ब्रह्मविष्णुशिवारध्या परा भगवती हि सा॥ ५ | यह पुराण देवी भगवतीके माहात्म्यसे परिपूर्ण होनेके कारण देवीभागवत कहा जाता है। वे परा भगवती ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी आराध्या हैं ॥ ५ ॥ |
| ऋतवागिति विख्यातो मुनिरासीन्महामतिः।<br>तस्य पुत्रोऽभवत्काले गण्डान्ते पौष्णभान्तिमे॥ ६ | ऋतवाक् नामसे विख्यात एक महान् बुद्धिसम्पन्न मुनि थे। रेवती नक्षत्रके अन्तिम भाग गण्डान्तयोगमें उनके यहाँ समयानुसार एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥ |
| स तस्य जातकर्मादिक्रियाश्चक्रे यथाविधि।<br>चूड़ोपनयनादींश्च संस्कारानपि सोऽकरोत्॥ ७ | उन्होंने उस पुत्रकी जातकर्म आदि क्रियाएँ तथा चूड़ाकरण एवं उपनयन आदि संस्कार भी विधिपूर्वक सम्पन्न किये ॥ ७ ॥ |
| यत आरभ्य जातोऽसौ पुत्रस्तस्य महात्मनः।<br>तत एवाथ स मुनिः शोकरोगाकुलोऽभवत्॥ ८<br>रोषलोभपरीतात्मा तथा मातापि तस्य च।<br>बहुरोगार्दिता नित्यं शुचा दुःखीकृता भृशम्॥ ९ | महात्मा ऋतवाक्के यहाँ जबसे वह पुत्र उत्पन्न हुआ, उसी समयसे वे शोक तथा रोगसे ग्रस्त रहने लगे और क्रोध एवं लोभने उन्हें घेर लिया। उस बालककी माता भी अनेक रोगोंसे ग्रसित होकर नित्य शोकाकुल और अति दुःखी रहने लगीं ॥ ८-९ ॥ |
| ऋतवाक् स मुनिश्चिन्तामवाप भृशदुःखितः।<br>किमेतत् कारणं जातं पुत्रो मेऽत्यन्तदुर्मतिः॥ १० | मुनि ऋतवाक् अत्यन्त दुःखी और चिन्तित होकर सोचने लगे कि ऐसा क्या कारण है कि मेरे यह अत्यन्त दुर्मति पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥ |
| कस्यचिन्मुनिपुत्रस्य बलात् पत्नीं जहार च।<br>मेने शिक्षां पितुर्नासौ न च मातुर्विमूढधीः॥ ११ | [तरुणावस्थाको प्राप्त होनेपर] उसने किसी मुनिपुत्रकी पत्नीका बलपूर्वक हरण कर लिया। वह दुर्बुद्धि अपने माता-पिताकी शिक्षाओंपर कभी भी ध्यान नहीं देता था ॥ ११ ॥ |
| ५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| ततो विषण्णचित्तस्तु ऋतवागब्रवीदिदम्।<br>अपुत्रता वरं नृणां न कदाचित् कुपुत्रता ॥ १२ | तदनन्तर अत्यन्त दुःखित मनवाले ऋतवाक्ने यह कहा कि मनुष्योंके लिये पुत्रहीन रह जाना अच्छा है, किंतु कुपुत्रकी प्राप्ति कभी भी ठीक नहीं है ॥ १२ ॥ | | पितॄन् कुपुत्रः स्वर्गातान्निरये पातयत्यपि।<br>यावज्जीवेत् सदा पित्रोः केवलं दुःखदायकः ॥ १३ | कुपुत्र स्वर्गमें गये हुए पितरोंको भी नरकमें गिरा देता है। वह जबतक जीवित रहता है, तबतक माता-पिताको केवल कष्ट ही देता रहता है ॥ १३ ॥ | | पित्रोर्दुःखाय धिग्जन्म कुपुत्रस्य च पापिनः।<br>सुहृदां नोपकाराय नापकाराय वैरिणाम् ॥ १४ | अतएव माता-पिताको कष्ट पहुँचानेवाले पापी कुपुत्रके जन्मको धिक्कार है। ऐसा पुत्र मित्रोंका न तो उपकार कर सकता है और न शत्रुओंका अपकार ही ॥ १४ ॥ | | धन्यास्ते मानवा लोके सुपुत्रो यद्गृहे स्थितः।<br>परोपकारशीलश्च पितुर्मातुः सुखावहः ॥ १५ | संसारमें वे मानव धन्य हैं, जिनके घरमें परोपकारपरायण तथा माता-पिताको सुख देनेवाला पुत्र हुआ करता है ॥ १५ ॥ | | कुपुत्रेण कुलं नष्टं कुपुत्रेण हतं यशः।<br>कुपुत्रेणेह चामुत्र दुःखं निरययातनाः ॥ १६ | कुपुत्रसे कुल नष्ट हो जाता है, कुपुत्रसे यश नष्ट हो जाता है और कुपुत्रसे लौकिक तथा पारलौकिक—दोनों जगत्में दुःख तथा नारकीय यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं ॥ १६ ॥ | | कुपुत्रेणान्वयो नष्टो जन्म नष्टं कुभार्यया।<br>कुभोजनेन दिवसः कुमित्रेण सुखं कुतः ॥ १७ | कुपुत्रसे वंश नष्ट हो जाता है, दुष्ट पत्नीसे जीवन नष्ट हो जाता है, विकृत भोजनसे दिन व्यर्थ चला जाता है और दुरात्मा मित्रसे सुख कहाँसे मिल सकता है ! ॥ १७ ॥ | | स्कन्द उवाच<br>एवं दुष्टस्य पुत्रस्य दुष्टैराचरणैर्मुनिः।<br>तप्यमानोऽनिशं काले गत्वा गर्गमपृच्छत ॥ १८ | कार्तिकेयजी बोले— [ हे अगस्त्यजी ! ] अपने दुष्ट पुत्रके दुराचरणोंसे निरन्तर सन्तप्त रहते हुए मुनि ऋतवाक्ने किसी दिन गर्गऋषिके पास जाकर पूछा— ॥ १८ ॥ | | ऋतवागुवाच<br>भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छामि वद तत् प्रभो।<br>ज्योतिश्शास्त्रस्य चाचार्य पुत्रदौःशील्यकारणम् ॥ १९ | ऋतवाक् बोले— हे भगवन् ! हे ज्योतिषशास्त्रके आचार्य ! मैं आपसे अपने पुत्रकी दुःशीलताका कारण पूछना चाहता हूँ। हे प्रभो ! आप उसे बतायें ॥ १९ ॥ | | गुरुशुश्रूषया वेदा अधीता विधिवन्मया।<br>ब्रह्मचारिव्रतं तीर्त्वा विवाहो विधिवत् कृतः ॥ २० | गुरुकी निरन्तर सेवा करते हुए मैंने विधिपूर्वक वेदाध्ययन किया और ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके विधि-विधानके साथ विवाह किया ॥ २० ॥ | | भार्यया सह गार्हस्थ्यधर्मश्चानुष्ठितोऽनिशम्।<br>पञ्चयज्ञविधानं च मयाकारि यथाविधि ॥ २१ | अपनी भार्याके साथ मैंने गृहस्थधर्मका सदैव यथोचित पालन किया और विधिपूर्वक पंचयज्ञका अनुष्ठान किया ॥ २१ ॥ | | नरकाद् बिभ्यता विप्र न तु कामसुखेच्छया।<br>गर्भाधानं च विधिवत् पुत्रप्राप्त्यै मया कृतम् ॥ २२ | हे विप्र ! नरकप्राप्तिके भयसे बचनेके लिये पुत्र प्राप्त करनेकी कामनासे मैंने विधिवत् गर्भाधान किया था न कि वासनात्मक सुखप्राप्तिकी इच्छासे ॥ २२ ॥ |
| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुत्रोऽयं मम दोषेण मातुर्दोषेण वा मुने।<br>जातो दुःखাবহः पित्रोर्दुःशीलो बन्धुशोकदः॥ २३ | हे मुने! दुःखदायी, माता-पिताके प्रति उद्दण्ड तथा बन्धु-बान्धवोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह पुत्र मेरे दोषसे अथवा अपनी माताके दोषसे उत्पन्न हुआ ? ॥ २३ ॥ |
| एतन्निशम्य वचनं गर्गाचार्यो मुनेस्तदा।<br>विचार्य सर्वं तद्धेतुं ज्योतिर्विद्वाचमब्रवीत्॥ २४ | तब ज्योतिषशास्त्रके ज्ञाता गर्गाचार्यने मुनि ऋतवाक्का यह वचन सुनकर सभी कारणोंपर सम्यक् रूपसे विचार करके कहा॥ २४॥ |
| गर्ग उवाच | गर्गाचार्यजी बोले— |
| मुने नैवापराधस्ते न मातुर्न कुलस्य च।<br>रेवत्यन्तं तु गण्डान्तं पुत्रदौःशील्यकारणम्॥ २५ | हे मुने! इसमें न तो आपका दोष है, न बालककी माताका दोष है और न तो कुलका दोष है। रेवती नक्षत्रका अन्तिम भाग—गण्डान्तयोग ही इस बालककी दुर्विनीतताका कारण है॥ २५॥ |
| दुष्टे काले यतो जन्म पुत्रस्य तव भो मुने।<br>तेनैव तव दुःखाय नान्यो हेतुर्मनागपि॥ २६ | हे मुने! अशुभ वेलामें आपके पुत्रका जन्म हुआ है, इसी कारण यह आपको दुःख दे रहा है; इसमें लेशमात्र भी अन्य कोई कारण नहीं है॥ २६॥ |
| तद्दुःखशान्तये ब्रह्मञ्जगतां मातरं शिवाम्।<br>समाराधय यत्नेन दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्॥ २७ | अतः हे ब्रह्मन्! इस दुःखके शमनके लिये आप प्रयत्नपूर्वक समस्त दुर्गत्तियोंका विनाश करनेवाली कल्याणी जगदम्बा दुर्गाकी आराधना कीजिये॥ २७॥ |
| गर्गस्य वचनं श्रुत्वा ऋतवाक् क्रोधमूर्च्छितः।<br>रेवतीं तु शशापासौ व्योम्नः पततु रेवती॥ २८ | गर्गाचार्यजीका वचन सुनकर ऋतवाङ्मुनि क्रोधसे मूर्च्छित हो गये और उन्होंने रेवतीको शाप दे दिया कि वह आकाशसे नीचे गिर जाय॥ २८॥ |
| दत्ते शापे तु तेनाथ पूष्णो भञ्च पपात खात्।<br>कुमुदाद्रौ भासमानं सर्वलोकस्य पश्यतः॥ २९ | ऋतवाक्के शाप देते ही चमकता हुआ रेवती नक्षत्र सभी लोगोंके देखते-देखते आकाशसे कुमुदपर्वतपर जा गिरा॥ २९॥ |
| ख्यातो रैवतकश्चाभूत्तत्पातात् कुमुदाचलः।<br>अतीव रमणीयश्च ततः प्रभृति सोऽप्यभूत्॥ ३० | वह कुमुदपर्वत रेवतीके गिरनेके कारण रैवतक नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसी समयसे वह अत्यन्त रमणीक हो गया॥ ३०॥ |
| दत्त्वा शापं च रेवत्यै गर्गोक्तविधिना मुनिः।<br>समाराध्याम्बिकां देवीं सुखसौभाग्यभागभूत्॥ ३१ | रेवतीको शाप देकर मुनि ऋतवाक्ने महर्षि गर्गद्वारा बताये गये विधानके अनुसार देवी भगवतीकी सम्यक् आराधनाकर सुख और सौभाग्य प्राप्त किया॥ ३१॥ |
| स्कन्द उवाच | कार्तिकेयजी बोले— |
| रेवत्यृक्षस्य यत् तेजस्तस्माज्जाता तु कन्यका।<br>रूपेणाप्रतिमा लोके द्वितीया श्रीरिवाभवत्॥ ३२ | [हे अगस्त्यजी!] उस रेवती नक्षत्रके महान् तेजसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो अनुपम रूपवती होनेके कारण लोकमें दूसरी लक्ष्मीकी भाँति प्रतीत हो रही थी॥ ३२॥ |
