देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 78, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 78
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
[ पूर्वार्ध ]
प्रथमः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
महर्षि शौनकका सूतजीसे श्रीमद्देवीभागवतपुराण सुनानेकी प्रार्थना करना
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ॐ सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि।<br>बुद्धिं या नः प्रचोदयात्॥ १ | जो सर्वचेतनात्मकस्वरूपा, आदिशक्ति तथा ब्रह्मविद्या-स्वरूपिणी भगवती जगदम्बा हैं, उनका हम ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धिको प्रेरणा प्रदान करें॥ १॥ |
| शौनक उवाच<br>सूत सूत महाभाग धन्योऽसि पुरुषर्षभ।<br>यदधीतास्त्वया सम्यक् पुराणसंहिताः शुभाः॥ २<br>अष्टादश पुराणानि कृष्णेन मुनिनानघ।<br>कथितानि सुदिव्यानि पठितानि त्वयानघ॥ ३<br>पञ्चलक्षणयुक्तानि सरहस्यानि मानद।<br>त्वया ज्ञातानि सर्वाणि व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ ४ | **शौनक बोले—**हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ तथा भाग्यवान् सूतजी! आप धन्य हैं; क्योंकि संसारमें अत्यन्त दुर्लभ पुराण-संहिताओं का आपने भलीभाँति अध्ययन किया है। हे पुण्यात्मन्! हे मानद! आपने कृष्णद्वैपायन व्यासरचित अठारह महापुराणोंका सम्यक् अध्ययन किया है, जो पंच लक्षणोंसे युक्त तथा गूढ रहस्योंसे समन्वित हैं और जिनका आपने सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे ज्ञान प्राप्त किया है॥ २–४॥ |
| अस्माकं पुण्ययोगेन प्राप्तस्त्वं क्षेत्रमुत्तमम्।<br>दिव्यं विश्वसनं पुण्यं कलिदोषविवर्जितम्॥ ५<br>समाजोऽयं मुनीनां हि श्रोतुकामोऽस्ति पुण्यदाम्।<br>पुराणसंहितां सूत ब्रूहि त्वं नः समाहितः॥ ६ | हमारे पुण्यसे ही आप इस उत्तम, मुनियोंके निवास-योग्य, दिव्य, पुण्यप्रद तथा कलिके दोषोंसे रहित क्षेत्रमें पधारे हुए हैं। हे सूतजी! मुनियोंका यह समुदाय परम पुण्यदायिनी पुराण-संहिताका श्रवण करना चाहता है। अतः आप समाहितचित्त होकर हमलोगोंसे उसका वर्णन कीजिये॥ ५-६॥ |
| दीर्घायुर्भव सर्वज्ञ तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम्॥ ७ | हे सर्वज्ञ! आप तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से रहित होकर दीर्घजीवी हों। हे महाभाग! ब्रह्मप्रतिपादक देवीभागवतमहापुराणका वर्णन करें॥ ७॥ |
| श्रोत्रेन्द्रिययुताः सूत नराः स्वादविचक्षणाः।<br>न शृण्वन्ति पुराणानि वञ्चिता विधिना हि ते॥ ८<br>यथा जिह्वेन्द्रियाह्लादः षड्रसैः प्रतिपद्यते।<br>तथा श्रोत्रेन्द्रियाह्लादो वचोभिः सुधियां स्मृतः॥ ९ | हे सूतजी! जो मनुष्य श्रवणेन्द्रिययुक्त होते हुए भी केवल जिह्वाके स्वादमें ही लगे रहते हैं और पुराणोंकी कथाएँ नहीं सुनते, वे निश्चित ही अभागे हैं। जैसे षड्रसके स्वादसे जिह्वाको आह्लाद होता है, वैसे विद्वज्जनोंके वचनोंसे कर्णेन्द्रियको आनन्द प्राप्त होता है॥ ८-९॥ |