देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] माहात्म्य ५९
| सूत उवाच<br>कुम्भयोनिस्तु माहात्म्यं विधिं भागवतस्य च।<br>श्रुत्वा कुमारं चाभ्यर्च्य स्वाश्रमं पुनराययौ॥ ९०<br><br>इदं मया भागवतस्य विप्रा<br>माहात्म्यमुक्तं भवतां समक्षम्।<br>शृणोति भक्त्या पठतीह भोगान्<br>भुक्त्वाखिलान्मुक्तिमुपैति चान्ते॥ ९१ | सूतजी बोले—[हे ब्राह्मणो!] इस प्रकार श्रीमद्देवीभागवतका माहात्म्य तथा उसकी विधि सुनकर और कुमार कार्तिकेयकी पूजाकर अगस्त्यजी अपने आश्रम चले आये॥ ९०॥<br><br>हे विप्रो! मैंने आपलोगोंके समक्ष श्रीमद्देवी-भागवतका यह माहात्म्य कह दिया। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण तथा पाठ करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका सुख प्राप्त करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है॥ ९१॥ |
इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये रैवतनामक-
मनुपुत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी श्रवण-विधि, श्रवणकर्ताके लिये पालनीय नियम, श्रवणके फल तथा माहात्म्यका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग श्रुतं माहात्म्यमुत्तमम्।<br>अधुना श्रोतुमिच्छामः पुराणश्रवणे विधिम्॥ १ | **ऋषियोंने कहा—**हे महाभाग सूतजी! हमलोगोंने श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य सुन लिया और अब इस पुराणके श्रवणकी विधि सुनना चाहते हैं॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>श्रूयतां मुनयः सर्वे पुराणश्रवणे विधिम्।<br>नराणां शृण्वतां येन सिद्धिः स्यात्सार्वकामिकी॥ २ | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! अब आपलोग इस पुराणके श्रवणका विधान सुनें, जिसे सुननेवाले मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं॥ २॥ |
| आदौ दैवज्ञमाहूय मुहूर्तं कल्पयेत्सुधीः।<br>आरभ्य शुचिमासं तु मासषट्कं शुभावहम्॥ ३ | पुराणश्रवणके इच्छुक विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि वह सर्वप्रथम ज्योतिषीको बुलाकर शुभ मुहूर्त निर्धारित कर ले। इसके लिये ज्येष्ठमाससे लेकर छः महीने शुभकारक होते हैं॥ ३॥ |
| हस्ताश्विमूलपुष्यर्क्षै ब्रह्ममैत्रेन्दुवैष्णवे।<br>सत्तिथौ शुभवारे च पुराणश्रवणं शुभम्॥ ४ | हस्त, अश्विनी, मूल, पुष्य, रोहिणी, अनुराधा, मृगशिरा तथा श्रवण नक्षत्र, पुण्य तिथि तथा शुभ दिनमें श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण कल्याणकारी होता है॥ ४॥ |
| गुरुभाद्वेदवेदाब्जशराङ्गाब्धिगुणैः क्रमात्।<br>धर्माप्तिरिन्दिराप्राप्तिः कथासिद्धिः परं सुखम्॥ ५ | जिस नक्षत्रमें बृहस्पति हों, उससे चन्द्रमातक गिननेपर क्रमशः इस प्रकार फल होते हैं—चार नक्षत्रतक धर्म-प्राप्ति, पुनः चारतक लक्ष्मीकी प्राप्ति, इसके बाद एक नक्षत्र कथामें सिद्धि प्रदान करनेवाला, फिर पाँच नक्षत्र परम सुखकी प्राप्ति करानेवाले, बादमें छः नक्षत्र पीड़ा करनेवाले, इसके |