देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 80, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 80
| अ० २ ] | प्रथम स्कन्ध | ७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| धिक्सुधां पिबतां सूत मुक्तिर्नैव कदाचन।<br>पिबन्भागवतं सद्यो नरो मुच्येत सङ्कटात् ॥ २१ | हे सूतजी! उस अमृतको धिक्कार है, जिसके पीनेसे कभी मुक्ति नहीं होती, परंतु इस भागवतरूपी कथा-सुधाके पानसे तो मनुष्य शीघ्र ही भवसंकटसे मुक्त हो जाता है॥ २१॥ |
| सुधापाननिमित्तं यत् कृता यज्ञाः सहस्रशः।<br>न शान्तिमधिगच्छामः सूत सर्वात्मना वयम् ॥ २२<br><br>मखानां हि फलं स्वर्गः स्वर्गात्प्रच्यवनं पुनः।<br>एवं संसारचक्रेऽस्मिन्भ्रमणं च निरन्तरम् ॥ २३ | हे सूतजी! अमृतपानके लिये जो हजारों प्रकारके यज्ञ किये गये हैं, उनसे भी सर्वदाके लिये हमें शान्ति नहीं मिली। यज्ञोंका फल तो केवल स्वर्ग है, [पुण्य क्षीण होनेपर] पुनः स्वर्गसे मृत्युलोकमें लौटना ही पड़ता है। इस प्रकार निरन्तर आवागमनके चक्रमें आना-जाना लगा रहता है॥ २२-२३॥ |
| विना ज्ञानेन सर्वज्ञ नैव मुक्तिः कदाचन।<br>भ्रमतां कालचक्रेऽत्र नराणां त्रिगुणात्मके ॥ २४<br><br>अतः सर्वरसोपेतं पुण्यं भागवतं वद।<br>पावनं मुक्तिदं गुह्यं मुमुक्षूणां सदा प्रियम् ॥ २५ | हे सर्वज्ञ! त्रिगुणात्मक कालचक्रमें भ्रमण करते हुए मनुष्योंकी ज्ञानके बिना मुक्ति कदापि सम्भव नहीं है। इसलिये सब प्रकारके रसोंसे परिपूर्ण तथा पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवतपुराण कहिये; जो पवित्र, मुक्तिदायक, गोपनीय तथा मुमुक्षुजनोंको सर्वदा प्रिय है॥ २४-२५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शौनकप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
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अथ द्वितीयोऽध्यायः
सूतजीद्वारा श्रीमद्देवीभागवतके स्कन्ध, अध्याय तथा श्लोकसंख्याका निरूपण और उसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| धन्योऽहमतिभाग्योऽहं पावितोऽहं महात्मभिः।<br>यत्पृष्टं सुमहत्पुण्यं पुराणं वेदविश्रुतम् ॥ १ | [हे मुनिजनो!] मैं धन्य और महान् भाग्यशाली हूँ, जो कि आप महात्माओंने वेदविश्रुत तथा अत्यन्त पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणके सम्बन्धमें प्रश्न करके मुझे पवित्र बना दिया॥ १॥ |
| तदहं सम्प्रवक्ष्यामि सर्वश्रुत्यर्थसम्मतम्।<br>रहस्यं सर्वशास्त्राणामागमानामनुत्तमम् ॥ २ | इसलिये मैं सभी वेदोंके तात्पर्यसे युक्त, सभी शास्त्रों और आगमोंके रहस्यरूप सर्वोत्तम श्रीमद्देवी-भागवतपुराणको आपलोगोंसे कहता हूँ॥ २॥ |
| नत्वा तत्पदपङ्कजं सुललितं मुक्तिप्रदं योगिनां<br>ब्रह्माद्यैरपि सेवितं स्तुतिपरैर्ध्येयं मुनीन्द्रैः सदा।<br>वक्ष्याम्यद्य सविस्तरं बहुरसं श्रीमत्पुराणोत्तमं<br>भक्त्या सर्वरसालयं भगवतीनाम्ना प्रसिद्धं द्विजाः ॥ ३ | हे द्विजगण! ब्रह्मा-विष्णु-महेशसे सेवित, स्तुतिपरायण मुनिजनोंके सतत ध्यान करनेयोग्य तथा योगियोंको मुक्ति देनेवाले भगवतीके सुन्दर एवं कोमल चरणकमलोंमें प्रणाम करके मैं अब उस उत्तम पुराणका भक्तिपूर्वक विस्तारसे वर्णन करूँगा; जो सभी रसोंसे युक्त, शोभासम्पन्न, सभी रसोंका निधान एवं श्रीमद्देवीभागवतके नामसे प्रसिद्ध है॥ ३॥ |