| अथ तां प्रमुचः कन्यां रेवतीकान्तिसम्भवाम्।<br>दृष्ट्वा नाम चकारास्या रेवतीति मुदा मुनिः॥ ३३ | रेवती नक्षत्रकी कान्तिसे प्रादुर्भूत उस कन्याको देखकर मुनि प्रमुचने प्रसन्न होकर उसका ‘रेवती’—यह नाम रख दिया॥ ३३॥ |
| ५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निन्येऽथ स्वाश्रमे चैनां पोषयामास धर्मतः।<br>ब्रह्मर्षिः प्रमुचो नाम कुमुदाद्रौ सुतामिव॥ ३४ | तदनन्तर ब्रह्मर्षि प्रमुच उसे कुमुदाचलपर स्थित अपने आश्रममें ले आये और पुत्रीकी भाँति उसका धर्मपूर्वक पालन-पोषण करने लगे॥ ३४॥ |
| अथ कालेन च प्रौढां दृष्ट्वा तां रूपशालिनीम्।<br>स मुनिश्चिन्तयामास कोऽस्या योग्यो वरो भवेत्॥ ३५ | समय पाकर यौवनको प्राप्त उस रूपवती कन्याको देखकर मुनिने विचार किया कि इस कन्याके योग्य वर कौन होगा?॥ ३५॥ |
| बहुधान्वेषयंस्तस्या नाससादोचितं पतिम्।<br>ततोऽग्निशालां संविश्य मुनिस्तुष्टाव पावकम्॥ ३६ | बहुत अन्वेषणके बाद भी जब मुनिको उसके योग्य कोई वर नहीं मिला, तब वे अग्निशालामें प्रवेश करके अग्निदेवकी स्तुति करने लगे॥ ३६॥ |
| कन्यावरं तदाशंसत्प्रीतस्तमपि हव्यवाट्।<br>धर्म्मिष्ठो बलवान् वीरः प्रियवागपराजितः॥ ३७<br>दुर्दमो भविता भर्त्ता मुनेऽस्याः पृथिवीपतिः।<br>इति श्रुत्वा वचो वह्नेः प्रसन्नोऽभून्मुनिस्तदा॥ ३८ | प्रमुचऋषिके स्तुति-गानसे प्रसन्न होकर अग्निदेवने कन्याके योग्य वरका संकेत करते हुए कहा—हे मुने! इस कन्याके पति धर्मपरायण, बलशाली, वीर, प्रिय भाषण करनेवाले और अपराजेय राजा दुर्दम होंगे। तब अग्निदेवके इस वचनको सुनकर मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ ३७-३८॥ |
| दैवादाखेटकव्याजात् तत्क्षणादागतो नृपः।<br>दुर्दमो नाम मेधावी तस्याश्रमपदं मुनेः॥ ३९ | संयोगसे उसी समय आखेटके बहाने दुर्दम नामक प्रतिभाशाली राजा मुनि प्रमुचके आश्रममें आ गये॥ ३९॥ |
| पुत्रो विक्रमशीलस्य बलवान् वीर्य्यवत्तरः।<br>कालिन्दीजठरे जातः प्रियव्रतकुलोद्भवः॥ ४० | बलवान् तथा अप्रतिम ओजसे सम्पन्न वे प्रियव्रतके वंशज राजा दुर्दम विक्रमशीलके पुत्र थे और कालिन्दीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे॥ ४०॥ |
| मुनेराश्रममाविश्य तमदृष्ट्वा महामुनिम्।<br>आमन्त्र्य तां प्रिये चेति रेवतीं पृष्टवान् नृपः॥ ४१ | मुनिके आश्रममें प्रवेशकर और उन्हें वहाँ न देखकर राजा दुर्दमने रेवतीको ‘प्रिये’—इस शब्दसे सम्बोधित करके पूछा॥ ४१॥ |
| राजोवाच<br>महर्षिर्भगवानस्मादाश्रमात् क्व गतः प्रिये।<br>तत्पादौ द्रष्टुमिच्छामि वद कल्याणि तत्त्वतः॥ ४२ | **राजा बोले—**हे प्रिये! महर्षि भगवान् प्रमुच इस आश्रमसे कहाँ गये हुए हैं? हे कल्याणि! मुझे सच-सच बताओ; मैं उनके चरणोंका दर्शन करना चाहता हूँ॥ ४२॥ |
| कन्योवाच<br>अग्निशालामुपगतो महाराज महामुनिः।<br>निश्चक्रामाश्रमात् तूर्णं राजाप्याकर्ण्य तद्वचः॥ ४३ | **कन्या बोली—**हे महाराज! महामुनि अग्निशालामें गये हुए हैं। राजा भी यह वचन सुनकर शीघ्रतापूर्वक आश्रमसे बाहर निकल आये॥ ४३॥ |
| अथाग्निशालाद्वारस्थं राजानं दुर्दमं मुनिः।<br>राजलक्षणसंयुक्तमपश्यत् प्रश्रयानतम्॥ ४४ | इसके बाद प्रमुचमुनिने राजलक्षणसम्पन्न एवं विनयावनत राजा दुर्दमको अग्निशालाके द्वारपर स्थित देखा॥ ४४॥ |
| प्रणनाम च तं राजा मुनिः शिष्यमुवाच ह।<br>गौतमानीयतामर्घ्यमर्घ्ययोग्योऽस्ति भूपतिः॥ ४५ | मुनिको देखकर राजाने प्रणाम किया और तदनन्तर मुनि प्रमुचने शिष्यसे कहा—हे गौतम! ये राजा अर्घ्य पानेके योग्य हैं, अतः शीघ्र ही इनके लिये |
| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५५ | | :--- | :--- |
| आगतश्चिरकालेन जामातेति विशेषतः।<br>इत्युक्त्वार्घ्यं ददौ तस्मै सोऽपि जग्राह चिन्तयन्॥ ४६<br><br>मुनिरासनमासीनं गृहीतार्घ्यं च भूपतिम्।<br>आशीर्भिरभिनन्द्याथ कुशलं चाप्यपृच्छत॥ ४७<br><br>अपि तेऽनामयं राजन् बले कोशे सुहृत्सु च।<br>भृत्येष्वमात्ये पुरे देशे तथात्मनि जनाधिप॥ ४८<br><br>भार्यास्ति ते कुशलिनी यतः सात्रैव तिष्ठति।<br>अतो न पृच्छाम्यस्यास्ते चान्यासां कुशलं वद॥ ४९ | अर्घ्य ले आओ। बहुत दिन बाद ये पधारे हुए हैं और विशेषरूपसे ये हमारे जामाता हैं—ऐसा कहकर मुनिने राजाको अर्घ्य प्रदान किया और राजाने भी विचार करते हुए उसे ग्रहण किया॥ ४५-४६॥<br><br>तत्पश्चात् राजाके अर्घ्य ग्रहण करके आसनपर बैठ जानेके उपरान्त मुनि प्रभुने उन्हें आशीर्वचनोंसे अभिनन्दित करके उनका कुशल-क्षेम पूछा—हे राजन्! आप स्वस्थ तो हैं? आपकी सेना, कोष, बन्धु-बान्धव, सेवकगण, सचिव, नगर, देश आदिकी सर्वविध कुशलता तो है? हे नरेश! आपकी भार्या तो यहीं विद्यमान है और वह सकुशल है। अतएव, मैं उसकी कुशलता नहीं पूछूँगा, आप अपनी अन्य स्त्रियोंका कुशल-क्षेम बताइये॥ ४७-४९॥ | | <center>राजोवाच</center>भगवंस्त्वत्प्रसादेन सर्वत्रानामयं मम।<br>एतत् कुतूहलं ब्रह्मन् मद्भार्या कात्र विद्यते॥ ५० | **राजा बोले—**हे भगवन्! आपके कृपाप्रभावसे मेरी सर्वविध कुशलता है। हे ब्रह्मन्! अब मेरी यह जिज्ञासा है कि मेरी कौन-सी भार्या यहाँ है?॥ ५०॥ | | <center>ऋषिरुवाच</center>रेवती नाम ते भार्या रूपेणाप्रतिमा भुवि।<br>विद्यतेऽत्र कथं पत्नीं तां न वेत्सि महीपते॥ ५१ | **ऋषि बोले—**हे पृथ्वीपते! संसारमें अप्रतिम लावण्यसे सम्पन्न रेवती नामक आपकी पत्नी यहाँ ही रहती है। क्या आप उसे नहीं जानते?॥ ५१॥ | | <center>राजोवाच</center>सुभद्राद्यास्तु या भार्या मम सन्ति गृहे विभो।<br>जानामि तास्तु भगवन् नैव जानामि रेवतीम्॥ ५२ | **राजा बोले—**हे प्रभो! सुभद्रा आदि मेरी पत्नियाँ तो घरपर ही हैं। हे भगवन्! मैं तो केवल उन्हें ही जानता हूँ। मैं रेवतीको तो नहीं जानता॥ ५२॥ | | <center>ऋषिरुवाच</center>प्रियेति साम्प्रतं राजंस्त्वयोक्ता या महामते।<br>सा विस्मृता क्षणादेव या ते श्लाघ्यतमा प्रिया॥ ५३ | **ऋषि बोले—**हे महामते! हे राजन्! इसी समय 'प्रिये' के सम्बोधनसे आपने जिससे पूछा था, अपनी उस योग्यतम प्रियाको आपने क्षणभरमें ही भुला दिया!॥ ५३॥ | | <center>राजोवाच</center>त्वयोक्तं यन्मृषा तन्नो तथैवामन्त्रिता मया।<br>मुने दुष्टो न मे भावः कोपं मा कर्तुमर्हसि॥ ५४ | **राजा बोले—**हे मुने! आपने जो कहा, वह असत्य नहीं है; किंतु मैंने तो सामान्यरूपसे ऐसा कह दिया था। इसमें मेरा कोई दूषित भाव नहीं था, अतः आप मेरे ऊपर क्रोध न करें॥ ५४॥ | | <center>ऋषिरुवाच</center>राजन्नुक्तं त्वया सत्यं न भावो दूषितस्तव।<br>वह्निना प्रेरितेनेत्थं भवता व्याहृतं वचः॥ ५५<br><br>अद्य पृष्टो मया वह्निः कोऽस्या भर्ता भविष्यति।<br>तेनोक्तं दुर्दमॊ राजा भवितास्याः पतिर्ध्रुवम्॥ ५६ | **ऋषि बोले—**हे राजन्! आपका भाव दूषित नहीं था अपितु आपने सत्य ही कहा था। अग्निदेवके द्वारा प्रेरित किये जानेपर ही आपने ऐसा कहा था॥ ५५॥<br><br>'इसका पति कौन होगा'—ऐसा मेरे द्वारा आज अग्निदेवसे पूछे जानेपर उन्होंने कहा था कि इसके पति निश्चितरूपसे राजा दुर्दम ही होंगे॥ ५६॥ |
५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदादत्स्व मया दत्तामिमां कन्यां महीपते।<br>प्रियेत्यामन्त्रिता पूर्वं मा विचारं कुरुष्व भोः॥ ५७ | हे महीपते! अतः मेरे द्वारा प्रदत्त इस कन्याको आप स्वीकार कीजिये। आप इसे 'प्रिये' ऐसा सम्बोधित भी कर चुके हैं। अतएव अब शंकारहित होकर किसी अन्य विचारमें न पड़ें॥ ५७॥ |
| श्रुत्वैतत् सोऽभवत् तूष्णीं चिन्तयन् मुनिभाषितम्।<br>वैवाहिकं विधिं तस्य मुनिः कर्तुं समुद्यतः॥ ५८ | मुनिका यह वचन सुनकर राजा दुर्दम चिन्तन करते हुए चुप हो गये और मुनि उनके वैवाहिक अनुष्ठानकी तैयारीमें जुट गये॥ ५८॥ |
| अथोद्यतं विवाहाय दृष्ट्वा कन्याब्रवीन्मुनिम्।<br>रेवत्यृक्षे विवाहो मे तात कर्तुं त्वमर्हसि॥ ५९ | इसके बाद विवाह-कार्यके लिये मुनिको तत्पर देखकर रेवतीने कहा—हे तात! आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही सम्पन्न करायें॥ ५९॥ |
