देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| अतस्त्वां श्रावयिष्यामि श्रीमद्भागवतं नृप।<br>यस्य श्रवणमात्रेण न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥ ७९ | अतएव हे राजन्! मैं आपको श्रीमद्देवीभागवत सुनाऊँगा, जिसके सुननेमात्रसे कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं रह जाता॥ ७९॥ | | इत्युक्त्वा सुदिने ब्रह्मन् कथारम्भमथाकरोत्।<br>पञ्चकृत्वः स शुश्राव विधिवद्भार्यया सह॥ ८० | हे ब्रह्मन्! ऐसा कहकर मुनिने किसी शुभ दिनमें कथाका आरम्भ किया। अपनी पत्नीके साथ राजाने पाँच बार श्रीमद्देवीभागवतपुराणका विधिवत् श्रवण किया॥ ८०॥ | | समाप्तिदिवसे राजा पुराणञ्च मुनिं तथा।<br>पूजयामास धर्मात्मा मुदा परमया युतः॥ ८१ | कथा-समाप्तिके दिन धर्मनिष्ठ राजा दुर्दमाने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतपुराण तथा लोमशमुनिकी पूजा की॥ ८१॥ | | हुत्वा नवार्णमन्त्रेण भोजयित्वा कुमारिकाः।<br>वाडवांश्च सपत्नीकान्दक्षिणाभिरतोषयत्॥ ८२ | राजाने नवार्णमन्त्रसे हवन करके कुमारी कन्याओंको भोजन कराया और सपत्नीक ब्राह्मणोंको प्रभूत दक्षिणादानद्वारा संतुष्ट किया॥ ८२॥ | | अथ कालेन कियता भगवत्याः प्रसादतः।<br>गर्भं दधार सा राज्ञी लोककल्याणकारकम्॥ ८३ | कुछ समय बीत जानेपर भगवतीकी कृपासे उस रानी रेवतीने लोककल्याणकारी गर्भ धारण किया॥ ८३॥ | | पुण्येऽथ समये प्राप्ते ग्रहैः सुस्थानसङ्गतैः।<br>सर्वमङ्गलसम्पन्ने रेवती सुषुवे सुतम्॥ ८४ | इसके बाद जब समस्त ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने अनुकूल स्थानोंपर थे और सभी मांगलिक कृत्य सम्पन्न हो गये थे—ऐसे शुभ समयमें रेवतीने पुत्रको जन्म दिया॥ ८४॥ | | श्रुत्वा पुत्रस्य जननं स्नात्वा राजा मुदान्वितः।<br>स सुवर्णाम्भसा चक्रे जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ८५ | पुत्रके जन्मका समाचार सुनकर राजा दुर्दाम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने स्नान करके स्वर्ण-कलशके जलसे पुत्रका जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न किया॥ ८५॥ | | यथाविधि च दानानि दत्त्वा विप्रानतोषयत्।<br>कृतोपनयनं राजा साङ्गान्वेदानपाठयत्॥ ८६ | तदनन्तर राजाने विधिपूर्वक दान देकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया। समयपर पुत्रका उपनयन-संस्कार करके राजाने अपने पुत्रको अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन कराया॥ ८६॥ | | सर्वविद्यानिधिर्जातो धर्मिष्ठोऽस्त्रविदां वरः।<br>धर्मस्य वक्ता कर्ता च रैवतो नाम वीर्यवान्॥ ८७ | इस प्रकार राजाका वह रैवत नामक तेजस्वी पुत्र समग्र विद्याओंका निधान, धर्मपरायण, अस्त्र-विशारदोंमें श्रेष्ठ, धर्मका वक्ता तथा धर्मका पालनकर्ता हो गया॥ ८७॥ | | नियुक्तवानथ ब्रह्मा रैवतं मानवे पदे।<br>मन्वन्तराधिपः श्रीमान् गां शशास स धर्मतः॥ ८८ | इसके बाद ब्रह्माजीने रैवतको मनुके पदपर नियुक्त किया और वे श्रीमान् मन्वन्तराधिपके रूपमें धर्मपूर्वक पृथ्वीपर शासन करने लगे॥ ८८॥ | | इत्थं देव्याः प्रभावोऽयं संक्षेपेणोपवर्णितः।<br>पुराणस्य च माहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात्क्षमः॥ ८९ | इस प्रकार मैंने देवी भगवतीके इस प्रभावका संक्षिप्तरूपसे वर्णन कर दिया। इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कौन समर्थ है?॥ ८९॥ |
अ० ५ ] माहात्म्य ५९
अ० ५ ] माहात्म्य ५९
| सूत उवाच<br>कुम्भयोनिस्तु माहात्म्यं विधिं भागवतस्य च।<br>श्रुत्वा कुमारं चाभ्यर्च्य स्वाश्रमं पुनराययौ॥ ९०<br><br>इदं मया भागवतस्य विप्रा<br>माहात्म्यमुक्तं भवतां समक्षम्।<br>शृणोति भक्त्या पठतीह भोगान्<br>भुक्त्वाखिलान्मुक्तिमुपैति चान्ते॥ ९१ | सूतजी बोले—[हे ब्राह्मणो!] इस प्रकार श्रीमद्देवीभागवतका माहात्म्य तथा उसकी विधि सुनकर और कुमार कार्तिकेयकी पूजाकर अगस्त्यजी अपने आश्रम चले आये॥ ९०॥<br><br>हे विप्रो! मैंने आपलोगोंके समक्ष श्रीमद्देवी-भागवतका यह माहात्म्य कह दिया। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण तथा पाठ करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका सुख प्राप्त करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है॥ ९१॥ |
इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये रैवतनामक-
मनुपुत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
श्रीमद्देवीभागवतपुराणकी श्रवण-विधि, श्रवणकर्ताके लिये पालनीय नियम, श्रवणके फल तथा माहात्म्यका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग श्रुतं माहात्म्यमुत्तमम्।<br>अधुना श्रोतुमिच्छामः पुराणश्रवणे विधिम्॥ १ | **ऋषियोंने कहा—**हे महाभाग सूतजी! हमलोगोंने श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य सुन लिया और अब इस पुराणके श्रवणकी विधि सुनना चाहते हैं॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>श्रूयतां मुनयः सर्वे पुराणश्रवणे विधिम्।<br>नराणां शृण्वतां येन सिद्धिः स्यात्सार्वकामिकी॥ २ | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! अब आपलोग इस पुराणके श्रवणका विधान सुनें, जिसे सुननेवाले मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं॥ २॥ |
| आदौ दैवज्ञमाहूय मुहूर्तं कल्पयेत्सुधीः।<br>आरभ्य शुचिमासं तु मासषट्कं शुभावहम्॥ ३ | पुराणश्रवणके इच्छुक विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि वह सर्वप्रथम ज्योतिषीको बुलाकर शुभ मुहूर्त निर्धारित कर ले। इसके लिये ज्येष्ठमाससे लेकर छः महीने शुभकारक होते हैं॥ ३॥ |
| हस्ताश्विमूलपुष्यर्क्षै ब्रह्ममैत्रेन्दुवैष्णवे।<br>सत्तिथौ शुभवारे च पुराणश्रवणं शुभम्॥ ४ | हस्त, अश्विनी, मूल, पुष्य, रोहिणी, अनुराधा, मृगशिरा तथा श्रवण नक्षत्र, पुण्य तिथि तथा शुभ दिनमें श्रीमद्देवीभागवतपुराणका श्रवण कल्याणकारी होता है॥ ४॥ |
| गुरुभाद्वेदवेदाब्जशराङ्गाब्धिगुणैः क्रमात्।<br>धर्माप्तिरिन्दिराप्राप्तिः कथासिद्धिः परं सुखम्॥ ५ | जिस नक्षत्रमें बृहस्पति हों, उससे चन्द्रमातक गिननेपर क्रमशः इस प्रकार फल होते हैं—चार नक्षत्रतक धर्म-प्राप्ति, पुनः चारतक लक्ष्मीकी प्राप्ति, इसके बाद एक नक्षत्र कथामें सिद्धि प्रदान करनेवाला, फिर पाँच नक्षत्र परम सुखकी प्राप्ति करानेवाले, बादमें छः नक्षत्र पीड़ा करनेवाले, इसके |
| ६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| पीडाथ भूपतिभयं ज्ञानप्राप्तिः क्रमात्फलम्।<br>पुराणश्रवणे चक्रं शोधयेच्छिवभाषितम्॥ ६ | बाद चार नक्षत्र राज-भय उत्पन्न करनेवाले और तत्पश्चात् तीन नक्षत्र ज्ञान-प्राप्तिमें सहायक होते हैं। पुराणश्रवणके आरम्भमें शिवोक्त चक्रका शोधन कर लेना चाहिये॥ ५-६॥ | | अथवा प्रीतये देव्या नवरात्रचतुष्टये।<br>शृणुयादन्यमासेऽपि तिथिवारर्क्षशोधिते॥ ७ | देवीकी प्रसन्नताके लिये इसे चारों नवरात्रोंमें* सुनना चाहिये अथवा तिथि, वार और नक्षत्रपर सम्यक् विचार करके यह पुराण अन्य मासोंमें भी सुना जा सकता है॥ ७॥ | | सम्भारं तादृशं कार्यं विवाहादौ च यादृशम्।<br>नवाहयज्ञे चाप्यस्मिन्विधेयं यत्नतो बुधैः॥ ८ | विवाह आदिमें जिस प्रकार [उत्साहपूर्वक] तैयारी की जाती है, उसी प्रकार नवाह-यज्ञके अवसरपर भी बुद्धिमान् मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक सामग्री आदिकी तैयारी करनी चाहिये॥ ८॥ | | सहाया बहवः कार्या दम्भलोभविवर्जिताः।<br>चतुराश्च वदान्याश्च देवीभक्तिपरा नराः॥ ९ | पाखण्ड तथा लोभसे रहित, चतुर, उदार एवं देवीभक्त सज्जनोंको भी सहायकके रूपमें लेना चाहिये॥ ९॥ | | प्रेष्या यत्नेन वार्तेयं देशे देशे जने जने।<br>आगन्तव्यमिहावश्यं कथा देव्या भविष्यति॥ १० | देश-देशमें भी यत्नपूर्वक यह सन्देश भेजना चाहिये—[हे कथानुरागी सज्जनो!] यहाँ श्रीमद्देवी-भागवतकी कथा होने जा रही है, आप अवश्य पधारें॥ १०॥ | | सौराश्च गाणपत्याश्च शैवाः शाक्ताश्च वैष्णवाः।<br>सर्वेषामपि सेव्येयं यतो देवाः सशक्तयः॥ ११ | चाहे सूर्यकी उपासना करनेवाले हों, चाहे गणेशभक्त हों, चाहे शैव हों, चाहे वैष्णव अथवा शक्तिके उपासक हों, सभी इस कथाके श्रवणके अधिकारी हैं; क्योंकि सभी देवता शक्तिके साथ ही रहते हैं॥ ११॥ | | श्रीमद्देवीभागवतपीयूषरसलोलुपैः ।<br>आगन्तव्यं विशेषेण कथार्थं प्रेमतत्परैः॥ १२ | इसलिये श्रीमद्देवीभागवतकी कथारूपी सुधाके रसिक प्रेमीजनोंको कथाश्रवणके लिये विशेषरूपसे आना चाहिये॥ १२॥ | | ब्राह्मणाद्याश्च ये वर्णाः स्त्रियश्चाश्रामिणस्तथा।<br>सकामाश्चापि निष्कामाः पातव्यं तैः कथामृतम्॥ १३ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—चारों वर्णके स्त्री, पुरुष एवं ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास—इन चारों आश्रमोंमें निरत मनुष्योंको चाहे सकामभावसे अथवा निष्कामभावसे—अवश्य ही इस कथा-सुधाका पान करना चाहिये॥ १३॥ |
