भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 889 में से

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पृष्ठ 69

| ६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |

| पीडाथ भूपतिभयं ज्ञानप्राप्तिः क्रमात्फलम्।<br>पुराणश्रवणे चक्रं शोधयेच्छिवभाषितम्॥ ६ | बाद चार नक्षत्र राज-भय उत्पन्न करनेवाले और तत्पश्चात् तीन नक्षत्र ज्ञान-प्राप्तिमें सहायक होते हैं। पुराणश्रवणके आरम्भमें शिवोक्त चक्रका शोधन कर लेना चाहिये॥ ५-६॥ | | अथवा प्रीतये देव्या नवरात्रचतुष्टये।<br>शृणुयादन्यमासेऽपि तिथिवारर्क्षशोधिते॥ ७ | देवीकी प्रसन्नताके लिये इसे चारों नवरात्रोंमें* सुनना चाहिये अथवा तिथि, वार और नक्षत्रपर सम्यक् विचार करके यह पुराण अन्य मासोंमें भी सुना जा सकता है॥ ७॥ | | सम्भारं तादृशं कार्यं विवाहादौ च यादृशम्।<br>नवाहयज्ञे चाप्यस्मिन्विधेयं यत्नतो बुधैः॥ ८ | विवाह आदिमें जिस प्रकार [उत्साहपूर्वक] तैयारी की जाती है, उसी प्रकार नवाह-यज्ञके अवसरपर भी बुद्धिमान् मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक सामग्री आदिकी तैयारी करनी चाहिये॥ ८॥ | | सहाया बहवः कार्या दम्भलोभविवर्जिताः।<br>चतुराश्च वदान्याश्च देवीभक्तिपरा नराः॥ ९ | पाखण्ड तथा लोभसे रहित, चतुर, उदार एवं देवीभक्त सज्जनोंको भी सहायकके रूपमें लेना चाहिये॥ ९॥ | | प्रेष्या यत्नेन वार्तेयं देशे देशे जने जने।<br>आगन्तव्यमिहावश्यं कथा देव्या भविष्यति॥ १० | देश-देशमें भी यत्नपूर्वक यह सन्देश भेजना चाहिये—[हे कथानुरागी सज्जनो!] यहाँ श्रीमद्देवी-भागवतकी कथा होने जा रही है, आप अवश्य पधारें॥ १०॥ | | सौराश्च गाणपत्याश्च शैवाः शाक्ताश्च वैष्णवाः।<br>सर्वेषामपि सेव्येयं यतो देवाः सशक्तयः॥ ११ | चाहे सूर्यकी उपासना करनेवाले हों, चाहे गणेशभक्त हों, चाहे शैव हों, चाहे वैष्णव अथवा शक्तिके उपासक हों, सभी इस कथाके श्रवणके अधिकारी हैं; क्योंकि सभी देवता शक्तिके साथ ही रहते हैं॥ ११॥ | | श्रीमद्देवीभागवतपीयूषरसलोलुपैः ।<br>आगन्तव्यं विशेषेण कथार्थं प्रेमतत्परैः॥ १२ | इसलिये श्रीमद्देवीभागवतकी कथारूपी सुधाके रसिक प्रेमीजनोंको कथाश्रवणके लिये विशेषरूपसे आना चाहिये॥ १२॥ | | ब्राह्मणाद्याश्च ये वर्णाः स्त्रियश्चाश्रामिणस्तथा।<br>सकामाश्चापि निष्कामाः पातव्यं तैः कथामृतम्॥ १३ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—चारों वर्णके स्त्री, पुरुष एवं ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास—इन चारों आश्रमोंमें निरत मनुष्योंको चाहे सकामभावसे अथवा निष्कामभावसे—अवश्य ही इस कथा-सुधाका पान करना चाहिये॥ १३॥ |


* सामान्यतः नवरात्र चार हैं—१-चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक, २-आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक (इसी नवरात्रके बाद हरिशयनी एकादशी), ३-आश्विन शुक्ल प्रतिपदासे विजयादशमीतक (इसके बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी देवोत्थानी—प्रबोधिनी एकादशी) तथा ४-माघ शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक सारस्वत-नवरात्र।

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