| ऋषिरुवाच<br>वत्से विवाहयोग्यानि सन्त्यन्यर्क्षाणि भूरिशः।<br>रेवत्यां कथमुद्वाहः पौष्णभं न दिवि स्थितम्॥ ६० | ऋषि बोले—वत्से! विवाहके योग्य अन्य बहुत-से नक्षत्र हैं। रेवती नक्षत्रमें विवाह कैसे होगा; क्योंकि रेवती तो आकाशमें स्थित है ही नहीं॥ ६०॥ |
| कन्योवाच<br>रेवत्यृक्षं विना कालो ममोद्वाहोचितो न हि।<br>अतः संप्रार्थयाम्येतद्विवाहं पौष्णभे कुरु॥ ६१ | कन्या बोली—रेवती नक्षत्रके अतिरिक्त अन्य कोई भी नक्षत्र मेरे विवाहके लिये उचित नहीं है। अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही करें॥ ६१॥ |
| ऋषिरुवाच<br>ऋतवाङ्मुनिना पूर्वं रेवतीभं निपातितम्।<br>भान्तरे चेन्न ते प्रीतिर्विवाहः स्यात् कथं तव॥ ६२ | ऋषि बोले—पूर्वकालमें मुनि ऋतवाक्ने रेवती नक्षत्रको पृथ्वीपर गिरा दिया था। इस प्रकार अन्य नक्षत्रमें यदि तुम्हारी श्रद्धा नहीं है, तब तुम्हारा विवाह कैसे होगा?॥ ६२॥ |
| कन्योवाच<br>तपः किं तप्तवानेक ऋतवागेव केवलम्।<br>भवता किं तपो नेदृक् तप्तं वाक्कायमानसैः॥ ६३ | कन्या बोली—तात! क्या केवल एक ऋतवाक्ने ही तपश्चर्या की है? क्या आपने मन-वचन-कर्मसे ऐसी तपःसाधना नहीं की है?॥ ६३॥ |
| जगत्स्रष्टुं समर्थस्त्वं वेद्यहं ते तपोबलम्।<br>रेवत्यृक्षं दिवि स्थाप्य ममोद्वाहं पितः कुरु॥ ६४ | हे पिताजी! मैं आपके तपोबलको जानती हूँ; आप जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। अतः आप अपने तपके प्रभावसे रेवतीको पुनः आकाशमें स्थापित करके उसी नक्षत्रमें मेरा विवाह कीजिये॥ ६४॥ |
| ऋषिरुवाच<br>एवं भवतु भद्रं ते यथैव त्वं ब्रवीषि माम्।<br>त्वत्कृते सोममार्गेऽहं स्थापयिष्याद्य पौष्णभम्॥ ६५ | ऋषि बोले—तुम्हारा कल्याण हो। तुम जैसा मुझसे कह रही हो, वैसा ही होगा, तुम्हारे हितार्थ मैं आज ही रेवती नक्षत्रको सोममार्ग (नक्षत्र-मण्डल)-में स्थापित करूँगा॥ ६५॥ |
| स्कन्द उवाच<br>एवमुक्त्वा मुनिस्तूर्णं पौष्णभं स्वतपोबलात्।<br>यथापूर्वं तथा चक्रे सोममार्गे घटोद्भव॥ ६६ | कार्तिकेयजी बोले—हे अगस्त्यजी! ऐसा कहकर मुनिने अपने तपोबलसे शीघ्र ही पूर्वकी भाँति रेवती नक्षत्रको फिरसे नक्षत्र-मण्डलमें स्थापित कर दिया॥ ६६॥ |
| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५७ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| रेवतीनाम्नि नक्षत्रे विवाहविधिना मुनिः।<br>रेवतीं प्रददौ राज्ञे दुर्दाय महात्मने॥ ६७ | तदनन्तर मुनि प्रमुचने रेवती नक्षत्रमें वैवाहिक विधिके अनुसार महात्मा राजा दुर्दमको वह रेवती कन्या सौंप दी॥ ६७॥ |
| कृत्वा विवाहं कन्याया मुनी राजानमब्रवीत्।<br>किं तेऽभिलषितं वीर वद तत्पूरयाम्यहम्॥ ६८ | इस प्रकार कन्याका विवाह कर देनेके उपरान्त मुनिने राजासे कहा—हे वीर! तुम्हारी क्या अभिलाषा है? मुझे बताओ, मैं उसे पूरी करूँगा॥ ६८॥ |
| राजोवाच<br>मनोः स्वायम्भुवस्याहं वंशे जातोऽस्मि हे मुने।<br>मन्वन्तराधिपं पुत्रं त्वत्प्रसादाच्च कामये॥ ६९ | राजा बोले— हे मुने! मैं स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न हुआ हूँ, अतः मैं यही कामना करता हूँ कि आपकी कृपासे मुझे मन्वन्तराधिपति पुत्रकी प्राप्ति हो॥ ६९॥ |
| मुनिरुवाच<br>यद्येषा कामना तेऽस्ति देव्या आराधनं कुरु।<br>भविष्यत्येव ते पुत्रो मनुर्मन्वन्तराधिपः॥ ७० | मुनि बोले— यदि आपकी यह अभिलाषा है तो आप देवी भगवतीकी आराधना कीजिये। ऐसा करनेपर आपका पुत्र मनु अवश्य ही मन्वन्तराधिपति होगा॥ ७०॥ |
| देवीभागवतं नाम पुराणं यत्तु पञ्चमम्।<br>पञ्चकृत्वस्तु तच्छ्रुत्वा लप्स्यसेऽभिमतं सुतम्॥ ७१ | श्रीमद्देवीभागवत जो पंचम पुराणके रूपमें विख्यात है, उसका पाँच बार श्रवण करनेके उपरान्त आपको मनोवांछित पुत्र प्राप्त होगा॥ ७१॥ |
| रेवत्यां रैवतो नाम पञ्चमो भविता मनुः।<br>वेदविच्छास्त्रतत्त्वज्ञो धर्मवानपराजितः॥ ७२ | रेवतीके गर्भसे उत्पन्न रैवत नामवाला पाँचवाँ मनु वेदवेत्ता, शास्त्रोंके तत्त्वोंको जाननेवाला, धर्मपरायण तथा अपराजेय होगा॥ ७२॥ |
| इत्युक्तो मुनिना राजा प्रणम्य मुदितो मुनिम्।<br>भार्यया सह मेधावी जगाम नगरं निजम्॥ ७३ | मुनि प्रमुचके इस प्रकार कहनेपर प्रसन्न होकर प्रतिभासम्पन्न राजा दुर्दमने मुनिको प्रणाम किया और वे भार्या रेवतीके साथ अपने नगर चले गये॥ ७३॥ |
| पितृपैतामहं राज्यं चकार स महामतिः।<br>पालयामास धर्मात्मा प्रजाः पुत्रानिवौरसान्॥ ७४ | महामति राजा दुर्दमने अपने पिता-पितामहसे प्राप्त राज्यपर शासन किया और उस धर्मात्माने औरस पुत्रोंकी भाँति अपनी प्रजाओंका पालन किया॥ ७४॥ |
| एकदा लोमशो नाम महात्मा मुनिरागतः।<br>प्रणिपत्य तमभ्यर्च्य प्राञ्जलिश्चाब्रवीन्नृपः॥ ७५ | एक बार उनके यहाँ महात्मा लोमशऋषि पधारे। राजा दुर्दमने उन्हें प्रणाम किया और उनका विधिवत् पूजनकर दोनों हाथ जोड़कर कहा॥ ७५॥ |
| राजोवाच<br>भगवंस्त्वत्प्रसादेन श्रोतुमिच्छामि भो मुने।<br>देवीभागवतं नाम पुराणं पुत्रलिप्सया॥ ७६ | राजा बोले— हे भगवन्! हे मुने! यदि आप कृपा करें तो मैं पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे आपसे देवीभागवत नामक पुराण सुनना चाहता हूँ॥ ७६॥ |
| श्रुत्वा वाचं प्रजाभर्तुः प्रीतः प्रोवाच लोमशः। | राजाका यह वचन सुनकर लोमशमुनि प्रसन्न हो गये और बोले— |
| धन्योऽसि राजंस्ते भक्तिर्जाता त्रैलोक्यमातरि॥ ७७<br>सुरासुरनराराध्या या परा जगदम्बिका।<br>तस्यां चेद्भक्तिरुत्पन्ना कार्यसिद्धिर्भविष्यति॥ ७८ | हे राजन्! आप धन्य हैं; क्योंकि तीनों लोकोंकी जननी देवी भगवतीमें आपकी ऐसी भक्ति हो गयी है। देव, दानव तथा मानवकी आराध्या परा भगवती जगदम्बामें यदि आपकी भक्ति उत्पन्न हुई है तो आपकी कार्य-सिद्धि अवश्य होगी॥ ७७-७८॥ |
| ५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| अतस्त्वां श्रावयिष्यामि श्रीमद्भागवतं नृप।<br>यस्य श्रवणमात्रेण न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥ ७९ | अतएव हे राजन्! मैं आपको श्रीमद्देवीभागवत सुनाऊँगा, जिसके सुननेमात्रसे कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं रह जाता॥ ७९॥ | | इत्युक्त्वा सुदिने ब्रह्मन् कथारम्भमथाकरोत्।<br>पञ्चकृत्वः स शुश्राव विधिवद्भार्यया सह॥ ८० | हे ब्रह्मन्! ऐसा कहकर मुनिने किसी शुभ दिनमें कथाका आरम्भ किया। अपनी पत्नीके साथ राजाने पाँच बार श्रीमद्देवीभागवतपुराणका विधिवत् श्रवण किया॥ ८०॥ | | समाप्तिदिवसे राजा पुराणञ्च मुनिं तथा।<br>पूजयामास धर्मात्मा मुदा परमया युतः॥ ८१ | कथा-समाप्तिके दिन धर्मनिष्ठ राजा दुर्दमाने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतपुराण तथा लोमशमुनिकी पूजा की॥ ८१॥ | | हुत्वा नवार्णमन्त्रेण भोजयित्वा कुमारिकाः।<br>वाडवांश्च सपत्नीकान्दक्षिणाभिरतोषयत्॥ ८२ | राजाने नवार्णमन्त्रसे हवन करके कुमारी कन्याओंको भोजन कराया और सपत्नीक ब्राह्मणोंको प्रभूत दक्षिणादानद्वारा संतुष्ट किया॥ ८२॥ | | अथ कालेन कियता भगवत्याः प्रसादतः।<br>गर्भं दधार सा राज्ञी लोककल्याणकारकम्॥ ८३ | कुछ समय बीत जानेपर भगवतीकी कृपासे उस रानी रेवतीने लोककल्याणकारी गर्भ धारण किया॥ ८३॥ | | पुण्येऽथ समये प्राप्ते ग्रहैः सुस्थानसङ्गतैः।<br>सर्वमङ्गलसम्पन्ने रेवती सुषुवे सुतम्॥ ८४ | इसके बाद जब समस्त ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने अनुकूल स्थानोंपर थे और सभी मांगलिक कृत्य सम्पन्न हो गये थे—ऐसे शुभ समयमें रेवतीने पुत्रको जन्म दिया॥ ८४॥ | | श्रुत्वा पुत्रस्य जननं स्नात्वा राजा मुदान्वितः।<br>स सुवर्णाम्भसा चक्रे जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ८५ | पुत्रके जन्मका समाचार सुनकर राजा दुर्दाम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने स्नान करके स्वर्ण-कलशके जलसे पुत्रका जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न किया॥ ८५॥ | | यथाविधि च दानानि दत्त्वा विप्रानतोषयत्।<br>कृतोपनयनं राजा साङ्गान्वेदानपाठयत्॥ ८६ | तदनन्तर राजाने विधिपूर्वक दान देकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया। समयपर पुत्रका उपनयन-संस्कार करके राजाने अपने पुत्रको अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन कराया॥ ८६॥ | | सर्वविद्यानिधिर्जातो धर्मिष्ठोऽस्त्रविदां वरः।<br>धर्मस्य वक्ता कर्ता च रैवतो नाम वीर्यवान्॥ ८७ | इस प्रकार राजाका वह रैवत नामक तेजस्वी पुत्र समग्र विद्याओंका निधान, धर्मपरायण, अस्त्र-विशारदोंमें श्रेष्ठ, धर्मका वक्ता तथा धर्मका पालनकर्ता हो गया॥ ८७॥ | | नियुक्तवानथ ब्रह्मा रैवतं मानवे पदे।<br>मन्वन्तराधिपः श्रीमान् गां शशास स धर्मतः॥ ८८ | इसके बाद ब्रह्माजीने रैवतको मनुके पदपर नियुक्त किया और वे श्रीमान् मन्वन्तराधिपके रूपमें धर्मपूर्वक पृथ्वीपर शासन करने लगे॥ ८८॥ | | इत्थं देव्याः प्रभावोऽयं संक्षेपेणोपवर्णितः।<br>पुराणस्य च माहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात्क्षमः॥ ८९ | इस प्रकार मैंने देवी भगवतीके इस प्रभावका संक्षिप्तरूपसे वर्णन कर दिया। इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कौन समर्थ है?॥ ८९॥ |