* सामान्यतः नवरात्र चार हैं—१-चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक, २-आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक (इसी नवरात्रके बाद हरिशयनी एकादशी), ३-आश्विन शुक्ल प्रतिपदासे विजयादशमीतक (इसके बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी देवोत्थानी—प्रबोधिनी एकादशी) तथा ४-माघ शुक्ल प्रतिपदासे दशमीतक सारस्वत-नवरात्र।
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नावकाशः कदाचित्स्यान्नवाहश्रवणेऽपि तैः।<br>आगन्तव्यं यथाकालं यज्ञे पुण्या क्षणस्थितिः॥ १४ | जिन लोगोंको पूरे नौ दिनतक कथा सुननेका अवकाश न मिल सके, वे जब भी समय मिले तभी आ जायें; क्योंकि यज्ञमें क्षणभर भी पहुँच जाना विशेष पुण्यदायक होता है॥ १४॥ |
| विनयेनैव कर्तव्यमेवमाकारणं नृणाम्।<br>आगतानाञ्च कर्तव्यं वासस्थानं यथोचितम्॥ १५ | बड़ी नम्रताके साथ मनुष्योंको निमन्त्रण देना चाहिये और आये हुए श्रोताओंके बैठनेका भी समुचित प्रबन्ध करना चाहिये॥ १५॥ |
| कथास्थानं प्रकर्तव्यं भूमौ मार्जनपूर्वकम्।<br>लेपनं गोमयेनाथ विशालायां मनोरमम्॥ १६<br><br>कार्यस्तु मण्डपो रम्यो रम्भास्तम्भोपशोभितः।<br>वितानमुपरिष्टात्तु पताकाध्वजराजितः॥ १७ | विस्तृत भूमिमें कथा-प्रवचनका सुन्दर स्थान बनाना चाहिये। उस स्थानकी सफाई कराकर गोबरसे लिपवा देना चाहिये। केलेके स्तम्भोंसे सुशोभित और ध्वज-पताकाओंसे अलंकृत एक सुरम्य मण्डपका निर्माण करना चाहिये और उसके ऊपर सुन्दर चाँदनी लगा देनी चाहिये॥ १६-१७॥ |
| वक्तुश्चैवासनं दिव्यं सुखास्तरणसंयुतम्।<br>रचितव्यं प्रयत्नेन प्राङ्मुखं वाप्युदङ्मुखम्॥ १८ | कथावाचकका आसन दिव्य तथा सुखकर आस्तरणसे युक्त होना चाहिये। उसे प्रयत्नपूर्वक पूर्वा-भिमुख अथवा उत्तराभिमुख रखना चाहिये॥ १८॥ |
| यथोचितानि कुर्वीत श्रोतॄणामासनानि च।<br>नॄणां चैवाथ नारीणां कथाश्रवणहेतवे॥ १९ | कथाश्रवणके लिये आनेवाले पुरुष तथा स्त्री श्रोताओंके लिये भी यथायोग्य पृथक्-पृथक् आसनोंकी व्यवस्था करनी चाहिये॥ १९॥ |
| वाग्मी दान्तश्च शास्त्रज्ञो देव्याराधनतत्परः।<br>दयालुर्निस्पृहो दक्षो धीरो वक्तोत्तमो मतः॥ २० | वक्तृत्वसम्पन्न, संयमी, शास्त्रज्ञ, देवीकी आराधनामें तत्पर, दयालु, लोभहीन, दक्ष तथा धैर्यशाली कथावाचक उत्तम माना गया है॥ २०॥ |
| ब्रह्मण्यो देवताभक्तः कथारसपरायणः।<br>उदारोऽलोलुपो नम्रः श्रोता हिंसाविवर्जितः॥ २१ | इसी प्रकार श्रोता भी ऐसा होना चाहिये जो ब्राह्मणसेवी, देवभक्त, कथा-रसका पान करनेवाला, उदार, लोभरहित, विनम्र और हिंसा आदिसे रहित हो॥ २१॥ |
| पाखण्डनिरतो लुब्धः स्त्रैणो धर्मध्वजस्तथा।<br>निष्ठुरः क्रोधनो वक्ता देवीयज्ञे न शस्यते॥ २२ | पाखण्डी, लोभी, स्त्रीस्वभाव, कामी, धर्मका दिखावामात्र करनेवाला, निष्ठुर तथा क्रोधी वक्ता देवीभागवतके नवाहयज्ञमें श्रेष्ठ नहीं माना जाता है॥ २२॥ |
| संशयच्छेदनायकः पण्डितश्च तथागुणः।<br>श्रोतृबोधकृदव्यग्रः कार्यो वक्तुः सहायकत्॥ २३ | श्रोताओंकी शंकाओंके निवारणहेतु कथावाचकके साथ एक ऐसा सहायक भी लगा देना चाहिये, जो पण्डित, गुणवान्, शान्त तथा श्रोताओंको समझानेमें कुशल हो॥ २३॥ |
| मुहूर्तदिवसादर्वाग्वक्तृश्रोत्रादिभिर्जनैः ।<br>कर्तव्यं क्षौरकर्मादि ततो नियमकल्पनम्॥ २४ | कथा प्रारम्भ होनेके एक दिन पूर्व ही वक्ता एवं श्रोतागणोंको क्षौरकर्म करा लेना चाहिये। तत्पश्चात् अन्यान्य नियमोंका पालन करना चाहिये॥ २४॥ |
| ६२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अरुणोदयवेलायां स्नायाच्छौचं विधाय च।<br>सन्ध्यार्पणकार्यञ्च नित्यं संक्षेपतश्चरेत्॥ २५ | उस दिन शौचादिसे निवृत्त हो अरुणोदयवेलामें ही स्नान कर लेना चाहिये। सन्ध्या तथा तर्पण आदि नित्यकर्म संक्षेपमें ही करना चाहिये॥ २५॥ |
| कथाश्रवणयोग्यत्वसिद्धये गाश्च दापयेत्।<br>समस्तविघ्नहर्तारमादौ गणपतिं यजेत्॥ २६<br><br>कलशांश्चापि संस्थाप्य पूजयेत्तत्र दिग्भवान्।<br>वटुकं क्षेत्रपालञ्च योगिनीर्मातृकास्तथा॥ २७<br><br>तुलसीञ्चापि सम्पूज्य ग्रहान्विष्णुञ्च शङ्करम्।<br>नवाक्षरेण मनुना पूजयेज्जगदम्बिकाम्॥ २८ | तत्पश्चात् कथाश्रवणका अधिकारी बननेके लिये गोदान करे और सब विघ्नोंको दूर करनेवाले श्रीगणेशजीका सर्वप्रथम पूजन करे। कलश-स्थापन करके वहाँ दस दिक्पालों, बटुक, क्षेत्रपाल, सभी योगिनियों और मातृकाओंका भी पूजन करे। तुलसी, नवग्रह, विष्णु तथा शिवजीका पूजन करके नवाक्षरमन्त्रसे जगदम्बाका पूजन करना चाहिये॥ २६—२८॥ |
| सर्वोपचारैः सम्पूज्य श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>श्रीदेव्या वाङ्मयीं मूर्तिं यथावच्छोभनाक्षरम्॥ २९<br><br>कथाविघ्नोपशान्त्यर्थं वृणुयात्पञ्च वाडवान्।<br>जाप्यो नवार्णमन्त्रस्तैः पाठ्यः सप्तशतीस्तवः॥ ३० | तत्पश्चात् सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई भगवतीकी वाङ्मयी मूर्तिस्वरूप श्रीमद्देवीभागवत-पुस्तककी सभी उपचारोंसे विधिवत् पूजा करके कथाकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये पाँच विद्वान् ब्राह्मणोंका वरण करना चाहिये। उनसे निरन्तर नवार्णमन्त्रका जप एवं दुर्गासप्तशतीका पाठ कराना चाहिये॥ २९-३०॥ |
| प्रदक्षिणनमस्कारान्कृत्वान्ते स्तुतिमाचरेत्।<br>कात्यायनि महामाये भवानि भुवनेश्वरि॥ ३१<br><br>संसारसागरे मग्नं मामुद्धर कृपामये।<br>ब्रह्मविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके॥ ३२<br><br>मनोऽभिलषितं देवि वरं देहि नमोऽस्तु ते।<br>इति सम्प्रार्थ्य शृणुयात्कथां नियतमानसः॥ ३३ | अन्तमें प्रदक्षिणा तथा नमस्कारके बाद इस प्रकार स्तुति करे—‘हे कात्यायनि! हे महामाये! हे भुवनेश्वरि! हे कृपामये! हे भवानि! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ; मेरा उद्धार कीजिये तथा हे ब्रह्मा, विष्णु, महेशसे पूजनीया माता जगदम्बिके! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। हे देवि! आप मुझे मनोवांछित वर प्रदान कीजिये; आपको बार-बार प्रणाम है। इस प्रकार प्रार्थना करके स्वस्थचित्त होकर कथा सुने॥ ३१—३३॥ |
| वक्तारञ्चापि सम्पूज्य व्यासबुद्ध्या यतात्मवान्।<br>माल्यालङ्कारवस्त्राद्यैः सम्भूष्य प्रार्थयेच्च तम्॥ ३४<br><br>सर्वशास्त्रेतिहासज्ञ व्यासरूप नमोऽस्तु ते।<br>कथाचन्द्रोदयेनान्तस्तमःस्तोमं निराकुरु॥ ३५ | उस समय संयतचित्त होकर वक्ताको साक्षात् व्यास समझकर विधिवत् उनकी पूजा करे और वस्त्राभूषण तथा माला आदि पहनाकर उनसे प्रार्थना करे—‘समस्त शास्त्र तथा पुराणेतिहासके ज्ञाता हे व्यासजी! आपको नमस्कार है। आप कथारूपी चन्द्रमाकी ज्योतिसे हमारे अन्तःकरणके अन्धकारसमूहको नष्ट कीजिये’॥ ३४-३५॥ |
| तदग्रे तु नवाहान्तं कर्तव्या नियमास्तदा।<br>विप्रादीनुपवेश्यादौ सम्पूज्योपविशेत्स्वयम्॥ ३६ | इसके बाद नवाहके नियमोंका व्रत ले और ब्राह्मणोंका यथाशक्ति पूजन करके उन्हें पहले यथास्थान बैठा दे, तत्पश्चात् स्वयं भी अपने आसनपर बैठ जाय॥ ३६॥ |
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रोतव्यं सावधानेन चतुर्वर्गफलाप्तये।<br>गृहपुत्रकलत्राप्तधनचिन्तामपास्य च॥ ३७ | तब सावधान मनसे चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष)-फलको प्राप्त करनेके लिये पुत्र-कलत्र, धन-धान्य तथा गृहकी चिन्ता छोड़कर कथा सुने॥ ३७॥ |
| सूर्योदयं समारभ्य किञ्चित्सूर्येऽवशेषिते।<br>मुहूर्तमात्रं विश्रम्य मध्याह्ने वाचयेत्सुधीः॥ ३८ | विद्वान् वक्ताको चाहिये कि वह सूर्योदयसे आरम्भ करके पुनः दोपहरमें दो घड़ी विश्राम करके सूर्यास्तके कुछ समय पहलेतक कथा-वाचन करे॥ ३८॥ |
| मलमूत्रजयायैषां लघु भोजनमिष्यते।<br>हविष्योन्नं वरं भोज्यं सकृदेव कथार्थिना॥ ३९<br>अथवा स्यात्फलाहारी पयोभुग्वा घृताशनः।<br>यथा स्यान्न कथाविघ्नस्तथा कार्यं विचक्षणैः॥ ४० | मल-मूत्रके वेगको रोकनेके लिये स्वल्पाहार उत्तम होता है। कथार्थीको दिन-रातमें केवल एक बार हविष्यान्नका भोजन करना ही ठीक है; अथवा फलाहार करे या केवल दूध-घीके आहारपर ही रहे। बुद्धिमान्को चाहिये कि ऐसा आहार ग्रहण करे, जिससे कथामें किसी प्रकारकी बाधा न हो॥ ३९-४०॥ |
