भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४

| अतस्त्वां श्रावयिष्यामि श्रीमद्भागवतं नृप।<br>यस्य श्रवणमात्रेण न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥ ७९ | अतएव हे राजन्! मैं आपको श्रीमद्देवीभागवत सुनाऊँगा, जिसके सुननेमात्रसे कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं रह जाता॥ ७९॥ | | इत्युक्त्वा सुदिने ब्रह्मन् कथारम्भमथाकरोत्।<br>पञ्चकृत्वः स शुश्राव विधिवद्भार्यया सह॥ ८० | हे ब्रह्मन्! ऐसा कहकर मुनिने किसी शुभ दिनमें कथाका आरम्भ किया। अपनी पत्नीके साथ राजाने पाँच बार श्रीमद्देवीभागवतपुराणका विधिवत् श्रवण किया॥ ८०॥ | | समाप्तिदिवसे राजा पुराणञ्च मुनिं तथा।<br>पूजयामास धर्मात्मा मुदा परमया युतः॥ ८१ | कथा-समाप्तिके दिन धर्मनिष्ठ राजा दुर्दमाने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतपुराण तथा लोमशमुनिकी पूजा की॥ ८१॥ | | हुत्वा नवार्णमन्त्रेण भोजयित्वा कुमारिकाः।<br>वाडवांश्च सपत्नीकान्दक्षिणाभिरतोषयत्॥ ८२ | राजाने नवार्णमन्त्रसे हवन करके कुमारी कन्याओंको भोजन कराया और सपत्नीक ब्राह्मणोंको प्रभूत दक्षिणादानद्वारा संतुष्ट किया॥ ८२॥ | | अथ कालेन कियता भगवत्याः प्रसादतः।<br>गर्भं दधार सा राज्ञी लोककल्याणकारकम्॥ ८३ | कुछ समय बीत जानेपर भगवतीकी कृपासे उस रानी रेवतीने लोककल्याणकारी गर्भ धारण किया॥ ८३॥ | | पुण्येऽथ समये प्राप्ते ग्रहैः सुस्थानसङ्गतैः।<br>सर्वमङ्गलसम्पन्ने रेवती सुषुवे सुतम्॥ ८४ | इसके बाद जब समस्त ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने अनुकूल स्थानोंपर थे और सभी मांगलिक कृत्य सम्पन्न हो गये थे—ऐसे शुभ समयमें रेवतीने पुत्रको जन्म दिया॥ ८४॥ | | श्रुत्वा पुत्रस्य जननं स्नात्वा राजा मुदान्वितः।<br>स सुवर्णाम्भसा चक्रे जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ८५ | पुत्रके जन्मका समाचार सुनकर राजा दुर्दाम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने स्नान करके स्वर्ण-कलशके जलसे पुत्रका जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न किया॥ ८५॥ | | यथाविधि च दानानि दत्त्वा विप्रानतोषयत्।<br>कृतोपनयनं राजा साङ्गान्वेदानपाठयत्॥ ८६ | तदनन्तर राजाने विधिपूर्वक दान देकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया। समयपर पुत्रका उपनयन-संस्कार करके राजाने अपने पुत्रको अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन कराया॥ ८६॥ | | सर्वविद्यानिधिर्जातो धर्मिष्ठोऽस्त्रविदां वरः।<br>धर्मस्य वक्ता कर्ता च रैवतो नाम वीर्यवान्॥ ८७ | इस प्रकार राजाका वह रैवत नामक तेजस्वी पुत्र समग्र विद्याओंका निधान, धर्मपरायण, अस्त्र-विशारदोंमें श्रेष्ठ, धर्मका वक्ता तथा धर्मका पालनकर्ता हो गया॥ ८७॥ | | नियुक्तवानथ ब्रह्मा रैवतं मानवे पदे।<br>मन्वन्तराधिपः श्रीमान् गां शशास स धर्मतः॥ ८८ | इसके बाद ब्रह्माजीने रैवतको मनुके पदपर नियुक्त किया और वे श्रीमान् मन्वन्तराधिपके रूपमें धर्मपूर्वक पृथ्वीपर शासन करने लगे॥ ८८॥ | | इत्थं देव्याः प्रभावोऽयं संक्षेपेणोपवर्णितः।<br>पुराणस्य च माहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात्क्षमः॥ ८९ | इस प्रकार मैंने देवी भगवतीके इस प्रभावका संक्षिप्तरूपसे वर्णन कर दिया। इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कौन समर्थ है?॥ ८९॥ |