अ० ५ ] माहात्म्य ५९
अ० ५ ] माहात्म्य ५९
| सूत उवाच<br>कुम्भयोनिस्तु माहात्म्यं विधिं भागवतस्य च।<br>श्रुत्वा कुमारं चाभ्यर्च्य स्वाश्रमं पुनराययौ॥ ९०<br><br>इदं मया भागवतस्य विप्रा<br>माहात्म्यमुक्तं भवतां समक्षम्।<br>शृणोति भक्त्या पठतीह भोगान्<br>भुक्त्वाखिलान्मुक्तिमुपैति चान्ते॥ ९१ | सूतजी बोले—[हे ब्राह्मणो!] इस प्रकार श्रीमद्देवीभागवतका माहात्म्य तथा उसकी विधि सुनकर और कुमार कार्तिकेयकी पूजाकर अगस्त्यजी अपने आश्रम चले आये॥ ९०॥<br><br>हे विप्रो! मैंने आपलोगोंके समक्ष श्रीमद्देवी-भागवतका यह माहात्म्य कह दिया। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण तथा पाठ करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका सुख प्राप्त करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है॥ ९१॥ |
इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये रैवतनामक-
मनुपुत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी श्रवण-विधि, श्रवणकर्ताके लिये पालनीय नियम, श्रवणके फल तथा माहात्म्यका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग श्रुतं माहात्म्यमुत्तमम्।<br>अधुना श्रोतुमिच्छामः पुराणश्रवणे विधिम्॥ १ | **ऋषियोंने कहा—**हे महाभाग सूतजी! हमलोगोंने श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य सुन लिया और अब इस पुराणके श्रवणकी विधि सुनना चाहते हैं॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>श्रूयतां मुनयः सर्वे पुराणश्रवणे विधिम्।<br>नराणां शृण्वतां येन सिद्धिः स्यात्सार्वकामिकी॥ २ | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! अब आपलोग इस पुराणके श्रवणका विधान सुनें, जिसे सुननेवाले मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं॥ २॥ |
| आदौ दैवज्ञमाहूय मुहूर्तं कल्पयेत्सुधीः।<br>आरभ्य शुचिमासं तु मासषट्कं शुभावहम्॥ ३ | पुराणश्रवणके इच्छुक विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि वह सर्वप्रथम ज्योतिषीको बुलाकर शुभ मुहूर्त निर्धारित कर ले। इसके लिये ज्येष्ठमाससे लेकर छः महीने शुभकारक होते हैं॥ ३॥ |
| हस्ताश्विमूलपुष्यर्क्षै ब्रह्ममैत्रेन्दुवैष्णवे।<br>सत्तिथौ शुभवारे च पुराणश्रवणं शुभम्॥ ४ | हस्त, अश्विनी, मूल, पुष्य, रोहिणी, अनुराधा, मृगशिरा तथा श्रवण नक्षत्र, पुण्य तिथि तथा शुभ दिनमें श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण कल्याणकारी होता है॥ ४॥ |
| गुरुभाद्वेदवेदाब्जशराङ्गाब्धिगुणैः क्रमात्।<br>धर्माप्तिरिन्दिराप्राप्तिः कथासिद्धिः परं सुखम्॥ ५ | जिस नक्षत्रमें बृहस्पति हों, उससे चन्द्रमातक गिननेपर क्रमशः इस प्रकार फल होते हैं—चार नक्षत्रतक धर्म-प्राप्ति, पुनः चारतक लक्ष्मीकी प्राप्ति, इसके बाद एक नक्षत्र कथामें सिद्धि प्रदान करनेवाला, फिर पाँच नक्षत्र परम सुखकी प्राप्ति करानेवाले, बादमें छः नक्षत्र पीड़ा करनेवाले, इसके |
| ६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| पीडाथ भूपतिभयं ज्ञानप्राप्तिः क्रमात्फलम्।<br>पुराणश्रवणे चक्रं शोधयेच्छिवभाषितम्॥ ६ | बाद चार नक्षत्र राज-भय उत्पन्न करनेवाले और तत्पश्चात् तीन नक्षत्र ज्ञान-प्राप्तिमें सहायक होते हैं। पुराणश्रवणके आरम्भमें शिवोक्त चक्रका शोधन कर लेना चाहिये॥ ५-६॥ | | अथवा प्रीतये देव्या नवरात्रचतुष्टये।<br>शृणुयादन्यमासेऽपि तिथिवारर्क्षशोधिते॥ ७ | देवीकी प्रसन्नताके लिये इसे चारों नवरात्रोंमें* सुनना चाहिये अथवा तिथि, वार और नक्षत्रपर सम्यक् विचार करके यह पुराण अन्य मासोंमें भी सुना जा सकता है॥ ७॥ | | सम्भारं तादृशं कार्यं विवाहादौ च यादृशम्।<br>नवाहयज्ञे चाप्यस्मिन्विधेयं यत्नतो बुधैः॥ ८ | विवाह आदिमें जिस प्रकार [उत्साहपूर्वक] तैयारी की जाती है, उसी प्रकार नवाह-यज्ञके अवसरपर भी बुद्धिमान् मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक सामग्री आदिकी तैयारी करनी चाहिये॥ ८॥ | | सहाया बहवः कार्या दम्भलोभविवर्जिताः।<br>चतुराश्च वदान्याश्च देवीभक्तिपरा नराः॥ ९ | पाखण्ड तथा लोभसे रहित, चतुर, उदार एवं देवीभक्त सज्जनोंको भी सहायकके रूपमें लेना चाहिये॥ ९॥ | | प्रेष्या यत्नेन वार्तेयं देशे देशे जने जने।<br>आगन्तव्यमिहावश्यं कथा देव्या भविष्यति॥ १० | देश-देशमें भी यत्नपूर्वक यह सन्देश भेजना चाहिये—[हे कथानुरागी सज्जनो!] यहाँ श्रीमद्देवी-भागवतकी कथा होने जा रही है, आप अवश्य पधारें॥ १०॥ | | सौराश्च गाणपत्याश्च शैवाः शाक्ताश्च वैष्णवाः।<br>सर्वेषामपि सेव्येयं यतो देवाः सशक्तयः॥ ११ | चाहे सूर्यकी उपासना करनेवाले हों, चाहे गणेशभक्त हों, चाहे शैव हों, चाहे वैष्णव अथवा शक्तिके उपासक हों, सभी इस कथाके श्रवणके अधिकारी हैं; क्योंकि सभी देवता शक्तिके साथ ही रहते हैं॥ ११॥ | | श्रीमद्देवीभागवतपीयूषरसलोलुपैः ।<br>आगन्तव्यं विशेषेण कथार्थं प्रेमतत्परैः॥ १२ | इसलिये श्रीमद्देवीभागवतकी कथारूपी सुधाके रसिक प्रेमीजनोंको कथाश्रवणके लिये विशेषरूपसे आना चाहिये॥ १२॥ | | ब्राह्मणाद्याश्च ये वर्णाः स्त्रियश्चाश्रामिणस्तथा।<br>सकामाश्चापि निष्कामाः पातव्यं तैः कथामृतम्॥ १३ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—चारों वर्णके स्त्री, पुरुष एवं ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास—इन चारों आश्रमोंमें निरत मनुष्योंको चाहे सकामभावसे अथवा निष्कामभावसे—अवश्य ही इस कथा-सुधाका पान करना चाहिये॥ १३॥ |
* सामान्यतः नवरात्र चार हैं—१-चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक, २-आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक (इसी नवरात्रके बाद हरिशयनी एकादशी), ३-आश्विन शुक्ल प्रतिपदासे विजयादशमीतक (इसके बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी देवोत्थानी—प्रबोधिनी एकादशी) तथा ४-माघ शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक सारस्वत-नवरात्र।
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नावकाशः कदाचित्स्यान्नवाहश्रवणेऽपि तैः।<br>आगन्तव्यं यथाकालं यज्ञे पुण्या क्षणस्थितिः॥ १४ | जिन लोगोंको पूरे नौ दिनतक कथा सुननेका अवकाश न मिल सके, वे जब भी समय मिले तभी आ जायें; क्योंकि यज्ञमें क्षणभर भी पहुँच जाना विशेष पुण्यदायक होता है॥ १४॥ |
| विनयेनैव कर्तव्यमेवमाकारणं नृणाम्।<br>आगतानाञ्च कर्तव्यं वासस्थानं यथोचितम्॥ १५ | बड़ी नम्रताके साथ मनुष्योंको निमन्त्रण देना चाहिये और आये हुए श्रोताओंके बैठनेका भी समुचित प्रबन्ध करना चाहिये॥ १५॥ |
| कथास्थानं प्रकर्तव्यं भूमौ मार्जनपूर्वकम्।<br>लेपनं गोमयेनाथ विशालायां मनोरमम्॥ १६<br><br>कार्यस्तु मण्डपो रम्यो रम्भास्तम्भोपशोभितः।<br>वितानमुपरिष्टात्तु पताकाध्वजराजितः॥ १७ | विस्तृत भूमिमें कथा-प्रवचनका सुन्दर स्थान बनाना चाहिये। उस स्थानकी सफाई कराकर गोबरसे लिपवा देना चाहिये। केलेके स्तम्भोंसे सुशोभित और ध्वज-पताकाओंसे अलंकृत एक सुरम्य मण्डपका निर्माण करना चाहिये और उसके ऊपर सुन्दर चाँदनी लगा देनी चाहिये॥ १६-१७॥ |
| वक्तुश्चैवासनं दिव्यं सुखास्तरणसंयुतम्।<br>रचितव्यं प्रयत्नेन प्राङ्मुखं वाप्युदङ्मुखम्॥ १८ | कथावाचकका आसन दिव्य तथा सुखकर आस्तरणसे युक्त होना चाहिये। उसे प्रयत्नपूर्वक पूर्वा-भिमुख अथवा उत्तराभिमुख रखना चाहिये॥ १८॥ |