| कथाश्रवणनिष्ठानां वक्ष्यामि नियमं द्विजाः।<br>ब्रह्मविष्णुमहेशानां मध्ये ये भेददर्शिनः॥ ४१<br>देवीभक्तिविहीना ये पाखण्डा हिंसकाः खलाः।<br>विप्रद्रुहो नास्तिका ये न ते योग्याः कथाश्रवे॥ ४२ | हे द्विजगण! अब मैं कथाश्रवणमें निष्ठा रखनेवालोंके नियम बताता हूँ। जो लोग ब्रह्मा, विष्णु और शिवमें भेददृष्टि रखते हैं, देवीकी भक्तिसे रहित हैं, जो पाखण्डी, हिंसक तथा दुष्ट हैं और जो ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले तथा नास्तिक हैं, वे कथाश्रवणके योग्य नहीं हैं॥ ४१-४२॥ |
| ब्रह्मस्वहरणे लुब्धाः परदारधनेषु च।<br>देवस्वहरणे तेषां नाधिकारः कथाश्रवे॥ ४३ | जो परस्त्री, पराया धन, ब्राह्मणधन तथा देव-सम्पत्तिके हरणमें लुब्ध रहते हैं, उनका कथाश्रवणमें अधिकार नहीं है॥ ४३॥ |
| ब्रह्मचारी च भूशायी सत्यवक्ता जितेन्द्रियः।<br>कथासमाप्तौ भुञ्जीत पत्रावल्यां यतात्मवान्॥ ४४ | श्रोताको चाहिये कि वह ब्रह्मचर्यका पालन करे, पृथ्वीपर सोये, सत्य बोले, जितेन्द्रिय रहे तथा कथाकी समाप्तिपर संयमपूर्वक पत्तलपर भोजन करे॥ ४४॥ |
| वृन्ताकञ्च कलिन्दञ्च तैलञ्च द्विदलं मधु।<br>दग्धमन्नं पर्युषितं भावदुष्टं त्यजेद् व्रती॥ ४५ | व्रतीको बैगन, बहेड़ा (कलिन्द), तेल, दाल, मधु और जला हुआ, बासी तथा भावदूषित अन्नका त्याग कर देना चाहिये॥ ४५॥ |
| आमिषञ्च मसूरान्नमुदक्यादृष्टमेव च।<br>रसोंनं मूलकं हिङ्गुं पलाण्डुं गृञ्जनं तथा॥ ४६<br>कूष्माण्डं नलिकाशाकं न भुञ्जीत कथाव्रती।<br>कामं क्रोधं मदं लोभं दम्भं मानञ्च वर्जयेत्॥ ४७ | कथा सुननेवाला व्रती मांस, मसूर, रजस्वला स्त्रीका देखा हुआ खाद्यान्न, लहसुन, मूली, हींग, प्याज, गाजर, कोहड़ा और करमीका साग न खाये। काम, क्रोध, मद, लोभ, पाखण्ड और अहंकारको छोड़ दे॥ ४६-४७॥ |
| विप्रध्रुक्पतितव्रात्यश्वपाकयवनान्त्यजैः ।<br>उदक्यया वेदबाह्यैर्न वदेद्यः कथाव्रती॥ ४८ | विप्रद्रोही, पतित, संस्कारहीन, चाण्डाल, यवन, अन्त्यज, रजस्वला स्त्री और वेदविहीन मनुष्योंसे कथाव्रतीको वार्तालाप नहीं करना चाहिये॥ ४८॥ |
| ६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| वेदगोगुरुविप्राणां स्त्रीराज्ञां महतां तथा।<br>देवानां देवभक्तानां न निन्दां शृणुयादपि॥ ४९ | श्रोताको चाहिये कि वह वेद, गौ, गुरु, ब्राह्मण, स्त्री, राजा, महापुरुष, देवताओं और देवभक्तोंकी निन्दा कभी न सुने॥ ४९॥ | | विनयं चार्जवं शौचं दयां च मितभाषणम्।<br>उदारं मानसञ्चैव कुर्याद्यस्तु कथाव्रती॥ ५० | जो कथाव्रती हो उसे सर्वदा विनयशील, सरलचित्त, पवित्र, दयालु, कम बोलनेवाला तथा उदार मनवाला होना चाहिये॥ ५०॥ | | श्वित्री कुष्ठी क्षयी रुग्णो भाग्यहीनश्च पापकृत्।<br>दरिद्रश्चानपत्यश्च भक्त्येमां शृणुयात्कथाम्॥ ५१ | श्वेतकुष्ठी, कुष्ठी, क्षयरोगी, अभागा, पापी, दरिद्र तथा सन्तानहीन मनुष्य इस कथाको भक्तिपूर्वक सुने॥ ५१॥ | | वन्ध्या वा काकबन्ध्या वा दुर्भगा वा मृतार्भका।<br>पतद्गर्भाङ्गना या च ताभिः श्राव्या तथा कथा॥ ५२ | जो स्त्री वन्ध्या, काकबन्ध्या (जिस स्त्रीको एक बार सन्तान होकर बन्द हो जाय), अभागिन तथा मृतवत्सा हो और जिसका गर्भ गिर जाता हो, ऐसी सभी स्त्रियोंको इस देवीभागवतकथाका श्रवण करना चाहिये॥ ५२॥ | | धर्मार्थकाममोक्षांश्च यो वाञ्छति विना श्रमम्।<br>भगवत्या भागवतं श्रोतव्यं तेन यत्नतः॥ ५३ | जो मनुष्य बिना परिश्रमके ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, वह यत्नपूर्वक इस देवीभागवतकी कथा अवश्य सुने॥ ५३॥ | | कथादिनानि चैतानि नवयज्ञैः समानि हि।<br>तेषु दत्तं हुतं जप्तमनन्तफलदं भवेत्॥ ५४ | इस नवाह्नकथाके नौ दिन नौ यज्ञोंके समान हैं। उनमें किया गया दान, हवन तथा जप अनन्त फल देनेवाला होता है॥ ५४॥ | | एवं व्रतं नवाहं तु कृत्योद्यापनमाचरेत्।<br>महाष्टमीव्रतं यद्वत्तथा कार्यं फलेप्सुभिः॥ ५५ | इस प्रकार नवाहव्रत करके उसका उद्यापन करना चाहिये। फलकी कामना करनेवाले पुरुषोंको महाष्टमीव्रतके उद्यापनकी भाँति नवाहव्रतका भी उद्यापन करना चाहिये॥ ५५॥ | | निष्कामाः श्रवणेनैव पूता मुक्तिं व्रजन्ति हि।<br>भोगमोक्षप्रदा नॄणां यतो भगवती परा॥ ५६ | निष्काम व्यक्ति कथाके श्रवणमात्रसे पवित्र होकर मुक्ति पा जाते हैं; क्योंकि परा भगवती मनुष्योंको भोग और मोक्ष सब कुछ देनेवाली हैं॥ ५६॥ | | पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्या तु नित्यशः।<br>वक्त्रा दत्तं प्रसादं तु गृह्णीयाद्भक्तिपूर्वकम्॥ ५७ | पुस्तक और कथावाचक—दोनोंकी प्रतिदिन पूजा करनी चाहिये और वक्ताद्वारा दिया हुआ प्रसाद भक्तिपूर्वक ग्रहण करना चाहिये॥ ५७॥ | | कुमारीः पूजयेन्नित्यं भोजयेत्प्रार्थयेच्च यः।<br>सुवासिनीश्च विप्रांश्च तस्य सिद्धिर्न संशयः॥ ५८ | नवाह-यज्ञमें जो श्रोता नित्य कुमारी कन्याओं, सुहागिन स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराता तथा उनसे प्रार्थना करता है, उसकी कार्यसिद्धि अवश्य हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ५८॥ | | गायत्र्या नाम साहस्रं समाप्तावथ वा पठेत्।<br>विष्णोर्नामसहस्रञ्च सर्वदोषोपशान्तये॥ ५९ | सभी त्रुटियोंकी शान्तिके निमित्त कथासमाप्तिके दिन गायत्रीसहस्रनाम अथवा विष्णुसहस्रनामका पाठ करना चाहिये॥ ५९॥ |
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।<br>न्यूनं सम्पूर्णतां याति तस्माद्विष्णुञ्च कीर्तयेत्॥ ६० | जिनके स्मरण तथा नामकीर्तनसे तप, यज्ञ, क्रिया आदिमें न्यूनता समाप्त हो जाती है, उन विष्णुभगवान्का नाम-कीर्तन करना चाहिये॥ ६०॥ |
| देव्याः सप्तशतीमन्त्रैः समाप्तौ होममाचरेत्।<br>देवीमाहात्म्यमूलेन नवार्णमनुनाथवा॥ ६१<br><br>गायत्र्या त्वथवा होमः पायसेन ससर्पिषा।<br>यतो भागवतं त्वेतद् गायत्रीमयमीरितम्॥ ६२ | कथासमाप्तिके दिन दुर्गासप्तशतीके मन्त्रोंसे अथवा देवीमाहात्म्यके मूलपाठसे या नवार्ण* मन्त्रसे होम करना चाहिये अथवा घृतसहित पायसद्वारा गायत्री मन्त्रका उच्चारण करके हवन करे; क्योंकि यह श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण गायत्रीमय कहा गया है॥ ६१-६२॥ |
| वाचकं तोषयेत्सम्यग्वस्त्रभूषधनादिभिः।<br>प्रसन्ने वाचके सर्वाः प्रसन्नास्तस्य देवताः॥ ६३ | कथावाचकको वस्त्र, भूषण, धन आदिके द्वारा सन्तुष्ट करे; क्योंकि कथावाचकके प्रसन्न होनेपर सभी देवता उसपर प्रसन्न हो जाते हैं॥ ६३॥ |
| ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या दक्षिणाभिश्च तोषयेत्।<br>पृथिव्यां देवरूपास्ते तुष्टेष्वेष्भीप्सितं फलम्॥ ६४ | श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराये और नानाविध दक्षिणाओंसे उन्हें सन्तुष्ट करे; क्योंकि वे विप्र पृथ्वीपर देवताके स्वरूप हैं। उनके सन्तुष्ट होनेपर वांछित फल प्राप्त होता है॥ ६४॥ |
| सुवासिनीः कुमारीश्च देवीभक्त्या च भोजयेत्।<br>ताभ्योऽपि दक्षिणां दत्त्वा प्रार्थयेत्सिद्धिमात्मनः॥ ६५ | सुहागिन स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंको साक्षात् देवी समझकर उन्हें भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा देकर अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करे॥ ६५॥ |
| दद्याद्दानानि चान्यानि सुवर्णं गाः पयस्विनीः।<br>हयानिभान्मेदिनीञ्च तस्य स्यादक्षयं फलम्॥ ६६ | सुवर्ण, दूध देनेवाली गौ, हाथी, घोड़े और भूमिको दान करना चाहिये; क्योंकि उसका अक्षय फल होता है॥ ६६॥ |
| देवीभागवतं चैतल्लिखितं शोभनाक्षरम्।<br>हेमसिंहासने स्थाप्य पट्टवस्त्रेण वेष्टितम्॥ ६७<br><br>अष्टम्यां वा नवम्याञ्च वाचकायार्चिताय च।<br>दद्यात्स भोगान्भुक्तेह दुर्लभं मोक्षमाप्नुयात्॥ ६८ | सुन्दर अक्षरोंमें लिखी देवीभागवतकी पुस्तकको रेशमी-वस्त्रमें लपेटकर उसे सुवर्णनिर्मित सिंहासनपर रखकर अष्टमी या नवमी तिथिको विधिपूर्वक कथावाचकको दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह इस संसारमें सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें दुर्लभ मोक्ष प्राप्त करता है॥ ६७-६८॥ |
| दरिद्रो दुर्बलो बालस्तरुणो जरठोऽपि वा।<br>पुराणवेत्ता वन्द्यः स्यात्पूज्यो मान्यश्च सर्वदा॥ ६९ | पुराणको जाननेवाला वक्ता चाहे दरिद्र हो, दुर्बल हो, बालक हो, युवक हो अथवा वृद्ध हो, वह सर्वदा वन्दनीय पूज्य एवं मान्य होता है॥ ६९॥ |
