देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |
| अश्रोत्राः फणिनः कामं मुह्यन्ति हि नभोगुणैः।<br>सकर्णा ये न शृण्वन्ति तेऽप्यकर्णाः कथं न च॥१० | जब कर्णहीन सर्प भी मधुर ध्वनि सुनकर मोहित हो जाते हैं, तब भला कर्णयुक्त मानव यदि कथा नहीं सुनते तो उन्हें बधिर क्यों न कहा जाय?॥१०॥ | | अतः सर्वे द्विजाः सौम्य श्रोतुकामाः समाहिताः।<br>वर्तन्ते नैमिषारण्ये क्षेत्रे कलिभयार्दिताः॥११ | अतः हे सौम्य! समाहितचित्त होकर कथा सुननेकी इच्छासे सभी द्विजगण कलिकालके भयसे पीड़ित हो इस नैमिषारण्यमें उपस्थित हैं॥११॥ | | येन केनाप्युपायेन कालातिवाहनं स्मृतम्।<br>व्यसनैरिह मूर्खाणां बुधानां शास्त्रचिन्तनैः॥१२ | जिस किसी प्रकारसे समय तो बीतता ही रहता है, किंतु मूर्खोंका समय व्यर्थ दुर्व्यसनोंमें बीतता है और विद्वानोंका समय शास्त्र-चिन्तनमें जाता है॥१२॥ | | शास्त्राण्यपि विचित्राणि जल्पवादयुतानि च।<br>(त्रिविधानि पुराणानि शास्त्राणि विविधानि च।<br>वितण्डाच्छलयुक्तानि गर्वामर्षकराणि च॥)<br>नानार्थवादयुक्तानि हेतुमन्ति बृहन्ति च॥१३ | शास्त्र भी विचित्र प्रकारके तर्क-वितर्कसे युक्त हैं। (पुराण तीन प्रकारके तथा शास्त्र विविध प्रकारके हैं, जो नानाविध वाद-विवाद तथा छल-प्रपंचसे युक्त हैं और अहंकार तथा अमर्ष उत्पन्न करनेवाले हैं) वे अनेक अर्थवाद तथा हेतुवादसे युक्त और बहुत विस्तारवाले हैं॥१३॥ | | सात्त्विकं तत्र वेदान्तं मीमांसा राजसं मतम्।<br>तामसं न्यायशास्त्रं च हेतुवादाभियन्त्रितम्॥१४ | उन शास्त्रोंमें वेदान्तशास्त्र सात्त्विक, मीमांसा राजस तथा न्यायशास्त्र तामस कहा गया है; क्योंकि वह हेतुवादसे परिपूर्ण है॥१४॥ | | तथैव च पुराणानि त्रिगुणानि कथानकैः।<br>कथितानि त्वया सौम्य पञ्चलक्षणवन्ति च॥१५ | इसी प्रकार हे सौम्य! आपके द्वारा कहे गये पुराण कथा-भेदसे तीन गुणोंवाले तथा पाँच लक्षणोंसे समन्वित हैं॥१५॥ | | तत्र भागवतं पुण्यं पञ्चमं वेदसम्मितम्।<br>कथितं यत्त्वया पूर्वं सर्वलक्षणसंयुतम्॥१६ | आपने यह भी बताया है कि उन पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवत पाँचवाँ पुराण है, पवित्र है, वेदके समान है और सभी लक्षणोंसे युक्त है॥१६॥ | | उद्देशमात्रेण तदा कीर्तितं परमाद्भुतम्।<br>मुक्तिप्रदं मुमुक्षूणां कामदं धर्मदं तथा॥१७<br><br>विस्तरेण तदाख्याहि पुराणोत्तममादरात्।<br>श्रोतुकामा द्विजाः सर्वे दिव्यं भागवतं शुभम्॥१८ | उस समय आपने प्रसंगवश अत्यन्त अद्भुत, मुमुक्षुजनोंके लिये मुक्तिप्रद, मनोरथ पूर्ण करनेवाले, धर्ममें रुचि उत्पन्न करनेवाले जिस पुराणको संक्षेपमें कहा था, उस उत्तम पुराणको विस्तारपूर्वक कहिये। उस दिव्य तथा कल्याणमय श्रीमद्देवीभागवतपुराणको हम सभी द्विजगण आदरपूर्वक सुननेकी इच्छा रखते हैं॥१७-१८॥ | | त्वं तु जानासि धर्मज्ञ पौराणीं संहितां किल।<br>कृष्णोक्तां गुरुभक्तत्वात् सम्यक् सत्त्वगुणाश्रयः॥१९ | हे धर्मज्ञ! गुरुभक्त एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न होनेके कारण आप कृष्णद्वैपायनके द्वारा कही गयी इस प्राचीन संहिताका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं॥१९॥ | | श्रुतान्यन्यानि सर्वज्ञ त्वन्मुखान्निःसृतानि च।<br>नैव तृप्तिं व्रजामोऽद्य सुधापानेऽमरा यथा॥२० | जिस प्रकार देवतालोग अमृतपान करते हुए तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार हमलोगोंने भी यहाँ आपके मुखारविन्दसे निकली अन्यान्य कथाएँ सुनीं, किंतु अभी भी हम तृप्त नहीं हुए हैं॥२०॥ |