| यथोचितानि कुर्वीत श्रोतॄणामासनानि च।<br>नॄणां चैवाथ नारीणां कथाश्रवणहेतवे॥ १९ | कथाश्रवणके लिये आनेवाले पुरुष तथा स्त्री श्रोताओंके लिये भी यथायोग्य पृथक्-पृथक् आसनोंकी व्यवस्था करनी चाहिये॥ १९॥ |
| वाग्मी दान्तश्च शास्त्रज्ञो देव्याराधनतत्परः।<br>दयालुर्निस्पृहो दक्षो धीरो वक्तोत्तमो मतः॥ २० | वक्तृत्वसम्पन्न, संयमी, शास्त्रज्ञ, देवीकी आराधनामें तत्पर, दयालु, लोभहीन, दक्ष तथा धैर्यशाली कथावाचक उत्तम माना गया है॥ २०॥ |
| ब्रह्मण्यो देवताभक्तः कथारसपरायणः।<br>उदारोऽलोलुपो नम्रः श्रोता हिंसाविवर्जितः॥ २१ | इसी प्रकार श्रोता भी ऐसा होना चाहिये जो ब्राह्मणसेवी, देवभक्त, कथा-रसका पान करनेवाला, उदार, लोभरहित, विनम्र और हिंसा आदिसे रहित हो॥ २१॥ |
| पाखण्डनिरतो लुब्धः स्त्रैणो धर्मध्वजस्तथा।<br>निष्ठुरः क्रोधनो वक्ता देवीयज्ञे न शस्यते॥ २२ | पाखण्डी, लोभी, स्त्रीस्वभाव, कामी, धर्मका दिखावामात्र करनेवाला, निष्ठुर तथा क्रोधी वक्ता देवीभागवतके नवाहयज्ञमें श्रेष्ठ नहीं माना जाता है॥ २२॥ |
| संशयच्छेदनायकः पण्डितश्च तथागुणः।<br>श्रोतृबोधकृदव्यग्रः कार्यो वक्तुः सहायकत्॥ २३ | श्रोताओंकी शंकाओंके निवारणहेतु कथावाचकके साथ एक ऐसा सहायक भी लगा देना चाहिये, जो पण्डित, गुणवान्, शान्त तथा श्रोताओंको समझानेमें कुशल हो॥ २३॥ |
| मुहूर्तदिवसादर्वाग्वक्तृश्रोत्रादिभिर्जनैः ।<br>कर्तव्यं क्षौरकर्मादि ततो नियमकल्पनम्॥ २४ | कथा प्रारम्भ होनेके एक दिन पूर्व ही वक्ता एवं श्रोतागणोंको क्षौरकर्म करा लेना चाहिये। तत्पश्चात् अन्यान्य नियमोंका पालन करना चाहिये॥ २४॥ |
| ६२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अरुणोदयवेलायां स्नायाच्छौचं विधाय च।<br>सन्ध्यार्पणकार्यञ्च नित्यं संक्षेपतश्चरेत्॥ २५ | उस दिन शौचादिसे निवृत्त हो अरुणोदयवेलामें ही स्नान कर लेना चाहिये। सन्ध्या तथा तर्पण आदि नित्यकर्म संक्षेपमें ही करना चाहिये॥ २५॥ |
| कथाश्रवणयोग्यत्वसिद्धये गाश्च दापयेत्।<br>समस्तविघ्नहर्तारमादौ गणपतिं यजेत्॥ २६<br><br>कलशांश्चापि संस्थाप्य पूजयेत्तत्र दिग्भवान्।<br>वटुकं क्षेत्रपालञ्च योगिनीर्मातृकास्तथा॥ २७<br><br>तुलसीञ्चापि सम्पूज्य ग्रहान्विष्णुञ्च शङ्करम्।<br>नवाक्षरेण मनुना पूजयेज्जगदम्बिकाम्॥ २८ | तत्पश्चात् कथाश्रवणका अधिकारी बननेके लिये गोदान करे और सब विघ्नोंको दूर करनेवाले श्रीगणेशजीका सर्वप्रथम पूजन करे। कलश-स्थापन करके वहाँ दस दिक्पालों, बटुक, क्षेत्रपाल, सभी योगिनियों और मातृकाओंका भी पूजन करे। तुलसी, नवग्रह, विष्णु तथा शिवजीका पूजन करके नवाक्षरमन्त्रसे जगदम्बाका पूजन करना चाहिये॥ २६—२८॥ |
| सर्वोपचारैः सम्पूज्य श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>श्रीदेव्या वाङ्मयीं मूर्तिं यथावच्छोभनाक्षरम्॥ २९<br><br>कथाविघ्नोपशान्त्यर्थं वृणुयात्पञ्च वाडवान्।<br>जाप्यो नवार्णमन्त्रस्तैः पाठ्यः सप्तशतीस्तवः॥ ३० | तत्पश्चात् सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई भगवतीकी वाङ्मयी मूर्तिस्वरूप श्रीमद्देवीभागवत-पुस्तककी सभी उपचारोंसे विधिवत् पूजा करके कथाकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये पाँच विद्वान् ब्राह्मणोंका वरण करना चाहिये। उनसे निरन्तर नवार्णमन्त्रका जप एवं दुर्गासप्तशतीका पाठ कराना चाहिये॥ २९-३०॥ |
| प्रदक्षिणनमस्कारान्कृत्वान्ते स्तुतिमाचरेत्।<br>कात्यायनि महामाये भवानि भुवनेश्वरि॥ ३१<br><br>संसारसागरे मग्नं मामुद्धर कृपामये।<br>ब्रह्मविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके॥ ३२<br><br>मनोऽभिलषितं देवि वरं देहि नमोऽस्तु ते।<br>इति सम्प्रार्थ्य शृणुयात्कथां नियतमानसः॥ ३३ | अन्तमें प्रदक्षिणा तथा नमस्कारके बाद इस प्रकार स्तुति करे—‘हे कात्यायनि! हे महामाये! हे भुवनेश्वरि! हे कृपामये! हे भवानि! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ; मेरा उद्धार कीजिये तथा हे ब्रह्मा, विष्णु, महेशसे पूजनीया माता जगदम्बिके! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। हे देवि! आप मुझे मनोवांछित वर प्रदान कीजिये; आपको बार-बार प्रणाम है। इस प्रकार प्रार्थना करके स्वस्थचित्त होकर कथा सुने॥ ३१—३३॥ |
| वक्तारञ्चापि सम्पूज्य व्यासबुद्ध्या यतात्मवान्।<br>माल्यालङ्कारवस्त्राद्यैः सम्भूष्य प्रार्थयेच्च तम्॥ ३४<br><br>सर्वशास्त्रेतिहासज्ञ व्यासरूप नमोऽस्तु ते।<br>कथाचन्द्रोदयेनान्तस्तमःस्तोमं निराकुरु॥ ३५ | उस समय संयतचित्त होकर वक्ताको साक्षात् व्यास समझकर विधिवत् उनकी पूजा करे और वस्त्राभूषण तथा माला आदि पहनाकर उनसे प्रार्थना करे—‘समस्त शास्त्र तथा पुराणेतिहासके ज्ञाता हे व्यासजी! आपको नमस्कार है। आप कथारूपी चन्द्रमाकी ज्योतिसे हमारे अन्तःकरणके अन्धकारसमूहको नष्ट कीजिये’॥ ३४-३५॥ |
| तदग्रे तु नवाहान्तं कर्तव्या नियमास्तदा।<br>विप्रादीनुपवेश्यादौ सम्पूज्योपविशेत्स्वयम्॥ ३६ | इसके बाद नवाहके नियमोंका व्रत ले और ब्राह्मणोंका यथाशक्ति पूजन करके उन्हें पहले यथास्थान बैठा दे, तत्पश्चात् स्वयं भी अपने आसनपर बैठ जाय॥ ३६॥ |
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रोतव्यं सावधानेन चतुर्वर्गफलाप्तये।<br>गृहपुत्रकलत्राप्तधनचिन्तामपास्य च॥ ३७ | तब सावधान मनसे चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष)-फलको प्राप्त करनेके लिये पुत्र-कलत्र, धन-धान्य तथा गृहकी चिन्ता छोड़कर कथा सुने॥ ३७॥ |
| सूर्योदयं समारभ्य किञ्चित्सूर्येऽवशेषिते।<br>मुहूर्तमात्रं विश्रम्य मध्याह्ने वाचयेत्सुधीः॥ ३८ | विद्वान् वक्ताको चाहिये कि वह सूर्योदयसे आरम्भ करके पुनः दोपहरमें दो घड़ी विश्राम करके सूर्यास्तके कुछ समय पहलेतक कथा-वाचन करे॥ ३८॥ |
| मलमूत्रजयायैषां लघु भोजनमिष्यते।<br>हविष्योन्नं वरं भोज्यं सकृदेव कथार्थिना॥ ३९<br>अथवा स्यात्फलाहारी पयोभुग्वा घृताशनः।<br>यथा स्यान्न कथाविघ्नस्तथा कार्यं विचक्षणैः॥ ४० | मल-मूत्रके वेगको रोकनेके लिये स्वल्पाहार उत्तम होता है। कथार्थीको दिन-रातमें केवल एक बार हविष्यान्नका भोजन करना ही ठीक है; अथवा फलाहार करे या केवल दूध-घीके आहारपर ही रहे। बुद्धिमान्को चाहिये कि ऐसा आहार ग्रहण करे, जिससे कथामें किसी प्रकारकी बाधा न हो॥ ३९-४०॥ |
| कथाश्रवणनिष्ठानां वक्ष्यामि नियमं द्विजाः।<br>ब्रह्मविष्णुमहेशानां मध्ये ये भेददर्शिनः॥ ४१<br>देवीभक्तिविहीना ये पाखण्डा हिंसकाः खलाः।<br>विप्रद्रुहो नास्तिका ये न ते योग्याः कथाश्रवे॥ ४२ | हे द्विजगण! अब मैं कथाश्रवणमें निष्ठा रखनेवालोंके नियम बताता हूँ। जो लोग ब्रह्मा, विष्णु और शिवमें भेददृष्टि रखते हैं, देवीकी भक्तिसे रहित हैं, जो पाखण्डी, हिंसक तथा दुष्ट हैं और जो ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले तथा नास्तिक हैं, वे कथाश्रवणके योग्य नहीं हैं॥ ४१-४२॥ |
| ब्रह्मस्वहरणे लुब्धाः परदारधनेषु च।<br>देवस्वहरणे तेषां नाधिकारः कथाश्रवे॥ ४३ | जो परस्त्री, पराया धन, ब्राह्मणधन तथा देव-सम्पत्तिके हरणमें लुब्ध रहते हैं, उनका कथाश्रवणमें अधिकार नहीं है॥ ४३॥ |
| ब्रह्मचारी च भूशायी सत्यवक्ता जितेन्द्रियः।<br>कथासमाप्तौ भुञ्जीत पत्रावल्यां यतात्मवान्॥ ४४ | श्रोताको चाहिये कि वह ब्रह्मचर्यका पालन करे, पृथ्वीपर सोये, सत्य बोले, जितेन्द्रिय रहे तथा कथाकी समाप्तिपर संयमपूर्वक पत्तलपर भोजन करे॥ ४४॥ |
| वृन्ताकञ्च कलिन्दञ्च तैलञ्च द्विदलं मधु।<br>दग्धमन्नं पर्युषितं भावदुष्टं त्यजेद् व्रती॥ ४५ | व्रतीको बैगन, बहेड़ा (कलिन्द), तेल, दाल, मधु और जला हुआ, बासी तथा भावदूषित अन्नका त्याग कर देना चाहिये॥ ४५॥ |
| आमिषञ्च मसूरान्नमुदक्यादृष्टमेव च।<br>रसोंनं मूलकं हिङ्गुं पलाण्डुं गृञ्जनं तथा॥ ४६<br>कूष्माण्डं नलिकाशाकं न भुञ्जीत कथाव्रती।<br>कामं क्रोधं मदं लोभं दम्भं मानञ्च वर्जयेत्॥ ४७ | कथा सुननेवाला व्रती मांस, मसूर, रजस्वला स्त्रीका देखा हुआ खाद्यान्न, लहसुन, मूली, हींग, प्याज, गाजर, कोहड़ा और करमीका साग न खाये। काम, क्रोध, मद, लोभ, पाखण्ड और अहंकारको छोड़ दे॥ ४६-४७॥ |