| सन्ति लोकस्य बहवो गुरवो गुणजन्मतः।<br>सर्वेषामपि तेषाञ्च पुराणज्ञः परो गुरुः॥ ७० | यद्यपि संसारमें जन्म अथवा गुणके कारण अनेक गुरु हैं, परंतु पुराणका ज्ञाता उन सबमें श्रेष्ठ गुरु है॥ ७०॥ |
| पौराणिको ब्राह्मणस्तु व्यासासनसमाश्रितः।<br>आसमाप्ते प्रसङ्गे तु नमस्कुर्यान्न कस्यचित्॥ ७१ | व्यासके आसनपर बैठा हुआ पौराणिक ब्राह्मण जबतक कथा समाप्त न हो जाय, तबतक किसीको भी प्रणाम न करे॥ ७१॥ |
* ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 A
| ६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पौराणिकीं कथां दिव्यां येऽपि शृण्वन्त्यभक्तितः ।<br>तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखदारिद्र्यभागिनाम् ॥ ७२ | जो लोग इस दिव्य पौराणिक कथाको श्रद्धारहित होकर सुनते हैं, उन दुःख तथा दारिद्र्य-युक्त मनुष्योंको कथाश्रवणका पुण्य-फल प्राप्त नहीं होता ॥ ७२ ॥ |
| असम्पूज्य पुराणं तु ताम्बूलकुसुमादिभिः ।<br>ये शृण्वन्ति कथां देव्यास्ते दरिद्रा भवन्ति हि ॥ ७३<br><br>कीर्त्यमानां कथां त्यक्त्वा ये व्रजन्त्यन्यतो नराः।<br>भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः ॥ ७४ | जो लोग ताम्बूल, पुष्प आदि उपचारोंसे पुराणका पूजन किये बिना ही देवीकी कथा सुनते हैं, वे दरिद्र होते हैं और जो लोग कथाके बीचमें ही उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, कुछ ही समय बाद उनकी सम्पदाएँ एवं स्त्री आदि नष्ट हो जाती हैं ॥ ७३-७४ ॥ |
| ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः ।<br>ते वायसा भवन्त्यत्र भुक्त्वा निरययातनाम् ॥ ७५ | जो अभिमानवश व्याससे ऊँचे स्थानपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे नरक-यातना भोगकर इस लोकमें कौएकी योनि पाते हैं ॥ ७५ ॥ |
| ये चाढ्यासनसंस्थाश्च ये वीरासनसंस्थिताः ।<br>शृण्वन्ति च कथां दिव्यां ते स्युरर्जुनशाखिनः ॥ ७६ | जो बहुमूल्य आसनपर अथवा वीरासनसे बैठकर दिव्य कथाका श्रवण करते हैं, वे 'अर्जुन' वृक्ष होते हैं ॥ ७६ ॥ |
| कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम् ।<br>रासभास्ते भवन्तीह कृकलासास्ततः परम् ॥ ७७ | कथा होते समय जो लोग व्यर्थ तर्क-वितर्क करते हैं, वे इस लोकमें पहले गर्दभयोनिमें तत्पश्चात् गिरगिटकी योनिमें जाते हैं ॥ ७७ ॥ |
| निन्दन्ति ये पुराणज्ञान् कथां वा पापहारिणीम् ।<br>ते तु जन्मशतं दुष्टाः शुनकाः स्युर्न संशयः ॥ ७८ | जो लोग पुराण जाननेवालोंकी अथवा पापनाशिनी कथाकी निन्दा करते हैं, वे सैकड़ों जन्मतक दुष्ट कुत्ते होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७८ ॥ |
| ये शृण्वन्ति कथां वक्तुः समानासनसंस्थिताः ।<br>गुरुतल्पसमं पापं लभन्ते नरकालयाः ॥ ७९<br><br>ये चाप्रणम्य शृण्वन्ति ते भवन्ति विषद्रुमाः ।<br>शयाना येऽपि शृण्वन्ति भवन्त्यजगराहयः ॥ ८० | जो लोग कथावाचकके बराबर आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, उन्हें गुरुके आसनपर बैठनेका पाप लगता है और वे नरकमें वास करते हैं। जो लोग वक्ताको प्रणाम किये बिना ही कथा सुनने लगते हैं, वे जन्मान्तरमें विषैले वृक्ष होते हैं। इसी प्रकार जो लोग लेटे-लेटे कथा सुनते हैं; वे अजगर, साँपकी योनि पाते हैं ॥ ७९-८० ॥ |
| ये कदाचन पौराणीं न शृण्वन्ति कथां नराः ।<br>ते घोरं नरकं भुक्त्वा भवन्ति वनसूकराः ॥ ८१<br><br>ये कथां नानुमोदन्ते विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः ।<br>कोट्यब्दं निरयं भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकराः ॥ ८२ | जो मनुष्य कभी भी पुराणकी कथा नहीं सुनते, वे घोर नरक भोगकर बनैले सूअरकी योनिमें जाते हैं। जो शठ मनुष्य कथाका अनुमोदन नहीं करते अपितु उसमें विघ्न डाला करते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक-यातना भोगकर अन्तमें ग्रामसूकर होते हैं ॥ ८१-८२ ॥ |
| आसनं भाजनं द्रव्यं फलं वस्त्राणि कम्बलम् ।<br>पुराणज्ञाय यच्छन्ति ते व्रजन्ति हरेः पदम् ॥ ८३ | जो लोग पुराणवेत्ताको आसन, पात्र, द्रव्य, फल, वस्त्र तथा कम्बल प्रदान करते हैं, वे भगवान्के परम पदको प्राप्त करते हैं ॥ ८३ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 3 B
| अ० ५ ] | माहात्म्य | ६७ | | :--- | :--- |
| पुराणपुस्तकस्यापि ये पट्टवसनं नवम्।<br>प्रयच्छन्ति शुभं सूत्रं ते नराः सुखभागिनः ॥ ८४ | जो मनुष्य पुराणपुस्तकके लिये नवीन रेशमी वस्त्र तथा सुन्दर सूत्रका दान करते हैं, वे सुखी रहते हैं ॥ ८४ ॥ | | पुराणानां तु सर्वेषां श्रवणाद्यत्फलं लभेत्।<br>तस्माच्छतगुणं पुण्यं देवीभागवताल्लभेत् ॥ ८५ | सभी पुराणोंके सुननेसे जो फल प्राप्त होता है, उससे सौगुना पुण्य श्रीमद्देवीभागवतपुराणके श्रवणसे होता है ॥ ८५ ॥ | | यथा सरित्सु प्रवरा गङ्गा देवेषु शङ्करः।<br>काव्ये रामायणं यद्वज्ज्योतिष्मत्सु यथा रविः ॥ ८६<br><br>आह्लादकानां चन्द्रश्च धनानाञ्च यथा यशः।<br>क्षमावतां यथा भूमिर्गाम्भीर्ये सागरो यथा ॥ ८७<br><br>मन्त्राणां चैव सावित्री पापनाशे हरिस्मृतिः।<br>अष्टादशपुराणानां देवीभागवतं तथा ॥ ८८ | जिस प्रकार नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं; देवताओंमें शिव, काव्योंमें वाल्मीकीय रामायण तथा तेजस्वियोंमें भगवान् सूर्य श्रेष्ठ हैं; और जैसे आनन्द देनेवालोंमें चन्द्रमा, सब धनोंमें सुयश, क्षमाशीलोंमें पृथ्वी, गम्भीरतामें समुद्र, मन्त्रोंमें गायत्री तथा पापनाशके उपायोंमें भगवत्स्मरण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार अठारहों पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है ॥ ८६-८८ ॥ | | येन केनाप्युपायेन नवकृत्वः शृणोति चेत्।<br>न शक्यं तत्फलं वक्तुं जीवन्मुक्तः स एव हि ॥ ८९ | जिस किसी भी उपायसे यदि कोई मनुष्य इस महापुराणकी नौ आवृत्तियाँ सुन ले तो उसके फलका वर्णन नहीं किया जा सकता, वह तो जीवन्मुक्त ही हो जाता है ॥ ८९ ॥ | | राजशत्रुभये प्राप्ते महामारीभये तथा।<br>दुर्भिक्षे राष्ट्रभङ्गे च तच्छान्त्यै शृणुयादिदम् ॥ ९० | किसी शत्रु राजासे भय होनेपर, महामारीके समय, अकाल पड़नेपर तथा राष्ट्र-भंगके अवसरपर उसकी शान्तिके लिये यह पुराण सुनना चाहिये ॥ ९० ॥ | | भूतप्रेतविनाशाय राज्यलाभाय शत्रुतः।<br>पुत्रलाभाय शृणुयाद्देवीभागवतं द्विजाः ॥ ९१ | हे विप्रो! भूत-प्रेतादिके शमनके लिये, शत्रुसे राज्य प्राप्त करनेके लिये और पुत्र-प्राप्तिके लिये श्रीमद्देवीभागवतका श्रवण करना चाहिये ॥ ९१ ॥ | | श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।<br>श्लोकार्धं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम् ॥ ९२ | जो देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ९२ ॥ | | भगवत्या स्वयं देव्या श्लोकार्धेन प्रकाशितम्।<br>शिष्यप्रशिष्यद्वारेण तदेव विपुलीकृतम् ॥ ९३ | स्वयं भगवती जगदम्बाने इस पुराणको सर्वप्रथम केवल आधे श्लोकमें ही प्रकाशित किया, वही बादमें शिष्य-प्रशिष्योंके द्वारा देवीभागवतके रूपमें विस्तृत कर दिया गया ॥ ९३ ॥ | | न गायत्र्याः परो धर्मो न गायत्र्याः परं तपः।<br>न गायत्र्याः समो देवो न गायत्र्याः परो मनुः ॥ ९४ | गायत्रीसे बढ़कर न कोई धर्म है, न तप है, न कोई देवता है और न कोई मन्त्र ही है ॥ ९४ ॥ | | गातारं त्रायते यस्माद् गायत्री तेन सोच्यते।<br>सात्र भागवते देवी सरहस्या प्रतिष्ठिता ॥ ९५<br><br>अतो भागवतस्यास्य देव्याः प्रीतिकरस्य च।<br>महान्त्यपि पुराणानि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ९६ | भगवती अपना गुणगान करनेवालेकी रक्षा करती हैं, इसी कारणसे उन्हें गायत्री कहा जाता है। वे भगवती गायत्री इस पुराणमें अपने रहस्योंसहित विराजती हैं। अतः भगवतीको प्रसन्न करनेवाले इस देवीभागवतकी सोलहवीं कलाके समान भी अन्य महापुराण नहीं हो सकते ॥ ९५-९६ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 C