| विप्रध्रुक्पतितव्रात्यश्वपाकयवनान्त्यजैः ।<br>उदक्यया वेदबाह्यैर्न वदेद्यः कथाव्रती॥ ४८ | विप्रद्रोही, पतित, संस्कारहीन, चाण्डाल, यवन, अन्त्यज, रजस्वला स्त्री और वेदविहीन मनुष्योंसे कथाव्रतीको वार्तालाप नहीं करना चाहिये॥ ४८॥ |
| ६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| वेदगोगुरुविप्राणां स्त्रीराज्ञां महतां तथा।<br>देवानां देवभक्तानां न निन्दां शृणुयादपि॥ ४९ | श्रोताको चाहिये कि वह वेद, गौ, गुरु, ब्राह्मण, स्त्री, राजा, महापुरुष, देवताओं और देवभक्तोंकी निन्दा कभी न सुने॥ ४९॥ | | विनयं चार्जवं शौचं दयां च मितभाषणम्।<br>उदारं मानसञ्चैव कुर्याद्यस्तु कथाव्रती॥ ५० | जो कथाव्रती हो उसे सर्वदा विनयशील, सरलचित्त, पवित्र, दयालु, कम बोलनेवाला तथा उदार मनवाला होना चाहिये॥ ५०॥ | | श्वित्री कुष्ठी क्षयी रुग्णो भाग्यहीनश्च पापकृत्।<br>दरिद्रश्चानपत्यश्च भक्त्येमां शृणुयात्कथाम्॥ ५१ | श्वेतकुष्ठी, कुष्ठी, क्षयरोगी, अभागा, पापी, दरिद्र तथा सन्तानहीन मनुष्य इस कथाको भक्तिपूर्वक सुने॥ ५१॥ | | वन्ध्या वा काकबन्ध्या वा दुर्भगा वा मृतार्भका।<br>पतद्गर्भाङ्गना या च ताभिः श्राव्या तथा कथा॥ ५२ | जो स्त्री वन्ध्या, काकबन्ध्या (जिस स्त्रीको एक बार सन्तान होकर बन्द हो जाय), अभागिन तथा मृतवत्सा हो और जिसका गर्भ गिर जाता हो, ऐसी सभी स्त्रियोंको इस देवीभागवतकथाका श्रवण करना चाहिये॥ ५२॥ | | धर्मार्थकाममोक्षांश्च यो वाञ्छति विना श्रमम्।<br>भगवत्या भागवतं श्रोतव्यं तेन यत्नतः॥ ५३ | जो मनुष्य बिना परिश्रमके ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, वह यत्नपूर्वक इस देवीभागवतकी कथा अवश्य सुने॥ ५३॥ | | कथादिनानि चैतानि नवयज्ञैः समानि हि।<br>तेषु दत्तं हुतं जप्तमनन्तफलदं भवेत्॥ ५४ | इस नवाह्नकथाके नौ दिन नौ यज्ञोंके समान हैं। उनमें किया गया दान, हवन तथा जप अनन्त फल देनेवाला होता है॥ ५४॥ | | एवं व्रतं नवाहं तु कृत्योद्यापनमाचरेत्।<br>महाष्टमीव्रतं यद्वत्तथा कार्यं फलेप्सुभिः॥ ५५ | इस प्रकार नवाहव्रत करके उसका उद्यापन करना चाहिये। फलकी कामना करनेवाले पुरुषोंको महाष्टमीव्रतके उद्यापनकी भाँति नवाहव्रतका भी उद्यापन करना चाहिये॥ ५५॥ | | निष्कामाः श्रवणेनैव पूता मुक्तिं व्रजन्ति हि।<br>भोगमोक्षप्रदा नॄणां यतो भगवती परा॥ ५६ | निष्काम व्यक्ति कथाके श्रवणमात्रसे पवित्र होकर मुक्ति पा जाते हैं; क्योंकि परा भगवती मनुष्योंको भोग और मोक्ष सब कुछ देनेवाली हैं॥ ५६॥ | | पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्या तु नित्यशः।<br>वक्त्रा दत्तं प्रसादं तु गृह्णीयाद्भक्तिपूर्वकम्॥ ५७ | पुस्तक और कथावाचक—दोनोंकी प्रतिदिन पूजा करनी चाहिये और वक्ताद्वारा दिया हुआ प्रसाद भक्तिपूर्वक ग्रहण करना चाहिये॥ ५७॥ | | कुमारीः पूजयेन्नित्यं भोजयेत्प्रार्थयेच्च यः।<br>सुवासिनीश्च विप्रांश्च तस्य सिद्धिर्न संशयः॥ ५८ | नवाह-यज्ञमें जो श्रोता नित्य कुमारी कन्याओं, सुहागिन स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराता तथा उनसे प्रार्थना करता है, उसकी कार्यसिद्धि अवश्य हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ५८॥ | | गायत्र्या नाम साहस्रं समाप्तावथ वा पठेत्।<br>विष्णोर्नामसहस्रञ्च सर्वदोषोपशान्तये॥ ५९ | सभी त्रुटियोंकी शान्तिके निमित्त कथासमाप्तिके दिन गायत्रीसहस्रनाम अथवा विष्णुसहस्रनामका पाठ करना चाहिये॥ ५९॥ |
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।<br>न्यूनं सम्पूर्णतां याति तस्माद्विष्णुञ्च कीर्तयेत्॥ ६० | जिनके स्मरण तथा नामकीर्तनसे तप, यज्ञ, क्रिया आदिमें न्यूनता समाप्त हो जाती है, उन विष्णुभगवान्का नाम-कीर्तन करना चाहिये॥ ६०॥ |
| देव्याः सप्तशतीमन्त्रैः समाप्तौ होममाचरेत्।<br>देवीमाहात्म्यमूलेन नवार्णमनुनाथवा॥ ६१<br><br>गायत्र्या त्वथवा होमः पायसेन ससर्पिषा।<br>यतो भागवतं त्वेतद् गायत्रीमयमीरितम्॥ ६२ | कथासमाप्तिके दिन दुर्गासप्तशतीके मन्त्रोंसे अथवा देवीमाहात्म्यके मूलपाठसे या नवार्ण* मन्त्रसे होम करना चाहिये अथवा घृतसहित पायसद्वारा गायत्री मन्त्रका उच्चारण करके हवन करे; क्योंकि यह श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण गायत्रीमय कहा गया है॥ ६१-६२॥ |
| वाचकं तोषयेत्सम्यग्वस्त्रभूषधनादिभिः।<br>प्रसन्ने वाचके सर्वाः प्रसन्नास्तस्य देवताः॥ ६३ | कथावाचकको वस्त्र, भूषण, धन आदिके द्वारा सन्तुष्ट करे; क्योंकि कथावाचकके प्रसन्न होनेपर सभी देवता उसपर प्रसन्न हो जाते हैं॥ ६३॥ |
| ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या दक्षिणाभिश्च तोषयेत्।<br>पृथिव्यां देवरूपास्ते तुष्टेष्वेष्भीप्सितं फलम्॥ ६४ | श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराये और नानाविध दक्षिणाओंसे उन्हें सन्तुष्ट करे; क्योंकि वे विप्र पृथ्वीपर देवताके स्वरूप हैं। उनके सन्तुष्ट होनेपर वांछित फल प्राप्त होता है॥ ६४॥ |
| सुवासिनीः कुमारीश्च देवीभक्त्या च भोजयेत्।<br>ताभ्योऽपि दक्षिणां दत्त्वा प्रार्थयेत्सिद्धिमात्मनः॥ ६५ | सुहागिन स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंको साक्षात् देवी समझकर उन्हें भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा देकर अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करे॥ ६५॥ |
| दद्याद्दानानि चान्यानि सुवर्णं गाः पयस्विनीः।<br>हयानिभान्मेदिनीञ्च तस्य स्यादक्षयं फलम्॥ ६६ | सुवर्ण, दूध देनेवाली गौ, हाथी, घोड़े और भूमिको दान करना चाहिये; क्योंकि उसका अक्षय फल होता है॥ ६६॥ |
| देवीभागवतं चैतल्लिखितं शोभनाक्षरम्।<br>हेमसिंहासने स्थाप्य पट्टवस्त्रेण वेष्टितम्॥ ६७<br><br>अष्टम्यां वा नवम्याञ्च वाचकायार्चिताय च।<br>दद्यात्स भोगान्भुक्तेह दुर्लभं मोक्षमाप्नुयात्॥ ६८ | सुन्दर अक्षरोंमें लिखी देवीभागवतकी पुस्तकको रेशमी-वस्त्रमें लपेटकर उसे सुवर्णनिर्मित सिंहासनपर रखकर अष्टमी या नवमी तिथिको विधिपूर्वक कथावाचकको दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह इस संसारमें सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें दुर्लभ मोक्ष प्राप्त करता है॥ ६७-६८॥ |
| दरिद्रो दुर्बलो बालस्तरुणो जरठोऽपि वा।<br>पुराणवेत्ता वन्द्यः स्यात्पूज्यो मान्यश्च सर्वदा॥ ६९ | पुराणको जाननेवाला वक्ता चाहे दरिद्र हो, दुर्बल हो, बालक हो, युवक हो अथवा वृद्ध हो, वह सर्वदा वन्दनीय पूज्य एवं मान्य होता है॥ ६९॥ |
| सन्ति लोकस्य बहवो गुरवो गुणजन्मतः।<br>सर्वेषामपि तेषाञ्च पुराणज्ञः परो गुरुः॥ ७० | यद्यपि संसारमें जन्म अथवा गुणके कारण अनेक गुरु हैं, परंतु पुराणका ज्ञाता उन सबमें श्रेष्ठ गुरु है॥ ७०॥ |
| पौराणिको ब्राह्मणस्तु व्यासासनसमाश्रितः।<br>आसमाप्ते प्रसङ्गे तु नमस्कुर्यान्न कस्यचित्॥ ७१ | व्यासके आसनपर बैठा हुआ पौराणिक ब्राह्मण जबतक कथा समाप्त न हो जाय, तबतक किसीको भी प्रणाम न करे॥ ७१॥ |
* ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 A
| ६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पौराणिकीं कथां दिव्यां येऽपि शृण्वन्त्यभक्तितः ।<br>तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखदारिद्र्यभागिनाम् ॥ ७२ | जो लोग इस दिव्य पौराणिक कथाको श्रद्धारहित होकर सुनते हैं, उन दुःख तथा दारिद्र्य-युक्त मनुष्योंको कथाश्रवणका पुण्य-फल प्राप्त नहीं होता ॥ ७२ ॥ |
| असम्पूज्य पुराणं तु ताम्बूलकुसुमादिभिः ।<br>ये शृण्वन्ति कथां देव्यास्ते दरिद्रा भवन्ति हि ॥ ७३<br><br>कीर्त्यमानां कथां त्यक्त्वा ये व्रजन्त्यन्यतो नराः।<br>भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः ॥ ७४ | जो लोग ताम्बूल, पुष्प आदि उपचारोंसे पुराणका पूजन किये बिना ही देवीकी कथा सुनते हैं, वे दरिद्र होते हैं और जो लोग कथाके बीचमें ही उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, कुछ ही समय बाद उनकी सम्पदाएँ एवं स्त्री आदि नष्ट हो जाती हैं ॥ ७३-७४ ॥ |
| ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः ।<br>ते वायसा भवन्त्यत्र भुक्त्वा निरययातनाम् ॥ ७५ | जो अभिमानवश व्याससे ऊँचे स्थानपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे नरक-यातना भोगकर इस लोकमें कौएकी योनि पाते हैं ॥ ७५ ॥ |
| ये चाढ्यासनसंस्थाश्च ये वीरासनसंस्थिताः ।<br>शृण्वन्ति च कथां दिव्यां ते स्युरर्जुनशाखिनः ॥ ७६ | जो बहुमूल्य आसनपर अथवा वीरासनसे बैठकर दिव्य कथाका श्रवण करते हैं, वे 'अर्जुन' वृक्ष होते हैं ॥ ७६ ॥ |
| कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम् ।<br>रासभास्ते भवन्तीह कृकलासास्ततः परम् ॥ ७७ | कथा होते समय जो लोग व्यर्थ तर्क-वितर्क करते हैं, वे इस लोकमें पहले गर्दभयोनिमें तत्पश्चात् गिरगिटकी योनिमें जाते हैं ॥ ७७ ॥ |
| निन्दन्ति ये पुराणज्ञान् कथां वा पापहारिणीम् ।<br>ते तु जन्मशतं दुष्टाः शुनकाः स्युर्न संशयः ॥ ७८ | जो लोग पुराण जाननेवालोंकी अथवा पापनाशिनी कथाकी निन्दा करते हैं, वे सैकड़ों जन्मतक दुष्ट कुत्ते होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७८ ॥ |
| ये शृण्वन्ति कथां वक्तुः समानासनसंस्थिताः ।<br>गुरुतल्पसमं पापं लभन्ते नरकालयाः ॥ ७९<br><br>ये चाप्रणम्य शृण्वन्ति ते भवन्ति विषद्रुमाः ।<br>शयाना येऽपि शृण्वन्ति भवन्त्यजगराहयः ॥ ८० | जो लोग कथावाचकके बराबर आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, उन्हें गुरुके आसनपर बैठनेका पाप लगता है और वे नरकमें वास करते हैं। जो लोग वक्ताको प्रणाम किये बिना ही कथा सुनने लगते हैं, वे जन्मान्तरमें विषैले वृक्ष होते हैं। इसी प्रकार जो लोग लेटे-लेटे कथा सुनते हैं; वे अजगर, साँपकी योनि पाते हैं ॥ ७९-८० ॥ |
| ये कदाचन पौराणीं न शृण्वन्ति कथां नराः ।<br>ते घोरं नरकं भुक्त्वा भवन्ति वनसूकराः ॥ ८१<br><br>ये कथां नानुमोदन्ते विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः ।<br>कोट्यब्दं निरयं भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकराः ॥ ८२ | जो मनुष्य कभी भी पुराणकी कथा नहीं सुनते, वे घोर नरक भोगकर बनैले सूअरकी योनिमें जाते हैं। जो शठ मनुष्य कथाका अनुमोदन नहीं करते अपितु उसमें विघ्न डाला करते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक-यातना भोगकर अन्तमें ग्रामसूकर होते हैं ॥ ८१-८२ ॥ |
| आसनं भाजनं द्रव्यं फलं वस्त्राणि कम्बलम् ।<br>पुराणज्ञाय यच्छन्ति ते व्रजन्ति हरेः पदम् ॥ ८३ | जो लोग पुराणवेत्ताको आसन, पात्र, द्रव्य, फल, वस्त्र तथा कम्बल प्रदान करते हैं, वे भगवान्के परम पदको प्राप्त करते हैं ॥ ८३ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 3 B
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६७ | | :--- | :--- |
| पुराणपुस्तकस्यापि ये पट्टवसनं नवम्।<br>प्रयच्छन्ति शुभं सूत्रं ते नराः सुखभागिनः ॥ ८४ | जो मनुष्य पुराणपुस्तकके लिये नवीन रेशमी वस्त्र तथा सुन्दर सूत्रका दान करते हैं, वे सुखी रहते हैं ॥ ८४ ॥ | | पुराणानां तु सर्वेषां श्रवणाद्यत्फलं लभेत्।<br>तस्माच्छतगुणं पुण्यं देवीभागवताल्लभेत् ॥ ८५ | सभी पुराणोंके सुननेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे सौगुना पुण्य श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे होता है ॥ ८५ ॥ | | यथा सरित्सु प्रवरा गङ्गा देवेषु शङ्करः।<br>काव्ये रामायणं यद्वज्ज्योतिष्मत्सु यथा रविः ॥ ८६<br><br>आह्लादकानां चन्द्रश्च धनानाञ्च यथा यशः।<br>क्षमावतां यथा भूमिर्गाम्भीर्ये सागरो यथा ॥ ८७<br><br>मन्त्राणां चैव सावित्री पापनाशे हरिस्मृतिः।<br>अष्टादशपुराणानां देवीभागवतं तथा ॥ ८८ | जिस प्रकार नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं; देवताओंमें शिव, काव्योंमें वाल्मीकीय रामायण तथा तेजस्वियोंमें भगवान् सूर्य श्रेष्ठ हैं; और जैसे आनन्द देनेवालोंमें चन्द्रमा, सब धनोंमें सुयश, क्षमाशीलोंमें पृथ्वी, गम्भीरतामें समुद्र, मन्त्रोंमें गायत्री तथा पापनाशके उपायोंमें भगवत्स्मरण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार अठारहों पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है ॥ ८६-८८ ॥ | | येन केनाप्युपायेन नवकृत्वः शृणोति चेत्।<br>न शक्यं तत्फलं वक्तुं जीवन्मुक्तः स एव हि ॥ ८९ | जिस किसी भी उपायसे यदि कोई मनुष्य इस महापुराणकी नौ आवृत्तियाँ सुन ले तो उसके फलका वर्णन नहीं किया जा सकता, वह तो जीवन्मुक्त ही हो जाता है ॥ ८९ ॥ | | राजशत्रुभये प्राप्ते महामारीभये तथा।<br>दुर्भिक्षे राष्ट्रभङ्गे च तच्छान्त्यै शृणुयादिदम् ॥ ९० | किसी शत्रु राजासे भय होनेपर, महामारीके समय, अकाल पड़नेपर तथा राष्ट्र-भंगके अवसरपर उसकी शान्तिके लिये यह पुराण सुनना चाहिये ॥ ९० ॥ | | भूतप्रेतविनाशाय राज्यलाभाय शत्रुतः।<br>पुत्रलाभाय शृणुयाद्देवीभागवतं द्विजाः ॥ ९१ | हे विप्रो! भूत-प्रेतादिके शमनके लिये, शत्रुसे राज्य प्राप्त करनेके लिये और पुत्र-प्राप्तिके लिये श्रीमद्देवीभागवतका श्रवण करना चाहिये ॥ ९१ ॥ | | श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।<br>श्लोकार्धं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम् ॥ ९२ | जो देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ९२ ॥ | | भगवत्या स्वयं देव्या श्लोकार्धेन प्रकाशितम्।<br>शिष्यप्रशिष्यद्वारेण तदेव विपुलीकृतम् ॥ ९३ | स्वयं भगवती जगदम्बाने इस पुराणको सर्वप्रथम केवल आधे श्लोकमें ही प्रकाशित किया, वही बादमें शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा देवीभागवतके रूपमें विस्तृत कर दिया गया ॥ ९३ ॥ | | न गायत्र्याः परो धर्मो न गायत्र्याः परं तपः।<br>न गायत्र्याः समो देवो न गायत्र्याः परो मनुः ॥ ९४ | गायत्रीसे बढ़कर न कोई धर्म है, न तप है, न कोई देवता है और न कोई मन्त्र ही है ॥ ९४ ॥ | | गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन सोच्यते।<br>सात्र भागवते देवी सरहस्या प्रतिष्ठिता ॥ ९५<br><br>अतो भागवतस्यास्य देव्याः प्रीतिकरस्य च।<br>महान्त्यपि पुराणानि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ९६ | भगवती अपना गुणगान करनेवालेकी रक्षा करती हैं, इसी कारणसे उन्हें गायत्री कहा जाता है। वे भगवती गायत्री इस पुराणमें अपने रहस्योंसहित विराजती हैं। अतः भगवतीको प्रसन्न करनेवाले इस देवीभागवतकी सोलहवीं कलाके समान भी अन्य महापुराण नहीं हो सकते ॥ ९५-९६ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 C
| ६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद् ब्राह्मणानां धनं<br>धर्मो धर्मसुतेन यत्र गदितो नारायणेनामलः।<br>गायत्र्याश्च रहस्यमत्र च मणिद्वीपश्च संवर्णितः<br>श्रीदेव्या हिमभूभृते भगवती गीता च गीता स्वयम्॥ ९७ | श्रीमद्देवीभागवतपुराण अत्यन्त निर्मल है। जो ब्राह्मणोंका अमूल्य धन है और जिसमें स्वयं धर्मपुत्र नारायणने पवित्र धर्मका वर्णन किया है। इसमें श्रीगायत्रीदेवीका रहस्य एवं मणिद्वीपका सम्यक् वर्णन किया गया है। साथ ही इसमें हिमालयके प्रति स्वयं भगवतीद्वारा कही गयी देवीगीता विद्यमान है॥ ९७॥ | | तस्मान्नास्य पुराणस्य लोकेऽन्यत्सदृशं परम्।<br>अतः सदैव संसेव्यं देवीभागवतं द्विजाः॥ ९८ | इस कारण हे विप्रो! इस महापुराणके सदृश दूसरा कोई उत्तम पुराण लोकमें नहीं है, अतः आपलोग सदा इस श्रीमद्देवीभागवतका भलीभाँति सेवन करें॥ ९८॥ | | यस्याः प्रभावमखिलं न हि वेद धाता<br>नो वा हरिर्न गिरिशो न हि चाप्यनन्तः।<br>अंशांशका अपि च ते किमुतान्यदेवा-<br>स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥ ९९ | जिनके सम्पूर्ण प्रभावको ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा भगवान् शेष भी भलीभाँति नहीं जान सकते जबकि वे उन्हींके अंशज भी हैं, तब दूसरे देवता उन्हें कैसे जान सकेंगे? उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा निरन्तर प्रणाम है॥ ९९॥ | | यत्पादपङ्कजरजः समवाप्य विश्वं<br>ब्रह्मा सृजत्यनुदिनञ्च बिभर्ति विष्णुः।