| ६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद् ब्राह्मणानां धनं<br>धर्मो धर्मसुतेन यत्र गदितो नारायणेनामलः।<br>गायत्र्याश्च रहस्यमत्र च मणिद्वीपश्च संवर्णितः<br>श्रीदेव्या हिमभूभृते भगवती गीता च गीता स्वयम्॥ ९७ | श्रीमद्देवीभागवतपुराण अत्यन्त निर्मल है। जो ब्राह्मणोंका अमूल्य धन है और जिसमें स्वयं धर्मपुत्र नारायणने पवित्र धर्मका वर्णन किया है। इसमें श्रीगायत्रीदेवीका रहस्य एवं मणिद्वीपका सम्यक् वर्णन किया गया है। साथ ही इसमें हिमालयके प्रति स्वयं भगवतीद्वारा कही गयी देवीगीता विद्यमान है॥ ९७॥ | | तस्मान्नास्य पुराणस्य लोकेऽन्यत्सदृशं परम्।<br>अतः सदैव संसेव्यं देवीभागवतं द्विजाः॥ ९८ | इस कारण हे विप्रो! इस महापुराणके सदृश दूसरा कोई उत्तम पुराण लोकमें नहीं है, अतः आपलोग सदा इस श्रीमद्देवीभागवतका भलीभाँति सेवन करें॥ ९८॥ | | यस्याः प्रभावमखिलं न हि वेद धाता<br>नो वा हरिर्न गिरिशो न हि चाप्यनन्तः।<br>अंशांशका अपि च ते किमुतान्यदेवा-<br>स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥ ९९ | जिनके सम्पूर्ण प्रभावको ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा भगवान् शेष भी भलीभाँति नहीं जान सकते जबकि वे उन्हींके अंशज भी हैं, तब दूसरे देवता उन्हें कैसे जान सकेंगे? उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा निरन्तर प्रणाम है॥ ९९॥ | | यत्पादपङ्कजरजः समवाप्य विश्वं<br>ब्रह्मा सृजत्यनुदिनञ्च बिभर्ति विष्णुः।<br>रुद्रश्च संहरति नेतरथा समर्था-<br>स्तस्यै नमोऽस्तु सततं जगदम्बिकायै॥ १०० | जिनके चरण-कमलोंकी धूलि पाकर ब्रह्मा समस्त संसारकी रचना करते हैं, भगवान् विष्णु निरन्तर पालन करते हैं और रुद्र संहार करते हैं; दूसरे किसी उपायसे वे अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ नहीं हो सकते—ऐसी उन भगवती जगदम्बिकाको मेरा सतत प्रणाम है॥ १००॥ | | सुधाकूपारान्तस्त्रिदशतरुवाटीविलसिते<br>मणिद्वीपे चिन्तामणिमयगृहे चित्ररुचिरे।<br>विराजन्तीमम्बां परशिवहृदि स्मेरवदनां<br>नरो ध्यात्वा भोगं भजति खलु मोक्षञ्च लभते॥ १०१ | अमृत-सागरके तटपर कल्पवृक्षकी वाटिकासे सुशोभित मणिद्वीपमें स्थित बहुवर्णचित्रित चिन्ता-मणिमय भवनमें तथा परम शिवके हृदयमें विराजमान रहनेवाली और मन्द-मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली जगदम्बाका ध्यान करके मनुष्य सांसारिक सुखोंका उपभोग करता है और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है॥ १०१॥ | | ब्रह्मेशाच्युतशक्राद्यैर्महर्षिभिरुपासिता ।<br>जगतां श्रेयसे सास्तु मणिद्वीपाधिदेवता॥ १०२ | इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र—आदि देवताओं एवं समस्त महर्षियोंद्वारा पूजित मणि-द्वीपनिवासिनी वे भगवती संसारका कल्याण करती रहें॥ १०२॥ |
इति श्रीस्कन्दपुराणे मानसखण्डे श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्ये देवीभागवत- श्रवणविधिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
~~ ० ~~
॥ समाप्तमिदं श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्॥
~~ ० ~~
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—3 D
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
[ पूर्वार्ध ]
प्रथमः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
महर्षि शौनकका सूतजीसे श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनानेकी प्रार्थना करना
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ॐ सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि।<br>बुद्धिं या नः प्रचोदयात्॥ १ | जो सर्वचेतनात्मकस्वरूपा, आदिशक्ति तथा ब्रह्मविद्या-स्वरूपिणी भगवती जगदम्बा हैं, उनका हम ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धिको प्रेरणा प्रदान करें॥ १॥ |
| शौनक उवाच<br>सूत सूत महाभाग धन्योऽसि पुरुषर्षभ।<br>यदधीतास्त्वया सम्यक् पुराणसंहिताः शुभाः॥ २<br>अष्टादश पुराणानि कृष्णेन मुनिनानघ।<br>कथितानि सुदिव्यानि पठितानि त्वयानघ॥ ३<br>पञ्चलक्षणयुक्तानि सरहस्यानि मानद।<br>त्वया ज्ञातानि सर्वाणि व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ ४ | **शौनक बोले—**हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा भाग्यवान् सूतजी! आप धन्य हैं; क्योंकि संसारमें अत्यन्त दुर्लभ पुराण-संहिताओं का आपने भलीभाँति अध्ययन किया है। हे पुण्यात्मन्! हे मानद! आपने कृष्णद्वैपायन व्यासरचित अठारह महापुराणोंका सम्यक् अध्ययन किया है, जो पंच लक्षणोंसे युक्त तथा गूढ रहस्योंसे समन्वित हैं और जिनका आपने सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे ज्ञान प्राप्त किया है॥ २–४॥ |
| अस्माकं पुण्ययोगेन प्राप्तस्त्वं क्षेत्रमुत्तमम्।<br>दिव्यं विश्वसनं पुण्यं कलिदोषविवर्जितम्॥ ५<br>समाजोऽयं मुनीनां हि श्रोतुकामोऽस्ति पुण्यदाम्।<br>पुराणसंहितां सूत ब्रूहि त्वं नः समाहितः॥ ६ | हमारे पुण्यसे ही आप इस उत्तम, मुनियोंके निवास-योग्य, दिव्य, पुण्यप्रद तथा कलिके दोषोंसे रहित क्षेत्रमें पधारे हुए हैं। हे सूतजी! मुनियोंका यह समुदाय परम पुण्यदायिनी पुराण-संहिताका श्रवण करना चाहता है। अतः आप समाहितचित्त होकर हमलोगोंसे उसका वर्णन कीजिये॥ ५-६॥ |
| दीर्घायुर्भव सर्वज्ञ तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम्॥ ७ | हे सर्वज्ञ! आप तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से रहित होकर दीर्घजीवी हों। हे महाभाग! ब्रह्मप्रतिपादक देवीभागवतमहापुराणका वर्णन करें॥ ७॥ |
| श्रोत्रेन्द्रिययुताः सूत नराः स्वादविचक्षणाः।<br>न शृण्वन्ति पुराणानि वञ्चिता विधिना हि ते॥ ८<br>यथा जिह्वेन्द्रियाह्लादः षड्रसैः प्रतिपद्यते।<br>तथा श्रोत्रेन्द्रियाह्लादो वचोभिः सुधियां स्मृतः॥ ९ | हे सूतजी! जो मनुष्य श्रवणेन्द्रिययुक्त होते हुए भी केवल जिह्वाके स्वादमें ही लगे रहते हैं और पुराणोंकी कथाएँ नहीं सुनते, वे निश्चित ही अभागे हैं। जैसे षड्रसके स्वादसे जिह्वाको आह्लाद होता है, वैसे विद्वज्जनोंके वचनोंसे कर्णेन्द्रियको आनन्द प्राप्त होता है॥ ८-९॥ |
| ७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| अश्रोत्राः फणिनः कामं मुह्यन्ति हि नभोगुणैः।<br>सकर्णा ये न शृण्वन्ति तेऽप्यकर्णाः कथं न च॥१० | जब कर्णहीन सर्प भी मधुर ध्वनि सुनकर मोहित हो जाते हैं, तब भला कर्णयुक्त मानव यदि कथा नहीं सुनते तो उन्हें बधिर क्यों न कहा जाय?॥१०॥ | | अतः सर्वे द्विजाः सौम्य श्रोतुकामाः समाहिताः।<br>वर्तन्ते नैमिषारण्ये क्षेत्रे कलिभयार्दिताः॥११ | अतः हे सौम्य! समाहितचित्त होकर कथा सुननेकी इच्छासे सभी द्विजगण कलिकालके भयसे पीड़ित हो इस नैमिषारण्यमें उपस्थित हैं॥११॥ | | येन केनाप्युपायेन कालातिवाहनं स्मृतम्।<br>व्यसनैरिह मूर्खाणां बुधानां शास्त्रचिन्तनैः॥१२ | जिस किसी प्रकारसे समय तो बीतता ही रहता है, किंतु मूर्खोंका समय व्यर्थ दुर्व्यसनोंमें बीतता है और विद्वानोंका समय शास्त्र-चिन्तनमें जाता है॥१२॥ | | शास्त्राण्यपि विचित्राणि जल्पवादयुतानि च।<br>(त्रिविधानि पुराणानि शास्त्राणि विविधानि च।<br>वितण्डाच्छलयुक्तानि गर्वामर्षकराणि च॥)<br>नानार्थवादयुक्तानि हेतुमन्ति बृहन्ति च॥१३ | शास्त्र भी विचित्र प्रकारके तर्क-वितर्कसे युक्त हैं। (पुराण तीन प्रकारके तथा शास्त्र विविध प्रकारके हैं, जो नानाविध वाद-विवाद तथा छल-प्रपंचसे युक्त हैं और अहंकार तथा अमर्ष उत्पन्न करनेवाले हैं) वे अनेक अर्थवाद तथा हेतुवादसे युक्त और बहुत विस्तारवाले हैं॥१३॥ | | सात्त्विकं तत्र वेदान्तं मीमांसा राजसं मतम्।<br>तामसं न्यायशास्त्रं च हेतुवादाभियन्त्रितम्॥१४ | उन शास्त्रोंमें वेदान्तशास्त्र सात्त्विक, मीमांसा राजस तथा न्यायशास्त्र तामस कहा गया है; क्योंकि वह हेतुवादसे परिपूर्ण है॥१४॥ | | तथैव च पुराणानि त्रिगुणानि कथानकैः।<br>कथितानि त्वया सौम्य पञ्चलक्षणवन्ति च॥१५ | इसी प्रकार हे सौम्य! आपके द्वारा कहे गये पुराण कथा-भेदसे तीन गुणोंवाले तथा पाँच लक्षणोंसे समन्वित हैं॥१५॥ | | तत्र भागवतं पुण्यं पञ्चमं वेदसम्मितम्।<br>कथितं यत्त्वया पूर्वं सर्वलक्षणसंयुतम्॥१६ | आपने यह भी बताया है कि उन पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवत पाँचवाँ पुराण है, पवित्र है, वेदके समान है और सभी लक्षणोंसे युक्त है॥१६॥ | | उद्देशमात्रेण तदा कीर्तितं परमाद्भुतम्।<br>मुक्तिप्रदं मुमुक्षूणां कामदं धर्मदं तथा॥१७<br><br>विस्तरेण तदाख्याहि पुराणोत्तममादरात्।<br>श्रोतुकामा द्विजाः सर्वे दिव्यं भागवतं शुभम्॥१८ | उस समय आपने प्रसंगवश अत्यन्त अद्भुत, मुमुक्षुजनोंके लिये मुक्तिप्रद, मनोरथ पूर्ण करनेवाले, धर्ममें रुचि उत्पन्न करनेवाले जिस पुराणको संक्षेपमें कहा था, उस उत्तम पुराणको विस्तारपूर्वक कहिये। उस दिव्य तथा कल्याणमय श्रीमद्देवीभागवतपुराणको हम सभी द्विजगण आदरपूर्वक सुननेकी इच्छा रखते हैं॥१७-१८॥ | | त्वं तु जानासि धर्मज्ञ पौराणीं संहितां किल।<br>कृष्णोक्तां गुरुभक्तत्वात् सम्यक् सत्त्वगुणाश्रयः॥१९ | हे धर्मज्ञ! गुरुभक्त एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न होनेके कारण आप कृष्णद्वैपायनके द्वारा कही गयी इस प्राचीन संहिताका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं॥१९॥ | | श्रुतान्यन्यानि सर्वज्ञ त्वन्मुखान्निःसृतानि च।<br>नैव तृप्तिं व्रजामोऽद्य सुधापानेऽमरा यथा॥२० | जिस प्रकार देवतालोग अमृतपान करते हुए तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार हमलोगोंने भी यहाँ आपके मुखारविन्दसे निकली अन्यान्य कथाएँ सुनीं, किंतु अभी भी हम तृप्त नहीं हुए हैं॥२०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शौनकप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
| अ० २ ] | प्रथम स्कन्ध | ७१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| धिक्सुधां पिबतां सूत मुक्तिर्नैव कदाचन।<br>पिबन्भागवतं सद्यो नरो मुच्येत सङ्कटात् ॥ २१ | हे सूतजी! उस अमृतको धिक्कार है, जिसके पीनेसे कभी मुक्ति नहीं होती, परंतु इस भागवतरूपी कथा-सुधाके पानसे तो मनुष्य शीघ्र ही भवसंकटसे मुक्त हो जाता है॥ २१॥ |
| सुधापाननिमित्तं यत् कृता यज्ञाः सहस्रशः।<br>न शान्तिमधिगच्छामः सूत सर्वात्मना वयम् ॥ २२<br><br>मखानां हि फलं स्वर्गः स्वर्गात्प्रच्यवनं पुनः।<br>एवं संसारचक्रेऽस्मिन्भ्रमणं च निरन्तरम् ॥ २३ | हे सूतजी! अमृतपानके लिये जो हजारों प्रकारके यज्ञ किये गये हैं, उनसे भी सर्वदाके लिये हमें शान्ति नहीं मिली। यज्ञोंका फल तो केवल स्वर्ग है, [पुण्य क्षीण होनेपर] पुनः स्वर्गसे मृत्युलोकमें लौटना ही पड़ता है। इस प्रकार निरन्तर आवागमनके चक्रमें आना-जाना लगा रहता है॥ २२-२३॥ |
| विना ज्ञानेन सर्वज्ञ नैव मुक्तिः कदाचन।<br>भ्रमतां कालचक्रेऽत्र नराणां त्रिगुणात्मके ॥ २४<br><br>अतः सर्वरसोपेतं पुण्यं भागवतं वद।<br>पावनं मुक्तिदं गुह्यं मुमुक्षूणां सदा प्रियम् ॥ २५ | हे सर्वज्ञ! त्रिगुणात्मक कालचक्रमें भ्रमण करते हुए मनुष्योंकी ज्ञानके बिना मुक्ति कदापि सम्भव नहीं है। इसलिये सब प्रकारके रसोंसे परिपूर्ण तथा पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवतपुराण कहिये; जो पवित्र, मुक्तिदायक, गोपनीय तथा मुमुक्षुजनोंको सर्वदा प्रिय है॥ २४-२५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शौनकप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
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अथ द्वितीयोऽध्यायः
सूतजीद्वारा श्रीमद्देवीभागवतके स्कन्ध, अध्याय तथा श्लोकसंख्याका निरूपण और उसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| धन्योऽहमतिभाग्योऽहं पावितोऽहं महात्मभिः।<br>यत्पृष्टं सुमहत्पुण्यं पुराणं वेदविश्रुतम् ॥ १ | [हे मुनिजनो!] मैं धन्य और महान् भाग्यशाली हूँ, जो कि आप महात्माओंने वेदविश्रुत तथा अत्यन्त पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणके सम्बन्धमें प्रश्न करके मुझे पवित्र बना दिया॥ १॥ |
| तदहं सम्प्रवक्ष्यामि सर्वश्रुत्यर्थसम्मतम्।<br>रहस्यं सर्वशास्त्राणामागमानामनुत्तमम् ॥ २ | इसलिये मैं सभी वेदोंके तात्पर्यसे युक्त, सभी शास्त्रों और आगमोंके रहस्यरूप सर्वोत्तम श्रीमद्देवी-भागवतपुराणको आपलोगोंसे कहता हूँ॥ २॥ |
| नत्वा तत्पदपङ्कजं सुललितं मुक्तिप्रदं योगिनां<br>ब्रह्माद्यैरपि सेवितं स्तुतिपरैर्ध्येयं मुनीन्द्रैः सदा।<br>वक्ष्याम्यद्य सविस्तरं बहुरसं श्रीमत्पुराणोत्तमं<br>भक्त्या सर्वरसालयं भगवतीनाम्ना प्रसिद्धं द्विजाः ॥ ३ | हे द्विजगण! ब्रह्मा-विष्णु-महेशसे सेवित, स्तुतिपरायण मुनिजनोंके सतत ध्यान करनेयोग्य तथा योगियोंको मुक्ति देनेवाले भगवतीके सुन्दर एवं कोमल चरणकमलोंमें प्रणाम करके मैं अब उस उत्तम पुराणका भक्तिपूर्वक विस्तारसे वर्णन करूँगा; जो सभी रसोंसे युक्त, शोभासम्पन्न, सभी रसोंका निधान एवं श्रीमद्देवीभागवतके नामसे प्रसिद्ध है॥ ३॥ |
७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २
| या विद्येत्यभिधीयते श्रुतिपथे शक्तिः सदाद्या परा<br>सर्वज्ञा भवबन्धच्छित्तिनिपुणा सर्वाशये संस्थिता।<br>दुर्ज्ञेया सुदुरात्मभिश्च मुनिभिर्ध्यानास्पदं प्रापिता<br>प्रत्यक्षा भवतीह सा भगवती सिद्धिप्रदा स्यात्सदा॥ ४ | वैदिक मार्गानुसार जिसे ‘विद्या’ कहते हैं, जो सर्वदा ‘आदिशक्ति’ कही जाती हैं, जिन्हें योगीलोग ‘पराशक्ति’ भी कहते हैं; जो सर्वज्ञ, भवबन्धन काटनेमें निपुण हैं तथा जो सबके हृदयदेशमें विराजती रहती हैं और दुरात्मा प्राणी जिन्हें नहीं जान सकते, मुनियोंके ध्यान करनेपर जो शीघ्र प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं, वे भगवती सर्वदा सिद्धिदायिनी बनी रहें॥ ४॥ |
| सृष्ट्वाखिलं जगदिदं सदसत्स्वरूपं<br>शक्त्या स्वया त्रिगुणया परिपाति विश्वम्।<br>संहृत्य कल्पसमये रमते तथैका<br>तां सर्वविश्वजननीं मनसा स्मरामि॥ ५ | जो सत्-असत्रूप उस जगत्की सृष्टि करके अपनी त्रिगुणात्मिका (सत्त्व, रज, तम) शक्तिद्वारा उसका पालन करती तथा प्रलयान्तमें उसका संहार करके अकेली स्वयं लीलारमण करती हैं, उन समस्त विश्वकी जननी भगवतीका मैं मन-ही-मन स्मरण करता हूँ॥ ५॥ |
| ब्रह्मा सृजत्यखिलमेतदिति प्रसिद्धं<br>पौराणिकैश्च कथितं खलु वेदविद्भिः।<br>विष्णोस्तु नाभिकमले किल तस्य जन्म<br>तैरूक्तमेव सृजते न हि स स्वतन्त्रः॥ ६ | यह संसारमें प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा ही इस सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा हैं, साथ ही सभी वेदज्ञ तथा पुराणवेत्ता भी यही कहते हैं। उनका यह भी कथन है कि भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ही उन ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई है, जो स्वतन्त्र नहीं हैं, अपितु विष्णुकी प्रेरणासे ही वे संसारकी सृष्टि करते हैं॥ ६॥ |
| विष्णुस्तु शेषशयने स्वपितीति काले<br>तन्नाभिपद्ममुकुले खलु तस्य जन्म।<br>आधारतां किल गतोऽत्र सहस्रमौलिः<br>सम्बोध्यातां स भगवान् हि कथं मुरारिः॥ ७ | जब कल्पान्तमें सर्वत्र जलमय हो जाता है, तब केवल शेषशय्यापर भगवान् विष्णु शयन करते हैं और उन्हींके नाभिकमलसे ब्रह्माका आविर्भाव होता है। इस प्रकार जब सहस्र फणवाले शेष ही विष्णुके आधार हैं, तो फिर उन मुरारिको भी सर्वाधार भगवान् कैसे कहा जाय?॥ ७॥ |
| एकार्णवस्य सलिलं रसरूपमेव<br>पात्रं विना न हि रसस्थितिरस्ति कच्चित्।<br>या सर्वभूतविषये किल शक्तिरूपा<br>तां सर्वभूतजननीं शरणं गतोऽस्मि॥ ८ | प्रलयकालीन समुद्रका जल भी तो रसरूप ही है और बिना पात्र रस कहीं ठहर नहीं सकता। अतएव जो सब प्राणियोंमें शक्तिरूपसे विराजती रहती हैं, मैं उन सम्पूर्ण संसारकी जननी आदिशक्ति भगवतीकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ८॥ |
| योगनिद्रामीलिताक्षं विष्णुं दृष्ट्वाम्बुजे स्थितः।<br>अजस्तुष्टाव यां देवीं तामहं शरणं गतः॥ ९ | योगनिद्रामें लीन भगवान् विष्णुको देखकर उनके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माने जिन देवीकी स्तुति की थी, मैं उन्हीं पराशक्ति भगवतीके शरणागत हूँ॥ ९॥ |
| तां ध्यात्वा सगुणां मायां मुक्तिदां निर्गुणां तथा।<br>वक्ष्ये पुराणमखिलं शृण्वन्तु मुनयस्त्विह॥ १० | हे मुनिजनो! उन्हीं निर्गुण तथा सगुण रूपवाली तथा मुक्तिदायिनी योगमायाका ध्यान करके मैं यहाँ सम्पूर्ण देवीभागवतपुराण कह रहा हूँ; आपलोग सुनिये॥ १०॥ |
अ० २ ] प्रथम स्कन्ध ७३
अ० २ ] प्रथम स्कन्ध ७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुराणमुत्तमं पुण्यं श्रीमद्भागवताभिधम्।<br>अष्टादश सहस्राणि श्लोकास्तत्र तु संस्कृताः ॥ ११<br>स्कन्धा द्वादश चैवात्र कृष्णेन विहिताः शुभाः।<br>त्रिशतं पूर्णमध्याया अष्टादशयुताः स्मृताः ॥ १२<br>विंशतिः प्रथमे तत्र द्वितीये द्वादशैव तु।<br>त्रिंशच्चैव तृतीये तु चतुर्थे पञ्चविंशतिः ॥ १३<br>पञ्चत्रिंशत्तथाध्यायाः पञ्चमे परिकीर्तिताः।<br>एकत्रिंशत्तथा षष्ठे चत्वारिंशाच्च सप्तमे ॥ १४<br>अष्टमे तत्त्वसङ्ख्याश्च पञ्चाशन्नवमे तथा।<br>त्रयोदश तु सम्प्रोक्ता दशमे मुनिना किल ॥ १५<br>तथा चैकादशस्कन्धे चतुर्विंशतिरीरिताः।<br>चतुर्दशैव चाध्याया द्वादशे मुनिसत्तमाः ॥ १६ | यह श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण अत्यन्त पवित्र एवं उत्तम है। इसमें अठारह हजार सुन्दर श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायनद्वारा विरचित इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणमें कल्याणकारी बारह स्कन्ध तथा कुल तीन सौ अठारह अध्याय बताये गये हैं। उनमें प्रथम स्कन्धमें बीस अध्याय, द्वितीयमें बारह, तृतीयमें तीस और चतुर्थमें पच्चीस अध्याय हैं। पंचम स्कन्धमें पैंतीस अध्याय, षष्ठमें इकतीस, सप्तममें चालीस, अष्टममें तत्त्व-संख्या* के बराबर अर्थात् चौबीस, नवममें पचास और दशम स्कन्धमें तेरह अध्याय मुनि व्यासजीने कहे हैं। इसी प्रकार हे मुनिगण! एकादश स्कन्धमें चौबीस और द्वादश स्कन्धमें चौदह अध्याय बताये गये हैं॥ ११—१६॥ |