<br>रुद्रश्च संहरति नेतरथा समर्था-<br>स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥ १०० | जिनके चरण-कमलोंकी धूलि पाकर ब्रह्मा समस्त संसारकी रचना करते हैं, भगवान् विष्णु निरन्तर पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं; दूसरे किसी उपायसे वे अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ नहीं हो सकते—ऐसी उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा सतत प्रणाम है॥ १००॥ | | सुधाकूपारान्तस्त्रिदशतरुवाटीविलसिते<br>मणिद्वीपे चिन्तामणिमयगृहे चित्ररुचिरे।<br>विराजन्तीमम्बां परशिवहृदि स्मेरवदनां<br>नरो ध्यात्वा भोगं भजति खलु मोक्षञ्च लभते॥ १०१ | अमृत-सागरके तटपर कल्पवृक्षकी वाटिकासे सुशोभित मणिद्वीपमें स्थित बहुवर्णचित्रित चिन्ता-मणिमय भवनमें तथा परम शिवके हृदयमें विराजमान रहनेवाली और मन्द-मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली जगदम्बाका ध्यान करके मनुष्य सांसारिक सुखोंका उपभोग करता है और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है॥ १०१॥ | | ब्रह्मेशाच्युतशक्राद्यैर्महर्षिभिरुपासिता ।<br>जगतां श्रेयसे सास्तु मणिद्वीपाधिदेवता॥ १०२ | इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र—आदि देवताओं एवं समस्त महर्षियोंद्वारा पूजित मणि-द्वीपनिवासिनी वे भगवती संसारका कल्याण करती रहें॥ १०२॥ |
इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवत- श्रवणविधिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
~~ ० ~~
॥ समाप्तमिदं श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्॥
~~ ० ~~
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 D
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
[ पूर्वार्ध ]
प्रथमः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
महर्षि शौनकका सूतजीसे श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनानेकी प्रार्थना करना
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ॐ सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि।<br>बुद्धिं या नः प्रचोदयात्॥ १ | जो सर्वचेतनात्मकस्वरूपा, आदिशक्ति तथा ब्रह्मविद्या-स्वरूपिणी भगवती जगदम्बा हैं, उनका हम ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धिको प्रेरणा प्रदान करें॥ १॥ |
| शौनक उवाच<br>सूत सूत महाभाग धन्योऽसि पुरुषर्षभ।<br>यदधीतास्त्वया सम्यक् पुराणसंहिताः शुभाः॥ २<br>अष्टादश पुराणानि कृष्णेन मुनिनानघ।<br>कथितानि सुदिव्यानि पठितानि त्वयानघ॥ ३<br>पञ्चलक्षणयुक्तानि सरहस्यानि मानद।<br>त्वया ज्ञातानि सर्वाणि व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ ४ | **शौनक बोले—**हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा भाग्यवान् सूतजी! आप धन्य हैं; क्योंकि संसारमें अत्यन्त दुर्लभ पुराण-संहिताओं का आपने भलीभाँति अध्ययन किया है। हे पुण्यात्मन्! हे मानद! आपने कृष्णद्वैपायन व्यासरचित अठारह महापुराणोंका सम्यक् अध्ययन किया है, जो पंच लक्षणोंसे युक्त तथा गूढ रहस्योंसे समन्वित हैं और जिनका आपने सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे ज्ञान प्राप्त किया है॥ २–४॥ |
| अस्माकं पुण्ययोगेन प्राप्तस्त्वं क्षेत्रमुत्तमम्।<br>दिव्यं विश्वसनं पुण्यं कलिदोषविवर्जितम्॥ ५<br>समाजोऽयं मुनीनां हि श्रोतुकामोऽस्ति पुण्यदाम्।<br>पुराणसंहितां सूत ब्रूहि त्वं नः समाहितः॥ ६ | हमारे पुण्यसे ही आप इस उत्तम, मुनियोंके निवास-योग्य, दिव्य, पुण्यप्रद तथा कलिके दोषोंसे रहित क्षेत्रमें पधारे हुए हैं। हे सूतजी! मुनियोंका यह समुदाय परम पुण्यदायिनी पुराण-संहिताका श्रवण करना चाहता है। अतः आप समाहितचित्त होकर हमलोगोंसे उसका वर्णन कीजिये॥ ५-६॥ |
| दीर्घायुर्भव सर्वज्ञ तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम्॥ ७ | हे सर्वज्ञ! आप तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से रहित होकर दीर्घजीवी हों। हे महाभाग! ब्रह्मप्रतिपादक देवीभागवतमहापुराणका वर्णन करें॥ ७॥ |
| श्रोत्रेन्द्रिययुताः सूत नराः स्वादविचक्षणाः।<br>न शृण्वन्ति पुराणानि वञ्चिता विधिना हि ते॥ ८<br>यथा जिह्वेन्द्रियाह्लादः षड्रसैः प्रतिपद्यते।<br>तथा श्रोत्रेन्द्रियाह्लादो वचोभिः सुधियां स्मृतः॥ ९ | हे सूतजी! जो मनुष्य श्रवणेन्द्रिययुक्त होते हुए भी केवल जिह्वाके स्वादमें ही लगे रहते हैं और पुराणोंकी कथाएँ नहीं सुनते, वे निश्चित ही अभागे हैं। जैसे षड्रसके स्वादसे जिह्वाको आह्लाद होता है, वैसे विद्वज्जनोंके वचनोंसे कर्णेन्द्रियको आनन्द प्राप्त होता है॥ ८-९॥ |
| ७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| अश्रोत्राः फणिनः कामं मुह्यन्ति हि नभोगुणैः।<br>सकर्णा ये न शृण्वन्ति तेऽप्यकर्णाः कथं न च॥१० | जब कर्णहीन सर्प भी मधुर ध्वनि सुनकर मोहित हो जाते हैं, तब भला कर्णयुक्त मानव यदि कथा नहीं सुनते तो उन्हें बधिर क्यों न कहा जाय?॥१०॥ | | अतः सर्वे द्विजाः सौम्य श्रोतुकामाः समाहिताः।<br>वर्तन्ते नैमिषारण्ये क्षेत्रे कलिभयार्दिताः॥११ | अतः हे सौम्य! समाहितचित्त होकर कथा सुननेकी इच्छासे सभी द्विजगण कलिकालके भयसे पीड़ित हो इस नैमिषारण्यमें उपस्थित हैं॥११॥ | | येन केनाप्युपायेन कालातिवाहनं स्मृतम्।<br>व्यसनैरिह मूर्खाणां बुधानां शास्त्रचिन्तनैः॥१२ | जिस किसी प्रकारसे समय तो बीतता ही रहता है, किंतु मूर्खोंका समय व्यर्थ दुर्व्यसनोंमें बीतता है और विद्वानोंका समय शास्त्र-चिन्तनमें जाता है॥१२॥ | | शास्त्राण्यपि विचित्राणि जल्पवादयुतानि च।<br>(त्रिविधानि पुराणानि शास्त्राणि विविधानि च।<br>वितण्डाच्छलयुक्तानि गर्वामर्षकराणि च॥)<br>नानार्थवादयुक्तानि हेतुमन्ति बृहन्ति च॥१३ | शास्त्र भी विचित्र प्रकारके तर्क-वितर्कसे युक्त हैं। (पुराण तीन प्रकारके तथा शास्त्र विविध प्रकारके हैं, जो नानाविध वाद-विवाद तथा छल-प्रपंचसे युक्त हैं और अहंकार तथा अमर्ष उत्पन्न करनेवाले हैं) वे अनेक अर्थवाद तथा हेतुवादसे युक्त और बहुत विस्तारवाले हैं॥१३॥ | | सात्त्विकं तत्र वेदान्तं मीमांसा राजसं मतम्।<br>तामसं न्यायशास्त्रं च हेतुवादाभियन्त्रितम्॥१४ | उन शास्त्रोंमें वेदान्तशास्त्र सात्त्विक, मीमांसा राजस तथा न्यायशास्त्र तामस कहा गया है; क्योंकि वह हेतुवादसे परिपूर्ण है॥१४॥ | | तथैव च पुराणानि त्रिगुणानि कथानकैः।<br>कथितानि त्वया सौम्य पञ्चलक्षणवन्ति च॥१५ | इसी प्रकार हे सौम्य! आपके द्वारा कहे गये पुराण कथा-भेदसे तीन गुणोंवाले तथा पाँच लक्षणोंसे समन्वित हैं॥१५॥ | | तत्र भागवतं पुण्यं पञ्चमं वेदसम्मितम्।<br>कथितं यत्त्वया पूर्वं सर्वलक्षणसंयुतम्॥१६ | आपने यह भी बताया है कि उन पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवत पाँचवाँ पुराण है, पवित्र है, वेदके समान है और सभी लक्षणोंसे युक्त है॥१६॥ | | उद्देशमात्रेण तदा कीर्तितं परमाद्भुतम्।<br>मुक्तिप्रदं मुमुक्षूणां कामदं धर्मदं तथा॥१७<br><br>विस्तरेण तदाख्याहि पुराणोत्तममादरात्।<br>श्रोतुकामा द्विजाः सर्वे दिव्यं भागवतं शुभम्॥१८ | उस समय आपने प्रसंगवश अत्यन्त अद्भुत, मुमुक्षुजनोंके लिये मुक्तिप्रद, मनोरथ पूर्ण करनेवाले, धर्ममें रुचि उत्पन्न करनेवाले जिस पुराणको संक्षेपमें कहा था, उस उत्तम पुराणको विस्तारपूर्वक कहिये। उस दिव्य तथा कल्याणमय श्रीमद्देवीभागवतपुराणको हम सभी द्विजगण आदरपूर्वक सुननेकी इच्छा रखते हैं॥१७-१८॥ | | त्वं तु जानासि धर्मज्ञ पौराणीं संहितां किल।<br>कृष्णोक्तां गुरुभक्तत्वात् सम्यक् सत्त्वगुणाश्रयः॥१९ | हे धर्मज्ञ! गुरुभक्त एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न होनेके कारण आप कृष्णद्वैपायनके द्वारा कही गयी इस प्राचीन संहिताका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं॥१९॥ | | श्रुतान्यन्यानि सर्वज्ञ त्वन्मुखान्निःसृतानि च।<br>नैव तृप्तिं व्रजामोऽद्य सुधापानेऽमरा यथा॥२० | जिस प्रकार देवतालोग अमृतपान करते हुए तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार हमलोगोंने भी यहाँ आपके मुखारविन्दसे निकली अन्यान्य कथाएँ सुनीं, किंतु अभी भी हम तृप्त नहीं हुए हैं॥२०॥ |