| एवं सङ्ख्या समाख्याता पुराणेऽस्मिन्महात्मना।<br>अष्टादशसहस्रीया सङ्ख्या च परिकीर्तिता ॥ १७ | इस प्रकार महात्मा व्यासजीने इस महापुराणमें अध्यायोंकी संख्या बतायी है। इसमें श्लोकोंकी संख्या अठारह हजार कही गयी है॥ १७॥ |
| सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ १८ | सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश-वर्णन, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित—इस प्रकार पुराणोंके ये पाँच लक्षण हैं॥ १८॥ |
| निर्गुणा या सदा नित्या व्यापिका विकृता शिवा।<br>योगगम्याखिलाधारा तुरीया या च संस्थिता ॥ १९<br>तस्यास्तु सात्त्विकी शक्ती राजसी तामसी तथा।<br>महालक्ष्मीः सरस्वती महाकालीति ताः स्त्रियः ॥ २० | जो कल्याणमयी भगवती नित्या, निर्गुणा, व्यापकरूपसे सृष्टिमें स्थित रहनेवाली, विकाररहित, योगगम्या, सबकी आधाररूपा तथा तुरीयावस्थामें प्रतिष्ठित हैं; उन्हींकी सात्त्विकी, राजसी और तामसी शक्तियाँ महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली नामक देवियोंके रूपमें प्रकट होती हैं॥ १९-२०॥ |
| तासां तिसृणां शक्तीनां देहाङ्गीकारलक्षणः।<br>सृष्ट्यर्थं च समाख्यातः सर्गः शास्त्रविशारदैः ॥ २१ | उन्हीं तीनों शक्तियोंका सृष्टिके लिये शरीर धारण करना ही शास्त्रके विद्वानोंके द्वारा 'सर्ग' कहा गया है॥ २१॥ |
| हरिद्रुहिणरुद्राणां समुत्पत्तिस्ततः स्मृता।<br>पालनोत्पत्तिनाशार्थं प्रतिसर्गः स्मृतो हि सः ॥ २२ | तदनन्तर जगत्के सृजन, पालन तथा संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी उत्पत्ति कही गयी है; और उसे ही प्रतिसर्ग बताया गया है॥ २२॥ |
| सोमसूर्योद्भवानां च राज्ञां वंशप्रकीर्तनम्।<br>हिरण्यकशिप्वादीनां वंशास्ते परिकीर्तिताः ॥ २३<br>स्वायम्भुवमुखानां च मनूनां परिवर्णनम्।<br>कालसङ्ख्या तथा तेषां तत्तन्मन्वन्तराणि च ॥ २४<br>तेषां वंशानुकथनं वंशानुचरितं स्मृतम्।<br>पञ्चलक्षणयुक्तानि भवन्ति मुनिसत्तमाः ॥ २५ | चन्द्रवंशी, सूर्यवंशी राजाओंके वंशवर्णन तथा हिरण्यकशिपु आदि दैत्योंके वंशकथनको 'वंश' कहा गया है; इसी प्रकार स्वायम्भुव आदि चौदह मनुओंका वर्णन एवं उनके समय-विभाग मन्वन्तर कहलाते हैं। उन मनुओंके वंशका क्रमशः वर्णन करना ही 'वंशानुचरित' कहा गया है। हे मुनिवरो! इस प्रकार सभी पुराण उपर्युक्त पाँचों लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ २३—२५॥ |
* सांख्यशास्त्रमें प्रकृति, महत्, अहंकार आदि चौबीस तत्त्व माने जाते हैं।
| ७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सपादलक्षं च तथा भारतं मुनिना कृतम्।<br>इतिहास इति प्रोक्तं पञ्चमं वेदसम्मतम्॥ २६ | सवा लाख श्लोकोंका महाभारत नामक ग्रन्थ भी व्यासजीने ही रचा है; यह ‘इतिहास’ कहलाता है—जो वेदसम्मत होनेके कारण पाँचवाँ वेद कहा गया है॥ २६॥ |
| शौनक उवाच<br>कानि तानि पुराणानि ब्रूहि सूत सविस्तरम्।<br>कतिसङ्ख्यानि सर्वज्ञ श्रोतुकामा वयं त्विह॥ २७ | शौनकजी बोले— हे सूतजी! वे पुराण कौन-कौनसे हैं और कितने हैं? हमलोगोंको सुननेकी उत्कट इच्छा है और आप सर्वज्ञ हैं, अतः विस्तारसे बताइये॥ २७॥ |
| कलिकालविभीताः स्मो नैमिषारण्यवासिनः।<br>ब्रह्मणात्र समादिष्टाश्चक्रं दत्त्वा मनोमयम्॥ २८<br><br>कथितं तेन नः सर्वानगच्छन्त्वेतस्य पृष्ठतः।<br>नेमिः संशीर्यते यत्र स देशः पावनः स्मृतः॥ २९<br><br>कलेस्तत्र प्रवेशो न कदाचित् सम्भविष्यति।<br>तावत्तिष्ठन्तु तत्रैव यावत्सत्ययुगं पुनः॥ ३० | कलिकालसे भयभीत हम ब्राह्मण नैमिषारण्यमें ही रहते हैं। ब्रह्माजीने मनोमय चक्र हमें देकर यह आदेश दिया था कि इसी चक्रके पीछे-पीछे आपलोग जायँ। जहाँ इस चक्रकी नेमि शीर्ण हो जाय, वह देश परम पवित्र कहा गया है। वहाँ कभी कलियुगका प्रवेश नहीं होगा। आपलोग वहाँ तबतक रहें, जबतक पुनः ‘सत्ययुग’ न आ जाय॥ २८–३०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गृहीत्वा तत्कथानकम्।<br>चालयन्निर्गतस्तूर्णं सर्वदेशदिदृक्षया॥ ३१ | उनका वह वचन सुनकर तथा उनकी बातोंको हृदयमें रखकर हमलोग सब देशोंके दर्शनार्थ उस मनोमय चक्रके पीछे-पीछे तत्काल चल दिये॥ ३१॥ |
| प्रेत्यात्र चालयंश्चक्रं नेमिः शीर्णोऽत्र पश्यतः।<br>तेनेदं नैमिषं प्रोक्तं क्षेत्रं परमपावनम्॥ ३२ | चलते-चलते इसी स्थानपर पहुँचकर उस चक्रकी नेमि हमलोगोंके देखते-देखते शीर्ण हो गयी। तभीसे यह स्थान परम पवित्र ‘नैमिषक्षेत्र’ के नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ ३२॥ |
| कलिप्रवेशो नैवात्र तस्मात्स्थानं कृतं मया।<br>मुनिभिः सिद्धसङ्घैश्च कलिभीतैर्महात्मभिः॥ ३३ | यहाँ कभी कलिको प्रवेश नहीं होता। इसीलिये मैंने अनेक ऋषि-मुनियों, सिद्धगणों एवं कलिसे भयभीत महात्माओंके साथ यहाँ अपना निवास बना लिया है॥ ३३॥ |
| पशुहीनाः कृता यज्ञाः पुरोडाशादिभिः किल।<br>कालातिवाहनं कार्यं यावत्सत्ययुगागमः॥ ३४ | हमलोगों ने यहाँपर चरु-पुरोडाश आदिद्वारा अनेक पशुवध-विहीन यज्ञ किये हैं। जबतक सत्ययुग न आ जाय तबतक हमलोगोंका यहीं रहनेका दृढ़ निश्चय है॥ ३४॥ |
| भाग्ययोगेन सम्प्राप्तः सूत त्वं चात्र सर्वथा।<br>कथयाद्य पुराणं हि पावनं ब्रह्मसम्मतम्॥ ३५ | हे सूतजी! आप निश्चितरूपसे हमलोगोंके सौभाग्यसे ही यहाँ आ पहुँचे हैं। इसलिये आप इस ब्रह्मसम्मत पावन पुराणकी कथा कहिये॥ ३५॥ |
| सूत शुश्रूषवः सर्वे वक्ता त्वं मतिमानथ।<br>निर्व्यापारा वयं नूनमेकचित्तास्तथैव च॥ ३६ | हे सूतजी! हमलोगोंको सुननेकी उत्कट इच्छा है और आप-जैसे बुद्धिमान् वक्ता भी प्राप्त हैं। हमलोग भी अपना सभी कार्य त्यागकर चित्त एकाग्र करके यहाँ स्थित हैं॥ ३६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे ग्रन्थसंख्याविषयवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
| अ० ३ ] | प्रथम स्कन्ध | ७५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| त्वं सूत भव दीर्घायुस्तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य पुराणं हि पुण्यं भागवतं शिवम्॥ ३७<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां वर्णनं विधिपूर्वकम्।<br>विद्यां प्राप्य तया मोक्षः कथितो मुनिना किल॥ ३८ | अतः हे सूतजी! आप चिरंजीवी हों तथा तीनों प्रकारके तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से मुक्त रहकर अब हमलोगोंको परम पवित्र तथा कल्याणकारी श्रीमद्देवी-भागवतपुराण सुनाइये; जिसमें धर्म, अर्थ और कामका विधिवत् वर्णन किया गया है। महर्षि व्यासने भी बताया है कि इसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करके पुनः उससे मुक्ति मिलती है॥ ३७-३८॥ |
| द्वैपायनेन मुनिना कथितं यच्च पावनम्।<br>न तृप्यामो वयं सूत कथां श्रुत्वा मनोरमाम्॥ ३९ | हे सूतजी! महर्षि वेदव्यासने जिस पवित्र पुराणको कहा है, उसके मनोहर कथा-चरित्रोंको सुननेसे हमारी कभी तृप्ति नहीं होती है॥ ३९॥ |
| सकलगुणगणानामेकपात्रं पवित्र-<br>मखिलभुवनमातुर्नाट्यवद्यद्विचित्रम् ।<br>निखिलमलगणानां नाशकत्कामदं<br>प्रकटय भगवत्या नामयुक्तं पुराणम्॥ ४० | सभी गुणोंका एकमात्र स्थान, परम पवित्र, समस्त संसारकी जननी भगवतीके लीलानाट्यके समान विचित्र, सभी पापसमूहोंका नाश करनेवाले तथा सब प्रकारकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाले तथा भगवतीके नामसे समन्वित श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणको प्रकट कीजिये॥ ४०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे ग्रन्थसंख्याविषयवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
सूतजीद्वारा पुराणोंके नाम तथा उनकी श्लोकसंख्याका कथन, उपपुराणों तथा प्रत्येक द्वापरयुगके व्यासोंका नाम
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु सम्प्रवक्ष्यामि पुराणानि मुनीश्वराः।<br>यथाश्रुतानि तत्त्वेन व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ १ | सूतजी बोले—हे मुनीश्वरवृन्द! सत्यवती-सुत वेद-व्यासजीसे मैंने जिस प्रकार तत्त्वपूर्वक पुराणोंको सुना है, उसे मैं आपलोगोंसे कहता हूँ, सुनिये॥ १॥ |
| मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।<br>अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्॥ २ | उनमें दो ‘म’ वाले (मत्स्यपुराण, मार्कण्डेयपुराण), दो ‘भ’ वाले (भविष्यपुराण तथा भागवत), तीन ‘ब्र’ वाले (ब्रह्म, ब्रह्माण्ड और ब्रह्मवैवर्तपुराण), चार ‘व’ वाले (वामन, विष्णु, वायु और वाराहपुराण), ‘अ’ वाला (अग्निपुराण), ‘ना’ वाला (नारदपुराण), ‘प’ वाला (पद्मपुराण), ‘लिं’ वाला (लिंगपुराण), ‘ग’ वाला (गरुडपुराण), ‘कू’ वाला (कूर्मपुराण), ‘स्क’ वाला (स्कन्दपुराण)—ये पृथक्-पृथक् (अठारह) पुराण हैं॥ २॥ |
| ७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चतुर्दशसहस्रं च मत्स्यमाद्यं प्रकीर्तितम्।<br>तथा ग्रहसहस्रं तु मार्कण्डेयं महाद्भुतम्॥ ३<br>चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च।<br>भविष्यं परिसंख्यातं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४ | उनमें आदिके मत्स्यपुराणमें चौदह हजार, अत्यन्त अद्भुत मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा भविष्यपुराणमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक-संख्या तत्त्वदर्शी मुनियोंने बतायी है॥ ३-४॥ |
| अष्टादशसहस्रं वै पुण्यं भागवतं किल।<br>तथा चायुतसंख्याकं पुराणं ब्रह्मसंज्ञकम्॥ ५<br>द्वादशैव सहस्राणि ब्रह्माण्डं च शताधिकम्।<br>तथाष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमेव च॥ ६ | पवित्र भागवतपुराणमें अठारह हजार और ब्रह्म-पुराणमें दस हजार श्लोक हैं। ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार एक सौ तथा ब्रह्मवैवर्तपुराणमें अठारह हजार श्लोक हैं॥ ५-६॥ |
| अयुतं वामनाख्यं च वायव्यं षट्शतानि च।<br>चतुर्विंशतिसंख्यातः सहस्राणि तु शौनक॥ ७<br>त्रयोविंशतिसाहस्रं वैष्णवं परमाद्भुतम्।<br>चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं परमाद्भुतम्॥ ८<br>षोडशैव सहस्राणि पुराणं चाग्निसंज्ञितम्।<br>पञ्चविंशतिसाहस्रं नारदं परमं मतम्॥ ९ | हे शौनक! वामनपुराणमें दस हजार तथा वायुपुराणमें चौबीस हजार छः सौ श्लोक हैं। उस परम विचित्र विष्णुपुराणमें तेईस हजार, वाराहपुराणमें चौबीस हजार, अग्निपुराणमें सोलह हजार तथा नारद-पुराणमें पचीस हजार श्लोक कहे गये हैं॥ ७-९॥ |
| पञ्चपञ्चाशतसाहस्रं पाद्माख्यं विपुलं मतम्।<br>एकादशसहस्राणि लैङ्गाख्यं चातिविस्तृतम्॥ १०<br>एकोनविंशत्साहस्रं गारुडं हरिभाषितम्।<br>सप्तदशसहस्रं च पुराणं कूर्मभाषितम्॥ ११ | विशाल पद्मपुराणमें पचपन हजार और लिंगपुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं। इसी प्रकार साक्षात् भगवान्के द्वारा कहे हुए गरुडपुराणमें उन्नीस हजार तथा कूर्मपुराणमें सत्रह हजार श्लोक हैं॥ १०-११॥ |
| एकाशीतिसहस्राणि स्कान्दाख्यं परमाद्भुतम्।<br>पुराणाख्या च संख्या च विस्तरेण मयानघाः॥ १२ | परम विचित्र स्कन्दपुराणमें इक्यासी हजार श्लोक कहे गये हैं। हे पापरहित मुनियो! इस प्रकार मैंने पुराणों तथा उनके श्लोकोंकी संख्या विस्तारपूर्वक बता दी॥ १२॥ |
| तथैवोपपुराणानि शृण्वन्तु ऋषिसत्तमाः।<br>सनत्कुमारं प्रथमं नारसिंहं ततः परम्॥ १३<br>नारदीयं शिवं चैव दौर्वाससमनुत्तमम्।<br>कापिलं मानवं चैव तथा चौशनसं स्मृतम्॥ १४<br>वारुणं कालिकाख्यं च साम्बं नन्दिकृतं शुभम्।<br>सौरं पाराशरप्रोक्तमादित्यं चातिविस्तरम्॥ १५<br>माहेश्वरं भागवतं वासिष्ठं च सविस्तरम्।<br>एतान्युपपुराणानि कथितानि महात्मभिः॥ १६ | हे मुनिवरो! अब उपपुराणोंकी भी संख्या सुनिये। उनमें सर्वप्रथम उपपुराण सनत्कुमार है, तत्पश्चात् नरसिंह, नारदीय, शिव, दुर्वासा, कपिल, मनु, उशना, वरुण, कालिका, साम्ब, नन्दी, सौर, पराशर, आदित्य, माहेश्वर, भागवत तथा अठारहवाँ वासिष्ठ—ये सब उपपुराण महात्माओंद्वारा बताये गये हैं॥ १३-१६॥ |
| अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>भारताख्यानमतुलं चक्रे तदुपबृंहितम्॥ १७ | सत्यवतीतनय वेदव्यासजीने अठारह पुराणोंकी रचना करनेके बाद उन्हीं विषयोंसे विस्तारपूर्वक उस अतुलनीय 'महाभारत' का प्रणयन किया॥ १७॥ |
| मन्वन्तरेषु सर्वेषु द्वापरे द्वापरे युगे।<br>प्रादुःकरोति धर्मार्थी पुराणानि यथाविधि॥ १८<br>द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपेण सर्वदा।<br>वेदमेकं स बहुधा कुरुते हितकाम्यया॥ १९ | प्रत्येक द्वापरयुगमें भगवान् वेदव्यासजी ही धर्मरक्षार्थ पुराणोंकी यथाविधि रचना करते रहते हैं। जब-जब द्वापरयुग आता है, तब-तब साक्षात् भगवान् विष्णु ही व्यासजीके रूपमें अवतीर्ण होकर सर्वलोकहितार्थ वेदके अनेक भेदोपभेद करते हैं॥ १८-१९॥ |
अ० ३ ] प्रथम स्कन्ध ७७
अ० ३ ] प्रथम स्कन्ध ७७
| श्लोक | अर्थ |
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| अल्पायुषोऽल्पबुद्धींश्च विप्रान् ज्ञात्वा कलावथ।<br>पुराणसंहितां पुण्यां कुरुतेऽसौ युगे युगे॥ २० | विशेषकर कलियुगमें ब्राह्मणोंको अल्पायु एवं अल्पबुद्धि जानकर वे युग-युगमें पवित्र पुराण-संहिताओंका निर्माण करते हैं॥ २०॥ |
| स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां न वेदश्रवणं मतम्।<br>तेषामेव हितार्थाय पुराणानि कृतानि च॥ २१ | स्त्रियों, शूद्रों तथा भ्रष्ट द्विजातियोंको वेद-श्रवणका अधिकार नहीं है, इसलिये उनके कल्याणके लिये व्यासजीने पुराणोंकी रचना की है॥ २१॥ |
| मन्वन्तरे सप्तमेऽत्र शुभे वैवस्वताभिधे।<br>अष्टाविंशतिमे प्राप्ते द्वापरे मुनिसत्तमाः॥ २२<br>व्यासः सत्यवतीसूनुर्गुरुर्मे धर्मवित्तमः।<br>एकोनत्रिंशत्संप्राप्ते द्रौणिर्व्यासो भविष्यति॥ २३<br>अतीतास्तु तथा व्यासाः सप्तविंशतिरेव च।<br>पुराणसंहितास्तैस्तु कथितास्तु युगे युगे॥ २४ | हे श्रेष्ठ मुनिगण! इस वैवस्वत नामक शुभ सातवें मन्वन्तरके अट्ठाइसवें द्वापरयुगमें परम धर्मनिष्ठ सत्यवतीपुत्र मेरे गुरु श्रीव्यासजी हुए और उनतीसवें द्वापरमें द्रौणि नामके व्यास होंगे। इनके पूर्व भी सत्ताईस व्यास हो चुके हैं, जिन्होंने प्रत्येक युगमें अनेक पुराण-संहिताएँ रची हैं॥ २२–२४॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>ब्रूहि सूत महाभाग व्यासाः पूर्वयुगोद्भवाः।<br>वक्तारस्तु पुराणानां द्वापरे द्वापरे युगे॥ २५ | ऋषियोंने कहा— हे महाभाग सूतजी! अब आप पूर्वकालमें प्रत्येक द्वापरयुगमें अवतीर्ण हुए पुराणवक्ता व्यासोंकी कथा कहिये॥ २५॥ |
| सूत उवाच<br>द्वापरे प्रथमे व्यस्ताः स्वयं वेदाः स्वयम्भुवा।<br>प्रजापतिर्द्वितीये तु द्वापरे व्यासकार्यकृत्॥ २६<br>तृतीये चोशना व्यासश्चतुर्थे तु बृहस्पतिः।<br>पञ्चमे सविता व्यासः षष्ठे मृत्युस्तथापरे॥ २७ | सूतजी बोले— सृष्टिके बाद सर्वप्रथम द्वापरयुगमें स्वयं ब्रह्माजीने ही 'व्यास' के रूपमें प्रकट होकर वेदोंका विभाजन किया। दूसरे द्वापरमें 'प्रजापति' व्यास बने, तीसरे द्वापरमें 'शुक्राचार्य', चौथे द्वापरमें 'बृहस्पति', पाँचवेंमें 'सूर्य' तथा छठेमें 'यमराज' ही साक्षात् व्यास बने थे॥ २६–२७॥ |
| मघवा सप्तमे प्राप्ते वसिष्ठस्त्वष्टमे स्मृतः।<br>सारस्वतस्तु नवमे त्रिधामा दशमे तथा॥ २८ | सातवें द्वापरमें 'इन्द्र', आठवेंमें 'वसिष्ठमुनि', नवेंमें 'सारस्वत' और दसवें द्वापरमें 'त्रिधामाजी' व्यास हुए॥ २८॥ |
| एकादशेऽथ त्रिवृषो भरद्वाजस्ततः परम्।<br>त्रयोदशे चान्तरिक्षो धर्मश्चापि चतुर्दशे॥ २९ | ग्यारहवेंमें 'त्रिवृष', बारहवेंमें 'भरद्वाजमुनि', तेरहवेंमें 'अन्तरिक्ष' और चौदहवें द्वापरमें 'धर्मराज' स्वयं व्यास बने॥ २९॥ |
| त्रय्यारुणिः पञ्चदशे षोडशे तु धनञ्जयः।<br>मेधातिथिः सप्तदशे व्रती ह्यष्टादशे तथा॥ ३० | पन्द्रहवें द्वापरमें 'त्रय्यारुणि', सोलहवेंमें 'धनंजय', सत्रहवेंमें 'मेधातिथि' तथा अठारहवें द्वापरमें 'व्रतीमुनि' व्यास हुए॥ ३०॥ |
| अत्रिरेकोनविंशेऽथ गौतमस्तु ततः परम्।<br>उत्तमश्चैकविंशेऽथ हर्यात्मा परिकीर्तितः॥ ३१ | उन्नीसवेंमें 'अत्रि', बीसवेंमें 'गौतम' और इक्कीसवें द्वापरमें हर्यात्मा 'उत्तम' नामक व्यास कहे गये हैं॥ ३१॥ |
| वेनो वाजश्रवाश्चैव सोमोऽमुष्यायणस्तथा।<br>तृणबिन्दुस्तथा व्यासो भार्गवस्तु ततः परम्॥ ३२ | बाईसवेंमें 'वाजश्रवा वेन', तेईसवेंमें 'आमुष्यायण सोम', चौबीसवेंमें 'तृणविन्दु' तथा पचीसवें द्वापरमें 'भार्गव' व्यास हुए॥ ३२॥ |